Wednesday, April 22, 2026

पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि मुनि की कथा

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:


पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


आगे-आगे श्रीराम चले, परम सुंदरी सीता पीछे 

जिनके पीछे चले लक्ष्मण, परमवीर लिए धनुष हाथ में 


भाँति-भाँति के पर्वत शिखरों, वनप्रदेश, नदियों आदि को 

देखते हुए बढ़े वे आगे, सारस, चक्रवाक खगों को 


कमलों व जलीय जीवों से, शोभा पाते नदियाँ, सरोवर 

चितकबरे मृग कहीं झुंड में, सींगों वाले भैंस कहीं पर 


बढ़े हुए दाँतों वाले, जंगली सूअर, हाथी भी वहाँ 

सूर्यास्त के समय जहाँ पहुँचे, अति विशाल एक सरवर था 


लाल, श्वेत कमल से भरा था, क्रीड़ा करते हाथी जल में 

व्याप्त दिखायी देता था वह, राजहंस, कलहंस,मत्स्य से


स्वच्छ नीर से भरे सरवर से, संगीत का स्वर आता था 

किंतु निकट कहीं भी कोई, नज़र दृष्टि में नहीं आता था 


कौतुहल वश श्रीराम ने, साथ आये धर्मभृत से पूछा 

ध्वनि कहाँ से आती है यहाँ, जानने की हमें उत्सुकता 


 धर्मभृत नामक मुनि तब बोले, यह है पंचाप्सर सरोवर 

सदा भरा रहता है जल से, मांडकर्णि मुनि का अनुपम घर 


निर्माण किया इस जलाशय का, अपने तप से महामुनि ने 

केवल वायु भक्षण कर रहे, दस हज़ार वर्षों तक इसमें 


अग्नि आदि सभी देवता, व्याकुल हो उठे उनके तपस से 

स्थान हमारा लेना चाहते, कहने लगे वे आपस में 


विघ्न डालने हेतु तप में, पाँच अप्सराओं को बुलाया 

उन्होंने मुनि को आकृष्ट किया, उनसे फिर विवाह रचाया 


सुंदर घर इक छिपा हुआ है, उनके रहने हित इस जल में

उनके वाद्यों की ध्वनियों संग, मधुर गीत सुनायी देते 


‘यह तो बड़े अचरज की बात’, कह राम ने सुनी यह गाथा 

तब दिखायी दिया उन्हें, आश्रम मण्डल तेज से भरा हुआ 


सीता और लक्ष्मण के साथ, सुखपूर्वक किया वहाँ निवास 

 बारी-बारी से रहे वहाँ, एक एक कर सभी के पास


जिनके यहाँ रहे थे पहले, भक्ति देख दुबारा भी गये 

कहीं दस, कहीं चार महीने, कहीं साल भर भी वहाँ रहे 


ऐसे ही मुनियों के पास, बसे हुए दस वर्ष बीत गये 

अंततः सब ओर घूम घाम कर, सुतीक्ष्ण आश्रम में लौटे 





Monday, April 20, 2026

श्रीराम का राक्षसों के वध के निमित्त की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

दशम: सर्ग:


श्रीराम का ऋषियों की रक्षा के लिए राक्षसों के वध के निमित्त

की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार प्रकट करना 


सीता की वह बात सुनी जब, ऐसे उत्तर दिया राम ने 

तुम्हें मुझसे अतीव स्नेह है, वचन हितैषी तभी कहा है 


क्षत्रियों के कुलधर्म विषय में, जो भी कहा योग्य तुम्हारे 

यदि कोई प्राणी पीड़ित, क्षत्रिय उसे पीड़ा से उबारे 


दण्डकारण्य के निवासी, मुनिजन राक्षसों से पीड़ित हैं 

खुद आकर कही निज पीड़ा, वे मेरे शरणागत हुए हैं 


कठोर व्रतों का पालन करते, फल-मूल खाकर रहते हैं 

मांसाहारी राक्षस उनको, मार जान से खा जाते हैं 


उनके मुख से बाहर आयी, रक्षा की पुकार को सुनकर 

स्वयं मैंने यह पूछा, कैसे, कर सकता आपका हितकर 


उनका मनोभाव तभी प्रकटा, रक्षा करें हमारी आप

अग्निहोत्र समय आने पर, बन जाते वे राक्षस अभिशाप 


तपस्या के प्रभाव से हम सभी, वध उनका कर सकते हैं 

किंतु न चाहें तप का खंडन, तप में सदा विघ्न आते हैं 


ऋषियों की पुकार सुनी जब, रक्षा की प्रतिज्ञा ली मैंने 

जीते जी अब नहीं त्यागूँगा, सत्य पालन सदा प्रिय मुझे 


अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, लक्ष्मण तथा तुम्हें तज सकता 

ब्राह्मणों के लिए की प्रतिज्ञा, किंतु नहीं छोड़ मैं सकता   


उनके कहे बिना ही मेरा,  कर्त्तव्य, सदा उनकी रक्षा

अब खुद आकर वे कह रहे, तब मुँह कैसे मैं मोड़ सकता 


सीते ! तुमने स्नेह, प्रेम वश, जो मुझसे यह बात कही है 

सुनकर मैं अति संतुष्ट हुआ, प्रिय का यह कहना संभव है 


कथन पूर्णतया योग्य तुम्हारे, कुल के भी सर्वथा अनुसार

तुम सह धर्मिणी हो मेरी, प्रिय हो प्राणों से सदा बढ़ कर 


ऐसा कह महात्मा राम, मिथिलेश कुमारी प्रिय सीता से 

धनुष हाथ में पकड़, रमणीय, उस वन में विचरण करते थे 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ। 



सीता का श्रीराम से अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिए अनुरोध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


नवम:सर्ग:



सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिए अनुरोध 


मुनि सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर, वन को जाते हुए राम से 

सीताजी ने किया अनुरोध, स्नेहभरी मनहर वाणी में 


आर्यपुत्र ! महान हैं आप, किंतु अधर्म के भागी होते 

कामजनित व्यसन से दूर हैं, इस अधर्म से भी बच सकते 


तीन व्यसन केवल जग में, कामनाओं से उत्पन्न होते 

मिथ्याभाषण, परस्त्री गमन, वैर बिना हिंसा रत होते 


मिथ्या भाषण नहीं किया है, न ही कभी भी करेंगे आप 

दूजा दोष नहीं आ सकता, धर्मनिष्ठ, जितेन्द्रिय हैं आप 


किंतु दूसरों के प्राणों की, हिंसा रूपी दोष तीसरा

 है उपस्थित आपके सम्मुख, राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा 


इसीलिए धनुष धारण कर, भाई के संग निकल पड़े हैं 

ऋषियों की रक्षा के हित, दण्डकारण्य आप जा रहे हैं 


 चिंता से व्याकुल मन मेरा, अरण्य गमन नहीं है भाता 

क्या कारण है? सुनिए इसको, अस्त्र आपके हाथ शोभता 


वनवासी राक्षसों को देख, संभव है, आप उन्हें मारें 

ज्यों ईंधन पावक को बढ़ाये, धनुष, क्षत्रिय को ललकारे 


पूर्वकाल की बात सुनी है, वन में एक मुनि रहते थे 

भंग करूँ तपस्या इसकी, इंद्र योद्धा बने आये थे 


मुनि आश्रम में पहुँच इंद्र ने, खड्ग धरोहर रूप में रखा 

मुनि उसकी रक्षा में लग गये, साथ सदा ही उसको रखा 


तप ही जिनका धन था, वह मुनि, शस्त्र की रक्षा में लग गये 

बुद्धि भी क्रूर हुई उनकी, अधर्म में आकर्षित हो गये 


जाना पड़ा नरक में उनको, रौद्र कर्म में लीन हुए वह 

स्नेह और विशेष आदर वश, शिक्षा दे रही आपको यह 


बिना किसी अपराध किसी को, मारना नहीं है यशकारी 

दुख  में पड़े प्राणी की रक्षा,  धर्म क्षत्रिय का इतना ही 


वनवासी को कदापि न शोभे, शस्त्रधारण कर वह विचरे 

हिंसामय कठोर कर्म तज के, प्राणियों पर वह दया करे 


केवल शस्त्र का सेवन करने से, बुद्धि कलुषित हो जाती

पुन: अयोध्या जाने पर ही, बनें क्षत्रिय आप धनुष धारी 


वन में मुनिवृत्ति से रहिए, इसी से सास-श्वसुर खुश होंगे 

मिले धर्म के पालन से सब, धर्म से ही सुखी हम होंगे 


शुद्धचित्त हुए तपोवन में, धर्म का ही करें अनुष्ठान 

इस त्रिलोकी में जो कुछ भी है, आपको है सभी का ज्ञान 


स्त्री सुलभ स्वभाव के कारण, आपको किया निवेदन मैंने

छोटे भाई संग करें विचार, जो समुचित हो वही करें 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें नौवाँ सर्ग पूरा हुआ। 



Friday, April 17, 2026

प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टम: सर्ग:


प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान 


सुतीक्ष्ण मुनि से पूजित होकर, भली-भाँति वह रात्रि बितायी 

प्रातःकाल समय से उठकर, स्नानादि दिनचर्या निभायी 


विधिपूर्वक तीनों ने मिलकर, अग्नि व देवों की पूजा की 

सूर्यदेव का दर्शन करके, स्वयं जा मुनिवर से भेंट की 


भगवन ! आपने वन्द्य  होकर, हम लोगों का किया सत्कार  

अब यहाँ से जाना चाहते, करें हमारी विनय स्वीकार  


दण्डकारण्य में रहने वाले, मुनियों से मिलना चाहें 

तेजस्वी, श्रेष्ठ तापसों संग, जाने की हमें आज्ञा दें 


सूर्य प्रचंड नहीं हुए जब तक, उससे पूर्व  प्रस्थान करें 

ऐसी ही अभिलाषा रखते, राम ने अति मधुर  वचन कहे 


चरणों का स्पर्श कर रहे थे, उन्हें उठाया सुतीक्ष्ण मुनि ने 

लगा ह्रदय से कहा स्नेह से , जायें संग सिया -लक्ष्मण के 


मंगलमय हो मार्ग आपका, विघ्न और बाधा मत आयें 

पुनीत ह्रदय वाले मुनियों के, आश्रमों के दर्शन पाएँ 


सुंदर वन, सरवर, झरने भी, इस मार्ग में अनेक मिलेंगे 

झुंड मृगों के, सुंदर पंछी, पंकज आदि पुष्प देखेंगे 


हे लक्ष्मण !  तुम भी संग जाओ, किंतु लौट पुन: आओ यहीं 

 उन दोनों ने की परिक्रमा, अच्छा, कहकर उन मुनिवर की


बड़े नेत्र वाली सीता ने, उनको धनुष-बाण पकड़ाये

बाँध पीठ पर तूणीरों को, धनुष लिए वे बाहर निकले 


दोनों वीर अति रूपवान थे, खड्ग और धनुष धारण कर 

सीता सहित  किया प्रस्थान, पूज्य मुनिवर की आज्ञा लेकर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 




Wednesday, April 15, 2026

सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम में ठहरना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तम: सर्ग: 


 सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम पर

जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो

रात में वहीं ठहरना 


सीता, लक्ष्मण व ब्राह्मणों को, लेकर अपने साथ श्री राम 

चल पड़े सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम, तय किया दीर्घ मार्ग अगाध 


कुछ नदियों को पार किया, फिर ऊँचा पर्वत पड़ा दिखायी 

उससे आगे बढ़ते गये, इक्ष्वाकु कुल के दोनों भाई 


अति घोर वन के एकांत में, मुनिवर आश्रम में बैठे थे 

वृक्ष प्रचुर फल-फूल से लदे, इधर-उधर कई चीर टंगे 


श्रीराम ने विधिवत् मुनि को, करके प्रणाम दिया निज परिचय 

श्रीरामचन्द्र  का दर्शन करके, सुतीक्ष्ण मुनि हुए ज्यों धन्य 


आलिंगन में बाँधा उनको, दोनों बाहों से मुनिवर ने 

मैं प्रतीक्षा किया करता था, हुआ सनाथ आश्रम आपसे 


इस पृथ्वी पर देह त्यागकर, इसके कारण गया नहीं मैं 

चित्रकूट पर जब रहते, सुनी थी आपकी गाथा मैंने


देवराज इंद्र ने स्वयं आ, मुझको शुभ लोक प्रदान किए 

उन लोकों में आप विहारें, देता हूँ मैं आपको उन्हें 


जैसे इंद्र से ब्रह्मा बोलें,  राम ने कहे वचन वैसे

प्रदान कराऊँगा आपको, वे सब लोक तो स्वयं ही मैं


इस समय भिन्न अभिलाषा लाया, आप इसे ही पूर्ण करें 

सबके हित में तत्पर मुनि, कहिए, मैं कहाँ रहूँ इस वन में ?


श्रीराम के यह कहने पर, मधुर वाणी में मुनि यह बोले 

यही आश्रम है उत्तम अतीव, यहीं पर आप निवास करें 


फल-मूल उपलब्ध सदा रहें, ऋषिगण आते-जाते रहते 

बिना भय के झुंड मृगों के, शोभा दिखाकर वापस जाते 


थोड़ा सा उपद्रव मृगों का, और नहीं कोई दोष यहाँ 

वचन सुना महर्षि का जब, लेकर धनुष-बाण राम ने कहा 


यदि उपद्रवकारी मृग को, कभी बाण की नोक से मारूँ 

होगा यह अपमान आपका, जिसको मैं कैसे सह पाऊँ 


इसीलिए मैं अधिक समय तक, नहीं रहूँगा इस आश्रम में

इतना कहकर चुप हुए, गये सांध्यकाल उपासना करने 


रात हुई स्वयं सुतीक्ष्ण मुनि, गये उनके हित भोजन लेकर 

पुरुष शिरोमणि भाई  व सीता, तृप्त हुए अन्न वह पाकर 




इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के

अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 


Tuesday, April 14, 2026

वानप्रस्थ मुनियों को श्रीराम का आश्वासन देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षष्ठ: सर्ग:

वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचारों से अपनी रक्षा के लिए श्रीरामचंद्र जी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना 

 
इस वन के निवासी मुनिजन, अनाथ की भाँति मारे जाते

 रक्षक आप बनें हमारे, वानप्रस्थ समूह से आते 


पंपा, तुंगभद्रा तट पर, मंदाकिनी के तट पर रहते 

चित्रकूट पर्वत के किनारे, राक्षसों से पीड़ित होते 


उनसे अपनी रक्षा के हित, शरण आपकी लेने आये 

नहीं कोई आपसे बढ़कर, इस आपद से हमें बचायें 


उन तापसी मुनियों के मुख से, विनय सुनकर कहा राम ने 

मुनियों का आज्ञा पालक हूँ, आप प्रार्थना करें न ऐसे


पिता की आज्ञा पालन हित, मैं इस वन में प्रवेश करूँगा 

आपकी सेवा के अवसर से, खुद को मैं धन्य मानूँगा 


करूँ  सिद्ध प्रयोजन आपका, दैव वश मैं यहाँ आ पहुँचा 

सेवा का अवसर मिला है,  वनवास शुभ फलदायक होगा


मुनियों से जो शत्रुता रखें, उनका मैं संहार चाहता 

आप सभी महर्षिगण देखें, भाई सहित पराक्रम मेरा


इस प्रकार देकर आश्वासन, धर्मशील श्रीराम व लक्ष्मण 

तपस्वी महात्मा जनों के साथ, गये सुतीक्ष्ण मुनि के निकट   



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्डमें

छठा सर्ग पूरा हुआ।  


Wednesday, November 19, 2025

वानप्रस्थ मुनियों का अपनी रक्षा के लिए श्रीरामचंद्र जी से प्रार्थना करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


षष्ठ: सर्ग:


वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचारों से अपनी रक्षा के लिए श्रीरामचंद्र जी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना 


ब्रह्मलोक प्रस्थान किया जब, द्विजश्रेष्ठ मुनि शरभङ्ग ने 

मुनियों के समुदाय आये, श्रीरामचंद्र जी से मिलने 


ब्रह्माजी के नख से उपजे, वैखानस उनमें शामिल थे 

बालखिल्य,बालों से उपजे, पत्राहार व वायुभक्ष थे   


कुछ भी बचा न रखते थे जो, संप्रक्षाल मुनि भी आये 

सूर्य, चन्द्र, रश्मियों का पान, मरीचि मुनीजन करते थे 


कच्चे अन्न को कूट कर खाते, अश्मकुट्ट व सलिलाहारी 

दाँतों से ले ऊखल का काम, संग आये दंतोलूखली 


जल में कंठ तक डूबे रहकर, उन्मज्जक तपस्या करते 

बिना बिछौने सोने वाले, गात्रशय्या वहाँ आये थे 


तपोनिष्ठ, पंचाग्नि सेवी, आर्द्रपटवासा मुनीजन भी थे 

ऊर्ध्ववासी, स्थांडिलशायी, आकाशनिलय, दान्त आये थे 


 ब्रह्मतेज से संपन्न थे वे, योग से मन एकाग्र हुआ 

धर्म के ज्ञाता श्रीराम संग, उनका यह संवाद हुआ  


इक्ष्वाकु वंश के ही नहीं, भूमंडल के स्वामी हैं आप 

देवों के नरेश ज्यों इंद्र, सभी मनुष्यों के राजा आप 


अपनी कीर्ति वपराक्रम से ही,तीनों लोकों में विख्यात 

पितृ भक्त और  सत्य निष्ठ भी, सभी धर्म हैं आपको ज्ञात 


निज स्वार्थ सिद्धि हेतु ही, हम सभी आपके सम्मुख आये 

क्षमा चाहते हैं पहले ही, बन प्रार्थी निवेदन लाये 


राजा यदि प्रजा से अपनी, छठा भाग कर में लेता है 

किंतु करे न रक्षा उसकी, अधर्म का भागी होता है 


पुत्र समान प्रजा का पालन, यदि कोई राजा करता है 

अक्षय कीर्ति जगत में पाये, ब्रह्मलोक तक वह जाता है 


मुनि जन फल-मूल ग्रहण कर, उत्तम धर्म का करें अनुष्ठान 

चौथा भाग उस शुभधर्म का, प्रजा रक्षक नरेश को प्राप्त