श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकादश: सर्ग:
पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन
आगे-आगे श्रीराम चले, परम सुंदरी सीता पीछे
जिनके पीछे चले लक्ष्मण, परमवीर लिए धनुष हाथ में
भाँति-भाँति के पर्वत शिखरों, वनप्रदेश, नदियों आदि को
देखते हुए बढ़े वे आगे, सारस, चक्रवाक खगों को
कमलों व जलीय जीवों से, शोभा पाते नदियाँ, सरोवर
चितकबरे मृग कहीं झुंड में, सींगों वाले भैंस कहीं पर
बढ़े हुए दाँतों वाले, जंगली सूअर, हाथी भी वहाँ
सूर्यास्त के समय जहाँ पहुँचे, अति विशाल एक सरवर था
लाल, श्वेत कमल से भरा था, क्रीड़ा करते हाथी जल में
व्याप्त दिखायी देता था वह, राजहंस, कलहंस,मत्स्य से
स्वच्छ नीर से भरे सरवर से, संगीत का स्वर आता था
किंतु निकट कहीं भी कोई, नज़र दृष्टि में नहीं आता था
कौतुहल वश श्रीराम ने, साथ आये धर्मभृत से पूछा
ध्वनि कहाँ से आती है यहाँ, जानने की हमें उत्सुकता
धर्मभृत नामक मुनि तब बोले, यह है पंचाप्सर सरोवर
सदा भरा रहता है जल से, मांडकर्णि मुनि का अनुपम घर
निर्माण किया इस जलाशय का, अपने तप से महामुनि ने
केवल वायु भक्षण कर रहे, दस हज़ार वर्षों तक इसमें
अग्नि आदि सभी देवता, व्याकुल हो उठे उनके तपस से
स्थान हमारा लेना चाहते, कहने लगे वे आपस में
विघ्न डालने हेतु तप में, पाँच अप्सराओं को बुलाया
उन्होंने मुनि को आकृष्ट किया, उनसे फिर विवाह रचाया
सुंदर घर इक छिपा हुआ है, उनके रहने हित इस जल में
उनके वाद्यों की ध्वनियों संग, मधुर गीत सुनायी देते
‘यह तो बड़े अचरज की बात’, कह राम ने सुनी यह गाथा
तब दिखायी दिया उन्हें, आश्रम मण्डल तेज से भरा हुआ
सीता और लक्ष्मण के साथ, सुखपूर्वक किया वहाँ निवास
बारी-बारी से रहे वहाँ, एक एक कर सभी के पास
जिनके यहाँ रहे थे पहले, भक्ति देख दुबारा भी गये
कहीं दस, कहीं चार महीने, कहीं साल भर भी वहाँ रहे
ऐसे ही मुनियों के पास, बसे हुए दस वर्ष बीत गये
अंततः सब ओर घूम घाम कर, सुतीक्ष्ण आश्रम में लौटे
