श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
अष्टदश: सर्ग:
श्रीराम के टाल देने पर शूर्पणखा का लक्ष्मण से
प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालने पर
उसका सीता पर आक्रमण
और लक्ष्मण का उसके नाक-कान काट लेना
कामपाश से बंधी हुई उस, शूर्पणखा से बोले राम
मधुर बहुत वचन थे उनके, आनन पर मंद मंद मुस्कान
आदरणीया देवि ! सीता से, मैं पहले कर चुका विवाह
तुम जैसी स्त्री भला क्यों, झेलना चाहेगी सौतिया डाह
यह मेरे छोटे भाई हैं, शीलवान प्रियदर्शी भी हैं
बल पराक्रम से संपन्न हैं, इनके साथ नहीं कोई स्त्री
तरुण और गुणवान बहुत हैं, यदि इन्हें भार्या की चाह है
योग्य तुम्हारे सुंदर रूप के, सुनो यह मेरी सलाह है
सूर्य प्रभा ज्यों मेरु पर्वत का, हो नि:शंक सेवन करती है
पति रूप में इन्हें अपनाकर, सौत के भय से रहित रहो
ऐसा कहने पर राम के, सहसा पहुँची लक्ष्मण के पास
केवल मैं हूँ योग्य तुम्हारे, कर लो तुम मुझे अंगीकार
बातचीत में निपुण लक्ष्मण, मुस्कुरा कर उससे यह बोले
मैं दास हूँ बड़े भाई का, तुम क्यों दासी बनना चाहो
ऐश्वर्यों से संपूर्ण हैं, मेरे बड़े भाई श्रीराम
उन्हीं की छोटी स्त्री हो जाओ, रूप तुम्हारा है अभिराम
कुरूप, ओछी, विकृत भार्या को, त्याग तुमको ग्रहण करेंगे
भला कौन तुम्हें छोड़कर, मानव कन्या से प्रेम करेगा
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर, परिहास को समझ न पायी
सत्य माना उनकी बात को, पुन: राम के निकट वह आयी
इस कुरूप वृद्धा के कारण, नहीं कर रहे आदर मेरा
खा जाऊँगी इस मानुषी को, फिर मिलेगा साथ तुम्हारा
ऐसा कह वह क्रोधित नेत्रों से, झपटी सीताजी की ओर
मानो कोई भारी उल्का, रोहिणी पर टूट पड़ी हो
मौत के फंदे की भाँति, आती हुई राक्षसी को रोक
कहा लक्ष्मण से श्री राम ने, कर दो किसी अंग से हीन
क्रूर कर्म करने वालों से, उचित नहीं कोई परिहास
अति कठिनाई से बचे हैं, देखो, इस समय सीता के प्राण
श्रीराम के ऐसा कहने पर, म्यान से खींची तलवार
नाक-कान काटे राक्षसी के, लक्ष्मण ने किया था वार
नाक-कान कट जाने पर वह, चिल्लाकर वन में भाग गयी
खून से भीगी महा भयंकर, भीषण चीत्कार करती थी
अति भयानक थी वह राक्षसी, कटे हुए अंगों को लेकर
भ्राता खर के पास गयी वह, भूमि पर गिर गई थी जाकर
जनस्थान निवासी खर की, बहन रक्त से नहा गई थी
भय व मोह से शूर्पणखा, कंपित, अचेत सी हो रही थी
सीता और लक्ष्मण के साथ, श्री राम के आगमन की बात
अपने कुरूप किए जाने का, सब सुनाया खर को वृतांत
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।