श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
पञ्चदश: सर्ग:
पञ्चवटी के रमणीय प्रदेश में श्रीराम की आज्ञा से
लक्ष्मण द्वारा सुंदर पर्णशाला का निर्माण
तथा उसमें सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का निवास
नाना प्रकार के सर्पों से, भरी हिंसक पशुओं-मृगों से
पञ्चवटी में पहुँच राम ने, बात यह कही प्रिय लक्ष्मण से
सौम्य ! ऋषी अगस्त्य ने हमको, जिस स्थान का दिया था परिचय
आ पहुँचे हम वनप्रांत में, सुंदर फूलों से भरे हुए
चारों ओर दृष्टि तुम डालो, इस कार्य में तुम अति निपुण हो
निश्चय करो यहाँ किस स्थान पर, नया आश्रम अपना स्थित हो
ऐसे स्थान को ढूँढ निकालो, जलाशय जहाँ से निकट हो
मन लगे जहाँ सीता जी का, सुख प्राप्ति हो तुमको व मुझको
आसपास ही समिधा व फूल, कुश, मिलने की हर सुविधा हो
हाथ जोड़े तब लक्ष्मण ने, सुंदर वचन कहे श्रीराम को
काकुत्स्थ ! सेवक मैं आपका, सदैव सेवा करना चाहूँ
आप स्वयं ही वह स्थान बतायें, जहाँ आश्रम मैं बनाऊँ
सैकड़ों व अनंत वर्ष रहूँ, आपकी आज्ञा के आधीन
सीता के सामने लक्ष्मण, राम के आगे बन गये दीन
लक्ष्मण का यह वचन सुना, हुए प्रसन्न तेजस्वी श्रीराम
स्वयं ही सोचविचार उन्होंने, पसंद किया था एक स्थान
सब प्रकार गुणों से संपन्न, आश्रम बनाने के योग्य था
हाथ में ले लक्ष्मण का हाथ, श्रीरामचन्द्र ने वचन कहा
है समतल व सुंदर यह स्थान, फूले हुए वृक्षों से घिरा
यथोचित रूप से यहीं करो, निर्माण रमणीय आश्रम का
यह निकट ही पुष्करणी है, कमलों की शोभा से संपन्न
सूर्य समान कांति है जिनकी, भरी हुई है मनोहर गंध
गोदावरी नदी भी यहीं, जिसके बारे में कहा मुनि ने
जलपक्षी विचरण करते हैं, झुंड मृगों के भी दिखते हैं
यहाँ से अधिक दूर नहीं है, न ही अतीव निकट बहती है
वन मालाओं में मोरों की, मीठी बोली गूंज रही है
स्थान-स्थान पर स्वर्ण, रजत व, ताम्र रंग के पर्वत दिखते
गैरिक धातुओं से उपलक्षित, ये प्रतीत होते हैं ऐसे
झरोखे के आकार में ज्यों, नीले, पीले, श्वेत रंग की
उत्तम शृंगारिक रचना से, शोभा बढ़ती है हाथी की

