श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
त्रयोविंश: सर्ग:
भयंकर उत्पातों को देखकर भी खर का
उनकी परवाह नहीं करना तथा राक्षस सेना का
श्रीराम के आश्रम के समीप पहुँचना
उस सेना के गमन करते ही, धूसर मेघ घिरे गगन में
तुमुल गर्जना हुई मेघ की, रक्तिम जल गिरता था नभ से
खर के रथ में जुते अश्व भी, समतल स्थल पर गिरे अचानक
सूर्य घिरा काले घेरे से, ध्वज पर बैठा गीध भयानक
मांसाहारी पशु व पक्षी, भीषण शब्द करने आये थे
मुँह से आग उगलने वाले, शब्द अमंगल गीदड़ करते
अंधकार अविरल छाया था, दिशा भान भी नहीं रहा था
असमय ही संध्या घिर आयी, पशु-पक्षियों का स्वर तीव्र था
भयकारी चील और गीदड़, खर के सम्मुख आ पहुँचे थे
मानो ग्रहण लगा सूर्य को, पवन देव भी तीव्र बहते थे
बिना रात्रि के नभ मण्डल में, जुगनू जैसे तारे चमके
तालाब से उड़ गये पक्षी, पुष्प कमल के भी सब सूखे
फल व फूल झड़े पादपों से, धूल छा गई अंतरिक्ष में
चें चें करती थीं सारिका, भूमि पर गिरीं कई उल्काएँ
पर्वत, वन सहित भूमि डोलती, खर रथ पर विराजमान था
सहसा भुजा काँपने लगी उसकी, स्वर भी अवरुद्ध हुआ था
आँखों में आँसू भर आये, सिर में भी पीड़ा होती थी
किंतु मोहवश युद्ध न छोड़ा, अति भयंकर हँसी उसकी थी
ये जितने उत्पात दिख रहे, मुझे नहीं परवा है इनकी
तारों को भूमि पर ला दें, इन बाणों में है शक्ति इतनी
यदि क्रोधित मैं हो जाऊँ तो, मृत्यु को भी मौत दे सकता
राम-लक्ष्मण को मारे बिना, मैं पीछे कैसे हट सकता
शूर्पणखा को दंडित करने का, कुविचार जिन्हें आया था
उन्हीं का रक्त पान करेगी, पूर्ण मनोरथ उसका होगा
कभी नहीं पहले हारा मैं, तुम सबने इसको देखा है
इंद्र भी मुझसे बच नहीं सकते, बात मानवों की क्या है
उसकी अति विशाल सेना, जो मोहपाश से बँधी हुई थी,
खर की यह गर्जना सुनकर, अनुपम हर्ष से पूर्ण हुई थी
युद्ध देखने की इच्छा से, ऋषि, देव, गंधर्व आये थे
पुण्यकर्मा महात्मा, सिद्ध, सब आपस में बात करते थे
हो कल्याण गौ व ब्राह्मणों का, लोकप्रिय महात्मा का भी
विष्णु ज्यों असुरों को हराते, खर को हरा दें श्रीराम भी
ऐसी ही मंगलसूचक कई, बातें करते हुए महर्षि
कौतूहलवश बैठ विमान पर, देखें राक्षसों की वाहिनी
रथ के द्वारा बड़े वेग से, चलकर खर आगे निकला था
बारह अति वीर राक्षसों ने, दोनों ओर उसे घेरा था
श्येंगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, कारविराक्ष
परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य, रुधिराशन
ये उन राक्षसों के नाम हैं, चार वीर सेना के आगे
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ, त्रिशिरा आदि उनके नाम थे
सेनापति दूषण आगे थे, राक्षसों की वीर सेना के
सहसा जा पहुँची आश्रम, जो आती युद्ध की कामना से
श्रीराम-लक्ष्मण के निकट जब, खर की वह सेना जा पहुँची
मानो सूर्य, चन्द्र के पास, ग्रहों की पंक्ति प्रकाशित होती
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्ड में तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।