श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
त्रिंश: सर्ग:
श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर
उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,
श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर
एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा
देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा
कर प्रयोग अनेक बाणों का, खर को क्षत-विक्षत कर डाला
रक्त बहा उसके अंगों से, मानो झरती हो जल धारा
व्याकुल किया राम ने उसको, फिर भी वह अति वेग से दौड़ा
दो-तीन पग पीछे हट गये, राम ने तेजस्वी बाण लिया
ब्रह्म दंड के सरिस भयंकर, देवराज इंद्र ने दिया था
खर को लक्ष्य करके उसे छोड़ा, वज्रपात सा शब्द हुआ
खींच कान तक धनुष राम ने, वह अति प्रबल बाण छोड़ा था
खर की छाती में लगा जाकर, प्रज्ज्वलित हुआ गिर पड़ा था
श्वेतवन में जैसे रुद्र ने, अंधकासुर को भस्म किया था
वृत्रासुर वज्र से जैसे, नमुचि फेन से मारा गया था
इंद्र की अशनि से जिस प्रकार, बलासुर का विनाश हुआ था
श्रीराम के उस बाण से, राक्षस खर धराशायी हुआ था
इसी समय देवतागण आये, चारण भी थे उनके साथ
हर्षित हो दुंदुभी बजाकर, करते पुष्पों की बरसात
उन्हें देख यह हुआ आश्चर्य, डेढ़ मुहूर्त में ही राम ने
खर-दूषण, उनकी सेना को, मारा था अपने बाणों से
निज स्वरूप को जानने वाले, राम का यह कर्म अद्भुत है
विष्णु की भाँति दृढ़ता इनमें, बल-पराक्रम भी अद्भुत है
ऐसा कह सभी देवता, जैसे आये चले गये वैसे
राजर्षि और महर्षि आये, कर सत्कार राम का बोले
देवराज इंद्र इसीलिए, शरभंग के आश्रम पर आया
इसी कार्य की पूर्णता हेतु, आपको पंचवटी पहुँचाया
राक्षसों के विनाश हेतु ही, शुभागमन हुआ है आपका
सिद्ध किया बड़ा कार्य, अब, धर्म का अनुष्ठान यहाँ होगा
इसी बीच सीता के साथ, लक्ष्मण जी कन्दरा से निकले
किया आश्रम में प्रवेश तब, भाई से पूजित हो राम ने
पति का दर्शन कर सीताजी, अतीव हर्ष पा, हुईं प्रसन्न
आलिंगन किया श्रीराम का, परमानंद में हुईं निमग्न
मारे गये राक्षस समूह सभी, श्रीराम को क्षति न पहुँची
देख और जानकर इसको, सीताजी तब अति हर्षित हुईं
हो प्रसन्न महात्मा मुनिजन, भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे
प्राण वल्लभ श्रीराम को देख, सीता के नयन खिलते थे
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।



