श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
चतुस्त्रिंश: सर्ग:
रावण के पूछने पर शूर्पणखा का उससे राम,
लक्ष्मण और सीता का परिचय देते हुए
सीता को भार्या बनाने के लिए उसे प्रेरित करना
शूर्पणखा की कटु बातें सुनकर, रावण ने व्यग्र हो पूछा
राम कौन है? पराक्रम कितना, रूप और बल कैसा उसका
किस कारण प्रवेश किया है, उसने विकट दण्डकारण्य में
उसके किस अस्त्र के द्वारा, मारे गये थे सभी युद्ध में
सही-सही तुम मुझे बताओ, किस नर ने तुम्हें कुरूप किया
रावण के पूछने पर उसका, ह्रदय क्रोध से तप्त हो गया
उसके बाद यथावत परिचय, श्रीराम का दिया भाई को
दशरथ पुत्र, अति ही सुंदर हैं, मृग चर्म से ढकते तन को
इंद्रधनुष के समान पिनाक, जिसमें स्वर्ण-छल्ले लगे हैं
महाविषैले सर्पों जैसे, बाणों की वर्षा करते हैं
युद्धस्थल में वह महाबली, कब धनुष पर तीर चढ़ाते
देख नहीं पाती थी इसको, कौन से पल में उन्हें छोड़ते
मर रही राक्षसों की सेना, इतना ही केवल दिखता था
ज्यों ओले खेती को मारें, कोप राम का बरस रहा था
राम अकेले तथा पैदल थे, तीन घड़ियों में किया विनाश
ऋषियों को अभयदान मिल गया, दंडक वन को शांति प्रकाश
कहीं स्त्री का वध न हो जाये, इस भय से मुझे नहीं मारा
बस नाक-कान काटे मेरे, अपमानित करके छोड़ दिया
लक्ष्मण है तेजस्वी भाई, गुण-पराक्रम में उन्हीं समान
तीक्ष्ण बुद्धि, भक्त भाई का, दुर्जय, विजयी, बल से संपन्न
श्रीराम की भार्या भी साथ, जो उनका हित करने में रत
नयन विशाल, मुख चन्द्र समान, केश, नासिका दोनों सुंदर
वह यशस्विनी राजकुमारी, दण्डकवन की देवी लगती
स्वर्ण की भाँति दमके काया, सीता नाम, जनक की पुत्री
देवों, गन्धर्वों, यक्षों में, ऐसी सुंदर ना कोई स्त्री
इस भूतल पर उस जैसी, कोई नारी नहीं मैंने देखी
जिसकी भार्या बने सीता, जिसका आलिंगन वह करेगी
इंद्र से बढ़कर उसका जीवन, हर्षित सदा उसे करेगी
शील-स्वभाव अति ही उत्तम, एक-एक अंग स्तुत्य व सुंदर
योग्य तुम्हारे है वह नारी, तुम भी उसके योग्य हो वर
उस सुमुखी को तुम्हारे हित, ले आने को हुई मैं उद्यत
क्रूर लक्ष्मण ने तब मुझको, कुरूप बनाया और किया हत
जनक पुत्री सीता को देख, काम बाण से तुम बिंधोगे
यदि उसको पाना चाहते, पैर बढ़ाओ समर भूमि में
भायी तुम्हें यदि मेरी सलाह, हो निःशंक यह यत्न करो
अपनी शक्ति का विचार कर, उस को पाने का प्रयत्न करो
खर-दूषण व जनस्थान के, सब निशाचरों का वध हुआ है
अब तुम्हारा क्या है कर्त्तव्य, यही निश्चय तुम्हें कर लेना है
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्ड में चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

