Tuesday, August 18, 2026

शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

द्वात्रिंश: सर्ग:


शूर्पनखा का लंका में रावण के पास जाना 


शूर्पनखा ने जब देखा यह, किए भयंकर कृत्य राम ने 

चौदह हज़ार राक्षस मारे, त्रिशिरा, खर, दूषण-प्राण हरे 


 करने लगी शोक के कारण, चीत्कार वह ज़ोर-ज़ोर से 

  जो अन्यों के लिए कठिन है, ऐसे कृत्य किये राम ने


 सब अपनी आँखों से देखकर, वह अति उद्ग्विन हो उठी थी 

रावण द्वारा जो शासित थी, लंकापुरी को जा पहुँची थी 


वहाँ पहुँच कर उसने देखा, रावण ऊँचे महल में बैठा 

राजोचित तेज से पूर्ण वह, निज मंत्रियों से घिरा हुआ 


मरुद्गणों से घिरे इंद्र की, भाँति, रावण विराजमान था 

सुवर्णमय सिंहासन उसका, सूर्य सरिस जगमगा रहा था 


स्वर्ण-वेदी पर घी-आहुति से, ज्यों अग्नि प्रज्वलित हो उठे 

 शोभा हुई थी रावण की, उस स्वर्ण सिंहासन पर वैसे


देव, गंधर्व, भूत, महात्मा, उसे जीतने में असमर्थ थे 

यमराज की भाँति भयंकर, लगता था वह समर भूमि में  


देव-असुर संग्राम के समय, उसके तन पर घाव लगे थे 

ऐरावत के दाँत के चिह्न, अब तक देह पर विद्यमान थे 


बीस भुजाएँ, दस मस्तक थे, छत्र, चंवर, आभूषण सुंदर 

वक्ष:स्थल विशाल था उसका, राजोचित लक्षण से संपन्न 


वैदूर्यमणि के आभूषण धारे, तन कांति भी वैसी थी 

भुजाएँ अति सुंदर, श्वेत दाँत, मुख विशाल, आकृति बड़ी थी 


देवों  के संग संघर्ष  में, प्रहार हुआ विष्णु चक्र का

बड़े अन्यान्य युद्धों में, किया सामना अस्त्रों-शस्त्रों का 


देवों के अस्त्रों की चोट से, खंडित नहीं हुए जो अंग 

 सागरों को क्षोभित करते, शीघ्रता से उसके प्रत्यंग 


पर्वत शिखर तोड़ देता था, देवताओं को रौंद डालता 

धर्म की जड़ को काट डालता, स्त्रियों का सतीत्व हरता था 


दिव्यास्त्रों का प्रयोग जानता, यज्ञों को नष्ट उसने दिया 

भोगपुरी पाताल में जाकर, वासुकि व तक्षक को हराया 


कैलास पर्वत पर जाकर,  किया पराजित था कुबेर को 

  हासिल किया पुष्पक विमान, इच्छानुसार चला करता जो


Monday, August 10, 2026

रावण का मारीच के कहने से लंका को लौट आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


इसका बदला लेने हेतु, उनकी स्त्री को हरना चाहता 

मेरा सहयोग करो इसमें, सुनकर यह मारीच तब बोला 


निशाचर शिरोमणे !  कहो यह, किसने तुमको यह सलाह दी

कौन तुम्हारा भला न चाहे, किसे तुम्हारी परवाह नहीं  


नाम बताओ मुझको उसका, राक्षस जगत का जो शत्रु है 

विषधर सर्प के मुख से वह, दाँत उखड़वाना चाहता है 

 

 ऐसी खोटी सलाह दी किसने, कुमार्ग पर ले आया है 

सुखपूर्वक सोते समय, मस्तक पर आघात लगाया है 


 जिनकी गंध से भागें गजराज, श्रीराम वह गजराज हैं

विशुद्ध कुल में जन्म है उनका, वही उनका शुण्ड दंड है 


मद उनका प्रताप जान लो, सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत 

उनकी ओर देखना कठिन है, जूझने की क्या करें बात 


मनुष्य रूप में राम सिंह हैं, समरभूमि में संधि व बाल 

राक्षस मानो मृग हैं उनके, बाण अंग, तलवार है दाढ़ 


नहीं जगा सकते हो तुम उस, सोते हुए सिंह राम को 

महासागर समान हैं राम, उचित नहीं है उसमें कूदो 


धनुष ही उस सागर का ग्राह, भुजाओं का वेग है कीचड़ 

बाण तरंगें, युद्ध जलराशि, मुख उसका जैसे बड़वानल 


लंकेश्वर प्रसन्न हो जाओ, सकुशल तुम लंका को लौटो 

रमण करो निज स्त्रियों संग, राम को सीता संग रहने दो 


मारीच के यह  कहने पर, दशमुख रावण लंका लौटा

शत्रुता की बात भुलाकर, वह अपने महल में चला गया  

  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में एकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Friday, August 7, 2026

रावण का मारीच के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


देव-असुर दोनों मिलकर भी, उन्हें कभी हरा नहीं सकते  

बहुत ध्यान देकर अब सुनिए, जिस उपाय से वे मर सकते


सीता हैं श्रीराम की पत्नी, जग की सर्वोत्तम सुंदरी

युवा, सुडौल अंग हैं उनके, आभूषणों से सजी रहतीं 


स्त्रियों में रत्न हैं सीता, कोई भी नहीं बराबर उनके 

देव, गंधर्व, नाग कन्या, अप्सरा भी समान नहीं उनके 


 सीता का करें आप अपहरण, किसी तरह राम को छलकर

जीवित नहीं रहेंगे श्रीराम, सीता से बिछुड़ जाने पर 


बात पसंद आयी रावण को, उसने यह अकम्पन से कहा

 प्रातः ही सारथि संग जाकर, सीता को लाऊँगा यहाँ 


ऐसा कहकर गधों से जुते, तेजस्वी रथ पर सवार हो 

रावण ने प्रस्थान किया था, कर प्रकाशित सब दिशाओं को 


नक्षत्रों के मार्ग पर चलता, चन्द्र समान सुशोभित होता 

 ढका हुआ बादलों के मध्य, रावण का रथ जहाँ विचरता 


एक आश्रम में जाकर वह, ताड़का पुत्र मारीच से मिला 

भक्ष्य भोज्य अर्पित कर उसने, रावण का शुभ सत्कार किया 


आसन व जल आदि देकर, करके पूजन उसका हाल लिया 

कुशल तो है राज्य में तुम्हारे, मन में लगा है कुछ खटका 


बड़ी उतावली से आये हो, लगता है, सब ठीक नहीं  

मारीच के प्रश्नों को सुनकर, रावण ने यह बात कही 


अनायास ही श्रीराम ने, मार गिराये दोनों खर-दूषण 

सीमा की रक्षा जो करते, जनस्थान के मारे राक्षस

 

Wednesday, August 5, 2026

अकम्पन का रावण को राम की महिमा बताना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:

रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


 संग हैं छोटे भाई लक्ष्मण, जो उनके समान बलवान 

 मुख मण्डल उनका अति शोभन, पूर्णिमा के चंद्रमा समान


रक्तिम आँखें, स्वर है गंभीर, ज्यों हो वायु अग्नि के साथ

श्रीराम अति प्रबल वीर हैं, संयुक्त हुए भाई के साथ


जनस्थान उजाड़ा उन्होंने, कोई नहीं है उनके साथ

न ही मुनि, न कोई देवता, पूर्णतया निश्चित यह बात  


श्रीराम के छोड़े हुए बाण, सोने की पाँख वाले थे 

पाँच मुख वाले सर्प बने वे, राक्षसों को खा जाते थे 


भय से कातर हुए राक्षस, जिस-जिस ओर भी भागा करते  

वहाँ-वहाँ श्रीराम को सदा, सम्मुख अपने खड़ा देखते 


इस तरह अकेले ही उन्होंने, जनस्थान का विनाश किया 

अकम्पन की बात यह सुनकर, रावण ने तुरंत वचन कहा 


लक्ष्मण सहित राम को मारने, जनस्थान अभी जाता हूँ 

सुनकर यह अकम्पन बोला, राम का पुरुषार्थ सुनाता हूँ 


यदि क्रोधित हों जायें राम, उन्हें नहीं नियंत्रित कर सकते

बाणों से भरे हुए नद के, वेग को वे पलट हैं सकते 


तारा, ग्रह, नक्षत्रों सहित, नभमण्डल को कष्ट दे सकते 

सागर में डूबती पृथ्वी को, वे निज बल से उठा सकते 


 महासागर की मर्यादा का भी, वे ह्रास कर सकते हैं 

बाणों से समुद्र का वेग, नष्ट वायु वेग कर सकते हैं


महायशस्वी वीर पुरुषोत्तम, लोकों का करके संहार 

नये सिरे से सृष्टि कर सकते, यदि करें वे इसका विचार 


जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर, निज अधिकार नहीं पा सकते 

उसी प्रकार आप व राक्षस, श्रीराम को जीत नहीं सकते


Tuesday, July 28, 2026

अकम्पन का रावण को जनस्थान के विनाश का समाचार देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकत्रिंश: सर्ग:


रावण का अकम्पन की सलाह से 

सीता का अपहरण करने के लिए जाना और 

मारीच के कहने से लंका को लौट आना 


उसके बाद जनस्थान से, अकम्पन नामका एक राक्षस

शीघ्रता से लंका जा पहुँचा, बोला यह रावण से मिलकर  


 जनस्थान के सभी राक्षस, मारे गये हैं खर के साथ 

किसी तरह यहाँ पहुँचा मैं, राजन् ! बचा के अपनी जान 


सुनते ही दशमुख रावण की, आँखें हुईं रक्तिम क्रोध से

 भरा रोष में अति राक्षस,  मानो कर डालेगा भस्म उसे


कौन चाहता मृत्यु अपनी, जनस्थान पर कर के आक्रमण 

कौन है ऐसा दु:साहसी,  निकट आ गया है जिसका मरण 


जो भी हैं मेरे अपराधी, आश्रय कहीं न पा सकते हैं 

इंद्र, यम, कुबेर या विष्णु भी, नहीं चैन से रह सकते हैं 


हूँ मैं काल काल का भी, ज्वाला को भी जला सकता हूँ

मौत को भी मृत्यु के मुख में, चाहने पर सुला सकता हूँ 


मैं यदि क्रोध में भर जाऊँ तो, वायुदेव की गति रोक दूँ 

दिनकर और अग्नि को भी मैं, निज प्रताप से वहीं ठोक दूँ 


रावण को क्रोधित हुआ देखा, भयभीत हो गया अकम्पन 

हाथ जोड़ की अभय याचना, निकला न मुख से कोई वचन 


राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने, दिया उसे अभयदान तब 

प्राण शेष रहेंगे उसके, संशय रहित हो बोला वह तब 


 दशरथ के पुत्र श्रीराम, पंचवटी में आकर रहते हैं 

सिंह समान गठन तन की, कंधे मोटे, भुजाएँ गोल हैं 


तन का रंग साँवला उनका, यशस्वी और तेजस्वी हैं 

उनके बल और पराक्रम की, कहीं कोई तुलना नहीं है 


धनुर्धरों में बहुत श्रेष्ठ हैं, अद्भुत है उनकी युद्ध कला 

जनस्थान में रहने वाले, खर-दूषण का वध कर डाला 


अकम्पन की बातें सुनकर यह, रावण ने दीर्घ श्वासें ली 

क्या देवों के संग आये हैं, अकम्पन ! बताओ तो सही 


अकम्पन ने एक बार फिर, राम के बल का किया बखान 

दिव्यास्त्रों के प्रयोग में भी, श्रीराम हैं पूर्णत: संपन्न 


Saturday, July 25, 2026

श्रीराम का एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

त्रिंश: सर्ग:


श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर

उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,

श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर

एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा

देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा


कर प्रयोग अनेक बाणों का, खर को क्षत-विक्षत कर डाला 

रक्त बहा उसके अंगों से, मानो झरती हो जल धारा 


व्याकुल किया राम ने उसको, फिर भी वह अति वेग से दौड़ा 

दो-तीन पग पीछे हट गये, राम ने तेजस्वी बाण लिया 


ब्रह्म दंड के सरिस भयंकर, देवराज इंद्र ने दिया था 

खर को लक्ष्य करके उसे छोड़ा, वज्रपात सा शब्द हुआ 


खींच कान तक धनुष राम ने, वह अति प्रबल बाण छोड़ा था 

खर की छाती में लगा जाकर, प्रज्ज्वलित हुआ गिर पड़ा था 


श्वेतवन में जैसे रुद्र ने, अंधकासुर को भस्म किया था 

वृत्रासुर वज्र से जैसे, नमुचि फेन से मारा गया था 


इंद्र की अशनि से जिस प्रकार, बलासुर का विनाश हुआ था 

श्रीराम के उस बाण से, राक्षस खर धराशायी हुआ था 


इसी समय देवतागण आये, चारण भी थे उनके साथ 

हर्षित हो दुंदुभी बजाकर, करते पुष्पों की बरसात 


 उन्हें देख यह हुआ आश्चर्य, डेढ़ मुहूर्त में ही राम ने 

खर-दूषण, उनकी सेना को, मारा था अपने बाणों से 


निज स्वरूप को जानने वाले, राम का यह कर्म अद्भुत है 

विष्णु की भाँति दृढ़ता इनमें, बल-पराक्रम भी अद्भुत है 


ऐसा कह सभी देवता, जैसे आये चले गये वैसे 

राजर्षि और महर्षि आये, कर सत्कार राम का बोले 


 देवराज इंद्र इसीलिए, शरभंग के आश्रम पर आया 

इसी कार्य की पूर्णता हेतु, आपको पंचवटी पहुँचाया  


राक्षसों के विनाश हेतु ही, शुभागमन हुआ है आपका 

सिद्ध किया बड़ा कार्य, अब, धर्म का अनुष्ठान यहाँ होगा 


इसी बीच सीता के साथ, लक्ष्मण जी कन्दरा से निकले 

किया आश्रम में प्रवेश तब, भाई से पूजित हो राम ने


पति का दर्शन कर सीताजी, अतीव हर्ष पा, हुईं प्रसन्न 

आलिंगन किया श्रीराम का, परमानंद में हुईं निमग्न 


मारे गये राक्षस समूह सभी, श्रीराम को क्षति न पहुँची 

देख और जानकर इसको, सीताजी तब अति हर्षित हुईं 


हो प्रसन्न महात्मा मुनिजन, भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे 

प्राण वल्लभ श्रीराम को देख, सीता के नयन खिलते थे 


  

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Wednesday, July 22, 2026

श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना,

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

त्रिंश: सर्ग:


श्रीराम के व्यंग्य करने पर खर का उन्हें फटकारकर उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना, श्रीराम का उस वृक्ष को काटकर एक तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना तथा देवताओं और महर्षियों द्वारा श्रीराम की प्रशंसा 


खर की गदा राम ने काटी, मुस्का कर यह कटु वचन कहे 

 मात्र यही तेरा सारा बल, क्यों व्यर्थ डींग मारता फिरे ?


शक्तिहीन है तू मुझसे अति, पूर्ण सिद्ध हो गया इसी क्षण 

भू पर गदा पड़ी है तेरी, कर तेरी बातों का खंडन 


तूने कहा, मेरा वध कर , राक्षसों के आँसू पोछेगा 

झूठ हुआ वचन वह तेरा, क्षुद्र स्वभाव कैसे छोड़ेगा 


हर लूँगा तेरे प्राणों को, जैसे अमृत हर लिया गरुड़ ने 

शीश काट डालूँगा तेरा, कर विदीर्ण शरीर को तेरे 


धूल से धूसर होंगे अंग, दो बाँहें भी कट जायेंगी 

फेन और बुदबुदों से युक्त, लहू का भूमि पान करेगी 


राक्षस कुलों का कलंक तू, महानिद्रा में सो जाएगा 

दंडक वन हो पुनः सुरक्षित, मुनियों का घर बन जाएगा 


जनस्थान में निर्मित तेरे, निवास-स्थान नष्ट होंगे अब 

निर्भय होकर विचरेंगे मुनि, इस अरण्य में नि:शंक होकर 


जो अब तक कारण बनीं भय का, राक्षसियाँ भाग जायेंगी 

जिनका स्वामी तुझ जैसा है, आतुर होकर शोक करेंगी 


क्रूर स्वभाव किया है धारण, क्षुद्र विचार ह्रदय में धरता 

कंटक तू ब्राह्मणों के हित, शंकित सदा उनका मन रहता 


श्रीराम कह रहे थे जब यह,  क्रुद्ध हुआ बोला तब खर भी 

निश्चय ही तुम बहुत घमंडी,  हो निर्भय, भय होने पर भी


 हो गये हो मृत्यु के अधीन, ऐसा मुझे जान पड़ता है 

 इसी कारण तुमको भान नहीं है, कब क्या कहना उचित है 


पड़े काल के फंदे में जो, उसकी इंद्रियाँ व्यर्थ हो जातीं 

कर्त्तव्य का भान न रहता, व्यर्थ कामों में वे लग जातीं 


ऐसा कहकर उस राक्षस ने, भौहें टेढ़ी कर के देखा 

लख रणभूमि में चारों ओर, साखू का इक वृक्ष उखाड़ा 


विकट गर्जना करके उसने, श्रीराम पर उसे दे मारा 

श्रीराम ने बाणों से ही, उस पादप को अधर में काटा 


खर को मार डालने हेतु तब, राम ने अति क्रोध दिखाया 

स्वेद आ गया उनके तन में, रक्त वर्ण आँखों में प्रकटा