श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
त्रयत्रिंश: सर्ग:
शूर्पणखा का रावण को फटकारना
श्रीराम से होकर अपमानित, शूर्पणखा अति ही दुखी थी
मंत्रियों से घिरे रावण को, वह कठोर वाणी में बोली
राक्षसराज ! तुम हो निरंकुश, स्वेच्छाचारी व विषयासक्त
किंतु तुम अनभिज्ञ हो उससे, भीषण भय जो हुआ उपस्थित
निम्न श्रेणी के भोगों में ही, आसक्त जो राजा रहता
मरघट की अग्नि समान ही, प्रजा द्वारा अनादरित होता
जो राजा भी ठीक समय पर, कार्य संपादन नहीं करता
राज्य तथा कार्यों सहित, असावधानी से नष्ट हो जाता
राज्य की सुरक्षा हेतु जो, गुप्तचरों को नियुक्त न करता
कामिनी आदि में आसक्त, प्रजाजनों से दूर ही रहता
प्रजा त्याग देती है उनको, हाथी नद का कीचड़ जैसे
अभ्युदय से नहीं चमकता, सिंधु में डूबे पर्वत जैसे
देवों, गन्धर्वों, दानव से, तुमने सदा विरोध किया है
पर गुप्तचर नहीं रखे हैं, स्वभाव भी बालकों जैसा है
ज्ञान नहीं है उन बातों का, जिनका जानना अति ज़रूरी
कैसे तुम कर सकोगे रक्षा, अपने इस विशाल राज्य की
जिस नरेश के आधीन नहीं हैं, गुप्तचर, कोष और नीति
साधारण जन के समान हैं, नहीं कहलाते दूरदर्शी
स्वजन तुम्हारे मारे गये हैं, जनस्थान उजाड़ हो गया
तुमको ज्ञान नहीं है इसका, राम ने ही यह विनाश किया
खर-दूषण के प्राण ले लिए, सेना पहुँच गयी यमलोक
ऋषियों को मिला अभयदान, दण्डकारण्य बना शुभलोक
लोभ और प्रमाद में फँसे, तुम पराधीन बने बैठे हो
अपने ही राज्य में घटे इस, भय का तुमको पता नहीं है
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