Saturday, July 25, 2026

श्रीराम का एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

त्रिंश: सर्ग:


श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर

उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,

श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर

एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा

देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा


कर प्रयोग अनेक बाणों का, खर को क्षत-विक्षत कर डाला 

रक्त बहा उसके अंगों से, मानो झरती हो जल धारा 


व्याकुल किया राम ने उसको, फिर भी वह अति वेग से दौड़ा 

दो-तीन पग पीछे हट गये, राम ने तेजस्वी बाण लिया 


ब्रह्म दंड के सरिस भयंकर, देवराज इंद्र ने दिया था 

खर को लक्ष्य करके उसे छोड़ा, वज्रपात सा शब्द हुआ 


खींच कान तक धनुष राम ने, वह अति प्रबल बाण छोड़ा था 

खर की छाती में लगा जाकर, प्रज्ज्वलित हुआ गिर पड़ा था 


श्वेतवन में जैसे रुद्र ने, अंधकासुर को भस्म किया था 

वृत्रासुर वज्र से जैसे, नमुचि फेन से मारा गया था 


इंद्र की अशनि से जिस प्रकार, बलासुर का विनाश हुआ था 

श्रीराम के उस बाण से, राक्षस खर धराशायी हुआ था 


इसी समय देवतागण आये, चारण भी थे उनके साथ 

हर्षित हो दुंदुभी बजाकर, करते पुष्पों की बरसात 


 उन्हें देख यह हुआ आश्चर्य, डेढ़ मुहूर्त में ही राम ने 

खर-दूषण, उनकी सेना को, मारा था अपने बाणों से 


निज स्वरूप को जानने वाले, राम का यह कर्म अद्भुत है 

विष्णु की भाँति दृढ़ता इनमें, बल-पराक्रम भी अद्भुत है 


ऐसा कह सभी देवता, जैसे आये चले गये वैसे 

राजर्षि और महर्षि आये, कर सत्कार राम का बोले 


 देवराज इंद्र इसीलिए, शरभंग के आश्रम पर आया 

इसी कार्य की पूर्णता हेतु, आपको पंचवटी पहुँचाया  


राक्षसों के विनाश हेतु ही, शुभागमन हुआ है आपका 

सिद्ध किया बड़ा कार्य, अब, धर्म का अनुष्ठान यहाँ होगा 


इसी बीच सीता के साथ, लक्ष्मण जी कन्दरा से निकले 

किया आश्रम में प्रवेश तब, भाई से पूजित हो राम ने


पति का दर्शन कर सीताजी, अतीव हर्ष पा, हुईं प्रसन्न 

आलिंगन किया श्रीराम का, परमानंद में हुईं निमग्न 


मारे गये राक्षस समूह सभी, श्रीराम को क्षति न पहुँची 

देख और जानकर इसको, सीताजी तब अति हर्षित हुईं 


हो प्रसन्न महात्मा मुनिजन, भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे 

प्राण वल्लभ श्रीराम को देख, सीता के नयन खिलते थे 


  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Wednesday, July 22, 2026

श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

त्रिंश: सर्ग:


श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना, श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा 


खर की गदा राम ने काटी, मुस्का कर यह कटु वचन कहे 

 मात्र यही तेरा सारा बल, क्यों व्यर्थ डींग मारता फिरे ?


शक्तिहीन है तू मुझसे अति, पूर्ण सिद्ध हो गया इसी क्षण 

भू पर गदा पड़ी है तेरी, कर तेरी बातों का खंडन 


तूने कहा, मेरा वध कर , राक्षसों के आँसू पोछेगा 

झूठ हुआ वचन वह तेरा, क्षुद्र स्वभाव कैसे छोड़ेगा 


हर लूँगा तेरे प्राणों को, जैसे अमृत हर लिया गरुड़ ने 

शीश काट डालूँगा तेरा, कर विदीर्ण शरीर को तेरे 


धूल से धूसर होंगे अंग, दो बाँहें भी कट जायेंगी 

फेन और बुदबुदों से युक्त, लहू का भूमि पान करेगी 


राक्षस कुलों का कलंक तू, महानिद्रा में सो जाएगा 

दंडक वन हो पुनः सुरक्षित, मुनियों का घर बन जाएगा 


जनस्थान में निर्मित तेरे, निवास-स्थान नष्ट होंगे अब 

निर्भय होकर विचरेंगे मुनि, इस अरण्य में नि:शंक होकर 


जो अब तक कारण बनीं भय का, राक्षसियाँ भाग जायेंगी 

जिनका स्वामी तुझ जैसा है, आतुर होकर शोक करेंगी 


क्रूर स्वभाव किया है धारण, क्षुद्र विचार ह्रदय में धरता 

कंटक तू ब्राह्मणों के हित, शंकित सदा उनका मन रहता 


श्रीराम कह रहे थे जब यह,  क्रुद्ध हुआ बोला तब खर भी 

निश्चय ही तुम बहुत घमंडी,  हो निर्भय, भय होने पर भी


 हो गये हो मृत्यु के अधीन, ऐसा मुझे जान पड़ता है 

 इसी कारण तुमको भान नहीं है, कब क्या कहना उचित है 


पड़े काल के फंदे में जो, उसकी इंद्रियाँ व्यर्थ हो जातीं 

कर्त्तव्य का भान न रहता, व्यर्थ कामों में वे लग जातीं 


ऐसा कहकर उस राक्षस ने, भौहें टेढ़ी कर के देखा 

लख रणभूमि में चारों ओर, साखू का इक वृक्ष उखाड़ा 


विकट गर्जना करके उसने, श्रीराम पर उसे दे मारा 

श्रीराम ने बाणों से ही, उस पादप को अधर में काटा 


खर को मार डालने हेतु तब, राम ने अति क्रोध दिखाया 

स्वेद आ गया उनके तन में, रक्त वर्ण आँखों में प्रकटा


Sunday, July 12, 2026

श्रीराम का खर को फटकारना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्


अरण्यकाण्डम्


एकोनत्रिंश: सर्ग:  

श्रीराम का खर को फटकारना तथा खर का भी उन्हें 

कठोर उत्तर देकर उनके ऊपर गदा का प्रहार करना 

और श्रीराम द्वारा उस गदा का खंडन 


रथहीन जब देखा खर को, श्रीराम ने उससे वचन कहे

पहले मृदु फिर कठोर शब्द में, राम उस राक्षस से बोले 


असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का, आश्रय ले अभिमान किया 

तू क्रूर व पापाचारी है, लोक विरोधी हर कर्म किया 


जो ऐसा क्रूर कर्मी है, चाहे हो त्रिलोकी का ईश्वर 

अधिक काल नहीं टिक सकता, कर्मों के फल से वह बचकर    


जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी अभिलाषा काम है 

प्राप्त वस्तु और भी मिल जाये, इसको ही कहते लोभ हैं 


काम व लोभ के वश होकर, जो भी पाप कर्म करता है 

नहीं देखे उसका परिणाम, उल्टा हर्ष अनुभव करता है


होता है उसका विनाश भी, ज्यों रक्त पुच्छिका का होता 

ओले खा लेती है जब वह, विष सरिस परिणाम तब होता 


दण्डकारण्य में रहने वाले, जो तपस्या में लीन थे 

उन मुनियों की हत्या करके, कैसे फल तुझे अभिप्रेत थे 


जिनकी जड़ें खोखली हो गयीं, अधिक काल वे तरु न रहते 

पापी, लोक निन्दित पुरुष भी, चिरकाल तक जीवित न रहते 


ऋतु आने पर फूल उगते हैं, जैसे वृक्षों पर स्वयं ही 

पापकर्म का दंड मिलता है, पापी पुरुष को अवश्य ही 


जैसे विष मिश्रित अनाज  का, खाने पर तुरंत फल मिलता 

उसी प्रकार लोक में किए, पापकर्मों का फल भी मिलता 


जगत का बुरा चाहने वाला, घोर कर्म में जो लगा है 

उसे प्राण दंड देने हेतु, राजा दशरथ ने भेजा है 


मेरे छोड़े हुए ये बाण, सर्प की भाँति जो निकलेंगे  

तेरे तन को कर विदीर्ण ये,  सीधे पाताल में गिरेंगे



Wednesday, July 8, 2026

खर के साथ श्रीराम का घोर युद्ध


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टाविंश: सर्ग:


खर के साथ श्रीराम का घोर युद्ध 


त्रिशिरा व दूषण मारे गये, खर को इससे भय हो आया  

श्रीराम का देख पराक्रम, भीतर-भीतर बहुत घबराया 


एक अकेले श्रीराम ने, राक्षस सेना का वध कर डाला 

दूषण,त्रिशिरा के साथ ही, सेना प्रमुखों को मार गिराया 


इसके बारे में सोच-सोच, खर अत्यंत उदास हो गया 

ज्यों नमुचि ने किया इंद्र पर, आक्रमण वैसा राम पर किया 


एक प्रबल धनुष खींचकर, कई नाराच चलाये उनपर 

विषधर सर्पों के समान थे, मारे उसने रोष में भरकर 


 वह प्रत्यंचा हिला रहा था, कई अस्त्रों का कर प्रदर्शन 

रथारूढ़ खर दिखा पैंतरे, युद्ध क्षेत्र में करता विचरण 


सभी दिशाएँ ढक दीं उसने, कई तीक्ष्ण कठोर बाणों से 

देख उसे श्रीराम ने नभ, आच्छादित कर दिया तीरों से  


दोनों के पैने बाणों से, अवकाश रहित हुआ आकाश 

रवि देव भी पीछे छिप गये, नहीं प्रकट होता था प्रकाश 


 नाराच, नालीक, विकर्णि, तीखी नोकों वाले तीरों से

खर ने प्रहार किया राम पर, मानो गज मारे अंकुश से 


रथ में स्थिर बैठा हुआ राक्षस, पाशधारी यम लगता था 

महाबलशाली श्रीराम को, उसने थका हुआ समझा था 


यद्यपि सिंह समान चलता, तो भी राम न उद्गविन होते 

जैसे छोटे मृग को देखें, सिंह कभी भयभीत न होते 


तत्पश्चात ज्यों कोई पतंगा, निकट आग के चला गया

खर अपने विशाल रथ पर चढ़, श्रीरामचन्द्र के निकट गया 


जाकर वहाँ दिखाकर फुर्ती, धनुष श्रीराम का काट दिया 

 उनके मर्मस्थल में वज्र सम, सात बाणों से वार किया 


उसके बाद बलशाली राम को, पीड़ित किया गर्जना की 

खर के छोड़े हुए बाणों से, गिरा टूट उनका कवच भी 


खर के बाण धँसे तन में, वे अग्नि समान शोभित होते थे   

धावा बोला राम ने खर पर, अगस्त्यमुनि के दिये धनुष से


 स्वर्ण पंख लगे हुए जिनमें, झुकी हुई गाँठों वाले थे

खर की ध्वजा राम ने काटी, भरे क्रोध में उन बाणों से 


दर्शनीय सुवर्णमयी ध्वज, कई टुकड़ों में गिरा भूमि पर 

क्रोधित खर ने मारे कई बाण, श्रीराम के वक्ष स्थल पर 


जैसे किसी महावत ने गज पर, तोमर से प्रहार किया हो 

श्री राम का तन घायल था, तत्पर हुए वह अति क्रोधित हो 


छह बाण चलाये उन्होंने, एक लगा उसके मस्तक पर 

दो बाण भुजाओं में लगे, तीन लगे उसकी छाती पर 


उसके बाद क्रोधित होकर फिर, छोड़े तेरह तीखे बाण 

काटा जुआ उसके रथ का, लिए सारथि व घोड़े के प्राण 


खंडित हुआ धनुष उसका, राम के छोड़े हुए बाणों से 

कूदा, खड़ा हो गया धरती पर, गदा हाथ में लिए हुए 


हर्षित हुए देवता व महर्षि, देख रहे बैठ विमान पर  

वीर श्रीराम के उस कर्म की, भूरि-भूरि प्रशंसा की तब



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में अट्ठाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Thursday, June 18, 2026

त्रिशिरा का वध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तविंश: सर्ग:

त्रिशिरा का वध 


 श्रीराम के सामने जाते, खर को जब त्रिशिरा ने देखा

सेनापति था वह खर का, उसी क्षण निकट आकर यह बोला 


मुझ पराक्रमी वीर को भेजें, ख़ुद न जायें आप युद्ध में 

 छूकर अस्त्र प्रतिज्ञा करता, अब हत होंगे राम समर में 


या तो मैं इनकी मृत्यु हूँ, या वही मेरे वध का कारण 

 थमे युद्ध बस एक घड़ी भर, बन जायें केवल निर्णायक 


यदि मैंने इनको मारा तो, सुखपूर्वक आप लौट जायें   

यदि राम ने मारा मुझको, उन्हें आप आक्रमण कर मारें 


मृत्यु मिले भगवान के हाथों, यह लोभ था उसके मन में 

खर को राज़ी किया इसलिए, दे दी थी तब आज्ञा उसने 


 अश्व जुते तेजस्वी रथ द्वारा, त्रिशिरा ने किया आक्रमण 

उस काल में वह लगता था, तीन शिखरों वाले पर्वत सम 

 

बाणों की वर्षा कर दी, मेघ की भाँति आते ही उसने

विकट गर्जना करता जैसे, जल से भीगे हुए नगाड़े


महाबली श्रीराम-त्रिशिरा का, युद्ध विकट जान पड़ता था 

सिंह और गजराज की भाँति, अति भीषण होने वाला था 


उसी समय तीन बाणों से, मस्तक बींधा था श्रीराम का

कुपित हुए बोले तब राम, सह न सके उसकी उद्दंडता 


पराक्रमी शूरवीर राक्षस का, बल क्या बस इतना ही भर  

फूलों सरिस बाणों द्वारा, किया प्रहार मेरे ललाट पर 


अत: अब तुम भी ग्रहण करो, धनुष-डोर से छूटे बाणों को

चौदह बाण उन्होंने मारे, जो दें मात विषधर सर्पों को  


झुकी गाँठ वाले बाणों से, चारों घोड़ों को गिरा दिया 

आठ सायकों से फिर उसके, सारथि को रथ में सुला दिया 


एक बाण से ध्वजा काट दी, जब था रथ से कूदने वाला

छाती भेद डाली तब उसकी, फिर तो वह जड़वत् हो गया 


तत्पश्चात् अमर्ष में भरकर, तीनों मस्तक काट गिराये 

समरांगण में खड़ा था वह, निज धड़ से गर्म रक्त बहाए 


गिरे मस्तकों के साथ ही, अगले क्षण भू शायी हो गया 

भाग खड़े हुए सब सैनिक, ज्यों हिरण सिंह देख के भागा 


उन्हें भागते देख रोष से, लौटाने आया तुरंत खर 

राहु चन्द्र पर करे आक्रमण, वैसे किया प्रहार राम पर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।




 

Wednesday, June 10, 2026

श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षड् विंश: सर्ग: 



श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध 


बुरी तरह से मारी जाती, सेना को दूषण ने देखा 

पाँच हज़ार सैनिकों को तब, उसने राम से लड़ने भेजा 


युद्ध में पीछे कभी न हटें, महाभयंकर बलशाली थे 

चारों ओर से श्रीराम पर, लगे अस्त्र की वर्षा करने 


वृक्षों और शिलाओं की उस, बारिश को बाणों से रोका 

आँखें मूँदें सांड की भाँति, श्रीराम ने क्रोध उपजाया 


अति क्रोधित होकर श्रीराम ने, बरसात बाणों की कर दी 

 सभी ओर से हुई पीड़ित, दूषण सहित उसकी सेना भी


दूषण ने भी क्रोधित होकर, वज्र सरिस बाणों से रोका 

क्षुर नामक बाण से राम ने, उसका धनुष भी काट डाला 


चार सायकों से घोड़े व, एक से सिर काटा सारथि का 

तीन बाण छोड़े छाती में, दूषण तब रथहीन हो गया 


सोने के पत्र मढ़े थे जिसपर, ऐसा परिघ लिया हाथ में 

लोहे की कीलें लगी थीं, वज्र समान था वह छूने में 


अति भयंकर सर्प के समान, परिघ से उसने किया आक्रमण 

श्रीराम ने जब यह देखा, कर दीं उसकी भुजाएँ विदीर्ण 


उसके हाथ से खिसक के परिघ, इन्द्रध्वज समान गिर पड़ा 

ज्यों दंतविहीन हाथी गिरता, भुजा विहीन दूषण हो गया 


धराशायी दूषण को देख, साधु-साधु कह हुई प्रशंसा 

सभी प्राणियों को हर्ष था, श्रीरामचन्द्र की देख वीरता 


महाकपाल, स्थूलाक्ष और, प्रमाथी नामके तीन राक्षस 

काल के फंदे में फँस मानो, करने लगे प्रहार राम पर 


महाकपाल ने शूल पकड़ा था, पट्टिश लिया स्थूलाक्ष ने 

किया प्रहार श्रीराम पर, फरसे से प्रमाथी राक्षस ने 


 तीनों को आया देखकर, तीखे सिरे वाले बाणों से 

 अतिथियों सा उन तीनों का, किया था स्वागत श्रीराम ने


महाकपाल का मस्तक काटा, प्रमाथी पर तीर चलाये 

स्थूलाक्ष की आँखें हुईं घायल, तीनों ही मार गिराए 


उसके बाद कुपित राम ने, सेना पर कई बाण चलाये 

पाँच हज़ार की उस सेना को, यमलोक के द्वार दिखाए 


दूषण व उसकी सेना के, ख़त्म होने को खर ने जाना 

शीघ्र करो राम का वध तुम, बची सेना को आदेश दिया 


श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, तृहंगम, दुर्जय, सर्पास्य  

कारविरक्ष, परुष, कालकर्मुक, हेम, महामाली, रुधिराशन 


बारह महापराक्रमियों के  संग, खर ने अब धावा बोला 

अग्नि समान बाणों से राम ने, उन सबका संहार किया 


बड़े-बड़े वृक्षों का जैसे, वज्र विनाश कर देता पल में  

श्रीराम ने उनको मारा, स्वर्णपांख से युक्त बाणों से 


कर्णिनामक सौ बाणों से, सौ राक्षसों का किया विनाश 

सहस्र राक्षसों का संहार, उतने बाणों से कर डाला 


निशाचारों के कवच, आभूषण, धनुष आदि सब टूट गये 

खून से लथपथ होकर वे सब, धरती पर विश्राम पा गये 


ढकी कुशों से ज्यों वेदी हो, खुले केश निशाचर लगते थे 

रक्त, मांस की कीचड़ मच गई, नरक समान वन लगते थे 


मानवरूप धारी श्रीराम, पैदल और अकेले भी थे 

चौदह हज़ार राक्षसों को मारा, जो क्रूर कर्म करते थे 


खर व त्रिशिरा बचे जीवित थे, उस विशाल सेना में उनकी 

एक विशाल रथ ले आया खर, मानो आया हो इंद्र ही 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Sunday, June 7, 2026

राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


पंचविंश: सर्ग:


राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा

राक्षसों का संहार 


घोड़े, हाथी, सारथियों को भी, छिन्न-भिन्न कर डाला था 

पैदल सेना को वीरराम ने, यमलोक पहुँचा दिया था 


नालीक, नाराच, विकर्णी, नामक श्रीराम के बाणों से  

दुखी  हुई वह राक्षस सेना, सैनिक आर्तनाद करते थे 


कुछ बलवान, भयंकर राक्षस, उन पर भी प्रहार करते थे 

किंतु राम ने निज बाणों से, रोका उनको, प्राण हर लिए 


सिर, ढाल, धनुष कटने से, वे निशाचर गिर गये धरती पर 

गरुड़ के पंखों की हवा से, नंदन वन के तरु  ज्यों गिरते


जो बचे थे बहुत  पीड़ित थे, खर के पास गये रक्षा हित 

परंतु मध्य में दूषण ने रोक,   कर दिया उन्हें आश्वासित   


दूषण का आश्रय मिलने से, वे सब के सब वापस आये 

साखू, ताड़ आदि पादप  ले, कुछ पत्थर लेकर टूट पड़े 


उस समय श्रीराम व उनमें, महा भयंकर युद्ध होता था 

चारों ओर से घेरा जब , श्रीराम ने भैरव नाद किया 


 तेजस्वी गांधर्व अस्त्र का, किया राक्षसों पर प्रयोग तब 

मंडलाकार धनुष से छूट, बाणों से दिशाएँ गयीं ढक 


 कब राम बाण हाथ में लेते, कब छोड़ देते हैं उनको,

देख नहीं पाते थे राक्षस, देखा  केवल धनुष खींचते 


श्रीराम के बाणों के झुंड ने, आकाश को ढक लिया था

एक स्थान पर खड़े थे वह, सूर्य भी नज़र नहीं आता था 


कई  राक्षसों के शवों से, भूमि वहाँ की पट गई सारी 

मरे, गिरे, कटे-पिटे वे दिखे, जहाँ जहाँ दृष्टि जाती थी 


पगड़ियों सहित मस्तक कटे , बाज़ूबंद के सहित भुजाएँ 

भाँति-भाँति के आभूषण भी, मृत घोड़े, हाथी नज़र आयें 


टूटे-फूटे रथों, चँवरों से, छिन्न-भिन्न हुए शूलों से 

कुछ खंडित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों और शिलाओं से 


बहुतेरे विचित्र बाणों से,  समरभूमि वह पटी हुई थी 

शूलों, पट्टिशों, जाघों, बाहों से, अति  भयंकर लगती थी 


उन सबको मारा हुए देख, शेष राक्षस आतुर हो गये 

शत्रुहंता श्रीराम के, सम्मुख आने में असमर्थ हुए 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में पच्चीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।