Thursday, April 7, 2022

भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्



 षडधिकशततम: सर्ग:

भरत की पुनः श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना 


अर्थयुक्त वचन यह कहकर, श्रीरामचंद्र  मौन हो गए 

मंदाकिनी तट पर भरत ने, ये अनोखे फिर वचन कहे 


नहीं आप सा दूसरा जगत में, परे आप हर सुख-दुःख से

वृद्ध जनों से आदर पाते, फिर भी उनसे प्रश्न पूछते  


मृत जीव की भाँति देह से, नहीं संबंध जीवित रहते भी 

राग-द्वेष से मुक्त सदा जो, उसको फिर पीड़ा क्यों होगी  


आत्म-अनात्म का ज्ञान जिसे है, संकट में भी शांत रहेगा 

आप सत्वगुण से संपन्न, सत्य प्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, महात्मा 


ऐसे उत्तम गुणों से युक्त, जन्म-मरण के भेद को जानें 

असह्य दुःख कैसे आ सकता, बुद्धिमान, साक्षी, सयाने 


जब राज्य से बाहर गया था, तुच्छ विचार किया माता ने  

मुझे नहीं अभीष्ट पाप वह, हों प्रसन्न क्षमा उसे करके 


धर्म के बंधन में बँधा हूँ, माँ को दंड नहीं दे सकता 

कुल-धर्म दोनों ही शुभ हैं, मैं मातृ वध कैसे कर सकता 


महाराज पिता, गुरू,व राजा, चले गए हैं परलोक को 

इसलिए इस भरी सभा में, निंदित नहीं कर सकता उनको 


भला कौन होगा नर ऐसा, पूर्ण धर्म का ज्ञान जिसे हो 

स्त्री प्रिय करने की ख़ातिर, कुत्सित कर्म जो कर सकता हो 


लोक में यह किवदंती प्रचलित, अंतकाल में मति खो जाती 

किया कठोर कृत्य राजा ने, सिद्द सत्यता इसकी कर दी 


क्रोध, मोह, साहस के कारण, किया धर्म का जो उल्लंघन 

 निर्णय वही पलट दें आज, आप करें उसका संशोधन  


है उत्तम संतान वही जो,  निज पिता की भूल सुधारे

नहीं करे समर्थन उसका,  जो बाहर धर्म  की सीमा से 


Thursday, March 24, 2022

राम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए ही राज्य ग्रहण न करके वन में ही रहने का दृढ़ निश्चय बताना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

पंचाधिकशततम: सर्ग: 


भरत का श्रीराम को अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करने के लिए कहना, श्रीराम का जीवन की अनित्यता बताते हुए पिता की मृत्यु के लिए शोक न करने का भरत को उपदेश देना और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए ही राज्य ग्रहण न करके वन में ही रहने का दृढ़ निश्चय बताना 


नाश हो रहा है आयु का, हित आत्मा का सदा धर्म से 

सब अपना कल्याण चाहते, करें साधना जान के इसे 


पिता हमारे धर्मात्मा थे, यज्ञ किए परम शुभ कारक 

दी पर्याप्त दक्षिणाएँ भी, स्वर्ग गये हैं पावन होकर 


परिजनों का पालन करते थे, प्रजाजनों का पोषण भी 

धर्म युक्त कर ही लेते थे, इस कारण पायी श्रेष्ठ गति 


यज्ञ पुरुष की कर आराधना, प्रचुर भोग प्राप्त किए थे 

सत्पुरुषों से हुए सम्मानित, उत्तम आयु भी मिली उन्हें 


शोक करने योग्य नहीं हैं, दैवी सम्पत्ति उन्हें  मिली है

ब्रह्मलोक में विचरण करते, दान-दक्षिणा अति बाँटी है 


शास्त्र ज्ञान से सम्पन्न हो तुम,  शोक न करो पिता के लिए

धीर व प्रज्ञावान पुरुष को, है उचित,सभी दुःख शोक तजे 


वक्ताओं में श्रेष्ठ हे भरत, त्यागो विलाप अब स्वस्थ बनो 

अयोध्यापुरी में लौट पुनः, पिता की आज्ञा को मानो 


पुण्य कर्मा उन महाराज ने, मुझे भी जो आज्ञा दी है 

पालन करूँगा वही आदेश, उसे तोड़ना उचित नहीं है


सर्वदा सम्मान के योग्य, वही हितैषी जन्मदाता थे 

वनवास के कर्म के द्वारा, करूँगा पालन वचन उनके  


जो परलोक पर विजय चाहता, वह नर धर्म के पथ जाए 

गुरुजनों का आज्ञापालक, आत्मा को उन्नत बनाए 


पूज्य पिता के शुभ कर्मों पर, कर दृष्टिपात प्रयास करो 

निज धार्मिक स्वभाव के द्वारा, स्वयं उद्धार का यत्न करो 


एक मुहूर्त राम भरत को, पिता की आज्ञा रहे बताते 

अर्थयुक्त वचन कई कहकर, श्रीरामचंद्र फिर मौन हुए 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Thursday, March 10, 2022

श्रीराम का जीवन की अनित्यता बताते हुए पिता की मृत्यु के लिए शोक न करने का भरत को उपदेश देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


पंचाधिकशततम: सर्ग: 


भरत का श्रीराम को अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करने के लिए कहना, श्रीराम का जीवन की अनित्यता बताते हुए पिता की मृत्यु के लिए शोक न करने का भरत को उपदेश देना और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए ही राज्य ग्रहण न करके वन में ही रहने का दृढ़ निश्चय बताना 


 सब संग्रहों का अंत विनाश, लौकिक उन्नति का अंत पतन 

मिलन का अंत वियोग ही होता, जीवन का है अंत मरण 


पके हुए फल ज्यों गिर जाते, पतन सिवा भय है उनको क्या

पैदा हुआ हर प्राणी मरे, मृत्यु सिवा उसको भी भय क्या 


जैसे सुदृढ़ स्तम्भ वाला घर, ढह जाता जर्जर होने पर

सब मानव भी नष्ट हो जाते, जरा और मृत्यु वश पड़कर 


रात्रि जो भी गुजर जाती है, नहीं लौटकर वापस आती 

जल से भरे समुद्र को गयी, यमुना वापस नहीं लौटती 


दिवस-रात गुजरते अविरत, आयु सभी की सदा ही घटती 

सूर्य रश्मियाँ ग्रीष्म ऋतु में, ज्यों नीर सदा सुखातीं रहतीं 


तुम स्वयं के लिए ही सोचो, क्यों करते हो शोक अन्य का 

आयु नर की सदा घटती, हो अन्यत्र या वासी यहाँ का 


मृत्यु सदा साथ ही चलती, संग बैठती सदा मानव के 

दूर यात्रा में संग जाकर, साथ लौटती सदा उसके 


तन पर पड़ीं झुर्रियाँ जिसके, सिर के केश सफ़ेद  हो गए 

जरावस्था से जीर्ण हुआ नर, मृत्यु से बचेगा कैसे 


नर सूर्योदय पर खुश होते, सूर्यास्त का स्वागत करते 

प्रतिदिन जीवन विनष्ट हो रहा, किन्तु न इतनी बात जानते 


किसी ऋतु का प्रारम्भ देखकर, लोग हर्ष से खिल उठते हैं 

पर न जानें ऋतु परिवर्तन से, क्षय होता प्राणों का उनके 


ज्यों सागर में बहते दो काठ, मिलकर बिछड़ कभी जाते हैं 

स्त्री, पुत्र, कुटुंम्ब, धन आदि, सदा साथ कब किसके रहते हैं 


इस जग का कोई भी प्राणी, जन्म-मरण से नहीं बच सकता 

स्वयं की मृत्यु को टाल न सके, मृत के लिए शोक जो करता 


ज्यों जाते यात्रियों को देख, मार्ग में खड़ा पथिक सुनाये 

मैं भी पीछे ही आता हूँ,  तदनुसार वह पीछे जाये 


वैसे ही पूर्वज हमारे, जिस मार्ग से गए हैं आगे 

जिस पर जाना अनिवार्य है, जिससे कोई बच नहीं पाए 


उस मार्ग पर खड़ा हुआ नर, औरों हित कैसे शोक मनाये 

जैसे नदियाँ नहीं लौटतीं, ढलती आयु नहीं फिर आये 


Thursday, March 3, 2022

भरत का श्रीराम को अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करने के लिए कहना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

पंचाधिकशततम: सर्ग: 


भरत का श्रीराम को अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करने के लिए कहना, श्रीराम का जीवन की अनित्यता बताते हुए पिता की मृत्यु के लिए शोक न करने का भरत को उपदेश देना और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए ही राज्य ग्रहण न करके वन में ही रहने का दृढ़ निश्चय बताना 


वह रात्रि शोक में ही बीती, सब भाई मिलकर बैठे थे

प्रातः काल मंदाकिनी तट गये, स्नान, होम, जप आदि किए  


पुनः आकर हो मौन बैठ गए, कोई कुछ नहीं बोल रहा 

सुहृदों के मध्य बैठे तब, भ्राता राम से भरत ने कहा 


पिताजी ने  देकर वरदान,  संतुष्ट किया मेरी माँ को

माँ ने राज्य मुझे सौंपा,  जो  सेवा में अर्पित आपको


आप करें अब पालन इसका,  मैं देता हूँ अपनी ओर से

वर्षा में भग्न पुल की भाँति,  अति कठिन है सम्भालना इसे


गधा अश्व की, विहग गरुड़ की,  चाल नहीं चल सकते जैसे

मुझमें भी सामर्थ्य नहीं यह , आप भाँति राज करूँ कैसे 


करे अन्यों का जीवन निर्वाह, उत्तम है उसी का  जीवन

जो अन्य के आश्रित रहता,  अति दुखकारी है उसका हर दिन  


जैसे फल की इच्छा रखकर, कोई एक पौधा लगाता 

पालपोसकर बड़ा भी किया, किंतु नहीं उससे फल पाता 


कैसे वह सुख पा सकता है, जिसने उसे लगाया था 

इस उपमा को आप समझ लें, क्या इसमें समझाया था 


श्रेष्ठ और समर्थ होकर, यदि आप राज्य का भार न लें 

आप पर ही लागू होगा,  जो  प्रसंग कहा है पहले


विभिन्न संघ व प्रधान पुरुष सब, शत्रु दमन राम को देखें 

तपते सूर्य की भाँति आप, जब राज्य सिंहासन पर बैठें 


लौट अयोध्या चलने पर, मतवाले गज गर्जना करें 

अंत:पुर की सारी स्त्रियाँ मिल, अभिनंदन हर्षित हो करें 


भरत की बात का अनुमोदन, विभिन्न नागरिकों ने किया 

तब धीर भगवान राम ने,  देते हुए सांत्वना यह कहा  


ईश्वर सम जीव नहीं स्वतंत्र, इच्छा से कुछ कर न सकता 

काल डोर में बँधा हुआ है, इधर-उधर खिंचा है करता 



Thursday, February 24, 2022

वसिष्ठ जी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


चतुरधिकशततम: सर्ग:


वसिष्ठ जी के साथ आती हुई कौसल्या का मंदाकिनी के तट पर सुमित्रा आदि के सम्मुख दुःखपूर्ण उद्गार, श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के द्वारा माताओं की चरण वंदना तथा वसिष्ठ जी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना 


सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ राम, देख उन्हें तब खड़े हो गये 

स्पर्श किया कमल चरणों का, बारी-बारी से उन सबके 


विशालनेत्र माएँ स्नेह वश, कोमल थीं जिनकी अंगुलियाँ 

धूल पोंछने लगी पीठ से, सुखद स्पर्श सुंदर हाथों का 


लक्ष्मण भी अति दुखी हो गये, देख दर्द उन माताओं का 

स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे फिर, उन चरणों में प्रणाम किया 


श्रीराम के साथ किया जैसा, वैसा ही स्नेह दर्शाया 

माताओं ने उनकी पीठ पर, कोमल हाथों को फिराया 


अश्रुओं भरे नेत्रों वाली, सीता ने फिर प्रणाम किया 

कौसल्या ने हृदय लगाया, जैसे बेटी को कोई माँ 


विदेहराज जनक की पुत्री,  पुत्रवधू राजा दशरथ की

श्री राम की पत्नी सीता,  माता पूछें, क्यों दुःख भोगती 


मुख तुम्हारा लग रहा ऐसा, धूप से तपा हआ कमल ज्यों 

कुचला उत्पल, धुसरित स्वर्ण या ढका बदलियों से चाँद हो  


जैसे काष्ठ को अग्नि जलाती, सीता! लख तुम्हारे  मुख को 

आपद अरणि से उत्पन्न दुःख,जला रहा है मेरे मन को

 

शोकाकुल माँ विलाप करें, राम ने पकड़ा गुरु चरणों को 

जैसे स्वर्ग के राजा इंद्र,  स्पर्श करें बृहस्पति चरण को 


अग्नि  समान तेज था जिनका, गुरु वशिष्ठ के चरण थाम कर 

आदर, प्रेम से भरे हुए, राम बैठ गये वहीं भूमि पर 


उसके बाद भरत भी बैठे, बड़े भाई के पीछे आकर 

मंत्री, सैनिक, पुरवासी व, धर्मज्ञ पुरुषों के साथ तब 


दिव्य दीप्ति से प्रकाशित थे राम, निकट बैठे हुए भरत ने 

उनके प्रति हाथ जोड़े तब,  ब्रह्मा जी को इंद्र ज्यों जोड़ें 


वहाँ बैठे श्रेष्ठ पुरुषों के, हृदय में तब जगा कौतूहल 

क्या कहते हैं भरत राम को, आदर से प्रणाम करके अब 


सत्यप्रतिज्ञ राम, श्रेष्ठ लक्ष्मण, धर्मात्मा भरत तीनों वे 

त्रिविध अग्नियों सी शोभा पाते थे, सुहृदयों से घिरे हुए



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Wednesday, February 16, 2022

कौसल्या का मंदाकिनी के तट पर सुमित्रा आदि के सम्मुख दुःखपूर्ण उद्गार,

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


चतुरधिकशततम: सर्ग:


वसिष्ठ जी के साथ आती हुई कौसल्या का मंदाकिनी के तट पर सुमित्रा आदि के सम्मुख दुःखपूर्ण उद्गार, श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के द्वार माताओं की चरण वंदना तथा वसिष्ठ जी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना 


राम दर्शन की ले अभिलाषा,  रानियों को करके आगे

मुनि वसिष्ठ  चल पड़े  उस ओर, जहाँ राम निवास करते थे 


मंद गति से चलती हुईं वे, मंदाकिनी घाट पर पहुँचीं 

देख जिसे कौसल्या के मुख पर, धार अश्रुओं की बहती 


शुष्क और उदास मुख से तब, कहे वचन सुमित्रा व सबसे 

आलस्य रहित पुत्र लक्ष्मण, राम हेतु जल लेते यहाँ से 


राज्य से निकाले गये जो, उन अनाथों का है तीर्थ यही  

  प्रिय बालक हैं जो मेरे,  दुःख अन्यों को देते कभी नहीं


लघु सेवा कार्य स्वीकार किया, किंतु नहीं निंदित हैं लक्ष्मण

गुणवान बड़े भाई के कार्य, नहीं करें वे ही हैं अक्षम 


किंतु नहीं है योग्य दुखों के, सहन उसे करने पड़ते हैं 

लौट चलें अब यदि श्रीराम, दुःख दायक कर्म सभी त्यागें 


आगे जा विशाल लोचना,  कौसल्या ने  देखा राम को

वसुंधरा  पर बिछे कुशों पर , इंगुदि का पिंड रखते जो


दुखी राम के द्वारा पिता हित, पिंड दिए जाने को देख 

 कहा कौसल्या ने, “देखो बहनों, विधिपूर्वक किया है श्राद्ध” 


देव समान तेजस्वी राजा, उत्तम भोगों को भोग चुके  

उनके लिए उचित नहीं यह,  कैसे इसे वह ग्रहण करेंगे 


इससे बढ़कर क्या दुख होगा, समृद्धिशाली होकर भी राम 

इंगुदी के पिसे फल का पिंड, दान पिता हित करते आज 


लौकिक श्रुति यह सत्य लग रही, हृदय विदीर्ण हुआ है  दुःख से

 जो अन्न स्वयं खाता मानव, वही खाते देवता उसके  


शोक से व्याकुल कौसल्या को, समझाकर ले गयीं रानियाँ 

आश्रम में श्रीराम को देखा,  गिरे स्वर्ग से ज्यों देवता 


त्याग सभी भोग का करके, तपस्वी जीवन वे जीते थे 

दुःख से कातर हुईं माताएँ, रोने लगीं आर्त भाव से 




Thursday, February 10, 2022

श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिए जलांजलि दान, पिंड दान और रोदन

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

त्र्यधिकशततम: सर्ग: 


श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिए जलांजलि दान, पिंड दान और रोदन 


कुछ ही समय तो अभी हुआ था, श्री राम को उनसे बिछड़े 

किंतु सभी को लगा यही था, देखा नहीं है जाने कब से 


जल्दी देखें मिलन भाइयों का,  उत्सुकता सबके मन में 

नाना तरह की सवारियों पर, बड़ी उतावली से निकले 


रथ के पहियों से आक्रांत, भूमि भयंकर शब्द कर रही 

ज्यों मेघों की घटा घिरने से, गड़गड़ाहट होने लगती 


तुमुलनाद से होकर भयभीत, हाथी, हथिनियों से घिरकर 

मद की गंध सुवासित करते, गये दूसरे वन में चलकर 


वराह, भेड़िए, सिंह, भैंसे, सृमर, व्याघ्र, गोकरण व गवय 

हरिण, हंस, जल कुक्कुट, कारंडव, नर कोकिल व क्रौंच भागे  


हुए संत्रस्त, होश हवास खो, विभिन्न दिशा में चले गये    

डरे हुए उस शब्द से पक्षी, छा गये सम्पूर्ण गगन में 


भू पर मानव, नभ में पंछी, दोनों  की शोभा होती थी 

यशस्वी, पापरहित पुरुष से, मिलने की आशा मन में थी 


सहसा उनके पास गये सब, वेदी पर श्री राम बैठे थे 

अश्रु बहने लगे मुखों पर, कैकेयी की निंदा करते थे 


 श्रीराम ने देखा सबको, बड़े प्रेम से गले लगाया 

 यथा योग्य सम्मान किया , कुछ ने चरणों में प्रणाम किया 


रोते हुए प्रजाजनों का, रुदन मृदंग की ध्वनि समान था 

 गगन, गुफा, दिशाओं में गूंजे, सभी ओर व्याप्त रहा था  



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ.