श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
चतुर्दश: सर्ग:
पंचवटी के मार्ग में जटायु का मिलना और
श्रीराम को अपना विस्तृत परिचय देना
पंचवटी की ओर चले जब, विशालकाय एक गृध्र मिला
समझ राक्षस राम ने उससे, आप कौन हैं? परिचय पूछा
अति मधुर व कोमल वाणी में, पक्षी ने यह कहा राम से
मुझे मित्र समझो दशरथ का, उन्हें अतीव प्रेम था मुझसे
मित्र पिता का जान राम ने, उस पक्षी का सम्मान किया
तत्पश्चात अति शांत भाव से, कुल आदि का परिचय पूछा
श्रीराम का प्रश्न सुना तो, नाम का परिचय देते-देते
उत्पत्ति क्रम संपूर्ण सृष्टि का, पक्षी तब लगा था देने
पूर्वकाल के प्रजापतियों का, एक-एक कर बोला नाम
‘कर्दम’ सबसे प्रथम हुए थे, ‘विकृत’ दूसरे का हुआ नाम
तीजे ‘शेष’, चौथे ‘संश्रय’, पाँचवें ‘बहुपुत्र’ पराक्रमी
छठे ‘स्थाणु’, सातवें मरीचि, आठवें अत्रि व नौवें क्रतु जी
दसवें पुलत्सय, ग्याहरवें अंगिरा, बारहवें वरुण, तेरहवें पुलह
चौदहवें दक्ष, पन्द्रहवें विवस्वान, सोलहवें अरिष्टनेमी हुए
महातेजस्वी, प्रजापति कश्यप जी अंतिम सत्रहवें हुए
रघुनन्दन ! प्रजापति दक्ष की, साठ यशस्विनी थीं कन्याएँ
आठ सुंदरी कन्याओं का, कश्यपजी से विवाह हुआ
अदिति, दिति, दनु, और कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु, अनला
कश्यप जी ने उन्हें कहा यह, मुझ समान तेजस्वी हों जो
ऐसे समर्थ योग्य पुत्रों की, प्राप्ति होगी तुम सबको
अदिति, दिति, दनु व कालका ने, इस बात को शब्दश: ग्रहण किया
किंतु शेष चारों स्त्रियों ने, इस पर नहीं कोई ध्यान दिया
तैंतीस देवताओं ने जन्म लिया, अदिति के गर्भ से,तब
बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनी कुमार
दिति ने दैत्य नाम से प्रसिद्ध, यशस्वी पुत्रों को जन्म दिया
पूर्वकाल में सारी पृथ्वी पर, उन्होंने ही अधिकार किया
दनु ने अश्वग्रीव को जन्मा, कालका ने नरक और कालक
ताम्रा ने पाँच कन्याएँ, क्रौंची, भासी, श्येनी, शुकी, धृतराष्ट्री
क्रौंची ने उल्लुओं को जन्म , भासी ने भास पक्षियों को
श्येनी ने बाजों, गीधों, धृतराष्ट्री ने हंसों, कलहंसों को
चक्रवाक पक्षियों को भी , शुकी ने नता, नता ने विनता
क्रोधवशा ने निज गर्भ से दस कन्याओं को जन्म दिया
मृगी, मृगमंदा, हरी, भद्रमदा, मातंगी, शार्दूली, श्वेता
सुरभि, सर्व लक्षणा सुरसा, नाम थे उनके और कद्रुका
मृगी की संतानें मृग सभी, मृगमंदा के रीछ, सृमर, चमर
भद्रमदा की पुत्री इरावती, जिसका पुत्र है ऐरावत
हरी की तीन संतानें हैं, सिंह, और वानर, लंगूर
शार्दूली ने व्याघ्र को जन्मा, मातंगी ने संतानें गज
श्वेता ने दिग्गज को जन्मा, सुरभि ने रोहिणी, गंधर्वी
रोहिणी से गौएँ उपजी, गंधर्वी अश्वों की माँ हुई
सुरसा से नाग उपजे थे, क़द्रू ने जन्मा पन्नगों को
मनु ने ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र आदि मानवों को
मुख से ब्राह्मण, हृदय से क्षत्रिय, उरुओं से वैश्यों का जन्म
दोनों पैरों से शूद्रों का, अनला से फल वाले तरुवर
कद्रू ने सहस्र नागों को, जो धरती को धारण करते
विनता के दो पुत्र हुए, गरुड़ और अरुण नाम हैं जिनके
उन्हीं अरुण से मैं जन्मा, सम्पाति मेरे बड़े भाई भी
मेरा नाम जटायु रखा, राम ! माता का नाम है श्येनी
आप अगर चाहते तो मैं, निवास में बन सकता सहायक
मृगों, राक्षसों से सेवित यह, दुर्गम अरण्य बहुत भयानक
लक्ष्मण सहित अगर आप, पर्णशाला से जाएँगे बाहर
देवी सीता की रक्षा में, रहूँगा मैं सदा ही तत्पर
सुना राम ने गले लगाया, नत मस्तक हो सम्मान किया
पिता का मित्र बना था कैसे, उनसे सारा वृत्तांत सुना
सीता रहेंगी संरक्षण में, यह बात मान ली राम ने
लक्ष्मण और जटायु के साथ, पंचवटी की ओर चल दिये
शत्रु समझकर कर दें दग्ध, ऋषि द्रोही कठोर राक्षसों को
राम यही चाहते जैसे, आग जलाती है पतिंगों को
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ।

