Thursday, June 18, 2026

त्रिशिरा का वध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तविंश: सर्ग:

त्रिशिरा का वध 


 श्रीराम के सामने जाते, खर को जब त्रिशिरा ने देखा

सेनापति था वह खर का, उसी क्षण निकट आकर यह बोला 


मुझ पराक्रमी वीर को भेजें, ख़ुद न जायें आप युद्ध में 

 छूकर अस्त्र प्रतिज्ञा करता, अब हत होंगे राम समर में 


या तो मैं इनकी मृत्यु हूँ, या वही मेरे वध का कारण 

 थमे युद्ध बस एक घड़ी भर, बन जायें केवल निर्णायक 


यदि मैंने इनको मारा तो, सुखपूर्वक आप लौट जायें   

यदि राम ने मारा मुझको, उन्हें आप आक्रमण कर मारें 


मृत्यु मिले भगवान के हाथों, यह लोभ था उसके मन में 

खर को राज़ी किया इसलिए, दे दी थी तब आज्ञा उसने 


 अश्व जुते तेजस्वी रथ द्वारा, त्रिशिरा ने किया आक्रमण 

उस काल में वह लगता था, तीन शिखरों वाले पर्वत सम 

 

बाणों की वर्षा कर दी, मेघ की भाँति आते ही उसने

विकट गर्जना करता जैसे, जल से भीगे हुए नगाड़े


महाबली श्रीराम-त्रिशिरा का, युद्ध विकट जान पड़ता था 

सिंह और गजराज की भाँति, अति भीषण होने वाला था 


उसी समय तीन बाणों से, मस्तक बींधा था श्रीराम का

कुपित हुए बोले तब राम, सह न सके उसकी उद्दंडता 


पराक्रमी शूरवीर राक्षस का, बल क्या बस इतना ही भर  

फूलों सरिस बाणों द्वारा, किया प्रहार मेरे ललाट पर 


अत: अब तुम भी ग्रहण करो, धनुष-डोर से छूटे बाणों को

चौदह बाण उन्होंने मारे, जो दें मात विषधर सर्पों को  


झुकी गाँठ वाले बाणों से, चारों घोड़ों को गिरा दिया 

आठ सायकों से फिर उसके, सारथि को रथ में सुला दिया 


एक बाण से ध्वजा काट दी, जब था रथ से कूदने वाला

छाती भेद डाली तब उसकी, फिर तो वह जड़वत् हो गया 


तत्पश्चात् अमर्ष में भरकर, तीनों मस्तक काट गिराये 

समरांगण में खड़ा था वह, निज धड़ से गर्म रक्त बहाए 


गिरे मस्तकों के साथ ही, अगले क्षण भू शायी हो गया 

भाग खड़े हुए सब सैनिक, ज्यों हिरण सिंह देख के भागा 


उन्हें भागते देख रोष से, लौटाने आया तुरंत खर 

राहु चन्द्र पर करे आक्रमण, वैसे किया प्रहार राम पर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।




 

Wednesday, June 10, 2026

श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षड् विंश: सर्ग: 



श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध 


बुरी तरह से मारी जाती, सेना को दूषण ने देखा 

पाँच हज़ार सैनिकों को तब, उसने राम से लड़ने भेजा 


युद्ध में पीछे कभी न हटें, महाभयंकर बलशाली थे 

चारों ओर से श्रीराम पर, लगे अस्त्र की वर्षा करने 


वृक्षों और शिलाओं की उस, बारिश को बाणों से रोका 

आँखें मूँदें सांड की भाँति, श्रीराम ने क्रोध उपजाया 


अति क्रोधित होकर श्रीराम ने, बरसात बाणों की कर दी 

 सभी ओर से हुई पीड़ित, दूषण सहित उसकी सेना भी


दूषण ने भी क्रोधित होकर, वज्र सरिस बाणों से रोका 

क्षुर नामक बाण से राम ने, उसका धनुष भी काट डाला 


चार सायकों से घोड़े व, एक से सिर काटा सारथि का 

तीन बाण छोड़े छाती में, दूषण तब रथहीन हो गया 


सोने के पत्र मढ़े थे जिसपर, ऐसा परिघ लिया हाथ में 

लोहे की कीलें लगी थीं, वज्र समान था वह छूने में 


अति भयंकर सर्प के समान, परिघ से उसने किया आक्रमण 

श्रीराम ने जब यह देखा, कर दीं उसकी भुजाएँ विदीर्ण 


उसके हाथ से खिसक के परिघ, इन्द्रध्वज समान गिर पड़ा 

ज्यों दंतविहीन हाथी गिरता, भुजा विहीन दूषण हो गया 


धराशायी दूषण को देख, साधु-साधु कह हुई प्रशंसा 

सभी प्राणियों को हर्ष था, श्रीरामचन्द्र की देख वीरता 


महाकपाल, स्थूलाक्ष और, प्रमाथी नामके तीन राक्षस 

काल के फंदे में फँस मानो, करने लगे प्रहार राम पर 


महाकपाल ने शूल पकड़ा था, पट्टिश लिया स्थूलाक्ष ने 

किया प्रहार श्रीराम पर, फरसे से प्रमाथी राक्षस ने 


 तीनों को आया देखकर, तीखे सिरे वाले बाणों से 

 अतिथियों सा उन तीनों का, किया था स्वागत श्रीराम ने


महाकपाल का मस्तक काटा, प्रमाथी पर तीर चलाये 

स्थूलाक्ष की आँखें हुईं घायल, तीनों ही मार गिराए 


उसके बाद कुपित राम ने, सेना पर कई बाण चलाये 

पाँच हज़ार की उस सेना को, यमलोक के द्वार दिखाए 


दूषण व उसकी सेना के, ख़त्म होने को खर ने जाना 

शीघ्र करो राम का वध तुम, बची सेना को आदेश दिया 


श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, तृहंगम, दुर्जय, सर्पास्य  

कारविरक्ष, परुष, कालकर्मुक, हेम, महामाली, रुधिराशन 


बारह महापराक्रमियों के  संग, खर ने अब धावा बोला 

अग्नि समान बाणों से राम ने, उन सबका संहार किया 


बड़े-बड़े वृक्षों का जैसे, वज्र विनाश कर देता पल में  

श्रीराम ने उनको मारा, स्वर्णपांख से युक्त बाणों से 


कर्णिनामक सौ बाणों से, सौ राक्षसों का किया विनाश 

सहस्र राक्षसों का संहार, उतने बाणों से कर डाला 


निशाचारों के कवच, आभूषण, धनुष आदि सब टूट गये 

खून से लथपथ होकर वे सब, धरती पर विश्राम पा गये 


ढकी कुशों से ज्यों वेदी हो, खुले केश निशाचर लगते थे 

रक्त, मांस की कीचड़ मच गई, नरक समान वन लगते थे 


मानवरूप धारी श्रीराम, पैदल और अकेले भी थे 

चौदह हज़ार राक्षसों को मारा, जो क्रूर कर्म करते थे 


खर व त्रिशिरा बचे जीवित थे, उस विशाल सेना में उनकी 

एक विशाल रथ ले आया खर, मानो आया हो इंद्र ही 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Sunday, June 7, 2026

राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


पंचविंश: सर्ग:


राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा

राक्षसों का संहार 


घोड़े, हाथी, सारथियों को भी, छिन्न-भिन्न कर डाला था 

पैदल सेना को वीरराम ने, यमलोक पहुँचा दिया था 


नालीक, नाराच, विकर्णी, नामक श्रीराम के बाणों से  

दुखी  हुई वह राक्षस सेना, सैनिक आर्तनाद करते थे 


कुछ बलवान, भयंकर राक्षस, उन पर भी प्रहार करते थे 

किंतु राम ने निज बाणों से, रोका उनको, प्राण हर लिए 


सिर, ढाल, धनुष कटने से, वे निशाचर गिर गये धरती पर 

गरुड़ के पंखों की हवा से, नंदन वन के तरु  ज्यों गिरते


जो बचे थे बहुत  पीड़ित थे, खर के पास गये रक्षा हित 

परंतु मध्य में दूषण ने रोक,   कर दिया उन्हें आश्वासित   


दूषण का आश्रय मिलने से, वे सब के सब वापस आये 

साखू, ताड़ आदि पादप  ले, कुछ पत्थर लेकर टूट पड़े 


उस समय श्रीराम व उनमें, महा भयंकर युद्ध होता था 

चारों ओर से घेरा जब , श्रीराम ने भैरव नाद किया 


 तेजस्वी गांधर्व अस्त्र का, किया राक्षसों पर प्रयोग तब 

मंडलाकार धनुष से छूट, बाणों से दिशाएँ गयीं ढक 


 कब राम बाण हाथ में लेते, कब छोड़ देते हैं उनको,

देख नहीं पाते थे राक्षस, देखा  केवल धनुष खींचते 


श्रीराम के बाणों के झुंड ने, आकाश को ढक लिया था

एक स्थान पर खड़े थे वह, सूर्य भी नज़र नहीं आता था 


कई  राक्षसों के शवों से, भूमि वहाँ की पट गई सारी 

मरे, गिरे, कटे-पिटे वे दिखे, जहाँ जहाँ दृष्टि जाती थी 


पगड़ियों सहित मस्तक कटे , बाज़ूबंद के सहित भुजाएँ 

भाँति-भाँति के आभूषण भी, मृत घोड़े, हाथी नज़र आयें 


टूटे-फूटे रथों, चँवरों से, छिन्न-भिन्न हुए शूलों से 

कुछ खंडित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों और शिलाओं से 


बहुतेरे विचित्र बाणों से,  समरभूमि वह पटी हुई थी 

शूलों, पट्टिशों, जाघों, बाहों से, अति  भयंकर लगती थी 


उन सबको मारा हुए देख, शेष राक्षस आतुर हो गये 

शत्रुहंता श्रीराम के, सम्मुख आने में असमर्थ हुए 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में पच्चीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Saturday, June 6, 2026

राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


पंचविंश: सर्ग:



राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार 


अग्रगामी सैनिकों के साथ, खर ने श्रीराम को देखा 

धनुष उठा, चढ़ा कर प्रत्यंचा, सारथी को तब दी आज्ञा 


रथ ले चला राम के सम्मुख, जो अकेले ही खड़े हुए थे 

शत्रुघाती श्रीरामचंद्र तब, धनुष की टंकार करते थे 


खर को देख निकट राम के, श्येनगामी मंत्री भी आये 

सिंहनाद कर खर को घेर वे, चारों ओर खड़े हो गये 


तारों में मंगल ग्रह जैसा, शोभित होता था खर उनमें

बलशाली राम को देखा, उसी समय गर्जना की उसने


भरे क्रोध में सभी निशाचर, अस्त्र-शस्त्र की वर्षा करते 

मुगदर, शूल, प्रास, और खड्ग, फरसों का प्रयोग भी करते 


काले, विशालकाय वे निशाचर, चारों ओर से टूट पड़े 

मेघ बरसते ज्यों पर्वत पर, बाणों की वे वृष्टि करते 


ज्यों प्रदोष की तिथियों में, शिवजी को उनके पार्षद घेरें 

उसी प्रकार वे सब राक्षस, राम को घेरे हुए खड़े थे 


किंतु राम ने उन अस्त्रों को, निज बाणों से ग्रस्त कर लिया 

जैसे नदियों के प्रवाह को, सागर ने है आत्मसात् किया 


यद्यपि उनका बदन घायल था, व्यथित या विचलित नहीं हुए 

जैसे वज्र का आघात सह, पर्वत अडिग बने हैं रहते 


लहुलुहान हो रहे थे राम, अस्त्र-शस्त्रों के आघात से 

संध्याकालीन मेघ से घिर, सूर्यदेव सम शोभित होते 


श्रीराम को देख अकेले, सहस्र शत्रुओं से घिरे हुए 

देव, सिद्ध, गंधर्व, महर्षिगण, सभी विषाद में डूब गये 


तत्पश्चात् कुपित हो राम ने, अपने धनुष को इतना खींचा 

बलशाली वह धनुष राम का, गोलाकार दिखाई पड़ता 


फिर तो वह उस धनुष से अपने, पैने बाण छोड़ते जाते 

जिन्हें रोकना अति कठिन था, कालपाश से जो भीषण थे 


चील के पंखों वाले बाण, खेल-खेल में उन्होंने छोड़े 

लीलापूर्वक छोड़े गये वे, प्राण राक्षसों के लेते थे 


राक्षसों के शरीर को बेध, खून में डूबे हुए बाण वे 

अग्नि के समान चमकते, जब भी आकाश में जा पहुँचते 


मंडलाकार धनुष से उनके, कई  बाण छूटते जाते 

ढाल, कवच, ध्वजा शत्रु की, खर की सेना को विक्षत करते 

 

Tuesday, June 2, 2026

श्रीराम का सीता सहित लक्ष्मण को पर्वत की गुफा में भेज युद्ध के लिए उद्यत होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


चतुर्विंश: सर्ग: 



श्रीराम का तात्कालिक शकुनों के द्वारा

राक्षसों के विनाश और अपनी विजय की

संभावना करके सीता सहित लक्ष्मण को

पर्वत की गुफा में भेजना और युद्ध के लिए उद्यत होना 


प्रचंड पराक्रमी राक्षस खर, जब आश्रम की ओर चला था 

अशकुन संबंधी लक्षणों को, राम-लक्ष्मण ने देखा था 


प्रजा अहित के सूचक लक्षण, देख किया विचार राम ने

भर गये वह अत्यंत अमर्ष में, लक्ष्मण से वचन तब बोले 


 इनकी ओर जरा तुम देखो, ये जो बड़े उत्पात हो रहे

राक्षसों का संहार तय है, इसकी यह सूचना देते 


गधों समान वर्ण धूसर है, बादल भीषण गर्जन करते 

रक्त की धारा बहा रहे हैं, आकाश में दिखें विचरते 

 

उत्पात वश उठने वाले, धूम से मेरे बाण जुड़ रहे 

युद्ध हेतु आनंदित होते, धनुष स्वयं तैयार हो रहे


वनचारी पक्षी ज्यों बोलें, अभय हमारा सूचित होता 

राक्षसों के लिए पर इससे, प्राणों का भय इंगित होता 


दाहिनी भुजा फड़क कर मेरी, इस बात की सूचना देती 

संशय नहीं जरा भी कोई, युद्ध की भेरी अभी बजेगी 


विजय हमारी, पराजय उनकी, कांति तुम्हारे मुख की कहती 

 जिनकी प्रभा क्षीण होती है, आयु उनकी नष्ट हो जाती  


घोर नाद राक्षसों का आता, रणभेरी तीव्र बजती है 

निज कल्याण चाहता है जो, पूर्व सुरक्षा उसे उचित है 


इसीलिए तुम धनुष-बाण ले, विदेहकुमारी सीता को ले 

प्रवेश कर जाओ  उस गुफा में, जो वृक्षों से आच्छादित है 


तुम मेरे इस वचन को मानो, विरोध जरा  नहीं चाहता 

चरणों की सौगंध दिला, देखना चाहूँ, तुम्हें मैं जाता 


इसमें नहीं संदेह  कोई, तुम वीर और   बलशाली हो 

राक्षसों का वध कर सकते हो, पर  मेरी आज्ञा तुम मानो 


मैं स्वयं  इन्हें मारूँगा,  सीता को सुरक्षित ले जाओ 

श्रीराम के यह कहने पर, ले गये लक्ष्मण गहन  गुफा में 


हर्षित हुए श्रीराम देख यह, बात मान ली  लक्ष्मण ने 

सीता पूर्ण सुरक्षित हैं अब, धारण किया कवच उन्होंने 


अग्नि समान कवच था उनका, श्रीराम शोभित होते थे 

धनुष बाण हाथ में लेकर, युद्ध के लिए तत्पर थे वे 


सभी दिशाएँ गूँज उठीं, उस प्रत्यंचा की टंकार से 

देव, गंधर्व, सिद्ध आ गये, युद्ध देखने की इच्छा से 


ब्रह्मर्षि शिरोमणि सभी  ऋषिगण, एक साथ वहाँ खड़े हुए 

हो कल्याण गौ व ब्राह्मणों का, रामचंद्र विजय प्राप्त करें 


एक-दूसरे को देखकर, आपस में करने लगे  विचार

एक और चौदह हज़ार हैं, दूसरी ओर अकेले राम  


वैष्णव तेज से आविष्ट राम को, युद्ध हेतु देख तैयार 

अनायास महान कर्म करते, राम लग रहे  रुद्र समान 


देव, गंधर्व, चारण आदि, जब मंगल कामना करते थे 

उसी समय पहुँची वह सेना, राक्षस तुमुल नाद करते थे 


धनुषों की टंकार गूंजती, ढोल नगाड़े भी बजते थे 

वनजंतु भागे भय के कारण, पीछे मुड़कर नहीं देखते 


बड़े वेग से चली वह सेना, सिंधु सी गंभीर लगती थी 

नाना तरह के आयुध धारी, सैनिकों की पंक्ति चलती थी 


युद्धकला के ज्ञाता राम ने, उस सेना का किया निरीक्षण 

युद्ध हेतु आगे बढ़ गये वह, तरकस से निकाले बाण 


 क्रोध प्रकट किया खींच धनुष, अग्नि समान जान पड़ते थे 

कठिन था उनकी ओर देखना, वन देवता व्यथित हो उठे  


तेजपूर्ण वह रूप राम का, महादेव  समान लगता था 

दक्ष यज्ञ का विनाश करने हित, जो उन्होंने धर लिया  था 


धनुष, आभूषण, रथों से, अग्नि समान कवचों से युक्त थी 

राक्षसों की सेना प्रातः, नील मेघ की घटा समान थी  


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।