श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
द्वात्रिंश: सर्ग:
शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना
शूर्पनखा ने जब देखा यह, किए भयंकर कृत्य राम ने
चौदह हज़ार राक्षस मारे, त्रिशिरा, खर, दूषण-प्राण हरे
करने लगी शोक के कारण, चीत्कार वह ज़ोर-ज़ोर से
जो अन्यों के लिए कठिन है, ऐसे कृत्य किये राम ने
सब अपनी आँखों से देखकर, वह अति उद्ग्विन हो उठी थी
रावण द्वारा जो शासित थी, लंकापुरी को जा पहुँची थी
वहाँ पहुँच कर उसने देखा, रावण ऊँचे महल में बैठा
राजोचित तेज से पूर्ण वह, निज मंत्रियों से घिरा हुआ
मरुद्गणों से घिरे इंद्र की, भाँति, रावण विराजमान था
सुवर्णमय सिंहासन उसका, सूर्य सरिस जगमगा रहा था
स्वर्ण-वेदी पर घी-आहुति से, ज्यों अग्नि प्रज्वलित हो उठे
शोभा हुई थी रावण की, उस स्वर्ण सिंहासन पर वैसे
देव, गंधर्व, भूत, महात्मा, उसे जीतने में असमर्थ थे
यमराज की भाँति भयंकर, लगता था वह समर भूमि में
देव-असुर संग्राम के समय, उसके तन पर घाव लगे थे
ऐरावत के दाँत के चिह्न, अब तक देह पर विद्यमान थे
बीस भुजाएँ, दस मस्तक थे, छत्र, चंवर, आभूषण सुंदर
वक्ष:स्थल विशाल था उसका, राजोचित लक्षण से संपन्न
वैदूर्यमणि के आभूषण धारे, तन कांति भी वैसी थी
भुजाएँ अति सुंदर, श्वेत दाँत, मुख विशाल, आकृति बड़ी थी
देवों के संग संघर्ष में, प्रहार हुआ विष्णु चक्र का
बड़े अन्यान्य युद्धों में, किया सामना अस्त्रों-शस्त्रों का
देवों के अस्त्रों की चोट से, खंडित नहीं हुए जो अंग
सागरों को क्षोभित करते, शीघ्रता से उसके प्रत्यंग
पर्वत शिखर तोड़ देता था, देवताओं को रौंद डालता
धर्म की जड़ को काट डालता, स्त्रियों का सतीत्व हरता था
दिव्यास्त्रों का प्रयोग जानता, यज्ञों को नष्ट उसने दिया
भोगपुरी पाताल में जाकर, वासुकि व तक्षक को हराया
कैलास पर्वत पर जाकर, किया पराजित था कुबेर को
हासिल किया पुष्पक विमान, इच्छानुसार चला करता जो

