Thursday, April 15, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

शततम: सर्ग: 


श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 


गूढ़ विषय पर मंत्रणा तुम, बैठ अकेले तो नहीं करते 

अथवा सबके साथ बैठकर, गुप्त बात भी फैला देते 


जिसका साधन अति ही लघु है, किन्तु दीर्घ फल देने वाला 

उस कर्म को शीघ्र तो करते, कर विलम्ब उसे नहीं टाला


पूर्ण हुए या होने वालें, कर्म तुम्हारे प्रकट तब होते 

ऐसा तो नहीं भावी कृत्य , पहले से ही सभी जानते 


तुमने निश्चय किया है जिनका, किन्तु अभी न प्रकट किया है 

तर्क व युक्तियों आदि से, उनको अन्य जान लेते  हैं क्या 


एक विद्वान् को निकट रखते, हजार मूर्खों  के बदले क्या,

कर सकता कल्याण वही जब,  संकट जब छाया हो गहरा


हजार मूर्ख भी नहीं सहायक, एक सुयोग्य मंत्री हो यदि 

शूरवीर, चतुर, नीतिज्ञ ही, दे सकता है सम्पत्ति बड़ी 


मुख्य व्यक्तियों को क्या तुमने, मुख्य कार्य में नियुक्त किया 

मध्यम को मध्यम कार्य में, निम्न को लघु कर्म में लगाया 


घूस नहीं लेते जो निश्छल, बहुत काल से कार्य कर रहे 

भीतर-बाहर से पवित्र हों, उत्तम कार्य सौंपा है उन्हें 


कठोर दण्ड से पीड़ित होकर, प्रजा तुम्हारे राज्य की कहीं

 अमात्यों व मंत्रियों का, तिरस्कार तो नहीं है करती 


 पतित यजमान का जैसे याजक, स्त्रियाँ कामी, पतित पुरुष का 

अपमान तो नहीं करती प्रजा, अधिक कर लेने पर तुम्हारा 


जो साम-दाम में अति कुशल है, राजनीति का भी ज्ञाता है 

राज्य हड़पने की इच्छा रख, भृत्यों को फोड़ने में रत है 


मरने से जिसे भय नहीं, ऐसे शत्रु को जो नहीं जीतता 

वह स्वयं उसके हाथों से, एक न एक दिन मारा  जाता 



 

Saturday, April 10, 2021

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

 शततम: सर्ग: 

श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना 


जटा, चीरवस्त्र धारण कर, जोड़े हाथ भरत गिरे भू पर 

मानो प्रलयकाल में दिनकर, गिरे पड़े हों इस धरती पर 


स्वजन के लिए अति ही कठिन था, उन्हें देखना इस हाल में 

किसी तरह पहचाना उनको, उन्हें देखकर राम दुखी थे 


श्रीराम ने उन्हें उठाया, मस्तक सूंघ गले से लगाया 

निज गोदी में उन्हें बिठाकर, फिर आदर से उनसे पूछा 


तात ! कहाँ है पिताजी हमारे, इस वन में क्यों आए हो

उनके जीतेजी न सम्भव, तुम कितने दुर्बल हो गए हो


बहुत दिनों बाद देखा तुमको,  महाराज तो जीवित हैं न 

ऐसा तो नहीं,स्वर्ग गए वे , सहसा तुम आये हो यहां 


तात भरत ! तुम अभी हो बालक,  राज्य तो पूर्ण सुरक्षित है न ?

सदा धर्म पर टिके जो रहते, वे महाराज कुशल से हैं न ?


राजसूय व अश्वमेध का, जिन्होंने अनुष्ठान किया है 

सत्यप्रतिज्ञ वे महाराजा, पूरी तरह सकुशल तो हैं 


जो रहें सदा धर्म में तत्पर, विद्वान् व ब्रह्मवेत्ता हैं 

इक्ष्वाकु कुल के आचार्य, वसिष्ठ तुमसे पूजित तो हैं   


माँ कौसल्या सुख से हैं, सुमित्रा, कैकेयी भी आनंदित 

उत्तम कुल में जो उत्प्नन हैं, विनय सम्पन्न वह पुरोहित 

 

सत्कार तो उनका करते हो, हवनविधि के जो हैं ज्ञाता 

क्या वे तुम्हें सूचित करते हैं, हवन का सही समय है क्या 


देवताओं, पितरों, भृत्यों, का, गुरुजनों और ब्राह्मणों का 

सम्मान तो तुम करते हो, पिता सम वृद्धों व वैद्यों का 


मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणों का, मन्त्र सहित उत्तम अस्त्रों का 

जिनको उत्तम ज्ञान प्राप्त है, तुमसे आदर पाते सुन्धवा 


अपने जैसे शूरवीरों, शास्त्रज्ञ, और कुलीन जनों को 

बाहरी चेष्टाओं से ही, मन की बात समझ लेते जो  


ऐसे जितेन्द्रिय योग्य जनों को, तुमने मंत्री पद दिया है ?

 राजा की हरएक  विजय का, उचित मन्त्रणा ही कारण है 


सफल तभी होती है मन्त्रणा, नीतिकुशल हों यदि अमात्य 

गुप्त सर्वथा रखें उसको, तभी विजयी होता है राज्य 


असमय तो नहीं नींद घेरती, समय पर जग तो जाते हो 

रात्रि के पिछले पहर में, चिंतन अर्थ का तो करते हो ?


Thursday, April 1, 2021

श्रीराम का भरत को हृदय से लगाना और मिलना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

नवनवतितम: सर्ग:


नवनवतितम: सर्ग:


भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला को देखना तथा रोते-रोते उनके चरणों में गिर जाना, श्रीराम का उनको हृदय से लगाना और मिलना 


यज्ञशाला में जिसके ऊपर, कोमल कुश बिछाए गए हों 

लम्बी-चौड़ी उस वेदी सी, वन में वह शोभा पाती थी 


कई धनुष वहां थे जिनके, पृष्ठ भाग सोने से मढ़े थे 

शत्रु को पीड़ा देने वाले, तरकसों में बाण भरे थे 


सूर्य  की किरणों के समान, बहुत भयंकर बाण चमकीले  

पर्णकुटी सशोभित उनसे, ज्यों पुरी भोगवती सर्पों से  


स्वर्ण म्यान में दो तलवारें, दो विचित्र ढाल भी वहां थीं 

स्वर्णमय बिंदुओं से सुशोभित, आश्रम की शोभा बढ़ातीं


गोह के चमड़े से बने जो,थे स्वर्ण जटित दस्ताने भी  

मृग, सिंह पर हमला न करे ज्यों, कुटिया शत्रु हित अजेय थी 


एक विशाल वेदी भी देखी, श्रीराम के उस स्थान में 

नीचे ईशान कोण की ओर, अग्नि देवता  स्थापित थे 


पर्णशाला की ओर देखकर,   भरत ने देखा श्रीराम को 

 जटामण्डल सिर पर धारे, वल्कल वस्त्र व चीर धारे को 


लगा भरत को निकट हैं राम, है अग्नि समान दिव्य प्रभा  

समुद्र पर्यंत पृथ्वी के स्वामी, महाबाहु व धर्मात्मा 


सनातन ब्रह्मा की भांति, कुश से ढकी वेदिका पर बैठे 

सिंह समान थे कंधे उनके, कमल समान नेत्र कोमल थे  


सीता और लक्ष्मण के साथ, वेदी पर विराजमान थे 

शोक-मोह में डूब गए थे, देख भरत उन्हें इस हाल में 


उनकी ओर महान वेग से,  दौड़े अति विलाप करते वे  

नहीं रख सके धैर्य भरत फिर, गदगद वाणी में यह बोले 


राजसभा में जो बैठकर, पाने योग्य हैं सबका आदर 

वही बड़े प्रिय भ्राता मेरे,  बैठे पशुओं से घिरे रहकर 


कई सहस्र वस्त्रों का पहले, जो उपयोग किया करते थे 

पहने केवल दो मृगचर्म , धर्माचरण पालन करते हैं 


नाना प्रकार के पुष्पों को, जो सिर पर धारण करते थे 

वही रघुनाथ इस काल में, जटा भार कैसे सहते हैं 


यज्ञों के अनुष्ठान के द्वारा, जिनके लिए धर्म उचित है 

देह को कष्ट दे जो मिलता, उस धर्म का संग्रह करते हैं 


बहुमूल्य चंदन से जिनके,  होती थी अंगों की सेवा

उन्हीं मेरे पूज्य भ्राता का, तन मल से सेवित है होता  


सुख भोगने के योग्य सर्वथा, मेरे कारण दुख भोगते 

हूँ कितना मैं  क्रूर, अभागा, है धिक्कार मेरे जीवन को 


इस प्रकार विलाप करने से, भरत अति ही व्याकुल हो गए 

स्वेद बिन्दु झलकते मुख पर, चरणों में राम के गिर गए 


हो संतप्त अति  पीड़ा से, दीन वाणी में आर्य पुकारा 

फिर कुछ भी नहीं बोल सके वह, अश्रुओं से गला रुँधा था 


हा !आर्य !कह चीख उठे, जब यशस्वी श्रीराम को देखा

इससे आगे शब्द न निकले, शत्रुघ्न ने भी प्रणाम किया 


श्रीराम ने उन दोनों को, उठा लगाया वक्षस्थल से 

अश्रुओं की धारा वे भी, लगे थे नेत्रों से बहाने  


 तब सुमंत्र व निषादराज से, मिले  श्रीराम, लक्ष्मण दोनों  

मानो नभ में सूर्य चंद्रमा, शुक्र, बृहस्पति से मिलते हों 


यूथराज गजराज पर बैठ, जो यात्रा करने योग्य थे 

उन चारों को वहाँ देखकर, वनवासी अश्रु बहाते थे



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.


 

Thursday, March 25, 2021

भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

नवनवतितम: सर्ग:


भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला को देखना तथा रोते-रोते उनके चरणों में गिर जाना, श्रीराम का उनको हृदय से लगाना और मिलना 


भाई के दर्शन को उत्सुक, प्रिय शत्रुघ्न को साथ लिए 

आश्रम के चिह्न पथ पर दिखते, भरत उसी की और चले 


माताओं को संग ले आएं, गुरू को यह संदेश दिया

पीछे-पीछे थे सुमन्त्र भी, ले राम  दर्श की अभिलाषा  


चलते-चलते कुमार भरत ने, पर्णकुटी राम की देखी

सम्मुख थे काष्ठ के टुकड़े, पूजा की सामग्री वहाँ थी 


आश्रम तक आने-जाने हित, मार्ग बोधक चिह्न लगे थे 

कुशों और चीरों के द्वारा, शाखाओं में लटक रहे थे 


शीत निवारण हेतु वहां, सूखे गोबर के ढेर पड़े थे 

लगता है हम आ ही पहुँचे, कहा भरत ने तब औरों से 


जिस स्थान का पता बताया, भारद्वाज मुनिवर ने हमको 

चित्रकूट अब दूर नहीं है, यूँ प्रतीत होता है मुझको 


वृक्षों में ऊँचे चीर बंधे, जिनका होना यही बताये 

मार्ग की पहचान के हेतु, लक्ष्मण ने यह चिह्न बनाये 


बड़े दाँतवाले हाथी मिल, पर्वत के पीछे रहते हैं 

उधर न कोई जाये भूल से, चिह्न यह सचेत करते हैं 


वन में सदा तपस्वी जन सब, मिल जिसका आवाहन करते 

सघन धूम दिखाई पड़ता, होंगे दर्शन अग्निदेव के 


गुरुजनों का करते सत्कार, पुरुष सिंह उन आर्य पुरुष का 

आनंद मग्न महर्षि से जो, उन राम का दर्शन करूँगा 


दो ही घड़ी में कुमार भरत तब, चित्रकूट तक आ पहुँचे

अपने साथ आये जनों से, फिर ये वचन कहे उन्होंने 


निर्जन वन में खुली भूमि पर, वीरासन में राम बैठते 

मुझ कारण संकट आया है, धिक्कार जीवन को मेरे


मेरे जन्म को है धिक्कार, मैं सब लोगों से निंदित हूँ 

उन चरणों में आज गिरूँगा, उन सबका मैं ही दोषी हूँ 


इस तरह विलाप करते ही, परम पवित्र कुटी एक देखी

शाल, ताल, अश्वकर्ण के, पत्तों से जो छायी हुई थी 


यज्ञशाला में जिसके ऊपर, कोमल कुश बिछाए गए हों 

लम्बी-चौड़ी उस वेदी सी, वन में वह शोभा पाती थी 

 

Thursday, March 18, 2021

भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबंध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


अष्टनवतितम: सर्ग:

भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की  खोज का प्रबंध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन 



राम से भेंट  का किया विचार,  सेना ठहरा कर भरत ने

शत्रुघ्न से बोले तब वह,  पता लगाओ शीघ्र ही वन में 


साथ निषादों को ले अपने, लग जाओ तुम अन्वेषण में

 मैं स्वयं  रह मंत्रियों के सँग , पैदल ही विचरूँगा वन में 


जब तक उनको देख न लूँगा, सीता और लक्ष्मण के साथ 

तब तक शांति नहीं मिलेगी, नहीं मिलेगा मन को विश्राम 


जब तक कमलनयन वाला मुख, प्रिय भाई का नहीं देखता 

निर्मल है जो चंद्र समान, तब तक यह मन अशांत रहेगा 


निश्चय ही सुमित्रानंदन, लक्ष्मण हुए कृतार्थ इस जग में 

नित निरंतर दर्शन पाते, महातेजस्वी मुख का वन में 


राजोचित लक्षणों से युक्त, जब तक उनके चरणों को मैं 

अपने मस्तक पर नहीं धरूँगा, शांति नहीं पाऊँगा मैं 


 वही राज्य के सच्चे अधिकारी, जब तक हों नहीं अभिषिक्त 

तब तक मेरा मन व्याकुल है, स्वामी वही समुद्र पर्यंत 


जनक किशोरी विदेह नंदिनी, अनुसरण करतीं जो पति का 

हुईं कृतार्थ इस सत्कर्म से, साथ निरंतर पातीं उनका 


ज्यों कुबेर हैं नंदनवन में, राम बसे हैं जिसके वन में 

चित्रकूट है मंगलकारी, वेंकटाच, हिमालय जैसे 


हुआ कृतार्थ यह दुर्गम वन भी, जो सर्प से सेवित रहता 

 शस्त्र धारी श्रीरामचंद्र ने, जिस वन में निवास है किया 


ऐसा कहक महातेजस्वी, पुरुष प्रवर महाबाहु भरत ने 

पैदल ही गमन करते हुए,  प्रवेश किया उस महावन में 


वक्ताओं में जो श्रेष्ठ, भरत, वृक्ष समूहों से हो निकले 

वनफूलों से भरे हुए थे, अग्रभाग जिनकी शाखा के 


आगे जा शाल वृक्ष पर, बड़ी ही तेजी से गए  वे चढ़ 

आश्रम से उठता था धुआँ, अति हर्षित हुए जिसे देखकर 


देख धूम को हुई प्रसन्नता, "यहीं राम है" हुआ निश्चय 

अथाह जल से पार हुए हों, ऐसा संतोष जगा मन में 


 आश्रम देखकर श्रीराम का, ऊपर चित्रकूट पर्वत के

शीघ्रता से उधर चले वे, निषाद राज को निज साथ लिए 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.


 

Sunday, March 7, 2021

श्रीराम का भरत के सद्भाव का वर्णन करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

सप्तनवतितम: सर्ग:


श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शांत करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना, लक्ष्मण का लज्जित हो श्रीराम के पास खड़ा होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना 


भरत के प्रति रोष के कारण, खो बैठे थे विवेक लक्ष्मण 

शांत किया श्रीराम ने उनको, समझा-बुझा कर कहे वचन 


महाबली उत्साही भरत जब, खुद ही यहाँ आ पहुँचे हैं 

धनुष-बाण या ढाल- तलवार, इनका कोई काम नहीं है 


पिता के सच की रक्षा हेतु, जिस राज्य को स्वयं ही त्यागा 

यदि छीन लूँ भरत से उसको, उसको लेकर क्या करूंगा 


जो धन मिलता हो विनाश से,  बंधु-बांधवों या मित्रों के 

विष मिश्रित भोजन की भांति,  नहीं उसे ग्रहण कर सकता मैं 


लक्ष्मण मैं प्रतिज्ञा कर कहता, धर्म, अर्थ, काम और राज्य 

तुम्हीं लोगों के हित चाहता, नहीं है कोई अन्य प्रयोज्य 


भाइयों के संग्रह की खातिर, राज्य की इच्छा करता हूँ 

उनके सुख के लिए चाहता, छूकर धनुष शपथ लेता हूँ 


सागर से घिरी यह धरती, मेरे लिए नहीं कभी दुर्लभ  

इन्द्र का पद  भी नहीं चाहता,  यदि करना हो मुझे अधर्म 


भरत, शत्रुघ्न व तुम्हें  छोड़कर, यदि मिले कोई सुख  मुझको 

अग्निदेव स्वयं उसे जला दें,   सौम्य लक्ष्मण ! तुम इसे सुनो 


भरत बड़े ही भातृभक्त हैं, प्राणों से अधिक मुझे प्रिय हैं 

ऐसा मुझे ज्ञात होता है, इस घटना से अति व्याकुल हैं 


कर विचार कुलधर्म का भरत, स्नेहभरे अंतर में अपने 

 हमसे मिलने वन आए हैं,  कारण नहीं अन्य  सिवा इसके


कैकेयी के प्रति कुपित हो, कठोर वचन सुनाकर उनको 

मुझे राज्य वापस लौटाने, करके प्रसन्न पिताजी को 


हम लोगों से मिलने आना, सर्वथा समुचित है भरत का 

बात  हमारे अहित की कोई, मन में ला सकते कभी ना 


कब, कौन सा अहित किया है, पहले कभी तुम्हारा भरत ने 

जिससे तुम भयभीत हुए, लाए ऐसी आशंका मन में 


अप्रिय या कठोर न बोलो, भरत के आने पर तुम उनसे 

यदि कोई प्रतिकूल बात की, मानूंगा, कही है मुझसे 


कैसी भी आपत्ति आये, बेटा, पिता को कैसे मारे 

प्राणों सम प्रिय भाई को, कैसे कोई भाई संहारे 

 

यदि  राज्य के हित तुम कहते, कहूँगा उससे दे तुम्हें राज्य 

अच्छा ! कह स्वीकारेंगे वे, पल न लगेगा, देंगे राज्य 


धर्मपरायण भाई ने जब, कहे वचन, लक्ष्मण शरमाये 

गड़ गए अपने अंगों में ही,  तत्पर थे उन्हीं के हित में 


लज्जित हुए लक्ष्मण ने तब, ,  कहा राम से,  ऐसा लगता

 खुद हमसे मिलने  हैं आए,  महाराज दशरथ ही पिता


 देख लक्ष्मण को तब लज्जित,  श्री राम ने यह वचन कहे थे 

 कष्ट भोगते हमें देखकर, दुखी पिता घर ले जाएंगे 


सुख का सेवन करने वाली, विदहराजपुत्री सीता को  

घर लेकर ही लौटेंगे वे, यूँ प्रतीत होता है मुझको 


वायु  समान वेग है जिनका, चमक रहे  बलशाली घोड़े 

देख रहा बूढ़ा गज भी, रहता था पिता की सवारी में 


किन्तु नहीं दिखाई देता, विश्वविख्यात छत्र पिता का 

सेना के मुहाने पर है,  मन में इससे संशय होता 


मेरी बात सुनो अब भाई,  नीचे आओ, कहा राम ने 

शाल वृक्ष से उतरे  लक्ष्मण,  निकट राम के खड़े हो गए 


उधर भरत ने दी आज्ञा,न सेना से हो कष्ट  किसी को 

आदेश उनका ही पाकर, सैनिक नीचे ही ठहर गए 


हाथी, घोड़ों व मानवों से, भरी हुई इक्षवाकु सेना 

छह कोस धरती घेर कर, डाले हुए वहाँ थी निज डेरा 


 श्रीराम को प्रसन्न करने, परम धर्म को सामने रखकर 

 जो नीतिज्ञ भरत लाए थे, वह सेना होती थी शोभित  



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.

 

Thursday, February 25, 2021

लक्ष्मण का भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपने रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

षण्णवतितम: सर्ग:


वन जंतुओं के भागने का कारण जानने के लिए श्रीराम की आज्ञा  से लक्ष्मण का शाल वृक्ष पर चढ़ कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपने रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना 


मंदाकिनी का दर्शन करा, मिथिलेशकुमारी सीता को 

बैठ गए समतल स्थान पर, तत्पर हुए उनके लालन को 


तापस जन  प्रयोग करें जिनका, ऐसे फल व मूल खिलाते 

यह फल स्वादिष्ट है खाओ, कह मानसिक आनंद बढ़ाते 


रघुनन्दन जब यह कहते थे,  भली प्रकार यह कंद है सिका  

भरत की  सेना के कारण, धूल व कोलाहल तब प्रकटा 


गज समूह भी लगे भागने, सुनकर वह महान कोलाहल 

 देखी  धूल, सुना शोर राम ने,  लक्ष्मण से यह कहे वचन 


तुमसे ही माता सुमित्रा, श्रेष्ठ पुत्र वाली कहलाती 

देखो तो सही शोर है कैसा, कैसी यह गर्जना आती 


यह पता लगाओ क्यों भागते, हाथी, भैंस, मृग आदि पशु  

सिंह से तो भयभीत नहीं या, शिकार खेलता राजा ही 


अपरिचित पक्षियों का आना, इस पर्वत पर अति कठिन है 

हिंसक पशु का आक्रमण फिर, होना आखिर कैसे संभव है 


श्रीराम की आज्ञा  पाकर, चढ़े लक्ष्मण शाल वृक्ष पर 

सभी दिशाओं को देखकर, पूर्व दिशा में गई थी नजर 


तत्पश्चात उत्तर दिशा में, सेना एक दिखाई दे गई 

हाथी, घोड़ों, रथों से पूर्ण, पैदल सैनिकों से सज्जित थी 


श्रीराम को दी सूचना इसकी, लक्ष्मण ने यह बात कही 

अग्नि बुझा, कवच पहन लें,   गुफा में बैठें सीता देवी


यह सुनकर श्रीराम ने कहा, भली प्रकार तुम वहाँ  देखो  

तुम्हारी समझ में किसकी सेना, हो सकती है यही  कहो 


क्रोधित हुए रोष से लक्ष्मण,  सेना की तरफ लगे देखने  

मानो उसे भस्म ही कर दें, अति क्रोध में भरकर बोले 


 निश्चय ही कैकेयी पुत्र है,  हमें मारने यहाँ आया   

अयोध्या का राज पा चाहे, निष्कंटक राज्य हो उसका


सम्मुख जो विशाल पादप है, उसके निकट ही रथ खड़ा  है  

 उज्ज्वल तने से युक्त जिस पर, कोविदार से चिह्नित ध्वज है 


घुड़सवार भी इधर आ  रहे, हाथी पर भी चढ़े सवार 

हम दोनों को धनुष बाण ले, युद्ध हेतु है रहना तैयार 


कोविदार चिह्नित ध्वजा के, रथ पर हम अधिकार करेंगे 

आज भरत से होगा सामना, उसी कारण हम हैं वन में 


वंचित किया आपको उसने, सनातन राज्य के अधिकार से 

संकट में सभी को डाला, शत्रु हमारा यही भरत है 


वध के योग्य, अपकारी भी, उसे नहीं जीवित छोड़ेंगे 

इसमें कोई नहीं अधर्म, आप ही फिर शासक बनेंगे 


कैकेयी का बांधवों सहित मैं, वध करने को हूँ तत्पर 

 कैकेयी के महा पाप से, आज यह पृथ्वी होगी मुक्त 


 रोके हुए अपमान, क्रोध को, आज सेना पर छोड़ूँगा 

 आग लगा दी जाए जैसे, सूखा घास-फूँस है जलता 


टुकड़े-टुकड़े कर शत्रु के, आज अपने तीखे बाणों से  

चित्रकूट के वन प्रांतर को, सींचूँगा उनके रक्त से 


 बाणों से हत हाथी-घोड़े, तथा मनुष्य भी जो मृत हों 

गीदड़ आदि माँसभक्षी पशु, इधर-उधर घसीटें उनको  


सेना सहित भरत का वध कर, शस्त्र ऋण से उऋण होऊँगा 

इसमें संशय नहीं मुझे,  हर अपमान का बदला लूँगा 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छियानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.