श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
द्वाविंश:सर्ग:
चौदह हज़ार राक्षसों के साथ खर-दूषण का
जनस्थान से पंचवटी की ओर प्रस्थान
शूर्पणखा द्वारा अपमानित, खर बोला कठोर वाणी में
बहना, भीषण क्रोध चढ़ आया, मुझे तुम्हारे अपमान से
संभव नहीं है धारण करना, न ही संभव इसे दबाना
ज्यों पूर्णिमा को प्रचंड हुईं, सिंधु की लहरों को रोकना
पराक्रम की दृष्टि से राम को, मैं कुछ महत्व नहीं देता
आज ही वह मारा जाएगा, क्षीण हुआ है जीवन उसका
तुम अपने अश्रु को रोको, साथ ही यह घबराहट छोड़ो
यम के लोक अभी पहुँचाता, भाई के सहित उस राम को
मेरे फरसे की मार से, मृत हो वह धरती पर गिरेगा
गरम-गरम रक्त उसका फिर, पीने के लिए तुम्हें मिलेगा
खर की बात से हो प्रसन्न, भूरि-भूरि प्रशंसा की उसकी
पहले कहे कठोर वचन, अब, उसकी सराहना करती थी
सेनापति दूषण को खर ने, युद्ध हित तैयार करवाया
चौदह हज़ार राक्षस बुलवा, आयुध, निज रथ भी मँगवाया
युद्ध से पीछे कभी न हटते, खर की आज्ञा भी न टालें
भीषण, हिंसक, क्रूर अति जो, सदा ही आगे बढ़ने वाले
ले धनुष बाण, कई खड्ग विचित्र, शक्तियाँ नाना भाँति की
आगे-आगे जाना चाहूँ, वीर सेना के राक्षसों की
उसके ऐसा कहते भर ही, सूर्य समान एक रथ आया
घोड़े जुते हुए चितकबरे, दूषण ने खर को दिखलाया
मेरुपर्वत के शिखर की भाँति, सुवर्ण मंडित बहुत ऊँचा
पहियों में भी जड़ा था सोना, रत्नों, मणियों से सजा था
रथ के ऊपर ध्वजा फहराती, भीतर अस्त्र-शस्त्र रखे थे
खर उस पर आरूढ़ हो गया, घोड़ों ने घुँघरू पहने थे
रथ, ढाल, ध्वज से संपन्न वह, बोला वह निहार सेना को
अब किस बात की देर लगाते, कर प्रस्थान, आगे निकलो
जोर-जोर से गर्जन करती, सेना जनस्थान से निकली
मुद्गर, पट्टिश, शूल,लिए फरसे, खड्ग, चक्र, तोमर, व शक्ति
परिघ भयंकर, धनुष विशाल, गदा, कटार , मूसल और वज्र
हाथों में पकड़े थे राक्षस, चल पड़े सभी ले अस्त्र-शस्त्र
कुछ देर के लिए रुका था रथ, सेना की प्रतीक्षा करता
सेना निकल गयी जब आगे, सारथि ने उसका रथ हाँका
घर-घर शब्द से उसके रथ के, सब दिशाएँ गूँज उठी थीं
बढ़ा हुआ था क्रोध भी उसका, सिंहनाद कर गर्जना की
यम समान भीषण लगता था, शत्रु वध के लिए उतावला
तेज हांकने के हित खर ने, सारथि को पुन: किया इशारा
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ।