श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
विंश: सर्ग:
श्रीराम द्वारा खर के भेजे हुए चौदह राक्षसों का वध
तत्पश्चात् भयानक राक्षसी, पुन: उनके आश्रम पर आयी
परिचय दे राक्षसों को उनका, घटना सारी पुन: बतायी
राक्षसों ने तीनों को देखा, इसी तरह उनको राम ने
उद्दीप्त अति तेज था जिनका, लक्ष्मण से फिर कहे वचन ये
थोड़ी देर तक यहीं रुको तुम, सीता जी का रखना ध्यान
राक्षसी के सहायक बने, राक्षसों का करूँगा संधान
निज स्वरूप को जानते थे, उन श्रीराम की बात जब सुनी
‘तथास्तु’ कहकर लक्ष्मण जी ने, आज्ञा उनकी शिरोधार्य की
सुवर्णमंडित विशाल धनुष पर, राम ने चढ़ायी प्रत्यंचा
क्यों हमारी हिंसा पर उतरे, राक्षसों से ये वचन कहा
देखो, तुम सब पापात्मा हो, ऋषियों के भी अपराधी हो
उनकी आज्ञा से मैं आया, चाहो तो तुम बच सकते हो
यदि तुम्हें संतोष मिलता है, तत्पर रहो युद्ध की खातिर
प्राणों का यदि भय सताता, तुम ठहरो नहीं यहाँ घड़ी भर
कुपित हुए वे सभी राक्षस, सुनकर यह श्रीराम का सवाल
ब्राह्मणहंता घोर निशाचरों ने क्रोधित हो दिया जवाब
तूने खर को क्रोध दिलाया, अब हमसे मारा जाएगा
हम अनेक हैं तू अकेला, खड़ा भी न तू रह पाएगा
हम छोड़ेंगे परिघ, शूल कई, पट्टिश भी कई जब तुझपर
धनुष सहित अभिमान तजेगा, प्राणों को भी अपने तजकर
ऐसा कहकर भरे क्रोध में, चौदह राक्षस टूट पड़े थे
काट दिया उन शूलों को, किंतु राम ने अपने बाणों से
महातेजस्वी श्रीराम ने, चौदह नाराचों को पकड़ा
रखा धनुष पर,कान तक खींचा, उन्हें राक्षसों पर छोड़ा
मानो इंद्र ने वज्र मारा , बाणों ने लक्ष्यों को बेधा
रुधिर में डूबे हुए से निकले, सर्प समान भू पर गिरे
जड़ से कटे वृक्षों की भाँति, वे राक्षस हुए धराशायी
रक्त में डूबे बदन थे उनके, तत्काल मृत्यु थी आयी
धरती पर मृत पड़ा देखकर, शूर्पणखा गयी खर के पास
सूख गया रक्त घावों का, लगती गोंद युक्त लता समान
शोक से पीड़ित, निकट भाई के, अर्तनाद करती जाती
सारा समाचार सुनाया, मुख की कांति फीकी पड़ी थी
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।