Saturday, May 8, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

शततम: सर्ग: 


श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 


निरपराध होने पर भी जिन्हें, मिथ्या दोष लगा दें दंड

उन मनुष्यों के आँसू गिरकर, शासक का कर देते अंत


क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों, प्रधान-प्रधान वैद्यों का भी 

मधुर वचन, अनुराग, धन आदि से, करते हो सम्मान कभी 


गुरुजनों, तपस्वियों, देवों, अतिथि गण, चैत्यों, मंदिरों को 

नमस्कार करते हो न तुम, वृद्धजनोंऔर ब्राह्मणों को 


तुम अर्थ के द्वारा धर्म को, धर्म के द्वारा अर्थ क्षेत्र में  

हानि तो नहीं पहुँचाते हो, आसक्ति तथा लोभ से उनमें 


विजयी वीरों में श्रेष्ठ हो, ज्ञाता समयोचित कर्त्तव्य के   

समय का करके विभाग तुम, सेवन करते न सही समय में


शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण, पुरवासी, जनपदवासी मानव  

कल्याण कामना तो करते हैं,  हित तुम्हारे सभी मिलकर 


नास्तिकता, असत वचन, आलस्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता 

ज्ञानी का संग न करना, सदा इन्द्रियों के वश में होना 


राजकार्यों के बारे में, एकांत में चिंतन प्रवाह

प्रयोजन को जो नहीं समझते, अयोग्य मंत्रियों की सलाह, 

 

एक साथ ही सब शत्रुओं पर,  राजा का आक्रमण करना 

न करना मांगलिक अनुष्ठान, गुप्त मन्त्रणा प्रकट कर देना 


ये राजा के दोष हैं चौदह, तुमने तो इन्हें नहीं धरा 

नीतिशास्त्र की आज्ञा से तुम, सबसे करते हो मशवरा 


काम से  उत्पन्न हों जो दोष, दशवर्ग का त्याग किया है 

त्याज्य हैं वे राजा के लिए, पंचवर्ग पर ध्यान दिया है 


साम, दान, दंड, भेद चतुर्वर्ग,  सबल तुम्हारा सप्त वर्ग

आठ दोष तो त्याग दिए हैं, क्रोध से जो होते उत्पन्न 


राजा के जो योग्य कर्म हैं, अष्ट कर्म तो वे करते हो 

कृषि, व्यापार,  पुल, दुर्ग बना,खानों पर अधिकार करते हो 


 

Friday, April 30, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्.


शततम: सर्ग: 


श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना


नाना प्रकार के अश्वमेध, महायज्ञ के स्थान हैं बने 

देवस्थान, पौंसले, सरवर, शोभा जिसकी सदा बढ़ाते


सदा प्रसन्न जहां नागरिक,  मनाते हैं उत्सव, आयोजन 

हिंसा जहां नहीं होती है, खेती के लिए अधिक पशु धन 


खेती के लिए वर्षा जल पर, निर्भर नहीं रहना पड़ता 

नाना प्रकार की खानें हैं, जहाँ नहीं कोई भय बसता


पूर्वजों ने सदा ही जिसकी, भली-भांति सुरक्षा की है 

वह अपना प्रिय कोसल देश, धन-धान्य से सम्पन्न तो है


खेती और गोरक्षा से, निज आजीविका जो चलाते 

व्यापर में सलंग्न वैश्य, सदा प्रीतिपात्र तो हैं तुम्हारे


उनके श्रम से ही लोक सुखी, और उन्नतिशील बनता है 

उनके इष्ट की करा प्राप्ति, अनिष्ट निवारण तो होता है 


भरण-पोषण तो तुम उनका, धर्मानुसार सदा करते हो 

क्या वे सदा सुरक्षित रहतीं, स्त्रियों को सन्तुष्ट रखते हो 


विश्वास रख उनके ऊपर, गुप्त बात तो नहीं कह देते

हाथी जहाँ उत्पन्न होते, वे जंगल तो सुरक्षित रखते 


कमी तो नहीं उन गौओं की, अधिक दूध देने वाली जो 

हाथी, हथिनियों व अश्वों के, संग्रह से तो तृप्त नहीं हो


क्या तुम पूर्वाह्न काल में, वस्त्राभूषणों से हो सुसज्जित 

नगरवासियों को देते दर्शन, प्रधान सड़क पर जाकर नित 


अति निडर हो तुम्हारे सम्मुख, कर्मचारी तो नहीं आते 

अथवा वे सब भय के कारण, तुमसे दूर-दूर ही रहते 


मध्यम स्थिति का अवलंबन ही, अर्थसिद्धि का कारण होता 

आय अधिक, व्यय कम तो नहीं, धन अपात्र को तो नहीं मिलता 


धनधान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, शिल्पी तथा धनुर्धरों आदि से 

सभी तुम्हारे दुर्ग और किले, भरपूर सदा हैं रहते 


देव, पितृ, ब्राह्मण, अभ्यागत, योद्धा, मित्रों की खातिर ही 

धन व्यय होता है तुम्हारा, बेकार कभी जाता तो नहीं 


श्रेष्ठ व निर्दोष पुरुष पर,यदि कोई मनुष्य दोष लगाता

बिना जाँच कराये लोभ वश, दंड तो नहीं दिया जाता 


चोरी में जो गया हो पकड़ा, प्रमाण भी यही मिला हो 

 छोड़ते तो नहीं लोभ से,  राज्य में ऐसे किसी चोर को 


विवाद छिड़ा हो न्यायालय में, यदि कोई धनी व निर्धन में

धन के लोभ को तजकर उसपर, मंत्री तो विचार हैं करते 


 

Thursday, April 22, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


शततम: सर्ग: 

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 

शूरवीर और धैर्यवान हैं,  जो सन्तुष्ट सदा रहते 
बुद्धिमान, कुलीन, पवित्र जन, अनुराग अपने में रखते 


 सेनापति तुमने जिन्हें बनाया, क्या वे सब ऐसे ही हैं 

 प्रधान योद्धा सभी तुम्हारे, रण कर्म में दक्ष पुरुष हैं


उनके शौर्य की परीक्षा भी, लेते रहते क्या कभी तुम   

सत्कार सहित उनका आदर भी, करते तो रहते हो तुम


नियत किया  वेतन, भत्ता, ठीक समय पर सदा ही देते  

यदि विलम्ब से मिलता वेतन, सैनिक अति कुपित हो जाते 


क्या उत्तम मंत्री, अधिकारी, प्रेम सभी तुममें हैं रखते  

क्या वे सभी तुम्हारी खातिर, प्राण देने को तत्पर रहते 


राजदूत जिसे बनाया तुमने, वासी निज देश का है न 

विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली, सद्विवेक से युक्त भी है न 


शत्रु पक्ष के अठारह तीर्थ, पन्द्रह तीर्थ अपने पक्ष के 

तीन-तीन गुप्तचरों से, क्या सदा ही तुमसे परखे जाते 

 

जिन शत्रुओं को किया निष्कासित, यदि लौट कर वे आते 

दुर्बल उन्हें समझकर, उपेक्षा तो उनकी नहीं करते 


संग नास्तिक ब्राह्मणों का तो, कभी  भी नहीं तुम करते हो 

कुशलता से विचलित कर देते,  परमार्थ से बुद्धि को वो 


अज्ञानी होते हुए भी, अपने को बड़ा ज्ञानी समझें 

वेद विरुद्ध होने से उनका,  ज्ञान अशुद्ध, तर्क वे करते


प्रमाणभूत जो धर्म शास्त्र  हैं, उनमें वे विश्वास न रखते 

केवल ले बुद्धि का आश्रय, व्यर्थ ही बात बनाया करते 


तात ! हमारे वीर पूर्वजों की, अयोध्या मातृ भूमि है

जैसा नाम वैसा गुण इसका, द्वार सभी और से दृढ हैं 


गज, अश्व, रथों से परिपूर्ण, अपने अपने कर्म में रत जो 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यहाँ हैं, उत्साही, जितेन्द्रिय, श्रेष्ठ वो 


नाना राजभवन और मंदिर, शोभा उसकी सदा बढ़ाते

विद्वानों से भरी है नगरी, तुम उसकी रक्षा तो करते 


Thursday, April 15, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

शततम: सर्ग: 


श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 


गूढ़ विषय पर मंत्रणा तुम, बैठ अकेले तो नहीं करते 

अथवा सबके साथ बैठकर, गुप्त बात भी फैला देते 


जिसका साधन अति ही लघु है, किन्तु दीर्घ फल देने वाला 

उस कर्म को शीघ्र तो करते, कर विलम्ब उसे नहीं टाला


पूर्ण हुए या होने वालें, कर्म तुम्हारे प्रकट तब होते 

ऐसा तो नहीं भावी कृत्य , पहले से ही सभी जानते 


तुमने निश्चय किया है जिनका, किन्तु अभी न प्रकट किया है 

तर्क व युक्तियों आदि से, उनको अन्य जान लेते  हैं क्या 


एक विद्वान् को निकट रखते, हजार मूर्खों  के बदले क्या,

कर सकता कल्याण वही जब,  संकट जब छाया हो गहरा


हजार मूर्ख भी नहीं सहायक, एक सुयोग्य मंत्री हो यदि 

शूरवीर, चतुर, नीतिज्ञ ही, दे सकता है सम्पत्ति बड़ी 


मुख्य व्यक्तियों को क्या तुमने, मुख्य कार्य में नियुक्त किया 

मध्यम को मध्यम कार्य में, निम्न को लघु कर्म में लगाया 


घूस नहीं लेते जो निश्छल, बहुत काल से कार्य कर रहे 

भीतर-बाहर से पवित्र हों, उत्तम कार्य सौंपा है उन्हें 


कठोर दण्ड से पीड़ित होकर, प्रजा तुम्हारे राज्य की कहीं

 अमात्यों व मंत्रियों का, तिरस्कार तो नहीं है करती 


 पतित यजमान का जैसे याजक, स्त्रियाँ कामी, पतित पुरुष का 

अपमान तो नहीं करती प्रजा, अधिक कर लेने पर तुम्हारा 


जो साम-दाम में अति कुशल है, राजनीति का भी ज्ञाता है 

राज्य हड़पने की इच्छा रख, भृत्यों को फोड़ने में रत है 


मरने से जिसे भय नहीं, ऐसे शत्रु को जो नहीं जीतता 

वह स्वयं उसके हाथों से, एक न एक दिन मारा  जाता 



 

Saturday, April 10, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

 शततम: सर्ग: 

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 


जटा, चीरवस्त्र धारण कर, जोड़े हाथ भरत गिरे भू पर 

मानो प्रलयकाल में दिनकर, गिरे पड़े हों इस धरती पर 


स्वजन के लिए अति ही कठिन था, उन्हें देखना इस हाल में 

किसी तरह पहचाना उनको, उन्हें देखकर राम दुखी थे 


श्रीराम ने उन्हें उठाया, मस्तक सूंघ गले से लगाया 

निज गोदी में उन्हें बिठाकर, फिर आदर से उनसे पूछा 


तात ! कहाँ है पिताजी हमारे, इस वन में क्यों आए हो

उनके जीतेजी न सम्भव, तुम कितने दुर्बल हो गए हो


बहुत दिनों बाद देखा तुमको,  महाराज तो जीवित हैं न 

ऐसा तो नहीं,स्वर्ग गए वे , सहसा तुम आये हो यहां 


तात भरत ! तुम अभी हो बालक,  राज्य तो पूर्ण सुरक्षित है न ?

सदा धर्म पर टिके जो रहते, वे महाराज कुशल से हैं न ?


राजसूय व अश्वमेध का, जिन्होंने अनुष्ठान किया है 

सत्यप्रतिज्ञ वे महाराजा, पूरी तरह सकुशल तो हैं 


जो रहें सदा धर्म में तत्पर, विद्वान् व ब्रह्मवेत्ता हैं 

इक्ष्वाकु कुल के आचार्य, वसिष्ठ तुमसे पूजित तो हैं   


माँ कौसल्या सुख से हैं, सुमित्रा, कैकेयी भी आनंदित 

उत्तम कुल में जो उत्प्नन हैं, विनय सम्पन्न वह पुरोहित 

 

सत्कार तो उनका करते हो, हवनविधि के जो हैं ज्ञाता 

क्या वे तुम्हें सूचित करते हैं, हवन का सही समय है क्या 


देवताओं, पितरों, भृत्यों, का, गुरुजनों और ब्राह्मणों का 

सम्मान तो तुम करते हो, पिता सम वृद्धों व वैद्यों का 


मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणों का, मन्त्र सहित उत्तम अस्त्रों का 

जिनको उत्तम ज्ञान प्राप्त है, तुमसे आदर पाते सुन्धवा 


अपने जैसे शूरवीरों, शास्त्रज्ञ, और कुलीन जनों को 

बाहरी चेष्टाओं से ही, मन की बात समझ लेते जो  


ऐसे जितेन्द्रिय योग्य जनों को, तुमने मंत्री पद दिया है ?

 राजा की हरएक  विजय का, उचित मन्त्रणा ही कारण है 


सफल तभी होती है मन्त्रणा, नीतिकुशल हों यदि अमात्य 

गुप्त सर्वथा रखें उसको, तभी विजयी होता है राज्य 


असमय तो नहीं नींद घेरती, समय पर जग तो जाते हो 

रात्रि के पिछले पहर में, चिंतन अर्थ का तो करते हो ?


Thursday, April 1, 2021

श्रीराम का भरत को हृदय से लगाना और मिलना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

नवनवतितम: सर्ग:


नवनवतितम: सर्ग:


भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला को देखना तथा रोते-रोते उनके चरणों में गिर जाना, श्रीराम का उनको हृदय से लगाना और मिलना 


यज्ञशाला में जिसके ऊपर, कोमल कुश बिछाए गए हों 

लम्बी-चौड़ी उस वेदी सी, वन में वह शोभा पाती थी 


कई धनुष वहां थे जिनके, पृष्ठ भाग सोने से मढ़े थे 

शत्रु को पीड़ा देने वाले, तरकसों में बाण भरे थे 


सूर्य  की किरणों के समान, बहुत भयंकर बाण चमकीले  

पर्णकुटी सशोभित उनसे, ज्यों पुरी भोगवती सर्पों से  


स्वर्ण म्यान में दो तलवारें, दो विचित्र ढाल भी वहां थीं 

स्वर्णमय बिंदुओं से सुशोभित, आश्रम की शोभा बढ़ातीं


गोह के चमड़े से बने जो,थे स्वर्ण जटित दस्ताने भी  

मृग, सिंह पर हमला न करे ज्यों, कुटिया शत्रु हित अजेय थी 


एक विशाल वेदी भी देखी, श्रीराम के उस स्थान में 

नीचे ईशान कोण की ओर, अग्नि देवता  स्थापित थे 


पर्णशाला की ओर देखकर,   भरत ने देखा श्रीराम को 

 जटामण्डल सिर पर धारे, वल्कल वस्त्र व चीर धारे को 


लगा भरत को निकट हैं राम, है अग्नि समान दिव्य प्रभा  

समुद्र पर्यंत पृथ्वी के स्वामी, महाबाहु व धर्मात्मा 


सनातन ब्रह्मा की भांति, कुश से ढकी वेदिका पर बैठे 

सिंह समान थे कंधे उनके, कमल समान नेत्र कोमल थे  


सीता और लक्ष्मण के साथ, वेदी पर विराजमान थे 

शोक-मोह में डूब गए थे, देख भरत उन्हें इस हाल में 


उनकी ओर महान वेग से,  दौड़े अति विलाप करते वे  

नहीं रख सके धैर्य भरत फिर, गदगद वाणी में यह बोले 


राजसभा में जो बैठकर, पाने योग्य हैं सबका आदर 

वही बड़े प्रिय भ्राता मेरे,  बैठे पशुओं से घिरे रहकर 


कई सहस्र वस्त्रों का पहले, जो उपयोग किया करते थे 

पहने केवल दो मृगचर्म , धर्माचरण पालन करते हैं 


नाना प्रकार के पुष्पों को, जो सिर पर धारण करते थे 

वही रघुनाथ इस काल में, जटा भार कैसे सहते हैं 


यज्ञों के अनुष्ठान के द्वारा, जिनके लिए धर्म उचित है 

देह को कष्ट दे जो मिलता, उस धर्म का संग्रह करते हैं 


बहुमूल्य चंदन से जिनके,  होती थी अंगों की सेवा

उन्हीं मेरे पूज्य भ्राता का, तन मल से सेवित है होता  


सुख भोगने के योग्य सर्वथा, मेरे कारण दुख भोगते 

हूँ कितना मैं  क्रूर, अभागा, है धिक्कार मेरे जीवन को 


इस प्रकार विलाप करने से, भरत अति ही व्याकुल हो गए 

स्वेद बिन्दु झलकते मुख पर, चरणों में राम के गिर गए 


हो संतप्त अति  पीड़ा से, दीन वाणी में आर्य पुकारा 

फिर कुछ भी नहीं बोल सके वह, अश्रुओं से गला रुँधा था 


हा !आर्य !कह चीख उठे, जब यशस्वी श्रीराम को देखा

इससे आगे शब्द न निकले, शत्रुघ्न ने भी प्रणाम किया 


श्रीराम ने उन दोनों को, उठा लगाया वक्षस्थल से 

अश्रुओं की धारा वे भी, लगे थे नेत्रों से बहाने  


 तब सुमंत्र व निषादराज से, मिले  श्रीराम, लक्ष्मण दोनों  

मानो नभ में सूर्य चंद्रमा, शुक्र, बृहस्पति से मिलते हों 


यूथराज गजराज पर बैठ, जो यात्रा करने योग्य थे 

उन चारों को वहाँ देखकर, वनवासी अश्रु बहाते थे



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.


 

Thursday, March 25, 2021

भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

नवनवतितम: सर्ग:


भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला को देखना तथा रोते-रोते उनके चरणों में गिर जाना, श्रीराम का उनको हृदय से लगाना और मिलना 


भाई के दर्शन को उत्सुक, प्रिय शत्रुघ्न को साथ लिए 

आश्रम के चिह्न पथ पर दिखते, भरत उसी की और चले 


माताओं को संग ले आएं, गुरू को यह संदेश दिया

पीछे-पीछे थे सुमन्त्र भी, ले राम  दर्श की अभिलाषा  


चलते-चलते कुमार भरत ने, पर्णकुटी राम की देखी

सम्मुख थे काष्ठ के टुकड़े, पूजा की सामग्री वहाँ थी 


आश्रम तक आने-जाने हित, मार्ग बोधक चिह्न लगे थे 

कुशों और चीरों के द्वारा, शाखाओं में लटक रहे थे 


शीत निवारण हेतु वहां, सूखे गोबर के ढेर पड़े थे 

लगता है हम आ ही पहुँचे, कहा भरत ने तब औरों से 


जिस स्थान का पता बताया, भारद्वाज मुनिवर ने हमको 

चित्रकूट अब दूर नहीं है, यूँ प्रतीत होता है मुझको 


वृक्षों में ऊँचे चीर बंधे, जिनका होना यही बताये 

मार्ग की पहचान के हेतु, लक्ष्मण ने यह चिह्न बनाये 


बड़े दाँतवाले हाथी मिल, पर्वत के पीछे रहते हैं 

उधर न कोई जाये भूल से, चिह्न यह सचेत करते हैं 


वन में सदा तपस्वी जन सब, मिल जिसका आवाहन करते 

सघन धूम दिखाई पड़ता, होंगे दर्शन अग्निदेव के 


गुरुजनों का करते सत्कार, पुरुष सिंह उन आर्य पुरुष का 

आनंद मग्न महर्षि से जो, उन राम का दर्शन करूँगा 


दो ही घड़ी में कुमार भरत तब, चित्रकूट तक आ पहुँचे

अपने साथ आये जनों से, फिर ये वचन कहे उन्होंने 


निर्जन वन में खुली भूमि पर, वीरासन में राम बैठते 

मुझ कारण संकट आया है, धिक्कार जीवन को मेरे


मेरे जन्म को है धिक्कार, मैं सब लोगों से निंदित हूँ 

उन चरणों में आज गिरूँगा, उन सबका मैं ही दोषी हूँ 


इस तरह विलाप करते ही, परम पवित्र कुटी एक देखी

शाल, ताल, अश्वकर्ण के, पत्तों से जो छायी हुई थी 


यज्ञशाला में जिसके ऊपर, कोमल कुश बिछाए गए हों 

लम्बी-चौड़ी उस वेदी सी, वन में वह शोभा पाती थी 

 

Thursday, March 18, 2021

भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबंध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


अष्टनवतितम: सर्ग:

भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की  खोज का प्रबंध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन 



राम से भेंट  का किया विचार,  सेना ठहरा कर भरत ने

शत्रुघ्न से बोले तब वह,  पता लगाओ शीघ्र ही वन में 


साथ निषादों को ले अपने, लग जाओ तुम अन्वेषण में

 मैं स्वयं  रह मंत्रियों के सँग , पैदल ही विचरूँगा वन में 


जब तक उनको देख न लूँगा, सीता और लक्ष्मण के साथ 

तब तक शांति नहीं मिलेगी, नहीं मिलेगा मन को विश्राम 


जब तक कमलनयन वाला मुख, प्रिय भाई का नहीं देखता 

निर्मल है जो चंद्र समान, तब तक यह मन अशांत रहेगा 


निश्चय ही सुमित्रानंदन, लक्ष्मण हुए कृतार्थ इस जग में 

नित निरंतर दर्शन पाते, महातेजस्वी मुख का वन में 


राजोचित लक्षणों से युक्त, जब तक उनके चरणों को मैं 

अपने मस्तक पर नहीं धरूँगा, शांति नहीं पाऊँगा मैं 


 वही राज्य के सच्चे अधिकारी, जब तक हों नहीं अभिषिक्त 

तब तक मेरा मन व्याकुल है, स्वामी वही समुद्र पर्यंत 


जनक किशोरी विदेह नंदिनी, अनुसरण करतीं जो पति का 

हुईं कृतार्थ इस सत्कर्म से, साथ निरंतर पातीं उनका 


ज्यों कुबेर हैं नंदनवन में, राम बसे हैं जिसके वन में 

चित्रकूट है मंगलकारी, वेंकटाच, हिमालय जैसे 


हुआ कृतार्थ यह दुर्गम वन भी, जो सर्प से सेवित रहता 

 शस्त्र धारी श्रीरामचंद्र ने, जिस वन में निवास है किया 


ऐसा कहक महातेजस्वी, पुरुष प्रवर महाबाहु भरत ने 

पैदल ही गमन करते हुए,  प्रवेश किया उस महावन में 


वक्ताओं में जो श्रेष्ठ, भरत, वृक्ष समूहों से हो निकले 

वनफूलों से भरे हुए थे, अग्रभाग जिनकी शाखा के 


आगे जा शाल वृक्ष पर, बड़ी ही तेजी से गए  वे चढ़ 

आश्रम से उठता था धुआँ, अति हर्षित हुए जिसे देखकर 


देख धूम को हुई प्रसन्नता, "यहीं राम है" हुआ निश्चय 

अथाह जल से पार हुए हों, ऐसा संतोष जगा मन में 


 आश्रम देखकर श्रीराम का, ऊपर चित्रकूट पर्वत के

शीघ्रता से उधर चले वे, निषाद राज को निज साथ लिए 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.