श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
नवम:सर्ग:
सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिए अनुरोध
मुनि सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर, वन को जाते हुए राम से
सीताजी ने किया अनुरोध, स्नेहभरी मनहर वाणी में
आर्यपुत्र ! महान हैं आप, किंतु अधर्म के भागी होते
कामजनित व्यसन से दूर हैं, इस अधर्म से भी बच सकते
तीन व्यसन केवल जग में, कामनाओं से उत्पन्न होते
मिथ्याभाषण, परस्त्री गमन, वैर बिना हिंसा रत होते
मिथ्या भाषण नहीं किया है, न ही कभी भी करेंगे आप
दूजा दोष नहीं आ सकता, धर्मनिष्ठ, जितेन्द्रिय हैं आप
किंतु दूसरों के प्राणों की, हिंसा रूपी दोष तीसरा
है उपस्थित आपके सम्मुख, राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा
इसीलिए धनुष धारण कर, भाई के संग निकल पड़े हैं
ऋषियों की रक्षा के हित, दण्डकारण्य आप जा रहे हैं
चिंता से व्याकुल मन मेरा, अरण्य गमन नहीं है भाता
क्या कारण है? सुनिए इसको, अस्त्र आपके हाथ शोभता
वनवासी राक्षसों को देख, संभव है, आप उन्हें मारें
ज्यों ईंधन पावक को बढ़ाये, धनुष, क्षत्रिय को ललकारे
पूर्वकाल की बात सुनी है, वन में एक मुनि रहते थे
भंग करूँ तपस्या इसकी, इंद्र योद्धा बने आये थे
मुनि आश्रम में पहुँच इंद्र ने, खड्ग धरोहर रूप में रखा
मुनि उसकी रक्षा में लग गये, साथ सदा ही उसको रखा
तप ही जिनका धन था, वह मुनि, शस्त्र की रक्षा में लग गये
बुद्धि भी क्रूर हुई उनकी, अधर्म में आकर्षित हो गये
जाना पड़ा नरक में उनको, रौद्र कर्म में लीन हुए वह
स्नेह और विशेष आदर वश, शिक्षा दे रही आपको यह
बिना किसी अपराध किसी को, मारना नहीं है यशकारी
दुख में पड़े प्राणी की रक्षा, धर्म क्षत्रिय का इतना ही
वनवासी को कदापि न शोभे, शस्त्रधारण कर वह विचरे
हिंसामय कठोर कर्म तज के, प्राणियों पर वह दया करे
केवल शस्त्र का सेवन करने से, बुद्धि कलुषित हो जाती
पुन: अयोध्या जाने पर ही, बनें क्षत्रिय आप धनुष धारी
वन में मुनिवृत्ति से रहिए, इसी से सास-श्वसुर खुश होंगे
मिले धर्म के पालन से सब, धर्म से ही सुखी हम होंगे
शुद्धचित्त हुए तपोवन में, धर्म का ही करें अनुष्ठान
इस त्रिलोकी में जो कुछ भी है, आपको है सभी का ज्ञान
स्त्री सुलभ स्वभाव के कारण, आपको किया निवेदन मैंने
छोटे भाई संग करें विचार, जो समुचित हो वही करें
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें नौवाँ सर्ग पूरा हुआ।
