श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकत्रिंश: सर्ग:
रावण का अकम्पन की सलाह से
सीता का अपहरण करने के लिए जाना और
मारीच के कहने से लंका को लौट आना
उसके बाद जनस्थान से, अकम्पन नामका एक राक्षस
शीघ्रता से लंका जा पहुँचा, बोला यह रावण से मिलकर
जनस्थान के सभी राक्षस, मारे गये हैं खर के साथ
किसी तरह यहाँ पहुँचा मैं, राजन् ! बचा के अपनी जान
सुनते ही दशमुख रावण की, आँखें हुईं रक्तिम क्रोध से
भरा रोष में अति राक्षस, मानो कर डालेगा भस्म उसे
कौन चाहता मृत्यु अपनी, जनस्थान पर कर के आक्रमण
कौन है ऐसा दु:साहसी, निकट आ गया है जिसका मरण
जो भी हैं मेरे अपराधी, आश्रय कहीं न पा सकते हैं
इंद्र, यम, कुबेर या विष्णु भी, नहीं चैन से रह सकते हैं
हूँ मैं काल काल का भी, ज्वाला को भी जला सकता हूँ
मौत को भी मृत्यु के मुख में, चाहने पर सुला सकता हूँ
मैं यदि क्रोध में भर जाऊँ तो, वायुदेव की गति रोक दूँ
दिनकर और अग्नि को भी मैं, निज प्रताप से वहीं ठोक दूँ
रावण को क्रोधित हुआ देखा, भयभीत हो गया अकम्पन
हाथ जोड़ की अभय याचना, निकला न मुख से कोई वचन
राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने, दिया उसे अभयदान तब
प्राण शेष रहेंगे उसके, संशय रहित हो बोला वह तब
दशरथ के पुत्र श्रीराम, पंचवटी में आकर रहते हैं
सिंह समान गठन तन की, कंधे मोटे, भुजाएँ गोल हैं
तन का रंग साँवला उनका, यशस्वी और तेजस्वी हैं
उनके बल और पराक्रम की, कहीं कोई तुलना नहीं है
धनुर्धरों में बहुत श्रेष्ठ हैं, अद्भुत है उनकी युद्ध कला
जनस्थान में रहने वाले, खर-दूषण का वध कर डाला
अकम्पन की बातें सुनकर यह, रावण ने दीर्घ श्वासें ली
क्या देवों के संग आये हैं, अकम्पन ! बताओ तो सही
अकम्पन ने एक बार फिर, राम के बल का किया बखान
दिव्यास्त्रों के प्रयोग में भी, श्रीराम हैं पूर्णत: संपन्न



