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Friday, April 17, 2026

प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टम: सर्ग:


प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान 


सुतीक्ष्ण मुनि से पूजित होकर, भली-भाँति वह रात्रि बितायी 

प्रातःकाल समय से उठकर, स्नानादि दिनचर्या निभायी 


विधिपूर्वक तीनों ने मिलकर, अग्नि व देवों की पूजा की 

सूर्यदेव का दर्शन करके, स्वयं जा मुनिवर से भेंट की 


भगवन ! आपने वन्द्य  होकर, हम लोगों का किया सत्कार  

अब यहाँ से जाना चाहते, करें हमारी विनय स्वीकार  


दण्डकारण्य में रहने वाले, मुनियों से मिलना चाहें 

तेजस्वी, श्रेष्ठ तापसों संग, जाने की हमें आज्ञा दें 


सूर्य प्रचंड नहीं हुए जब तक, उससे पूर्व  प्रस्थान करें 

ऐसी ही अभिलाषा रखते, राम ने अति मधुर  वचन कहे 


चरणों का स्पर्श कर रहे थे, उन्हें उठाया सुतीक्ष्ण मुनि ने 

लगा ह्रदय से कहा स्नेह से , जायें संग सिया -लक्ष्मण के 


मंगलमय हो मार्ग आपका, विघ्न और बाधा मत आयें 

पुनीत ह्रदय वाले मुनियों के, आश्रमों के दर्शन पाएँ 


सुंदर वन, सरवर, झरने भी, इस मार्ग में अनेक मिलेंगे 

झुंड मृगों के, सुंदर पंछी, पंकज आदि पुष्प देखेंगे 


हे लक्ष्मण !  तुम भी संग जाओ, किंतु लौट पुन: आओ यहीं 

 उन दोनों ने की परिक्रमा, अच्छा, कहकर उन मुनिवर की


बड़े नेत्र वाली सीता ने, उनको धनुष-बाण पकड़ाये

बाँध पीठ पर तूणीरों को, धनुष लिए वे बाहर निकले 


दोनों वीर अति रूपवान थे, खड्ग और धनुष धारण कर 

सीता सहित  किया प्रस्थान, पूज्य मुनिवर की आज्ञा लेकर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 




Wednesday, April 15, 2026

सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम में ठहरना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तम: सर्ग: 


 सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम पर

जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो

रात में वहीं ठहरना 


सीता, लक्ष्मण व ब्राह्मणों को, लेकर अपने साथ श्री राम 

चल पड़े सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम, तय किया दीर्घ मार्ग अगाध 


कुछ नदियों को पार किया, फिर ऊँचा पर्वत पड़ा दिखायी 

उससे आगे बढ़ते गये, इक्ष्वाकु कुल के दोनों भाई 


अति घोर वन के एकांत में, मुनिवर आश्रम में बैठे थे 

वृक्ष प्रचुर फल-फूल से लदे, इधर-उधर कई चीर टंगे 


श्रीराम ने विधिवत् मुनि को, करके प्रणाम दिया निज परिचय 

श्रीरामचन्द्र  का दर्शन करके, सुतीक्ष्ण मुनि हुए ज्यों धन्य 


आलिंगन में बाँधा उनको, दोनों बाहों से मुनिवर ने 

मैं प्रतीक्षा किया करता था, हुआ सनाथ आश्रम आपसे 


इस पृथ्वी पर देह त्यागकर, इसके कारण गया नहीं मैं 

चित्रकूट पर जब रहते, सुनी थी आपकी गाथा मैंने


देवराज इंद्र ने स्वयं आ, मुझको शुभ लोक प्रदान किए 

उन लोकों में आप विहारें, देता हूँ मैं आपको उन्हें 


जैसे इंद्र से ब्रह्मा बोलें,  राम ने कहे वचन वैसे

प्रदान कराऊँगा आपको, वे सब लोक तो स्वयं ही मैं


इस समय भिन्न अभिलाषा लाया, आप इसे ही पूर्ण करें 

सबके हित में तत्पर मुनि, कहिए, मैं कहाँ रहूँ इस वन में ?


श्रीराम के यह कहने पर, मधुर वाणी में मुनि यह बोले 

यही आश्रम है उत्तम अतीव, यहीं पर आप निवास करें 


फल-मूल उपलब्ध सदा रहें, ऋषिगण आते-जाते रहते 

बिना भय के झुंड मृगों के, शोभा दिखाकर वापस जाते 


थोड़ा सा उपद्रव मृगों का, और नहीं कोई दोष यहाँ 

वचन सुना महर्षि का जब, लेकर धनुष-बाण राम ने कहा 


यदि उपद्रवकारी मृग को, कभी बाण की नोक से मारूँ 

होगा यह अपमान आपका, जिसको मैं कैसे सह पाऊँ 


इसीलिए मैं अधिक समय तक, नहीं रहूँगा इस आश्रम में

इतना कहकर चुप हुए, गये सांध्यकाल उपासना करने 


रात हुई स्वयं सुतीक्ष्ण मुनि, गये उनके हित भोजन लेकर 

पुरुष शिरोमणि भाई  व सीता, तृप्त हुए अन्न वह पाकर 




इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के

अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 


Monday, July 28, 2025

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका मुनि से सम्मानित होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


पञ्चम: सर्ग:


श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर जाना,

देवताओं का दर्शन करना और मुनि से सम्मानित होना

तथा शरभङ्ग मुनि का ब्रह्मलोक-गमन  


जो इस रथ के दोनों ओर, खड्ग ले सौ-सौ वीर खड़े हैं 

वक्ष विशाल, भुजाएँ बलवान, वस्त्र लाल, व्याघ्र समान हैं 


पच्चीस वर्ष सम लगते, गले में सुंदर हार धारा है 

देव सदा ऐसे ही रहते, दर्शन इनका अति प्यारा है 


 लक्ष्मण! जब तक मैं यह जानूँ, रथ पर है कौन विराजमान

तुम ठहरो सीता के साथ, कहकर राम कर गये प्रस्थान 


मुनि आश्रम पहुँचते जब तक, इसके पूर्व ही देख इंद्र ने 

जाता हूँ, कहा मुनि से, मिलना नहीं है अभी श्रीराम से 


 जो दूजों के लिए कठिन है, इन्हें महान कर्म करना है

रावण को पराजित करके, निज कर्त्तव्य पूरा करना है 


विजयी हुए कृतार्थ राम के, तब आऊँगा दर्शन करने

अनुमति लेकर शरभङ्ग मुनि से, इंद्र लगे थे वहाँ से चलने 


बैठ समीप अग्नि के मुनि जब, अग्निहोत्र यज्ञ करते थे 

सीता व लक्ष्मण के साथ मिल, श्री राम वहाँ आ पहुँचे 


कर प्रणाम मुनि चरणों में, उनकी आज्ञा से वहाँ बैठे 

इंद्र के आने का कारण क्या, पूछा उनसे श्रीराम ने 


ब्रह्म लोक ले जाने आये, वरदाता यह इंद्र मुझे 

 इंद्रियों पर कर नियंत्रण, विजय पायी है तप से अपने


किंतु मुझे जब ज्ञात हुआ कि, आप यहाँ आने हैं वाले

 निश्चय किया। नहीं जाऊँगा, बिना आपके दर्शन पाये 


धर्म परायण आप महात्मा, आपको मैं निवेदन करता 

स्वर्ग व ब्रह्म लोक जो जीते, उन्हें आपको अर्पित करता 


सुनकर बात शरभङ्ग मुनि की, कहा शास्त्रज्ञाता राम ने

  कराऊँगा मैं ही आपको , दर्शन स्वर्ग औ' ब्रह्मलोक के 


इस समय मैं आपसे पूछूँ, वन वास हेतु बतायें स्थान

कुछ दूरी पर हैं मुनि सुतीक्ष्ण, मुनिवर ने कराया यह ज्ञान 


Wednesday, October 30, 2024

विराध का दोनों भाइयों को साथ लेकर दूसरे वन में जाना


।। श्री सीतारामचंद्राभ्यां नम: ।।

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् 

अरण्य कांडम् 


तृतीय सर्ग:


विराध और श्रीराम की बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा विराध पर प्रहार तथा विराध का इन दोनों भाइयों को साथ लेकर दूसरे वन में जाना 


तत्पश्चात वन गुंजाते, पूछा विराध ने, कौन हो तुम?

मुझसे कहो , कहाँ जाओगे ? सुन कर उत्तर दिया राम ने 

 

सदाचार का पालन करते, इक्ष्वाकु कुल के महा क्षत्रिय 

कारणवश वन में रहते हैं, अब तुम भी दो अपना परिचय 


यह सुनकर बोला विराध यह, सत्य पराक्रमी श्रीराम से

रघुवंशी नरेश सुनो तुम, हर्षित हुआ देता हूँ परिचय 


जव नामक राक्षस का पुत्र हूँ, शतहृदा मेरी माता है 

भू के सभी राक्षसों द्वारा, विराध मुझे कहा जाता है  


मैंने भीषण तप के द्वारा, वर पाया है ब्रह्मा जी से 

हूँ अवध्य, अभेद्य जगत में, मर सकता नहीं किसी शस्त्र से 


अब तुम दोनों इस युवती को, यहीं छोड़ दूर चले जाओ 

प्राण नहीं लूँगा तुम्हारे, इसे पाने की इच्छा त्यागो 


पापपूर्ण बात यह सुनकर, तब श्रीराम भर गये क्रोध से 

विकट राक्षस महा विराध से, आँखें लाल किए वे बोले 


धिक्कार तुझे ओ नीच, तेरा अभिप्राय बहुत खोटा है 

शीघ्र युद्ध में तू पाएगा, मृत्यु स्वयं की  खोज रहा है


जीवित नहीं बचेगा अब तू, कहा राम ने बाण चढ़ाया 

तीखा बाण कर अनुसंधान, सात बार उस पर बरसाया 


प्रज्वलित अग्नि के समान थे, तेजस्वी मोर पंख वाले 

रक्तरंजित हो गिरे भूमि पर, तन को भेद विराध के वे


घायल हो जाने पर उसने, अलग बिठाया था सीता को 

स्वयं हाथ में ले शूल, दोनों भाइयों पर टूट पड़ा था 


इन्द्रध्वज सम लेकर त्रिशूल, बड़े ज़ोर से करी गर्जना

महा भयंकर दुष्ट राक्षस, काल समान शोभा पाता था 


काल, अंतक, औ' यम की भाँति, बाणों की वर्षा की उस पर 

अट्टाहस कर खड़ा हुआ, जँभाई संग अंगड़ाई लेकर 


वरदान के बल से उसने, अपने प्राणों को रोक लिया था 

बाण गिर गये भूमि पर तन से, शूल उठा आक्रमण किया 


वज्र और अग्नि सम प्रज्वलित, चमक उठा वह शूल गगन में 

किंतु काट डाला बाणों से, बलवानों  में श्रेष्ठ राम ने 


मेरु पर्वत के शिला खंड सा, छिन्न भिन्न हो गिरा भू पर 

काले सर्पों सी तलवारें ले, दोनों टूट पड़े उस पर 


उस आघात से घायल होकर, दोनों को पकड़ना चाहा 

उसके अभिप्राय को जानकर, श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा 


अपनी इच्छा से यह राक्षस, हम दोनों को ढो ले जाये 

जिस मार्ग से यह जाता है, वही हमारा मार्ग बन जाये 


बल से उद्दंड बन विराध ने, काँधे पर बिठा दोनों को 

करता हुआ भीषण गर्जना, चलने लगा वन की ओर को 


प्रवेश किया घने एक  वन में, मेघों की घटा सा नीला 

बड़े वृक्ष, अनेक पक्षी थे, हिंसक पशुओं से भरा हुआ 



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ।  



 


Thursday, June 13, 2024

अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


अष्टादशाधिकशततम: सर्ग: 


सीता अनसूया संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना 


सीता के ये वचन सुने जब, अनसूया को अति हर्ष हुआ 

बड़े स्नेह से सूंघ कर मस्तक, मिथलेशकुमारी से कहा 


उत्तम व्रत पालने वाली !, शक्ति मैंने तप से संचित की 

उस तपोबल का ले आश्रय, वर माँगने को तुमसे कहती 


 युक्ति-युक्त बात कही तुमने, सुनकर अति संतोष हुआ है

क्या प्रिय अब मैं करूँ तुम्हारा ?, तुमने उत्तम वचन कहा है 


सुन कर कथन यह अनसूया का, सीता को हुआ अति विस्मय 

मंद स्मित लाकर अधरों पर, कहा, नहीं !  मुझे कुछ न चाहिए 


आपने निज  वचनों द्वारा ही, मेरा सारा प्रिय कर दिया 

सीता के निर्लोभी भाव से, हर्षित हुईं अति अनसूया 


लोभ हीनता के कारण ही, तुममें यह आनंद भरा है 

सफल करूँगी उसे अवश्य, मिलकर तुमसे सुहर्ष  हुआ है 


हार, वस्त्र, आभूषण, अंगराग, बहुमूल्य अनुलेपन दिये 

 शोभा नित बढ़ायेंगी तन की , तुम्हारे योग्य ये वस्तुएँ


सदा उपयोग में लाने पर भी,  निर्दोष व शुद्ध रहेंगी 

दिव्य अङ्गराग को अपना, तुम लक्ष्मी सी सुशोभित होगी 


अनसूया की आज्ञा से सीता ने, अति यशस्विनी थी जो 

प्रसन्नता का उपहार समझकर, ग्रहण किए वस्त्र आदि वो 


दोनों हाथ जोड़कर वहाँ वह, बैठी रहीं निकट उन्हीं के

 प्रिय कथा सुनने के हित,  प्रश्न यह पूछा अनसूया ने  


मैंने सुना है श्रीराम ने, स्वयंवर में तुम्हें प्राप्त किया 

कैसे हुआ घटना क्रम वह, सुनना चाहती विवरण सारा 


 धर्मचारिणी अनसूया को, उनके कहने पर सहर्ष ही

सुनिए, माता ! कह सीता ने, निज विवाह की कथा सुनायी


Friday, May 24, 2024

सीता अनसूया संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

अष्टादशाधिकशततम: सर्ग: 


सीता अनसूया संवाद, अनसूया का सीता को प्रेमोपहार देना तथा अनसूया के पूछने पर सीता का उन्हें अपने स्वयंवर की कथा सुनाना 


तपस्विनी अनसूया के इन, वचनों को सुनकर सीता ने 

भूरि-भूरि प्रशंसा करके, धीरे-धीरे यही वचन कहे 


 आप संसार में सर्वश्रेष्ठ हैं, स्त्रियों में सदा पूज्य हैं 

 नारी के लिए पति है गुरु सम, यह बात मुझे पूर्व विदित है 


यदि अनार्य या निर्धन होते, मेरे पतिदेव किसी कारण 

तब भी सेवा में रत रहती, दुविधा बिन कर पूर्ण समर्पण 


फिर जब वे हैं गुणों के सागर, पात्र सभी के आदर के 

तब क्या कहना इनकी सेवा का, परम दयालु हैं अति प्रिय वे 


माँ कौशल्या के प्रति जैसा, व्यवहार, बर्ताव वे करते 

अन्य रानियों के प्रति भी वे, माँ के सम ही वर्तन करते 


महाराज दशरथ ने जिनको, प्रेम से देखा एक बार भी 

पितृ वत्सल श्री राम ने, माँ को देखा उनके भीतर भी 


जब मैं तत्पर थी आने को, निर्जन वन में राम के साथ 

माँ कौशल्या का दिया उपदेश, ज्यों का त्यों मुझे है याद 


 पहले मेरे विवाह काल में, माँ ने सीख जो भी दी थी 

उपदेश कहे अन्य स्वजनों ने, उसके साथ स्मरण हैं सभी 


पति की सेवा के अलावा, नहीं स्त्री के लिए तप दूसरा   

सत्यवान की सेवा करके, जग में पूजित सावित्री सदा  


उन जैसे ही आपने भी तो, स्वर्ग में इक स्थान  बनाया 

पति की सेवा के प्रभाव से, जग में श्रेष्ठ स्थान भी पाया 


स्वर्ग की देवी रोहिणी भी, विलग कब होती चंद्रमा से 

पतिव्रत  हेतु  आदर  पातीं, कई साध्वियाँ देवलोक में 




Friday, June 30, 2023

भरत का नंदीग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


पञ्चशाधिकशततम: सर्ग:


भरत का नंदीग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदनपूर्वक राज्य का सब कार्य करना 


माताओं को अयोध्या में रख, दृढ़ प्रतिज्ञ भरत ने कहा 

गुरुजन से आज्ञा माँगू , अब मैं नंदीग्राम  रहूँगा


श्रीराम वियोग से उत्पन्न,  दुख महा वहीं सहन करूँगा 

इस राज्य के लाभ के हेतु,  करूँगा भाई  की प्रतीक्षा


 गये स्वर्ग पिता, राम वन में, वह गुरु हैं पूजनीय मेरे 

मंत्री और पुरोहित वसिष्ठ, शुभ वचन भरत का सुन बोले 


भातृ भक्ति से प्रेरित होकर, यह जो तुमने बात कही है 

 प्रशंसनीय होने के साथ, वास्तव में योग्य तुम्हारे है 


भाई के दर्शन भी चाहते, हित साधन में उनके लीन 

श्रेष्ठ मार्ग पर स्थित हो तुम,  करे न कौन तुम्हारा अनुमोदन 


मंत्रियों का प्रिय वचन सुना, तब सारथी से भरत ने कहा

रथ तैयार करो शीघ्र तुम, ली माताओं से भी आज्ञा 


रथ पर वे आरूढ़ हो गये,  उसी समय शत्रुघ्न के साथ

मंत्रियों और पुरोहितों से घिर,  ब्राह्मण भी चल रहे साथ


अयोध्या से पूर्वाभिमुख, नंदीग्राम का पथ पकड़ा 

अश्व, गजों रथ से भरी,  स्वयं पीछे-पीछे चल दी सेना


पुरवासी भी साथ हो लिए, भातृवत्सल भरत के पीछे 

मस्तक पर रख चरण पादुका, बहुत शीघ्रता से जाते थे 


उतर नंदीग्राम में रथ से, गुरुजनों से भरत ने कहा 

धरोहर के रूप में मुझको, भाई ने राज्य यह सौंपा 


सुवर्णाभूषित पादुकाएँ, निर्वाह करें योगक्षेम

उनके प्रति मस्तक झुकाया, राज्य कर दिया उन्हें समर्पित 


इन पर धारण करें छत्र अब, इन्हें मानूँ भाई के चरण

 इनके द्वारा ही राज्य में, परम धर्म का होगा स्थापन 


प्रेम के कारण ही भाई ने, यह धरोहर मुझे सौंप दी 

रक्षित होगी मुझ  द्वारा, उनके वापस लौटने तक ही 


इसके बाद स्वयं इनको मैं, श्रीराम को लौटा दूँगा 

पादुकाओं से सज्जित, चरण युगलों का दर्शन करूँगा 


उनके आने पर मिलते ही, राज्य समर्पित उनको कर के 

आज्ञा के अधीन रहकर, सदा सेवा में उनकी रह के 


राज्य भार तब उन्हें सौंप कर, स्वयं हल्का हो जाऊँगा

श्रीराम  की सेवा में दे, पश्चाताप से मुक्त  रहूँगा 


ककुत्स्थकुल भूषण श्रीराम के, राजा के पद पर होने से 

हर्षित होंगे लोग सभी, चौगुना मिलेगा आनंद मुझे 


इस प्रकार दीनभाव से भरकर, कर विलाप दुख मग्न भरत  

राज्य चलाने लगे वहीं से,  वह मंत्रियों के संग मिलकर 


वल्कल और जटा धारण कर, सदा मुनिवेश में वहाँ रहे 

भाई की आज्ञा पालन कर, प्रतिज्ञा के भी पार गये 


राज्य का समस्त कार्य वे, पादुकाओं को निवेदन करते 

ख़ुद ही उनपर छत्र लगाते, स्वयं ही चंवर डुलाते थे 


ख़ुद  रहकर उनके अधीन वे, मंत्रियों से कार्य  करवाते 

जो भी कार्य उपस्थित होता, प्रबंध यथावत उसका करते 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ.