Saturday, May 23, 2026

शूर्पणखा का खर को राम का भय दिखाकर युद्ध के लिए उत्तेजित करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


एकविंश: सर्ग:



शूर्पणखा का खर के पास आकर उन

राक्षसों के वध का समाचार बताना और

राम का भय दिखाकर उसे युद्ध के लिए उत्तेजित करना 


शूर्पणखा को पुन: देखकर, खर ने कहा स्पष्ट वाणी में 

शूरवीर राक्षस कई गये, बहन, तुम्हारा प्रिय हित करने 


अब तुम किस कारण व्याकुल हो, वीर राक्षस नहीं मर सकते 

मेरी आज्ञा को नहीं मानें,  ऐसा भी वे न कर सकते 


फिर ऐसा क्या हुआ है आखिर, हा नाथ ! कह लोट रही हो 

मुझसे संरक्षक के रहते, क्यों ऐसे विलाप करती हो 


उठो ! उठो!! अब त्याग दो चिंता, खर ने दी सांत्वना उसको 

अश्रु भरे नयनों को पोंछ कर, बोली अपने भाई खर को 

 

घायल होकर प्रथम बार जब, आयी थी मैं तुम्हारे पास 

तुमने चौदह राक्षस भेजे, राम के वध हित मेरे साथ 


वे सब के सब अमर्ष में भरकर, पट्टिश, शूल लिए पहुँचे 

किंतु राम ने निज  बाणों से, उन्हें गिराया समरांगण में 


पल में महान निशाचरों को, गिरते देख अति भयभीत हूँ 

चहूँ ओर भय ही भय दिखता, उद्ग्विन और विषाद ग्रस्त हूँ 


दुख के उस सागर में डूबी, जहाँ शोक के ग्रह बसते हैं 

त्रास की तरंगें उठतीं,  तुम क्यों मेरा उद्धार न करते  

 

मेरे साथ गये जो राक्षस, सभी के सब मारे गये हैं 

राम के पैने बाणों से हत, पृथ्वी पर वे गिर पड़े हैं 


यदि मुझ पर और राक्षसों पर, तनिक दया तुमको आती है 

वध कर डालो शीघ्र राम का, अगर तुममें इतनी शक्ति है 


दंडक वन के वासी राम, राक्षसों के लिए बने  कंटक 

यदि उनका वध आज न करते, त्याग  दूँगी  मैं अपने  प्राण 


मैं बुद्धि से यही सोचती, ठहर सकोगे राम के आगे ?

तुम स्वयं को शूर समझते, किंतु सिद्ध बलहीन ही होगे 


समरांगण में उन्हें मार कर, निज पराक्रम का परिचय दो 

या कुल में कलंक लगाकर, जनस्थान से ही तुम भागो  


राम-लक्ष्मण दोनों मानव हैं, यदि उनको भी मार न सकते 

कैसे संभव है तुम जैसे, निर्बल राक्षस यहाँ रह सकते 


शीघ्र नष्ट तुम हो जाओगे, राम के बल  से हो पराजित 

तेजस्वी हैं राम व  लक्ष्मण, कर कुरूप किया मुझे लज्जित 


इस प्रकार करके विलाप, गुफा समान उदर वाली वह 

शोक से आतुर  हुई मूर्छित, फूट-फूट कर रोती थी वह 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Friday, May 22, 2026

श्रीराम द्वारा खर के भेजे हुए चौदह राक्षसों का वध

  

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


विंश: सर्ग:



श्रीराम द्वारा खर के भेजे हुए चौदह राक्षसों का वध 


तत्पश्चात् भयानक राक्षसी, पुन: उनके आश्रम पर आयी 

परिचय दे राक्षसों को उनका, घटना सारी पुन: बतायी 


राक्षसों ने तीनों को देखा, इसी तरह उनको राम ने

उद्दीप्त अति तेज था जिनका, लक्ष्मण से फिर कहे वचन ये


थोड़ी देर तक यहीं रुको तुम, सीता जी का रखना ध्यान 

राक्षसी के सहायक बने, राक्षसों का करूँगा संधान 

 

निज स्वरूप को जानते थे, उन श्रीराम की बात जब सुनी

  ‘तथास्तु’ कहकर लक्ष्मण जी ने, आज्ञा उनकी शिरोधार्य की 


 सुवर्णमंडित विशाल धनुष पर, राम ने चढ़ायी प्रत्यंचा 

क्यों हमारी हिंसा पर उतरे, राक्षसों से ये वचन कहा 


देखो, तुम सब पापात्मा हो, ऋषियों के भी अपराधी हो 

उनकी आज्ञा से मैं आया, चाहो तो तुम बच सकते हो 


यदि तुम्हें संतोष मिलता है, तत्पर रहो युद्ध की खातिर 

प्राणों का यदि भय सताता, तुम ठहरो नहीं यहाँ घड़ी भर 


 कुपित हुए वे सभी राक्षस, सुनकर यह श्रीराम का सवाल  

ब्राह्मणहंता घोर निशाचरों ने  क्रोधित हो दिया जवाब 


तूने खर को क्रोध दिलाया, अब हमसे मारा जाएगा 

हम अनेक हैं तू अकेला, खड़ा भी न तू रह पाएगा 


हम छोड़ेंगे परिघ, शूल कई, पट्टिश भी कई जब तुझपर 

धनुष सहित अभिमान तजेगा, प्राणों को भी अपने तजकर 


ऐसा कहकर भरे क्रोध में, चौदह राक्षस टूट पड़े थे 

काट दिया उन शूलों को, किंतु राम ने अपने बाणों से 


महातेजस्वी श्रीराम ने, चौदह नाराचों को पकड़ा 

रखा धनुष पर,कान तक खींचा, उन्हें राक्षसों पर छोड़ा 


मानो इंद्र ने वज्र मारा , बाणों ने लक्ष्यों को बेधा 

रुधिर में डूबे हुए से निकले, सर्प समान भू पर गिरे  


जड़ से कटे वृक्षों की भाँति, वे राक्षस हुए धराशायी 

रक्त में डूबे बदन  थे उनके, तत्काल मृत्यु थी आयी 


 धरती पर मृत पड़ा देखकर, शूर्पणखा गयी खर के पास 

सूख गया रक्त घावों का, लगती गोंद युक्त लता समान 


शोक से पीड़ित, निकट भाई के, अर्तनाद करती जाती  

सारा समाचार सुनाया, मुख की कांति फीकी पड़ी थी


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Thursday, May 21, 2026

खर का श्रीराम आदि के वध के लिये चौदह राक्षसों को भेजना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


एकोनविंश: सर्ग:



शूर्पणखा के मुख से उसकी दुर्दशा का वृत्तांत

सुनकर क्रोध में भरे हुए खर का 

श्रीराम आदि के वध के लिये चौदह राक्षसों को भेजना 


अंगहीन व रक्त से भीगी, भूमि पर जो पड़ी हुई थी 

देख बहन को भरा क्रोध से, खर ने उससे बात यह पूछी 


उठो बहन, मूर्छा त्यागो, स्पष्ट कहो, यह किया है किसने 

किसने किया आक्रमण तुम पर, रूपहीन बनाया किसने 


अंगुलियों के अग्र भाग से, कौन खेलता है विषधर से 

उसने विष पी लिया समझ लो, मोहवश अनभिज्ञ है इससे 


तुम तो स्वयं यम समान हो, अन्य प्राणी तुमसे डरते हैं 

इच्छानुसार रूप बदलती, यह अवस्था कहो की किसने 


देवों, गन्धर्वों, भूतों में, कौन शक्तिशाली ऋषियों में 

जिसने तुमको कष्ट दिया है, कौन भला ऐसा है जग में 


इंद्र भी ऐसा साहस कर लें, दिखायी पड़ता नहीं मुझे

प्राणान्तकारी मेरे बाण, प्राण हरेंगे अपराधी के 


छिन्न-भिन्न हो गये किसके, मर्मस्थान मेरे बाणों से 

गरम रक्त पीना चाहती है, यह वसुंधरा किस पुरुष के 


मेरे द्वारा मारे गये किस, व्यक्ति के शरीर का मांस 

झुंड के झुंड पक्षी खायेंगे, केवल मुझे बताओ नाम 


जिसे महासमर में खींचूँ , देवता भी नहीं बचा सकते 

गंधर्व, पिशाच, राक्षस भी, उसकी रक्षा नहीं कर सकते

 

खर के क्रोधित वचन सुने जब, शूर्पणखा ने उसे बताया 

वन में दो तरुण आये हैं , पिता हैं जिनके दशरथ राजा 


सुकुमार और बहुत बलवान हैं, वल्कल व मृगचर्म धारे 

कमल समान नयन हैं सुंदर, राम,लक्ष्मण नाम हैं उनके 


फल-मूल उनका भोजन है, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं 

गन्धर्वों समान लगते हैं, आपस में भाई-भाई हैं  


दानव या देव हैं दोनों, इसका मुझको भान नहीं है 

राजोचित लक्षण से संपन्न, उनके साथ एक युवती है 


रूपवती उस तरुणी स्त्री का, मध्यभाग अतीव सुंदर है 

आभूषणों से विभूषित, उसके कारण यह दशा हुई है 


एक अनाथ, कुलटा की भाँति, उन्होंने की मेरी दुर्दशा

 रक्त पान करना मैं चाहूँ, दो भाइयों और उस स्त्री का 


यह मेरी पहली प्रमुख इच्छा है, पूर्ण करो, हूँ अति व्यथित 

 शूर्पणखा के यह कहने पर,  होकर खर ने अत्यंत कुपित


चौदह राक्षसों को यही कहा, यम समान भयंकर थे जो 

दण्डकारण्य के भीतर जाकर, दो पुरुषों व स्त्री को मारो 


उन तीनों दुष्टों का रक्त, पीना चाहती है मेरी बहन

शीघ्र पूर्ण करो यह मनोरथ, उससे इसका होगा रंजन 


खर की आज्ञा पाकर, हवा से उड़ाये मेघों के जैसे  

पंचवटी की दिशा की तरफ़, शूर्पणखा के साथ वे गये 



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 

Wednesday, May 20, 2026

शूर्पणखा का सीता पर आक्रमण व लक्ष्मण का उसके नाक-कान काट लेना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टदश: सर्ग:



श्रीराम के टाल देने पर शूर्पणखा का लक्ष्मण से

प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालने पर

उसका सीता पर आक्रमण 

और लक्ष्मण का उसके नाक-कान काट लेना 


कामपाश से बंधी हुई उस, शूर्पणखा से बोले राम 

मधुर बहुत वचन थे उनके, आनन पर मंद  मंद मुस्कान


आदरणीया देवि ! सीता से, मैं पहले कर चुका विवाह 

तुम जैसी स्त्री भला क्यों, झेलना चाहेगी सौतिया डाह 


यह मेरे छोटे भाई हैं, शीलवान प्रियदर्शी भी हैं 

बल पराक्रम से संपन्न हैं, इनके साथ नहीं कोई  स्त्री 


तरुण और गुणवान बहुत हैं, यदि इन्हें भार्या की चाह है

  योग्य  तुम्हारे सुंदर रूप के, सुनो  यह मेरी सलाह है 


सूर्य प्रभा ज्यों मेरु पर्वत का, हो नि:शंक सेवन करती है 

पति रूप में इन्हें अपनाकर, सौत के भय से रहित रहो 


ऐसा कहने पर राम के,  सहसा पहुँची लक्ष्मण के पास 

केवल मैं  हूँ योग्य तुम्हारे, कर लो तुम मुझे अंगीकार 


बातचीत में निपुण लक्ष्मण, मुस्कुरा कर उससे यह बोले 

मैं दास हूँ बड़े भाई का, तुम क्यों दासी बनना चाहो 


ऐश्वर्यों से संपूर्ण हैं, मेरे बड़े भाई श्रीराम 

उन्हीं की छोटी स्त्री हो जाओ, रूप तुम्हारा है अभिराम 


कुरूप, ओछी, विकृत भार्या को, त्याग तुमको  ग्रहण करेंगे 

भला कौन  तुम्हें छोड़कर, मानव कन्या से प्रेम करेगा 


लक्ष्मण के ऐसा कहने पर, परिहास को समझ न पायी 

सत्य  माना उनकी बात को, पुन: राम के निकट वह आयी 


इस कुरूप वृद्धा के कारण, नहीं कर रहे आदर मेरा

खा जाऊँगी इस मानुषी को, फिर मिलेगा साथ तुम्हारा 


ऐसा कह वह क्रोधित नेत्रों से, झपटी सीताजी की ओर

मानो कोई भारी उल्का, रोहिणी पर टूट पड़ी हो 


मौत के फंदे की भाँति, आती हुई राक्षसी को रोक 

कहा लक्ष्मण से श्री राम ने, कर दो किसी अंग से हीन 


क्रूर कर्म करने वालों से, उचित नहीं कोई परिहास 

अति कठिनाई से बचे हैं, देखो, इस समय सीता के प्राण 


श्रीराम के ऐसा  कहने पर, म्यान से खींची तलवार 

नाक-कान काटे राक्षसी के, लक्ष्मण ने किया था वार 


नाक-कान कट जाने पर वह, चिल्लाकर वन में भाग गयी 

खून से भीगी महा भयंकर, भीषण चीत्कार करती थी 


अति भयानक थी वह राक्षसी, कटे हुए अंगों को लेकर 

भ्राता खर के पास गयी वह, भूमि पर गिर गई थी जाकर 


जनस्थान निवासी खर की, बहन रक्त से नहा गई थी 

भय व मोह से शूर्पणखा, कंपित, अचेत सी हो रही थी 


सीता और लक्ष्मण के साथ, श्री राम के आगमन की बात 

अपने कुरूप किए जाने का, सब सुनाया खर को वृतांत 

 

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Tuesday, May 19, 2026

शूर्पणखा का राम से अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तदश: सर्ग:

राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना, उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर उनसे अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना 


देवी ! मैं दशरथ का पुत्र हूँ, जो थे चक्रवर्ती सम्राट  

साथ हैं मेरे भाई लक्ष्मण, राम नाम से मैं विख्यात 


विदेहराज जनक की पुत्री, यह मेरी पत्नी सीता हैं 

माता-पिता की आज्ञा से हम, वनवास करने आये हैं  


तुम किसकी पुत्री हो? देवी, क्या नाम मिला, किसकी पत्नी

 राक्षसी जान पड़ती हो, रूप इच्छानुसार धार सकती 


सही-सही बातें बताओ, किस कारण तुम यहाँ आयी हो

 शूर्पणखा है मेरा नाम,  बोली, वह काम से पीड़ित हो


भय पैदा करती मनों में, किया करती हूँ वन में विचरण

 संभव है तुमने सुना हो, नाम मेरे भाई का रावण


विश्रवा का वीर पुत्र है, दूसरा भाई है कुंभकर्ण 

जिसकी निद्रा सदा बढ़ती है, तीसरे का नाम विभीषण 


राक्षसों सरिस नहीं आचार, विभीषण बहुत धर्मात्मा है

 खर-दूषण भी भ्राता मेरे, युद्ध में पराक्रम जिनका है,


बल में भाइयों से बढ़ हूँ, नहीं है कोई मेरे समान

 मन आसक्त हुआ है मेरा, पाकर तुम्हारा प्रथम दर्शन 


तुम जैसे पुरुषोत्तम के प्रति, भावना लिए आयी पति की

संपन्न हूँ मैं प्रभाव से, हर लोक में विचरण कर सकती 


 दीर्घकाल के लिए, इसलिए,  स्वामी बन जाओ तुम मेरे

इस अबला सीता को लेकर, जीवन में तुम क्या कर लोगे

 

 विकार युक्त है और कुरूपा, अत: यह तुम्हारे योग्य नहीं 

मैं केवल अनुरूप तुम्हारे, बना लो भार्या मुझे अपनी


सीता कुरूप मेरी दृष्टि में, है धँसे हुए उदर वाली 

यह तुम्हारे भाई के साथ, अब मेरा आहार बनेगी 


फिर तुम कामभाव से जुड़कर, दंडक वन में विचरण करना 

 सुन कर शूर्पणखा की बात, आरंभ किया राम ने हँसना 


मतवाले नेत्रों वाली उस, निशाचरी से ये वचन कहे 

ककुत्स्थकुलभूषण रामचंद्र, बातचीत में बहुत कुशल थे 



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ।

 


Sunday, May 17, 2026

राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तदश: सर्ग:


राम के आश्रम में शूर्पणखा का आना,

उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर

उनसे अपने को भार्या के रूप में

ग्रहण करने के लिए अनुरोध करना 



 सीता-रामचन्द्र और लक्ष्मण, पुन: आश्रम लौट आये फिर

 पूर्वाह्न का पूजन करके, पर्णशाला में बैठे आकर 


इसी प्रकार निवास करते थे, सुखपूर्वक सीता के साथ 

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आकर, किया करते उनका सत्कार 


चित्रा के संग ज्यों चंद्रमा, ऐसे ही शोभा पाते थे 

लक्ष्मण के संग बैठे राम, तरह-तरह की वार्ता करते 


एक बार जब इसी प्रकार, किसी चर्चा में लीन थे राम  

आ पहुँची थी बहन रावण की, शूर्पणखा था उसका नाम 

 

देवताओं के सम राम का, मनहर रूप निहारा उसने 

मुख तेजस्वी, बड़ी भुजाएँ, नेत्र कमल समान सुंदर थे 


हस्ति समान चाल थी उनकी, जटामण्डल युक्त था मस्तक

परम सुकुमार, महा बलशाली, राजोचित लक्षण से युक्त 


नीलकमल के समान कांति, सौंदर्य कामदेव जैसा था

इंद्र समान तेजस्वी राम, देख राक्षसी को मोह हुआ 


श्रीराम का मुख सुंदर था, शूर्पणखा का भद्दा व कुरूप 

मध्यभाग सुंदर राम का, था उसका दीर्घ उदर बेडौल


श्रीराम के नयन थे सुंदर, उसकी अति डरावने आँखें 

केश राम के कोमल, सुंदर, ताम्र वर्णीय कुंतल उसके 


रूप अति प्यारा राम का, शूर्पणखा का वीभत्स, विकराल 

बहुत मधुर वाणी राम की, कर्कश कठोर थे उसके बोल 


राम सौम्य और नित तरुण थे, वह हज़ारों वर्ष की वृद्धा 

सरल और उदार थे राम, उसकी बातों में थी कुटिलता 


सदाचार का पालन करते, न्यायोचित थे कृत्य राम के 

शूर्पणखा थी दुराचारिणी, वितृष्णा होती जो देखते 


कामभाव से हुई आविष्ट, निकट वह आयी श्रीराम के

क्यों आये यहाँ? मुझे कहो, धनुष लिए तापस के वेश में


इस प्रकार जब उसने पूछा, राम ने बताना शुरू किया 

अपने सरल स्वभाव के कारण, कुछ भी नहीं अन्यथा लिया

 

Friday, May 15, 2026

लक्ष्मण द्वारा भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का गोदावरी नदी में स्नान


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षोडश: सर्ग:

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन

और भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का

उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान 


 आँखें जिनकी कमल सी सुंदर, अंगकांति श्याम है जिनकी 

उदर का जिनके भान न होता, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, मृदुभाषी 


शत्रु दमन श्रीमान भरत ने, आपका ही आश्रय लिया है 

स्वर्गलोक पर विजय भी पा ली, स्थित तप में, वनवास लिया है 


प्राय: माता के ही गुणों का, अधिक अनुसरण मानव करते

मिथ्या किया प्रमाणित इसको, भरत ने अपने बर्ताव से 


 जिनके स्वामी हैं राजा दशरथ, साधु समान पुत्र भरत सा 

कैसे उन माता कैकेयी ने, की क्रूरता दुष्ट बुद्धि पा  


धर्मपरायण लक्ष्मण जिस घड़ी, स्नेहवश ऐसा कहते थे

निंदा सही नहीं गयी माँ की, श्री राम ने कहे वचन ये 


 मत करो माता की निंदा, भरत के बारे में ही बोलो 

परम प्रिय और मनभावनी, याद आ रहीं भरत की बातें, 


दृढ़ता पूर्वक यद्यपि मैंने, निश्चय किया वन में रहूँगा 

भरत के स्नेह में हो संतप्त, विचलित हो उठा मन मेरा 


कब आएगा वह दिन भाई, जब मैं साथ तुम्हारे चल कर 

भरत-शत्रुघ्न से मिलूँगा, कहते हुए वे पहुँचे तट पर 


लक्ष्मण व सीता के साथ, गोदावरी नदी में किया स्नान 

 देवों व पितरों का तर्पण, सूर्यदेव का किया उपस्थान 


सीता और लक्ष्मण के संग, उसी तरह शोभा पाते थे, 

देवी व नंदी संग ज्यों शिव, अवगाहन करके गंगा में 


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।