श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकत्रिंश: सर्ग:
रावण का अकम्पन की सलाह से
सीता का अपहरण करने के लिए जाना और
मारीच के कहने से लंका को लौट आना
संग हैं छोटे भाई लक्ष्मण, जो उनके समान बलवान
मुख मण्डल उनका अति शोभन, पूर्णिमा के चंद्रमा समान
रक्तिम आँखें, स्वर है गंभीर, ज्यों हो वायु अग्नि के साथ
श्रीराम अति प्रबल वीर हैं, संयुक्त हुए भाई के साथ
जनस्थान उजाड़ा उन्होंने, कोई नहीं है उनके साथ
न ही मुनि, न कोई देवता, पूर्णतया निश्चित यह बात
श्रीराम के छोड़े हुए बाण, सोने की पाँख वाले थे
पाँच मुख वाले सर्प बने वे, राक्षसों को खा जाते थे
भय से कातर हुए राक्षस, जिस-जिस ओर भी भागा करते
वहाँ-वहाँ श्रीराम को सदा, सम्मुख अपने खड़ा देखते
इस तरह अकेले ही उन्होंने, जनस्थान का विनाश किया
अकम्पन की बात यह सुनकर, रावण ने तुरंत वचन कहा
लक्ष्मण सहित राम को मारने, जनस्थान अभी जाता हूँ
सुनकर यह अकम्पन बोला, राम का पुरुषार्थ सुनाता हूँ
यदि क्रोधित हों जायें राम, उन्हें नहीं नियंत्रित कर सकते
बाणों से भरे हुए नद के, वेग को वे पलट हैं सकते
तारा, ग्रह, नक्षत्रों सहित, नभमण्डल को कष्ट दे सकते
सागर में डूबती पृथ्वी को, वे निज बल से उठा सकते
महासागर की मर्यादा का भी, वे ह्रास कर सकते हैं
बाणों से समुद्र का वेग, नष्ट वायु वेग कर सकते हैं
महायशस्वी वीर पुरुषोत्तम, लोकों का करके संहार
नये सिरे से सृष्टि कर सकते, यदि करें वे इसका विचार
जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर, निज अधिकार नहीं पा सकते
उसी प्रकार आप व राक्षस, श्रीराम को जीत नहीं सकते



