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Tuesday, June 2, 2026

श्रीराम का सीता सहित लक्ष्मण को पर्वत की गुफा में भेज युद्ध के लिए उद्यत होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


चतुर्विंश: सर्ग: 



श्रीराम का तात्कालिक शकुनों के द्वारा

राक्षसों के विनाश और अपनी विजय की

संभावना करके सीता सहित लक्ष्मण को

पर्वत की गुफा में भेजना और युद्ध के लिए उद्यत होना 


प्रचंड पराक्रमी राक्षस खर, जब आश्रम की ओर चला था 

अशकुन संबंधी लक्षणों को, राम-लक्ष्मण ने देखा था 


प्रजा अहित के सूचक लक्षण, देख किया विचार राम ने

भर गये वह अत्यंत अमर्ष में, लक्ष्मण से वचन तब बोले 


 इनकी ओर जरा तुम देखो, ये जो बड़े उत्पात हो रहे

राक्षसों का संहार तय है, इसकी यह सूचना देते 


गधों समान वर्ण धूसर है, बादल भीषण गर्जन करते 

रक्त की धारा बहा रहे हैं, आकाश में दिखें विचरते 

 

उत्पात वश उठने वाले, धूम से मेरे बाण जुड़ रहे 

युद्ध हेतु आनंदित होते, धनुष स्वयं तैयार हो रहे


वनचारी पक्षी ज्यों बोलें, अभय हमारा सूचित होता 

राक्षसों के लिए पर इससे, प्राणों का भय इंगित होता 


दाहिनी भुजा फड़क कर मेरी, इस बात की सूचना देती 

संशय नहीं जरा भी कोई, युद्ध की भेरी अभी बजेगी 


विजय हमारी, पराजय उनकी, कांति तुम्हारे मुख की कहती 

 जिनकी प्रभा क्षीण होती है, आयु उनकी नष्ट हो जाती  


घोर नाद राक्षसों का आता, रणभेरी तीव्र बजती है 

निज कल्याण चाहता है जो, पूर्व सुरक्षा उसे उचित है 


इसीलिए तुम धनुष-बाण ले, विदेहकुमारी सीता को ले 

प्रवेश कर जाओ  उस गुफा में, जो वृक्षों से आच्छादित है 


तुम मेरे इस वचन को मानो, विरोध जरा  नहीं चाहता 

चरणों की सौगंध दिला, देखना चाहूँ, तुम्हें मैं जाता 


इसमें नहीं संदेह  कोई, तुम वीर और   बलशाली हो 

राक्षसों का वध कर सकते हो, पर  मेरी आज्ञा तुम मानो 


मैं स्वयं  इन्हें मारूँगा,  सीता को सुरक्षित ले जाओ 

श्रीराम के यह कहने पर, ले गये लक्ष्मण गहन  गुफा में 


हर्षित हुए श्रीराम देख यह, बात मान ली  लक्ष्मण ने 

सीता पूर्ण सुरक्षित हैं अब, धारण किया कवच उन्होंने 


अग्नि समान कवच था उनका, श्रीराम शोभित होते थे 

धनुष बाण हाथ में लेकर, युद्ध के लिए तत्पर थे वे 


सभी दिशाएँ गूँज उठीं, उस प्रत्यंचा की टंकार से 

देव, गंधर्व, सिद्ध आ गये, युद्ध देखने की इच्छा से 


ब्रह्मर्षि शिरोमणि सभी  ऋषिगण, एक साथ वहाँ खड़े हुए 

हो कल्याण गौ व ब्राह्मणों का, रामचंद्र विजय प्राप्त करें 


एक-दूसरे को देखकर, आपस में करने लगे  विचार

एक और चौदह हज़ार हैं, दूसरी ओर अकेले राम  


वैष्णव तेज से आविष्ट राम को, युद्ध हेतु देख तैयार 

अनायास महान कर्म करते, राम लग रहे  रुद्र समान 


देव, गंधर्व, चारण आदि, जब मंगल कामना करते थे 

उसी समय पहुँची वह सेना, राक्षस तुमुल नाद करते थे 


धनुषों की टंकार गूंजती, ढोल नगाड़े भी बजते थे 

वनजंतु भागे भय के कारण, पीछे मुड़कर नहीं देखते 


बड़े वेग से चली वह सेना, सिंधु सी गंभीर लगती थी 

नाना तरह के आयुध धारी, सैनिकों की पंक्ति चलती थी 


युद्धकला के ज्ञाता राम ने, उस सेना का किया निरीक्षण 

युद्ध हेतु आगे बढ़ गये वह, तरकस से निकाले बाण 


 क्रोध प्रकट किया खींच धनुष, अग्नि समान जान पड़ते थे 

कठिन था उनकी ओर देखना, वन देवता व्यथित हो उठे  


तेजपूर्ण वह रूप राम का, महादेव  समान लगता था 

दक्ष यज्ञ का विनाश करने हित, जो उन्होंने धर लिया  था 


धनुष, आभूषण, रथों से, अग्नि समान कवचों से युक्त थी 

राक्षसों की सेना प्रातः, नील मेघ की घटा समान थी  


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Friday, April 17, 2026

प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टम: सर्ग:


प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान 


सुतीक्ष्ण मुनि से पूजित होकर, भली-भाँति वह रात्रि बितायी 

प्रातःकाल समय से उठकर, स्नानादि दिनचर्या निभायी 


विधिपूर्वक तीनों ने मिलकर, अग्नि व देवों की पूजा की 

सूर्यदेव का दर्शन करके, स्वयं जा मुनिवर से भेंट की 


भगवन ! आपने वन्द्य  होकर, हम लोगों का किया सत्कार  

अब यहाँ से जाना चाहते, करें हमारी विनय स्वीकार  


दण्डकारण्य में रहने वाले, मुनियों से मिलना चाहें 

तेजस्वी, श्रेष्ठ तापसों संग, जाने की हमें आज्ञा दें 


सूर्य प्रचंड नहीं हुए जब तक, उससे पूर्व  प्रस्थान करें 

ऐसी ही अभिलाषा रखते, राम ने अति मधुर  वचन कहे 


चरणों का स्पर्श कर रहे थे, उन्हें उठाया सुतीक्ष्ण मुनि ने 

लगा ह्रदय से कहा स्नेह से , जायें संग सिया -लक्ष्मण के 


मंगलमय हो मार्ग आपका, विघ्न और बाधा मत आयें 

पुनीत ह्रदय वाले मुनियों के, आश्रमों के दर्शन पाएँ 


सुंदर वन, सरवर, झरने भी, इस मार्ग में अनेक मिलेंगे 

झुंड मृगों के, सुंदर पंछी, पंकज आदि पुष्प देखेंगे 


हे लक्ष्मण !  तुम भी संग जाओ, किंतु लौट पुन: आओ यहीं 

 उन दोनों ने की परिक्रमा, अच्छा, कहकर उन मुनिवर की


बड़े नेत्र वाली सीता ने, उनको धनुष-बाण पकड़ाये

बाँध पीठ पर तूणीरों को, धनुष लिए वे बाहर निकले 


दोनों वीर अति रूपवान थे, खड्ग और धनुष धारण कर 

सीता सहित  किया प्रस्थान, पूज्य मुनिवर की आज्ञा लेकर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 




Monday, July 28, 2025

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका मुनि से सम्मानित होना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


पञ्चम: सर्ग:


श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर जाना,

देवताओं का दर्शन करना और मुनि से सम्मानित होना

तथा शरभङ्ग मुनि का ब्रह्मलोक-गमन  


जो इस रथ के दोनों ओर, खड्ग ले सौ-सौ वीर खड़े हैं 

वक्ष विशाल, भुजाएँ बलवान, वस्त्र लाल, व्याघ्र समान हैं 


पच्चीस वर्ष सम लगते, गले में सुंदर हार धारा है 

देव सदा ऐसे ही रहते, दर्शन इनका अति प्यारा है 


 लक्ष्मण! जब तक मैं यह जानूँ, रथ पर है कौन विराजमान

तुम ठहरो सीता के साथ, कहकर राम कर गये प्रस्थान 


मुनि आश्रम पहुँचते जब तक, इसके पूर्व ही देख इंद्र ने 

जाता हूँ, कहा मुनि से, मिलना नहीं है अभी श्रीराम से 


 जो दूजों के लिए कठिन है, इन्हें महान कर्म करना है

रावण को पराजित करके, निज कर्त्तव्य पूरा करना है 


विजयी हुए कृतार्थ राम के, तब आऊँगा दर्शन करने

अनुमति लेकर शरभङ्ग मुनि से, इंद्र लगे थे वहाँ से चलने 


बैठ समीप अग्नि के मुनि जब, अग्निहोत्र यज्ञ करते थे 

सीता व लक्ष्मण के साथ मिल, श्री राम वहाँ आ पहुँचे 


कर प्रणाम मुनि चरणों में, उनकी आज्ञा से वहाँ बैठे 

इंद्र के आने का कारण क्या, पूछा उनसे श्रीराम ने 


ब्रह्म लोक ले जाने आये, वरदाता यह इंद्र मुझे 

 इंद्रियों पर कर नियंत्रण, विजय पायी है तप से अपने


किंतु मुझे जब ज्ञात हुआ कि, आप यहाँ आने हैं वाले

 निश्चय किया। नहीं जाऊँगा, बिना आपके दर्शन पाये 


धर्म परायण आप महात्मा, आपको मैं निवेदन करता 

स्वर्ग व ब्रह्म लोक जो जीते, उन्हें आपको अर्पित करता 


सुनकर बात शरभङ्ग मुनि की, कहा शास्त्रज्ञाता राम ने

  कराऊँगा मैं ही आपको , दर्शन स्वर्ग औ' ब्रह्मलोक के 


इस समय मैं आपसे पूछूँ, वन वास हेतु बतायें स्थान

कुछ दूरी पर हैं मुनि सुतीक्ष्ण, मुनिवर ने कराया यह ज्ञान 


Tuesday, January 2, 2024

वृद्ध कुलपतिसहित बहुत से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

षोडशाधिकशततम: सर्ग:


वृद्ध कुलपतिसहित बहुत से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना 

 

पापजनक अपवित्र द्रव्य से, तपस्वियों का स्पर्श कराके 

ऋषियों को घनी पीड़ा  देते, आश्रमों में रहते छिप के 


असावधान तपस्वियों का फिर, कर विनाश वहाँ बस जाते 

यज्ञ सामग्री बिखरा देते, घट फोड़, अग्नि बुझा देते  


दुरात्मा उन राक्षसों के भय से, त्याग आश्रमों को ऋषिगण 

अन्य स्थान में जाना चाहें, करूँ में इनका पथ प्रदर्शन 


 शारीरिक हानि पहुँचायें, इससे पूर्व ही हम जाएँगे 

अश्व मुनि का आश्रम निकट है, उसी में हम निवास करेंगे 


खर करेगा अनुचित बर्ताव, आपके प्रति भी हे श्री राम 

उससे पूर्व आप यदि चाहें, साथ हमारे करें प्रस्थान 


यद्यपि आप सदा सावधान, राक्षसों के दमन में समर्थ 

किंतु सीता सहित यहाँ रहना, संदेह जनक व दुख दायक 


थे अन्यत्र जाने को उत्सुक, रोक नहीं सके राम उन्हें 

अभिनंदन करके उन्होंने,  किया प्रस्थान साथ समूह के 


पीछे जाकर विदा दी उनको, प्रणाम किया कुलपति को भी

 सुन उपदेश लौट आये आश्रम, राम अनुमति लेकर उनकी


ऋषियों से जो रिक्त हुआ था, उस आश्रम को नहीं त्यागा 

ऋषि समान जीवन था राम का, रक्षा का सामर्थ्य भरा था 


 दृढ़ विश्वास जिन्हें ऐसा था, उन ऋषियों ने किया अनुसरण 

जिन्हें भरोसा था राम पर , नहीं गये वे दूसरे आश्रम 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ.



Monday, September 25, 2023

वृद्ध कुलपतिसहित बहुत से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

षोडशाधिकशततम: सर्ग:


वृद्ध कुलपतिसहित बहुत से ऋषियों का चित्रकूट छोड़कर दूसरे आश्रम में जाना 

 

लौट गये जब भरत अयोध्या, राम वहीं वन में बसते थे 

उन्हें एक दिन भान हुआ यह, तापस उद्वगिन से लगते थे 


श्रीराम का आश्रय लेकर, पूर्व में जो आनंद मग्न थे 

मानो वहाँ से जाना चाहें, ऐसे उत्कंठित लगते थे 

   

नेत्रों से, भौहें टेढ़ी कर,  राम की ओर  संकेत करें

मन ही मन शंकित हों जैसे, बातें करते मंद स्वरों में 


श्रीरघुपति ने मन में सोचा, उनसे कोई भूल हुई क्या 

हाथ जोड़ कुलपति से पूछा, क्या मुझसे कोई अपराध हुआ 


या मेरा बर्ताव था अनुचित, राजाओं के योग्य नहीं था 

अथवा कोई विकार दिख रहा, मुनि गण को जो अति खला था  


लक्ष्मण ने प्रमाद के कारण, कोई किया आचरण ऐसा  

योग्य नहीं है जो उसके भी, ऋषिगण ने जिसको देखा है


अर्ध्य-पाद्य के द्वारा, जो करती आयी ऋषियों की सेवा 

मेरी सेवा कारण क्या, की सीता ने नहीं समुचित सेवा 


श्रीराम के प्रश्न को सुन, वृद्ध महर्षि काँपते से बोले 

जो स्वभाव से कल्याणी  है, सीता से त्रुटि संभव कैसे 


राक्षसों द्वारा आपके कारण, भय उपस्थित होने वाला 

तभी उद्विग्न हुए तपस्वी, आपस में करते हैं चिंता 


रावण का छोटा भाई खर,  हता है यहीं वन प्रांत में

 तपस्वियों को उखाड़ फेंका,  जनस्थान में रहने वाले


अति क्रूर, घमंडी, ढीठ बहुत, नरभक्षी, विजयोन्मत्त है 

नहीं सहन कर पाता आपको, तापसों  पर रुष्ट हुआ है 


जब से आप यहाँ आये हैं, तब से वे अति कष्ट दे रहे 

हैं अनार्य राक्षस अति भीषण, खल, विकृत व दुखदायक भी वे



Friday, June 30, 2023

भरत का नंदीग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


पञ्चशाधिकशततम: सर्ग:


भरत का नंदीग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदनपूर्वक राज्य का सब कार्य करना 


माताओं को अयोध्या में रख, दृढ़ प्रतिज्ञ भरत ने कहा 

गुरुजन से आज्ञा माँगू , अब मैं नंदीग्राम  रहूँगा


श्रीराम वियोग से उत्पन्न,  दुख महा वहीं सहन करूँगा 

इस राज्य के लाभ के हेतु,  करूँगा भाई  की प्रतीक्षा


 गये स्वर्ग पिता, राम वन में, वह गुरु हैं पूजनीय मेरे 

मंत्री और पुरोहित वसिष्ठ, शुभ वचन भरत का सुन बोले 


भातृ भक्ति से प्रेरित होकर, यह जो तुमने बात कही है 

 प्रशंसनीय होने के साथ, वास्तव में योग्य तुम्हारे है 


भाई के दर्शन भी चाहते, हित साधन में उनके लीन 

श्रेष्ठ मार्ग पर स्थित हो तुम,  करे न कौन तुम्हारा अनुमोदन 


मंत्रियों का प्रिय वचन सुना, तब सारथी से भरत ने कहा

रथ तैयार करो शीघ्र तुम, ली माताओं से भी आज्ञा 


रथ पर वे आरूढ़ हो गये,  उसी समय शत्रुघ्न के साथ

मंत्रियों और पुरोहितों से घिर,  ब्राह्मण भी चल रहे साथ


अयोध्या से पूर्वाभिमुख, नंदीग्राम का पथ पकड़ा 

अश्व, गजों रथ से भरी,  स्वयं पीछे-पीछे चल दी सेना


पुरवासी भी साथ हो लिए, भातृवत्सल भरत के पीछे 

मस्तक पर रख चरण पादुका, बहुत शीघ्रता से जाते थे 


उतर नंदीग्राम में रथ से, गुरुजनों से भरत ने कहा 

धरोहर के रूप में मुझको, भाई ने राज्य यह सौंपा 


सुवर्णाभूषित पादुकाएँ, निर्वाह करें योगक्षेम

उनके प्रति मस्तक झुकाया, राज्य कर दिया उन्हें समर्पित 


इन पर धारण करें छत्र अब, इन्हें मानूँ भाई के चरण

 इनके द्वारा ही राज्य में, परम धर्म का होगा स्थापन 


प्रेम के कारण ही भाई ने, यह धरोहर मुझे सौंप दी 

रक्षित होगी मुझ  द्वारा, उनके वापस लौटने तक ही 


इसके बाद स्वयं इनको मैं, श्रीराम को लौटा दूँगा 

पादुकाओं से सज्जित, चरण युगलों का दर्शन करूँगा 


उनके आने पर मिलते ही, राज्य समर्पित उनको कर के 

आज्ञा के अधीन रहकर, सदा सेवा में उनकी रह के 


राज्य भार तब उन्हें सौंप कर, स्वयं हल्का हो जाऊँगा

श्रीराम  की सेवा में दे, पश्चाताप से मुक्त  रहूँगा 


ककुत्स्थकुल भूषण श्रीराम के, राजा के पद पर होने से 

हर्षित होंगे लोग सभी, चौगुना मिलेगा आनंद मुझे 


इस प्रकार दीनभाव से भरकर, कर विलाप दुख मग्न भरत  

राज्य चलाने लगे वहीं से,  वह मंत्रियों के संग मिलकर 


वल्कल और जटा धारण कर, सदा मुनिवेश में वहाँ रहे 

भाई की आज्ञा पालन कर, प्रतिज्ञा के भी पार गये 


राज्य का समस्त कार्य वे, पादुकाओं को निवेदन करते 

ख़ुद ही उनपर छत्र लगाते, स्वयं ही चंवर डुलाते थे 


ख़ुद  रहकर उनके अधीन वे, मंत्रियों से कार्य  करवाते 

जो भी कार्य उपस्थित होता, प्रबंध यथावत उसका करते 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Wednesday, July 20, 2022

वसिष्ठजी का सृष्टि परंपरा के साथ इक्ष्वाकु कुल की परंपरा बताना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

 दशाधिकततम: सर्ग:

वसिष्ठजी  का सृष्टि परंपरा के साथ इक्ष्वाकु कुल की परंपरा बताकर ज्येष्ठ के हाई राज्याभिषेक का औचित्य सिद्द्ध करना और श्रीराम जी से राज्य ग्रहण करने के लिए कहना 


श्री रामचंद्र को रुष्ट जान, यह कहा महर्षि वसिष्ठ ने 

अस्तित्त्व है परलोक का, ब्राह्मण जाबालि भी यह जानते      


तुमको लौटाने की ख़ातिर, ऐसी बात कही उन्होंने 

इस लोक की उत्पत्ति का, अब यह वृत्तांत सुनो तुम मुझसे 


सभी जलमय था आरम्भ में, जल से भू का निर्माण हुआ 

ब्रह्मा प्रकटे देवों के सँग, बन विष्णु वराहावतार लिया      


जल के भीतर से पृथ्वी को, इसी रूप में बाहर निकाला 

कृतात्मा पुत्रों के संग मिल, ब्रह्मा ने जग निर्माण किया 


परब्रह्म  परमात्मा से, प्रादुर्भाव हुआ ब्रह्मा का 

नित्य,सनातन, अविनाशी जो, फिर मरीचि, जिनसे कश्यप का 


कश्यप से हुए विवस्वान फिर, प्रजापति वैवस्त मनु थे 

मनु के पुत्र हुए इक्ष्वाकु, राजा जिन्हें बनाया मनु ने     


प्रथम नरेश अयोध्या के थे वे, उनसे कुक्षि, फिर विकुक्षि

महाप्रतापी बाण हुए फिर, अनरण्य थे जिनके पुत्र श्री 


सत्पुरुषों में श्रेष्ठ राजा थे, नहीं अकाल, सूखा देखा 

कोई चोर नहीं था राज्य में,  उनके पुत्र थे पृथु राजा


महातेजस्वी त्रिशंकु की, उत्पत्ति हुई राजा पृथु से    

विश्वामित्र के सत् प्रभाव से, स्वर्ग सदेह वे चले गए  


महायशस्वी धुँधुमार फिर, राजा त्रिशंकु के पुत्र हुए 

धुँधुमार के युवनाश्व थे,  जिनके पुत्र श्री मांधाता थे


सुसंधि पुत्र मांधाता के, ध्रुवसंधि व प्रसेनजित उनके 

ध्रुवसंधि के पुत्र भरत थे, असित का जन्म हुआ था जिन से   


तालजाँघ व शशबिंदु से मिल, शत्रु हैहय ने उन्हें हराया  

शैल शिखर पर मुनिभाव से, चिंतन करते परमात्मा का