Thursday, September 10, 2020

भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


एकनवतितम: सर्ग: 

भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार 



उत्तम व्रत का पालन करते, तेज युक्त भरद्वाज मुनि ने  

आवाहन किया उन सबका, हो सम्पन्न एकाग्र चित्त से


पूर्व दिशा में दो हाथ जोड़कर, मन ही मन फिर ध्यान किया 

एक-एक कर सभी देवता, आ पहुँचे ज्यों ही स्मरण किया  


मलय व दर्दुर पर्वत को छू,  बही पवन सुख देनेवाली 

दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई,  दुंदुभियों का शब्द सुनायी


नृत्य, गान, वीणा के स्वरों से, धरती व आकाश भर गए 

कोमल, मधु, लयगुण से सम्पन्न, कर्ण प्रिय था शब्द वह दिव्य 


विश्वकर्मा का वास्तु कौशल, भरत की सेना ने निहारा  

समतल हो गयी भूमि दूर तक, उग आयी उस पर दूर्वा 


आम, बेल, बिजौरा, आंवला, भांति-भांति के वृक्ष लगे थे 

चैत्ररथ वन आ पहुँचा था, भरा  भोग की सामग्रियों से 



तटवर्ती वृक्षों से शोभित, नदियां भी वहाँ आ पहुंची 

उज्ज्वल घर, चबूतरे बन गए, निर्मित हुए नगर द्वार भी 


हाथी, घोड़ों के रहने हित, शालाएं भी बनीं सुविशेष 

अट्टालिकाएं, महल विशाल, लखते सब थे जिन्हें अनिमेष 


राजा के परिवार हेतु इक, दिव्य भवन था श्वेत मेघ सा 

सुंदर द्वार, सजा फूल से, दिव्य सुगन्धित जल से सींचा


चौकोना व अति विशाल था, सोने, बैठने लिए थे स्थान 

भोजन, रस, वस्त्र सब कुछ थे, हरेक प्रकार के दिव्य पदार्थ 


तरह-तरह के अन्न पात्र थे, सब प्रकार के आसन भी थे 

सोने हित सुंदर शय्याएँ, किया प्रवेश भरत ने उसमें 


गए पुरोहित और मंत्री, भवन देखकर हुए आनंदित 

राज सिंहासन, चँवर छत्र भी, रखे हुए थे वहाँ सज्जित 


श्रीराम की भरे भावना, प्रदक्षिणा की भरत ने उनकी 

सिंहासन पर राम विराजते, यही सोच वन्दना भी की 


चँवर हाथ में लेकर फिर वे, मंत्री के आसन पर बैठे 

पुरोहित, मंत्री, सेनापति भी, यथोचित स्थानों पर बैठे 


दो घड़ी में हुईं उपस्थित, नदियां भरत की सेवा में फिर 

भरद्वाज मुनि के तप से, जल के स्थान पर जिनमें थी खीर 


 

Tuesday, June 30, 2020

भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


एकनवतितम: सर्ग: 

भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार 

किया भरत ने जब दृढ निश्चय, आश्रम में ही  निवास करें वे   
 दिया निमंत्रण मुनि ने उसको,आतिथ्य  उन्हीं का ग्रहण करे 

वन में जैसा भी है संभव, अर्घ्य, पाद्य, फल, मूल मुझे दे 
कर ही चुके हैं स्वागत मेरा, कहा, नहीं कुछ और चाहिए   

हँसते हुए तब कहा मुनि ने, मेरे प्रति है स्नेह तुम्हारा 
तुम मुझसे सन्तुष्ट रहोगे, जितना भी मैं तुमको दूंगा 

किन्तु इस समय मैं चाहता, सेना को भोजन करवाऊँ
होगी इससे अति प्रसन्नता, इस अवसर से चूक न जाऊं 

सेना को क्यों छोड़ के आये, मुनिवर ने भरत से पूछा 
भय आपका ही था मुझको, दो हाथ जोड़ उत्तर यह दिया 

तपस्वियों से दूर ही रहें,  उचित यही है राजपुत्रों को 
सेना में हाथी, घोड़े हैं, हानि होगी आश्रम भूमि को 

सेना को यहीं बुलवाओ,  दी मुनिवर ने तब यह आज्ञा 
 अग्निशाला में पहुँचे फिर वह,  कर आचमन मुख पोंछा

विश्वकर्मा का कर आवाहन, उन्हें कहा मन्तव्य अपना 
हो सेनासहित भरत का स्वागत,  उचित प्रबन्ध  करें इसका 

इंद्र सहित लोकपालों को  भी, इस कार्य का दिया आदेश 
पृथ्वी व आकाश में बहती, नदियों का किया  आवाहन 

कुछ नदियां मैरेय ले आएं, कुछ सुरा, ईख सा मीठा जल  
गन्धर्वों, अप्सराओं को, कहा पधारें वाद्ययंत्र संग 

चैत्ररथ वन को बुलवाया, उत्तम अन्न हित कहा सोम से 
ताजे पुष्प, मधु  पेय पदार्थ, प्रस्तुत करें फलों के गूदे  


Wednesday, May 27, 2020

भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

नवतितम: सर्ग: 

भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने ही आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना 

धर्म ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने, निकट पहुँच कर आश्रम के
रुकने का आदेश दिया, सभी को आश्रम से कुछ पहले 

अस्त्र-शस्त्र उतार कर  रखे, राजोचित निज वस्त्र भी बदले 
दो रेशमी वस्त्र पहनकर, पैदल ही गए उनसे मिलने 

चले पुरोहित उनके आगे, मन्त्रीगण भी साथ गए थे 
देख दूर से मुनिवर को फिर, वसिष्ठ मुनि संग आगे गए 

मुनि भरद्वाज खड़े हो गए, 'लाओ अर्घ्य'  कहा शिष्यों से 
दोनों मुनिजन मिले आपस में, किया तब प्रणाम भरत ने 

महातेजस्वी मुनि समझ गए, दशरथ नन्दन भरत यह हैं 
कुल का कुशल-मंगल पूछा , अर्घ्य, पाद्य, फल देकर उनसे 

सेना, खजाना, मित्र सहित, मन्त्रिमण्डल का हाल जाना 
राजा मृत हैं उन्हें ज्ञात था, उनके विषय में कुछ न पूछा

मुनि वसिष्ठ व भरत ने भी तब, महर्षि की जानी कुशलता 
अग्निहोत्र, शिष्य, पशु, पौधे, समाचार सभी का ज्ञात किया 

‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर, भरद्वाज मुनि भरत से बोले 
तुम अयोध्या के राजा हो, किस कारण यहाँ तुम आये 

शुद्ध नहीं है मेरा अंतर, तुम्हारे प्रति नहीं विश्वास 
तुम थे कारण राम गए वन, अब क्या और करोगे घात

दुःख से भरी भरत की आँखें, लड़खड़ा गयी थी वाणी भी 
आप भी यदि ऐसा कहते हैं, तब तो मैं बड़ा हतभागी 

निश्चित रूप से मुझे ज्ञात है, मेरा नहीं कोई अपराध 
नहीं कहें कठोर वचन ये, नहीं मानी माता की बात 

मैं तो उन पुरुष सिंह को, अयोध्या में ले जाने आया 
भगवन आप बताएं कहाँ, श्रीराम ने अब निवास बनाया 

भरत का कुछ अपराध नहीं है, वसिष्ठ आदि मुनियों ने कहा
प्रसन्न होकर तब भरद्वाज ने, उनको आशीर्वचन कहा 

तुम  रघुकुल में जन्मे हो, श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण करते 
मुझे ज्ञात है भाव तुम्हारा, पूछा बस जिससे कीर्ति बढ़े 

श्रीरामचन्द्र तुम्हारे भ्राता, चित्रकूट पर्वत पर रहते 
आज यहीं विश्राम करो,  यात्रा करना कल तुम आगे

मेरी इस अभिलाषा को तुम, पूरा करने में  समर्थ हो 
'ऐसा ही हो' कहा भरत ने,मान लिया मुनि आज्ञा को 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Tuesday, May 19, 2020

भरत का सेनासहित गंगा पार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


एकोननवतितम: सर्ग:
भरत का सेनासहित गंगा पार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना 

श्रृंगवेरपुर में गंगा तट पर, रात्रि बिताकर भरत जगे 
गुह को शीघ्र बुलाकर लाओ, शत्रुघ्न को उठाकर बोले 

श्रीराम का चिंतन करता था, सोया नहीं आपकी भांति 
कह रहे थे शत्रुघ्न भरत से, आ पहुँचा था तब गुह वहीं 

हाथ जोड़कर उनसे बोले, सुख से बीती आपकी रात ? 
सेना सहित रहे बिना कष्ट के,बन्धु सहित स्वस्थ हैं आप  

गुह के स्नेहिल वचन सुने जब, कहा भरत ने तब यह उससे 
सुख से बीती रात हमारी, बड़ा सत्कार किया आपने 

अब व्यवस्था करें कुछ ऐसी, मिलकर ये मल्लाह तुम्हारे 
बहुत सी नौकाएं लाकर, गंगा से हमको पार उतारें

भरत का यह आदेश सुना तो, जाकर बोला गुह नगर में 
नौकाओं को घाट पर लाओ, सेना को हम पर उतारें 

राजा की आज्ञा मानकर, मल्लाह सभी उठ खड़े हुए 
पांच सौ नौकाएं ले आये, कर एकत्र चारों ओर से 

स्वस्तिक के चिन्हों से अलंकृत, अति मजबूत नौकाएं भी थीं 
बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटकीं थी, पताकाएं फहराती थीं  

कल्याणमयी नाव गुह लाया, जिसमें बिछे श्वेत कालीन 
मांगलिक शब्द भी होता था, स्वस्तिक नाम वाली नाव  पर 

पहले पुरोहित व गुरु बैठे, तत्पश्चात भरत व शत्रुघ्न 
कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी, अन्य रानियां हुईं आसीन  

गाड़ियाँ व अन्य सामग्री, लादी गयीं अन्य नावों पर 
सैनिक निज सामान उठाते, करने लगे महान रौरव  

पताकाएं फहराती थीं, सब पर कुशल मल्लाह बैठे  
तीव्र गति से वे उन सबको, उस पार लेकर जा रहे थे 

 कुछ पर केवल स्त्रियां ही थीं, कुछ नौकाओं पर अश्व सवार
कुछ पर खच्चर, बैल लदे थे, कुछ रत्नों को ले जातीं पार

दूसरे तट पर पहुँचाकर, जब वे नावें लौट रही थीं 
प्रदर्शन करते थे गतियां, मल्लाह बंधु जल में उनकी 

वैजयंती पताकाओं से सजे, हाथी नदी पर करते थे 
पँखधारी पर्वतों के समान, उस समय वे प्रतीत होते थे 

कितने ही जन नावों पर थे, कितने बांस के बेड़ों पर थे 
कुछ  कलशों या घड़ों के द्वारा, कुछ तैर कर पार जाते थे 

इस प्रकार वह  पावन सेना, गंगा के उस पार उतर गयी 
 मैत्र नामक मुहूर्त में स्वयं, प्रयागवन की ओर बढ़ गयी 

वहाँ पहुँच कुमार भरत, विश्राम की आज्ञा सेना को दे 
ऋत्विज व राजसदस्यों संग, भरद्वाज के दर्शन हित गए 

देवपुरोहित भारद्वाज के, आश्रम पर भरत जी पहुँचे
दर्शन किये पर्णशाला सहित, रमणीय व विशाल वन के  

  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.
 

Thursday, April 30, 2020

भरत का स्वयं वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


अष्टाशीतितम: सर्ग: 

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना 


यह है शय्या श्रीराम की, बदलीं होंगी यहीं करवटें
दबा हुआ तृण पड़ा यहां पर, इस कठोर वेदी पर सोये 

ऐसा लगता शुभ लक्षणा, सीता पहन आभूषण सोयीं
यत्र-तत्र बिखरे स्वर्ण कण, सटे हुए धागे भी रेशमी 

पति की शय्या कैसी भी हो, सुखदायिनी साध्वी को है 
सुकुमारी बाला सीता को, दुःख का लेशमात्र नहीं है 

व्यर्थ हुआ है जीवन मेरा, अति कठोर हूँ बड़ा अभागा 
जिसके कारण ही श्रीराम को, सीता संग वनवास मिला 

चक्रवर्ती सम्राट के कुल में, जन्म हुआ है श्रीराम का 
सुख देते, सबका हित करते, प्रिय लगता है दर्शन जिनका 

नीलकमल समान तन श्यामल, नयन लाल, अधिकारी सुख के 
वे रघुनाथ भू पर सोते, परित्याग निज राज्य का करके 

उत्तम लक्षण वाले लक्ष्मण, धन्य और बड़भागी अति हैं 
संकटकाल में निकट राम के, उनकी नित सेवा करते हैं 

हुईं कृतार्थ विदेहनन्दिनी, किया अनुसरण अपने पति का
संशय में तो हम सब ही हैं, छूट गया संग श्रीराम का 

महाराज चले गए स्वर्ग को, हो गए श्रीराम वनवासी 
बिन नाविक की नौका जैसी, सूनी सी लगती यह धरती 

वन में वास करें वह चाहे, यह वसुधा उनसे ही सुरक्षित 
कोई शत्रु जिसे मन से भी, लेना नहीं चाहे है रक्षित 

इस समय अयोध्या नगरी की, चारदीवारी खुली हुई है 
हाथी, घोड़े बंधे नहीं, नगरद्वार भी बन्द नहीं है 

पूर्ण अरक्षित राजधानी है, सेना में उत्साह नहीं है 
है आवरण रहित यह नगरी, अति संकट में पड़ी हुई है 

शत्रु ग्रहण नहीं करते लेकिन, विष मिश्रित भोजन की भांति
श्रीराम के बाहुबल से ही, इसकी रक्षा होती रहती 

भूमि पर मैं भी सोऊँगा, आज से वल्कल ही धारूँगा
फल-मूल का भोजन करके, जटा ही धारण किये रहूँगा 

मैं ही वहां निवास करूँगा, जितने दिन वनवास के बाकी
श्रीरामचन्द्र  की प्रतिज्ञा भी, नहीं असत्य सिद्ध तब होगी 

शत्रुघ्न मेरे साथ रहंगे, राम अयोध्या लौटेंगे
ब्राह्मण गण अभिषेक करेंगे, क्या दैव यह सफल करेंगे 

उनके चरणों पर सिर रखकर, मनाने का प्रयत्न करूंगा 
लौटने को यदि हुए न राजी, मैं भी वहीँ निवास करूँगा


  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठ्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Tuesday, April 21, 2020

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार



 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् अयोध्याकाण्डम्


अष्टाशीतितम: सर्ग: 

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना
सुनीं ध्यान से भरत ने सारी, निषादराज की बातें उस क्षण
मंत्रियों सहित निकट आये फिर, इंगुदी वृक्ष का किया निरीक्षण 

 कहा उहोंने माताओं से, राम ने रात्रि बितायी यहीं पर 
हुआ विमर्दित उनके अंगों से, यही कुश समूह सोये जिस पर  

महाराजों के कुल में उत्पन्न, राजा दशरथ के पुत्र यह 
धरती पर शयन करने के, नहीं योग्य हैं किसी तरह वह 

पुरुषसिंह श्रीराम सदा ही, उस पलंग पर सोते आए 
कोमल मृगचर्म की चादर, सुंदर बिछौनों से जो सजाये  

कैसे सोते होंगे भू पर, सदा रहे हैं महलों में ही  
स्वर्ण, रजत के फर्श हैं जिनके, पुष्पों से शोभा है जिनकी 

श्रेष्ठ भवन व अट्टालिकाएं, श्वेत बादलों सी जो उज्ज्वल 
चन्दन, अगुरु से सुगंधित, शुक समूहों का होता कलरव

शीतल कपूर की सुवास से, स्वर्ण सुशोभित दीवारों पर
सोते होंगे कैसे श्रीराम, वन में कुश की शैया पर 

गीतों और वाद्य ध्वनियों से, जो सदा जगाये जाते थे
आभूषण की झंकार सहित, मृदङ्ग के उत्तम शब्दों से 

समय-समय पर कई वंदीजन जिनकी, स्तुति किया करते थे 
सूत और मागध भी जिनकी, वन्दना  कर जिन्हें जगाते थे 

कैसे सोते होंगे भूमि पर, शत्रुहन्ता श्रीराम वह
यह विश्वास के योग्य नहीं है, सच नहीं मुझको लगता यह 

हुआ अवश्य मोहित मन मेरा, जैसे यह कोई स्वप्न है
काल समान नहीं कोई देव, जिसके कारण यह सम्भव है 

काल के प्रभाव के कारण, विदेहराज की परम् सुंदरी 
सीता भी भू पर सोतीं, पुत्रवधू महाराज दशरथ की 

Monday, March 30, 2020

भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

सप्ताशीतितिमः सर्गः

भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुखी होना, होश में आने पर भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना और गुह का उन्हें सब बातें बताना 

जटा धारण के विषय में जब, गुह के वचन सुने भरत ने
श्रीराम ने जटा भी रख ली, सोचा अब शायद ही लौटें

सुकुमार होने के साथ ही, बलशाली भी अति भरत थे 
बड़ी भुजाएं, नयन विशाल, सिंह समान कंधे थे उनके 

धैर्य धारण किया कुछ पल तक, सुनकर भरत ने गुह की बात 
अंकुश - बिद्ध हुए गज सम फिर,  हुए मूर्छित पाकर आघात 

गुह के चेहरे का रंग उड़ा, मूर्छित हुआ देख भरत को 
भूकम्प में मथित वृक्ष सम,  हो उठा था अतीव व्यथित जो

शत्रुघ्न बैठे थे निकट ही,  भरत को हृदय से लगाया 
सुध-बुध वह भी खो बैठे अब, पीड़ित होकर शोक मनाया 

माताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं, दुर्बल और दीन लगती थीं 
पतिवियोग के दुःख से पीड़ित, उपवास से दुर्बल हुई थीं 

घेर लिया भरत को सबने, भूमि पर जो पड़े हुए थे 
कौसल्या हुईं अति कातर, लिया भरत को निज गोद में 

जैसे कोई गाय वत्सला, निज बछड़े को गले लगाती 
शोक से आकुल तपस्विनी ने, रोते हुए बात यह पूछी 

रोग तो कोई नहीं सताता, कहो पुत्र, तुम्हारे तन को  
अब इस राजवंश का जीवन, है अधीन तुम्हारे ही तो 

तुम्हें देखकर ही जीती हूँ, राम-लक्ष्मण गए हैं वन को 
स्वर्गवासी हुए महाराजा, रक्षक एक तुम्हीं तो हो 

सत्य कहो क्या तुमने कोई, अप्रिय बात सुनी है कोई 
लक्ष्मण के बारे में या फिर, सीता संग वन गए राम की 

दो घड़ी में स्वस्थ हुआ चित्त, कहा भरत ने रोकर माँ से 
नहीं सुनी ऐसी कोई बात, पूछा फिर निषादराज से 

उस दिन, रात कहाँ ठहरे थे, भाई राम, लक्ष्मण व सीता 
कैसा था बिछौना उनका, क्या भोजन में ग्रहण किया था 

हुआ प्रसन्न प्रश्न सुन ऐसे, गुह ने सारी बात सुनायी 
कैसे राम के आने पर, भांति-भांति सामग्री पहुँचाई

सत्य पराक्रमी श्रीराम ने, सभी वस्तुएं स्वीकारी थीं 
किन्तु स्मरण कर क्षत्रिय धर्म का, ग्रहण नहीं कर लौटा दी थीं   

फिर उन महात्मा राम ने, हम सब को यह समझाया था 
हमें किसी से कुछ नहीं लेना, अपितु सदा देना ही आता 

सीता सहित श्रीरामचन्द्र ने, उस रात उपवास ही किया 
लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उस जल को ही पीया

ग्रहण किया तब शेष बचा जल, लक्ष्मण ने उपासना करके 
सन्ध्योपासना भी की थी, एकाग्रचित्त से उन तीनों ने 

सुंदर एक बिछौना बनाया, कुश लाकर तब लक्ष्मण ने
सीता सहित राम विराजे, चरण पखारे उन दोनों के 

यही इंगुंदी वृक्ष की जड़ है, यही  बिछौने का तृण है 
जहाँ किया था शयन उस रात, राम और सीता दोनों ने 

भरे हुए बाणों से तरकस, बाँध पीठ पर वीर लक्ष्मण 
अँगुलियों  में दस्ताने पहने, पहरा देते रहे रात भर 

मैं भी धनुष-तीर लेकर तब, लक्ष्मण संग आ खड़ा हुआ 
निद्रा व आलस्य त्याग जो, थे सावधान, मैं जगा रहा 

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.