Wednesday, May 20, 2026

शूर्पणखा का सीता पर आक्रमण व लक्ष्मण का उसके नाक-कान काट लेना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टदश: सर्ग:



श्रीराम के टाल देने पर शूर्पणखा का लक्ष्मण से

प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालने पर

उसका सीता पर आक्रमण 

और लक्ष्मण का उसके नाक-कान काट लेना 


कामपाश से बंधी हुई उस, शूर्पणखा से बोले राम 

मधुर बहुत वचन थे उनके, आनन पर मंद  मंद मुस्कान


आदरणीया देवि ! सीता से, मैं पहले कर चुका विवाह 

तुम जैसी स्त्री भला क्यों, झेलना चाहेगी सौतिया डाह 


यह मेरे छोटे भाई हैं, शीलवान प्रियदर्शी भी हैं 

बल पराक्रम से संपन्न हैं, इनके साथ नहीं कोई  स्त्री 


तरुण और गुणवान बहुत हैं, यदि इन्हें भार्या की चाह है

  योग्य  तुम्हारे सुंदर रूप के, सुनो  यह मेरी सलाह है 


सूर्य प्रभा ज्यों मेरु पर्वत का, हो नि:शंक सेवन करती है 

पति रूप में इन्हें अपनाकर, सौत के भय से रहित रहो 


ऐसा कहने पर राम के,  सहसा पहुँची लक्ष्मण के पास 

केवल मैं  हूँ योग्य तुम्हारे, कर लो तुम मुझे अंगीकार 


बातचीत में निपुण लक्ष्मण, मुस्कुरा कर उससे यह बोले 

मैं दास हूँ बड़े भाई का, तुम क्यों दासी बनना चाहो 


ऐश्वर्यों से संपूर्ण हैं, मेरे बड़े भाई श्रीराम 

उन्हीं की छोटी स्त्री हो जाओ, रूप तुम्हारा है अभिराम 


कुरूप, ओछी, विकृत भार्या को, त्याग तुमको  ग्रहण करेंगे 

भला कौन  तुम्हें छोड़कर, मानव कन्या से प्रेम करेगा 


लक्ष्मण के ऐसा कहने पर, परिहास को समझ न पायी 

सत्य  माना उनकी बात को, पुन: राम के निकट वह आयी 


इस कुरूप वृद्धा के कारण, नहीं कर रहे आदर मेरा

खा जाऊँगी इस मानुषी को, फिर मिलेगा साथ तुम्हारा 


ऐसा कह वह क्रोधित नेत्रों से, झपटी सीताजी की ओर

मानो कोई भारी उल्का, रोहिणी पर टूट पड़ी हो 


मौत के फंदे की भाँति, आती हुई राक्षसी को रोक 

कहा लक्ष्मण से श्री राम ने, कर दो किसी अंग से हीन 


क्रूर कर्म करने वालों से, उचित नहीं कोई परिहास 

अति कठिनाई से बचे हैं, देखो, इस समय सीता के प्राण 


श्रीराम के ऐसा  कहने पर, म्यान से खींची तलवार 

नाक-कान काटे राक्षसी के, लक्ष्मण ने किया था वार 


नाक-कान कट जाने पर वह, चिल्लाकर वन में भाग गयी 

खून से भीगी महा भयंकर, भीषण चीत्कार करती थी 


अति भयानक थी वह राक्षसी, कटे हुए अंगों को लेकर 

भ्राता खर के पास गयी वह, भूमि पर गिर गई थी जाकर 


जनस्थान निवासी खर की, बहन रक्त से नहा गई थी 

भय व मोह से शूर्पणखा, कंपित, अचेत सी हो रही थी 


सीता और लक्ष्मण के साथ, श्री राम के आगमन की बात 

अपने कुरूप किए जाने का, सब सुनाया खर को वृतांत 

 

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Tuesday, May 19, 2026

शूर्पणखा का राम से अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तदश: सर्ग:

राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना, उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर उनसे अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना 


देवी ! मैं दशरथ का पुत्र हूँ, जो थे चक्रवर्ती सम्राट  

साथ हैं मेरे भाई लक्ष्मण, राम नाम से मैं विख्यात 


विदेहराज जनक की पुत्री, यह मेरी पत्नी सीता हैं 

माता-पिता की आज्ञा से हम, वनवास करने आये हैं  


तुम किसकी पुत्री हो? देवी, क्या नाम मिला, किसकी पत्नी

 राक्षसी जान पड़ती हो, रूप इच्छानुसार धार सकती 


सही-सही बातें बताओ, किस कारण तुम यहाँ आयी हो

 शूर्पणखा है मेरा नाम,  बोली, वह काम से पीड़ित हो


भय पैदा करती मनों में, किया करती हूँ वन में विचरण

 संभव है तुमने सुना हो, नाम मेरे भाई का रावण


विश्रवा का वीर पुत्र है, दूसरा भाई है कुंभकर्ण 

जिसकी निद्रा सदा बढ़ती है, तीसरे का नाम विभीषण 


राक्षसों सरिस नहीं आचार, विभीषण बहुत धर्मात्मा है

 खर-दूषण भी भ्राता मेरे, युद्ध में पराक्रम जिनका है,


बल में भाइयों से बढ़ हूँ, नहीं है कोई मेरे समान

 मन आसक्त हुआ है मेरा, पाकर तुम्हारा प्रथम दर्शन 


तुम जैसे पुरुषोत्तम के प्रति, भावना लिए आयी पति की

संपन्न हूँ मैं प्रभाव से, हर लोक में विचरण कर सकती 


 दीर्घकाल के लिए, इसलिए,  स्वामी बन जाओ तुम मेरे

इस अबला सीता को लेकर, जीवन में तुम क्या कर लोगे

 

 विकार युक्त है और कुरूपा, अत: यह तुम्हारे योग्य नहीं 

मैं केवल अनुरूप तुम्हारे, बना लो भार्या मुझे अपनी


सीता कुरूप मेरी दृष्टि में, है धँसे हुए उदर वाली 

यह तुम्हारे भाई के साथ, अब मेरा आहार बनेगी 


फिर तुम कामभाव से जुड़कर, दंडक वन में विचरण करना 

 सुन कर शूर्पणखा की बात, आरंभ किया राम ने हँसना 


मतवाले नेत्रों वाली उस, निशाचरी से ये वचन कहे 

ककुत्स्थकुलभूषण रामचंद्र, बातचीत में बहुत कुशल थे 



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 


Sunday, May 17, 2026

राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तदश: सर्ग:


राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना,

उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर

उनसे अपने को भार्या के रूप में

ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना 



 सीता-रामचन्द्र और लक्ष्मण, पुन: आश्रम लौट आये फिर

 पूर्वाह्न का पूजन करके, पर्णशाला में बैठे आकर 


इसी प्रकार निवास करते थे, सुखपूर्वक सीता के साथ 

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आकर, किया करते उनका सत्कार 


चित्रा के संग ज्यों चंद्रमा, ऐसे ही शोभा पाते थे 

लक्ष्मण के संग बैठे राम, तरह-तरह की वार्ता करते 


एक बार जब इसी प्रकार, किसी चर्चा में लीन थे राम  

आ पहुँची थी बहन रावण की, शूर्पणखा था उसका नाम 

 

देवताओं के सम राम का, मनहर रूप निहारा उसने 

मुख तेजस्वी, बड़ी भुजाएँ, नेत्र कमल समान सुंदर थे 


हस्ति समान चाल थी उनकी, जटामण्डल युक्त था मस्तक

परम सुकुमार, महा बलशाली, राजोचित लक्षण से युक्त 


नीलकमल के समान कांति, सौंदर्य कामदेव जैसा था

इंद्र समान तेजस्वी राम, देख राक्षसी को मोह हुआ 


श्रीराम का मुख सुंदर था, शूर्पणखा का भद्दा व कुरूप 

मध्यभाग सुंदर राम का, था उसका दीर्घ उदर बेडौल


श्रीराम के नयन थे सुंदर, उसकी अति डरावने आँखें 

केश राम के कोमल, सुंदर, ताम्र वर्णीय कुंतल उसके 


रूप अति प्यारा राम का, शूर्पणखा का वीभत्स, विकराल 

बहुत मधुर वाणी राम की, कर्कश कठोर थे उसके बोल 


राम सौम्य और नित तरुण थे, वह हज़ारों वर्ष की वृद्धा 

सरल और उदार थे राम, उसकी बातों में थी कुटिलता 


सदाचार का पालन करते, न्यायोचित थे कृत्य राम के 

शूर्पणखा थी दुराचारिणी, वितृष्णा होती जो देखते 


कामभाव से हुई आविष्ट, निकट वह आयी श्रीराम के

क्यों आये यहाँ? मुझे कहो, धनुष लिए तापस के वेश में


इस प्रकार जब उसने पूछा, राम ने बताना शुरू किया 

अपने सरल स्वभाव के कारण, कुछ भी नहीं अन्यथा लिया

 

Friday, May 15, 2026

लक्ष्मण द्वारा भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का गोदावरी नदी में स्नान


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षोडश: सर्ग:

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन

और भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का

उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान 


 आँखें जिनकी कमल सी सुंदर, अंगकांति श्याम है जिनकी 

उदर का जिनके भान न होता, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, मृदुभाषी 


शत्रु दमन श्रीमान भरत ने, आपका ही आश्रय लिया है 

स्वर्गलोक पर विजय भी पा ली, स्थित तप में, वनवास लिया है 


प्राय: माता के ही गुणों का, अधिक अनुसरण मानव करते

मिथ्या किया प्रमाणित इसको, भरत ने अपने बर्ताव से 


 जिनके स्वामी हैं राजा दशरथ, साधु समान पुत्र भरत सा 

कैसे उन माता कैकेयी ने, की क्रूरता दुष्ट बुद्धि पा  


धर्मपरायण लक्ष्मण जिस घड़ी, स्नेहवश ऐसा कहते थे

निंदा सही नहीं गयी माँ की, श्री राम ने कहे वचन ये 


 मत करो माता की निंदा, भरत के बारे में ही बोलो 

परम प्रिय और मनभावनी, याद आ रहीं भरत की बातें, 


दृढ़ता पूर्वक यद्यपि मैंने, निश्चय किया वन में रहूँगा 

भरत के स्नेह में हो संतप्त, विचलित हो उठा मन मेरा 


कब आएगा वह दिन भाई, जब मैं साथ तुम्हारे चल कर 

भरत-शत्रुघ्न से मिलूँगा, कहते हुए वे पहुँचे तट पर 


लक्ष्मण व सीता के साथ, गोदावरी नदी में किया स्नान 

 देवों व पितरों का तर्पण, सूर्यदेव का किया उपस्थान 


सीता और लक्ष्मण के संग, उसी तरह शोभा पाते थे, 

देवी व नंदी संग ज्यों शिव, अवगाहन करके गंगा में 


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।


लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और भरत की प्रशंसा



 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षोडश: सर्ग:


लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और

भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का

उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान 


पछुआ हवा स्वभाव से शीतल, दुगनी ठंडी अब तुहिन से

जौ-गेहूं खेतों से युक्त, ढके हुए हैं वन कोहरे से


सूर्योदय काल में सुशोभित, क्रौंच व सारस कलरव करते

जल के पास ही बैठे पक्षी, नहीं उतरते हैं नीर में 


खजूर-पुष्प जैसा आकार, सुनहरी बालियों में धान हैं 

भरी हुए चावल से बालें, लटक गयीं शोभा पाती हैं 


ढकी कुहासे से व फैलतीं, किरणों से उपलक्षित होकर 

दूर उदित हुए सूर्यदेव अब, लगते हैं ज्यों हो निशाकर 


रक्तिम, पीली और सफ़ेद, धूप धरती पर फैल रही है 

सुबह तो बलहीन ही रहती, दोपहरी में सुखदात्री है 


ओस की बूँदे पड़ने से जहाँ, भीगी हुई सी है घास 

वनभूमि वहाँ शोभित होती, पाकर सूर्यदेव का उजास 


अति प्यासा है जंगली हाथी, जल का स्पर्श तो करता है 

ठंडक असह्य हो जाने से, सूंड तुरंत सिकोड़ लेता है 


अंधकार व तुहिन से रात, कोहरे से प्रातःकाल ढकीं

पुष्पहीन वन की श्रेणियाँ, जान पड़ती हैं सोयी हुईं


नदियों के जल ढके भाप से, तटों से ही प्रकाश में आतीं 

सारस आदि जलीय पक्षी भी, जाने जाते कलरव से ही


मंद सूर्य रश्मियों के कारण, शीतल हुआ जल शिखरों का 

कमलों के दल जर्जर हुए, पाले से घटी उनकी शोभा 


भरत आपके लिए दुखी हैं, नगर में ही तपस्या करते 

राज्य, मान, सभी भोग त्याग कर, शीतल भूमि पर ही सोते 


निश्चय ही इस घड़ी भरत भी, स्नान हेतु सरयू पर जाते 

मंत्री व प्रजाजनों संग, नदी के जल में डुबकी लगाते 


सुख में पले सुकुमार भरत, वनवासी हो रहते कैसे

रात्रि के पिछले प्रहर में, वह कष्ट शीत का सहते कैसे 


Thursday, May 14, 2026

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


षोडश: सर्ग:

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और

भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का उन दोनों के

साथ गोदावरी नदी में स्नान 


उस आश्रम में रहते-रहते, शरद काल बीतने को आया 

हुआ आगमन हेमंत ऋतु  का, जो श्रीराम आदि को भाया 


एक प्रातः रघुकुल नंदन, गोदावरी के तट पर पहुँचे 

सीता जी उनके पीछे ही थीं, घड़ा लिए लक्ष्मण भी थे 


जाते-जाते लक्ष्मण यह बोले, प्रियभाषी हे ! भ्राता राम 

आ पहुँचा जो प्रिय आपको,  शीतल, कोमल हेमंत काल 


अलंकृत हो गया संवत्सर, फसल रबी की लहराती है 

जल शीतल प्रतीत होता है, अग्निशिखा सबको भाती है 


नवसस्येष्टि अनुष्ठान की, घड़ियों में जो पूजा करते 

देवों, पितरों को देकर अन्न, सत्पुरुष निष्पाप हो गये 


अन्नप्राप्ति की कामना, हर जनपद वासी की पूर्ण हुई 

गोरस की भी बहुतायत है, सेनाएँ राजा की विचरतीं 


यमसेवित दक्षिण दिशा का, सूर्यदेव सेवन करते अब

सिंदूर वंचित नारी सी, होती न उत्तर दिशा सुशोभित


स्वभाव से हिमालय पर्वत, घनीभूत हिम से सदा रहता 

किंतु सूर्य दक्षिणगामी हुए, अधिक हिम का संचय करता  


दोपहरी में स्पर्श धूप का, दिन में करने देता विचरण

सूर्यदेव सौभाग्यशाली बहुत, सुसेव्य होने के कारण


सेवन के अब योग्य नहीं हैं, छाँह व नीर अभागे लगते 

कुहासा भी छाया रहता, ठंडी पवन के झोंके लगते 


पाला पड़ने से वृक्ष के, पत्ते झर गये, जंगल सूने 

गलित हुए  कमल हिम स्पर्श से, बड़ी होने लगी हैं रातें


कोई नहीं रात्रि को सोता, खुले आसमान के नीचे  

पौषमास की ये रात्रियाँ , हुई हैं धूसर हिमपात से 


सौभाग्य चंद्रमा का अब तो, सूर्यदेव में चला गया है 

धूमिल जान पड़ता है चंद्रमा, मलिन हुए दर्पण की भाँति 


पूर्णिमा की चाँदनी रातें, तुहिन बिंदु से ढकी हुई है 

जैसे सीता हुई साँवली, पूर्ववत  न शोभा पाती है 


Tuesday, May 12, 2026

लक्ष्मण द्वारा सुंदर पर्णशाला का निर्माण तथा उसमें सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का निवास


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

पञ्चदश: सर्ग:


पञ्चवटी के रमणीय प्रदेश में श्रीराम की आज्ञा से 

लक्ष्मण द्वारा सुंदर पर्णशाला का निर्माण 

तथा उसमें सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का निवास 


पुष्पों, गुल्मों व लता-वल्लरी, ताल, तमाल, साल से युक्त 

खजूर, कटहल, जलकदंब, तिनिश, पुंनाग, आम, केवड़ा, धव


चंपा, स्यंदन, चंदन, कदंब, पर्णास, लक, अश्वकर्ण, शमी 

पाटल, खैर पलाश वृक्ष से, घिरे हुए पर्वत शोभित अति 


अति पवित्र व रमणीय स्थान, अनेक पशु-पक्षी यहाँ रहते 

हम पक्षिराज  जटायु के साथ, सुखपूर्वक निवास करेंगे  


श्रीराम के ऐसा कहने पर, अरिहंता वीर लक्ष्मण ने 

 आश्रम का निर्माण किया तब , शीघ्र निवास हेतु  भाई के  


विस्तृत पर्णशाला रूप में, आश्रम का निर्माण हुआ था 

पहले वहाँ एकत्र की मिट्टी, एक दीवार खड़ी कर दी 


फिर सुंदर व सुदृढ़ खम्भों पर, तिरछे विशाल  बांस रखे थे  

 बांसों के रख जाने से वह, कुटी सुंदर प्रतीत होती थी 


उन बाँसों पर फिर उन्होंने, शमी की शाखाएँ फैला दीं 

बाँध दिया मज़बूत रस्सी से, ऊपर से कुछ, कास, बिछाए 


सरकंडे, पत्ते बिछाकर, भली भाँति छा डाला कुटी को 

समतल कर नीचे की भूमि,कुटी को बड़ा रमणीय बनाया 


इस प्रकार लक्ष्मण जी ने, सर्वोत्तम एक  निवास बनाया 

श्रीराम के योग्य था जो, देखने में भी बहुत सुंदर था 


तब सीता के साथ श्रीराम,  सुंदर नये आश्रम में गये 

बहुत प्रसन्न हुए देखकर, कुछ काल तक भीतर खड़े रहे 


तत्पश्चात हर्ष में भरकर, लक्ष्मण को हृदय से लगाया

दोनों भुजाओं से कस पकड़, स्नेह के साथ उसे बताया 


सामर्थ्य शाली हे वीर लक्ष्मण ! मैं तुम पर अति प्रसन्न हूँ 

अति महान कार्य किया तुमने, उसके लिए भला मैं क्या दूँ 


तुम्हारे इस कृत्य के लिए, समुचित नहीं कोई पुरस्कार   

इसीलिए यह गाढ़ आलिंगन, तुमको मैंने किया प्रदान


मनोभाव अति शीघ्र समझते, तुम कृतज्ञ और हो धर्मज्ञ

  तुम जैसे पुत्र के कारण, अब भी जीवित पिता इस जग में 


अपनी शोभा को दिखाया, ऐसा कह लक्ष्मण से राम ने 

प्रचुर फलों से युक्त जो थी, पंचवटी में लगे थे रहने


सीता व लक्ष्मण से सेवित, वह कुछ काल रहे वहाँ ऐसे 

  निवास देवतागण करते हैं, महास्वर्गलोक में जैसे



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।