Wednesday, August 26, 2026

शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


द्वात्रिंश: सर्ग:

शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना 


नष्ट किया था क्रोधपूर्वक, दिव्य चैत्ररथ वन कुबेर का 

नलिनी नामक पुष्करिणी व, नंदनवन भी देवताओं का 


पर्वत शिखर सा धर आकार, चन्द्र, सूर्य को भी ढक लेता 

दस हज़ार वर्षों तक की थी, ब्रह्मा जी की घोर तपस्या 


एक विशाल महावन में जा, मस्तकों की बलि दे दी थी 

देव, दानव, गंधर्व, पिशाच से, मृत्यु उसकी संभव न थी


सिवा मनुष्य सभी से उसको, प्राप्त हुआ था अभय वरदान 

वही महाबली राक्षस आकर, यज्ञों का करता अपमान 


जो समाप्ति के निकट पहुँच गये, यज्ञों का करता विध्वंस 

ब्राह्मणों की हत्या करता, निर्दयी, कठोर था अति नृशंस 


 लोकों को भय देने वाला, सब प्राणियों को जो रुलाता 

महाबली इस क्रूर भाई को, शूर्पणखा ने तब देखा था 


दिव्य वस्त्र-आभूषण से मंडित, धारण किए पुष्प हार था  

सिंहासन पर विराजमान वह, महाकाल के ही समान था 

 

 घिरा मंत्रियों से शत्रुहन्ता, गई निकट भाई रावण के 

 भय से विह्वल हुई वह बोली, रावण से दुर्दशा दिखा के



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।






Tuesday, August 18, 2026

शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

द्वात्रिंश: सर्ग:


शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना 


शूर्पनखा ने जब देखा यह, किए भयंकर कृत्य राम ने 

चौदह हज़ार राक्षस मारे, त्रिशिरा, खर, दूषण-प्राण हरे 


 करने लगी शोक के कारण, चीत्कार वह ज़ोर-ज़ोर से 

  जो अन्यों के लिए कठिन है, ऐसे कृत्य किये राम ने


 सब अपनी आँखों से देखकर, वह अति उद्ग्विन हो उठी थी 

रावण द्वारा जो शासित थी, लंकापुरी को जा पहुँची थी 


वहाँ पहुँच कर उसने देखा, रावण ऊँचे महल में बैठा 

राजोचित तेज से पूर्ण वह, निज मंत्रियों से घिरा हुआ 


मरुद्गणों से घिरे इंद्र की, भाँति, रावण विराजमान था 

सुवर्णमय सिंहासन उसका, सूर्य सरिस जगमगा रहा था 


स्वर्ण-वेदी पर घी-आहुति से, ज्यों अग्नि प्रज्वलित हो उठे 

 शोभा हुई थी रावण की, उस स्वर्ण सिंहासन पर वैसे


देव, गंधर्व, भूत, महात्मा, उसे जीतने में असमर्थ थे 

यमराज की भाँति भयंकर, लगता था वह समर भूमि में  


देव-असुर संग्राम के समय, उसके तन पर घाव लगे थे 

ऐरावत के दाँत के चिह्न, अब तक देह पर विद्यमान थे 


बीस भुजाएँ, दस मस्तक थे, छत्र, चंवर, आभूषण सुंदर 

वक्ष:स्थल विशाल था उसका, राजोचित लक्षण से संपन्न 


वैदूर्यमणि के आभूषण धारे, तन कांति भी वैसी थी 

भुजाएँ अति सुंदर, श्वेत दाँत, मुख विशाल, आकृति बड़ी थी 


देवों  के संग संघर्ष  में, प्रहार हुआ विष्णु चक्र का

बड़े अन्यान्य युद्धों में, किया सामना अस्त्रों-शस्त्रों का 


देवों के अस्त्रों की चोट से, खंडित नहीं हुए जो अंग 

 सागरों को क्षोभित करते, शीघ्रता से उसके प्रत्यंग 


पर्वत शिखर तोड़ देता था, देवताओं को रौंद डालता 

धर्म की जड़ को काट डालता, स्त्रियों का सतीत्व हरता था 


दिव्यास्त्रों का प्रयोग जानता, यज्ञों को नष्ट उसने दिया 

भोगपुरी पाताल में जाकर, वासुकि व तक्षक को हराया 


कैलास पर्वत पर जाकर,  किया पराजित था कुबेर को 

  हासिल किया पुष्पक विमान, इच्छानुसार चला करता जो


Monday, August 10, 2026

रावण का मारीच के कहने से लंका को लौट आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


इसका बदला लेने हेतु, उनकी स्त्री को हरना चाहता 

मेरा सहयोग करो इसमें, सुनकर यह मारीच तब बोला 


निशाचर शिरोमणे !  कहो यह, किसने तुमको यह सलाह दी

कौन तुम्हारा भला न चाहे, किसे तुम्हारी परवाह नहीं  


नाम बताओ मुझको उसका, राक्षस जगत का जो शत्रु है 

विषधर सर्प के मुख से वह, दाँत उखड़वाना चाहता है 

 

 ऐसी खोटी सलाह दी किसने, कुमार्ग पर ले आया है 

सुखपूर्वक सोते समय, मस्तक पर आघात लगाया है 


 जिनकी गंध से भागें गजराज, श्रीराम वह गजराज हैं

विशुद्ध कुल में जन्म है उनका, वही उनका शुण्ड दंड है 


मद उनका प्रताप जान लो, सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत 

उनकी ओर देखना कठिन है, जूझने की क्या करें बात 


मनुष्य रूप में राम सिंह हैं, समरभूमि में संधि व बाल 

राक्षस मानो मृग हैं उनके, बाण अंग, तलवार है दाढ़ 


नहीं जगा सकते हो तुम उस, सोते हुए सिंह राम को 

महासागर समान हैं राम, उचित नहीं है उसमें कूदो 


धनुष ही उस सागर का ग्राह, भुजाओं का वेग है कीचड़ 

बाण तरंगें, युद्ध जलराशि, मुख उसका जैसे बड़वानल 


लंकेश्वर प्रसन्न हो जाओ, सकुशल तुम लंका को लौटो 

रमण करो निज स्त्रियों संग, राम को सीता संग रहने दो 


मारीच के यह  कहने पर, दशमुख रावण लंका लौटा

शत्रुता की बात भुलाकर, वह अपने महल में चला गया  

  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में एकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Friday, August 7, 2026

रावण का मारीच के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


देव-असुर दोनों मिलकर भी, उन्हें कभी हरा नहीं सकते  

बहुत ध्यान देकर अब सुनिए, जिस उपाय से वे मर सकते


सीता हैं श्रीराम की पत्नी, जग की सर्वोत्तम सुंदरी

युवा, सुडौल अंग हैं उनके, आभूषणों से सजी रहतीं 


स्त्रियों में रत्न हैं सीता, कोई भी नहीं बराबर उनके 

देव, गंधर्व, नाग कन्या, अप्सरा भी समान नहीं उनके 


 सीता का करें आप अपहरण, किसी तरह राम को छलकर

जीवित नहीं रहेंगे श्रीराम, सीता से बिछुड़ जाने पर 


बात पसंद आयी रावण को, उसने यह अकम्पन से कहा

 प्रातः ही सारथि संग जाकर, सीता को लाऊँगा यहाँ 


ऐसा कहकर गधों से जुते, तेजस्वी रथ पर सवार हो 

रावण ने प्रस्थान किया था, कर प्रकाशित सब दिशाओं को 


नक्षत्रों के मार्ग पर चलता, चन्द्र समान सुशोभित होता 

 ढका हुआ बादलों के मध्य, रावण का रथ जहाँ विचरता 


एक आश्रम में जाकर वह, ताड़का पुत्र मारीच से मिला 

भक्ष्य भोज्य अर्पित कर उसने, रावण का शुभ सत्कार किया 


आसन व जल आदि देकर, करके पूजन उसका हाल लिया 

कुशल तो है राज्य में तुम्हारे, मन में लगा है कुछ खटका 


बड़ी उतावली से आये हो, लगता है, सब ठीक नहीं  

मारीच के प्रश्नों को सुनकर, रावण ने यह बात कही 


अनायास ही श्रीराम ने, मार गिराये दोनों खर-दूषण 

सीमा की रक्षा जो करते, जनस्थान के मारे राक्षस

 

Wednesday, August 5, 2026

अकम्पन का रावण को राम की महिमा बताना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


 संग हैं छोटे भाई लक्ष्मण, जो उनके समान बलवान 

 मुख मण्डल उनका अति शोभन, पूर्णिमा के चंद्रमा समान


रक्तिम आँखें, स्वर है गंभीर, ज्यों हो वायु अग्नि के साथ

श्रीराम अति प्रबल वीर हैं, संयुक्त हुए भाई के साथ


जनस्थान उजाड़ा उन्होंने, कोई नहीं है उनके साथ

न ही मुनि, न कोई देवता, पूर्णतया निश्चित यह बात  


श्रीराम के छोड़े हुए बाण, सोने की पाँख वाले थे 

पाँच मुख वाले सर्प बने वे, राक्षसों को खा जाते थे 


भय से कातर हुए राक्षस, जिस-जिस ओर भी भागा करते  

वहाँ-वहाँ श्रीराम को सदा, सम्मुख अपने खड़ा देखते 


इस तरह अकेले ही उन्होंने, जनस्थान का विनाश किया 

अकम्पन की बात यह सुनकर, रावण ने तुरंत वचन कहा 


लक्ष्मण सहित राम को मारने, जनस्थान अभी जाता हूँ 

सुनकर यह अकम्पन बोला, राम का पुरुषार्थ सुनाता हूँ 


यदि क्रोधित हों जायें राम, उन्हें नहीं नियंत्रित कर सकते

बाणों से भरे हुए नद के, वेग को वे पलट हैं सकते 


तारा, ग्रह, नक्षत्रों सहित, नभमण्डल को कष्ट दे सकते 

सागर में डूबती पृथ्वी को, वे निज बल से उठा सकते 


 महासागर की मर्यादा का भी, वे ह्रास कर सकते हैं 

बाणों से समुद्र का वेग, नष्ट वायु वेग कर सकते हैं


महायशस्वी वीर पुरुषोत्तम, लोकों का करके संहार 

नये सिरे से सृष्टि कर सकते, यदि करें वे इसका विचार 


जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर, निज अधिकार नहीं पा सकते 

उसी प्रकार आप व राक्षस, श्रीराम को जीत नहीं सकते