तुमने जो प्रेम सुधा सौंपी
रच बस गयी मेरे कण-कण में,
उस प्रीत माधुरी को पीने
तुम आये हो मेरे मन में !
अंतर्मन में है गूंज रहा
एक राग मधुर बन कर गुंजन,
उस स्वरलहरी को सुनने ही
आये हो तुम बनकर धड़कन !
नयनों में छवि इस सृष्टि की
जो प्रेम तत्व से रची गयी
उस दृश्य अनोखे को लखने
तुम आये हो मेरे उर में !
जो छिपा रहा जग आँखों से
जो व्यक्त कभी न हो पाया,
वह गीत मधुर, रसमय तुमको
अर्पित है आज, प्रभु मेरे !
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Monday, December 27, 2010
Friday, December 24, 2010
भावांजलि
रंग भरा यह जग सारा है
बादल रंगीं, पंछी रंगीं
जल में सूर्य रंग बरसाता,
रंग हमें आनन्दित करते !
नन्हें बालक मुग्ध खेलते
निरख निरख प्रभु हर्षित होता !
लहरें तरल स्वर बिखरातीं
सर-सर-सर-सर गीत सुनाते,
पत्ते वन-वन डोला करते
जैसे लोरी शिशु हों सुनते !
तुमसे मिलकर मिटी दूरियाँ
अपने हो गए सभी पराये,
अनजाने जाने से लगते
परिचय तुमने दिये कराए !
हो तुम जन्मों के चिर-परिचित
जीवन में तुम ! तुम्हीं मरण में,
दूरस्थ निकट तुम ला देते
स्वयं प्रतिपल साथ रहे मेरे !
बादल रंगीं, पंछी रंगीं
जल में सूर्य रंग बरसाता,
रंग हमें आनन्दित करते !
नन्हें बालक मुग्ध खेलते
निरख निरख प्रभु हर्षित होता !
लहरें तरल स्वर बिखरातीं
सर-सर-सर-सर गीत सुनाते,
पत्ते वन-वन डोला करते
जैसे लोरी शिशु हों सुनते !
तुमसे मिलकर मिटी दूरियाँ
अपने हो गए सभी पराये,
अनजाने जाने से लगते
परिचय तुमने दिये कराए !
हो तुम जन्मों के चिर-परिचित
जीवन में तुम ! तुम्हीं मरण में,
दूरस्थ निकट तुम ला देते
स्वयं प्रतिपल साथ रहे मेरे !
Wednesday, December 22, 2010
भावांजलि
यह भव सागर, तट पर जिसके
इक भारी मेला लगा हुआ,
ऊपर नीला आकाश तना
नीचे लहरों का खेल चला !
नाविक निकले बैठ नाव पर
मोती, माणिक, मूंगा पाने,
नन्हें बालक खेलें तट पर
अविरत खेल कौन सा जाने ?
शिशु की मुंदी हुई पलकों पर
चंदा की चाँदनी छायी,
दूर देश में परी लोक है
नींद शिशु की वहीं से आयी !
नाजुक अधरों की मुस्कानें
शरदकाल में जन्मी होंगी,
कोमल रेशमी काया तन की
माँ की रूप माधुरी लायी !
अनिता निहालानी
२२ दिसंबर २०१०
इक भारी मेला लगा हुआ,
ऊपर नीला आकाश तना
नीचे लहरों का खेल चला !
नाविक निकले बैठ नाव पर
मोती, माणिक, मूंगा पाने,
नन्हें बालक खेलें तट पर
अविरत खेल कौन सा जाने ?
शिशु की मुंदी हुई पलकों पर
चंदा की चाँदनी छायी,
दूर देश में परी लोक है
नींद शिशु की वहीं से आयी !
नाजुक अधरों की मुस्कानें
शरदकाल में जन्मी होंगी,
कोमल रेशमी काया तन की
माँ की रूप माधुरी लायी !
अनिता निहालानी
२२ दिसंबर २०१०
Tuesday, December 21, 2010
भावांजलि
गीतों के शब्दों में घुलमिल
सुख की धार पिघल जाये,
धरती हँसती, हँसता अम्बर
स्वर भीतर के हँस बह जाएँ !
गरजें बादल तो लगे हँसे
विद्युत भी चमके मुस्काए,
आनंद भरे कण - कण में अब
पीड़ा में भी हम हरषाएं !
जीवन तो सुख का स्रोत बने
मृत्यु भी हमें हँसा जाये !
ओ चितचोर ! प्रभु मेरे
डोल रही है गूंज प्रेम की
छन पत्तों से आये उजाला ,
मेघ उड़ें नभ में अलसाये
बहता समीर तन सहलाए,
दे रहे गवाही मिल ये सब
ओ चितचोर ! मुझे बतलायें
तुम मुझसे मिलने नित आते
मन मेरा लख झुक झुक जाये !
सुख की धार पिघल जाये,
धरती हँसती, हँसता अम्बर
स्वर भीतर के हँस बह जाएँ !
गरजें बादल तो लगे हँसे
विद्युत भी चमके मुस्काए,
आनंद भरे कण - कण में अब
पीड़ा में भी हम हरषाएं !
जीवन तो सुख का स्रोत बने
मृत्यु भी हमें हँसा जाये !
ओ चितचोर ! प्रभु मेरे
डोल रही है गूंज प्रेम की
छन पत्तों से आये उजाला ,
मेघ उड़ें नभ में अलसाये
बहता समीर तन सहलाए,
दे रहे गवाही मिल ये सब
ओ चितचोर ! मुझे बतलायें
तुम मुझसे मिलने नित आते
मन मेरा लख झुक झुक जाये !
Friday, December 17, 2010
भावांजलि
प्रीत में मिटकर जीवन पाया
मृत्यु को निज दास बनाया,
प्रियतम ने कुछ भेद बताए
जीवन उत्सव सहज बनाया !
न माँगा न कुछ दिया परिचय
बस मौन में ही सब कह डाला,
पथिक प्यासा वह बन आया
रह गयी चकित पनघट बाला !
मृत्यु को निज दास बनाया,
प्रियतम ने कुछ भेद बताए
जीवन उत्सव सहज बनाया !
न माँगा न कुछ दिया परिचय
बस मौन में ही सब कह डाला,
पथिक प्यासा वह बन आया
रह गयी चकित पनघट बाला !
Thursday, December 16, 2010
भावांजलि
आहट जब कदमों की आयी,
झोंका पवन का होगा, माना
तुमने जब पुकार लगाई,
हुआ नींद में भ्रम था जाना !
हे प्रभु ! लौट गए जब तुम
पड़ा था कितना पछताना,
चौंक गयी मैं, पुनः आये तुम
स्वागत का न किया ठिकाना,
फटेहाल, सूने आंगन में
तुम्हें पड़ा था बैठाना !
प्रेम राह में मिटना होगा
फूलों की यह डगर नहीं है
तलवारों पर चलना होगा
बस मधुमय यह सफर नहीं है !
झोंका पवन का होगा, माना
तुमने जब पुकार लगाई,
हुआ नींद में भ्रम था जाना !
हे प्रभु ! लौट गए जब तुम
पड़ा था कितना पछताना,
चौंक गयी मैं, पुनः आये तुम
स्वागत का न किया ठिकाना,
फटेहाल, सूने आंगन में
तुम्हें पड़ा था बैठाना !
प्रेम राह में मिटना होगा
फूलों की यह डगर नहीं है
तलवारों पर चलना होगा
बस मधुमय यह सफर नहीं है !
Tuesday, December 14, 2010
भावांजलि
तुमने भर दी खाली झोली
कुछ भी न, मैंने तुम्हें दिया,
तुम दाता ! ऐसे हो औघड़
मैंने कुछ देकर बचा लिया,
क्यों न सब दे पायी मैं
जब आये तुम मेरे द्वारे,
तुमने प्रेम अपार बहाया
न देखा कृपण हृदय को मेरे !
मैंने दिया निमंत्रण तुमको
मेरे हृदय सदन में आना,
पर तुम आये तब थी बेसुध
वह आना मैंने न जाना,
तुमने भेजे दूत, उन्हें भी
लौटा दिया नहीं पहचाना !
कुछ भी न, मैंने तुम्हें दिया,
तुम दाता ! ऐसे हो औघड़
मैंने कुछ देकर बचा लिया,
क्यों न सब दे पायी मैं
जब आये तुम मेरे द्वारे,
तुमने प्रेम अपार बहाया
न देखा कृपण हृदय को मेरे !
मैंने दिया निमंत्रण तुमको
मेरे हृदय सदन में आना,
पर तुम आये तब थी बेसुध
वह आना मैंने न जाना,
तुमने भेजे दूत, उन्हें भी
लौटा दिया नहीं पहचाना !
Monday, December 13, 2010
भावांजलि
उस दिन स्वप्न से जैसे जगकर
हुआ चकित मन तुमसे मिलकर !
ज्यों ही झलक मिली मूरत की
टूटी जन्मों की बेहोशी !
मुस्कान तुम्हारी मोहित कर
मेरी सुधबुध ले गयी हर !
बरसायी अकारण करुणा तुमने,
ओ स्वामी करुणा वरुणालय !
दिया अहैतुक प्रेम तुम्हीं ने
प्रेमसरोवर ! ओ प्रेमालय!
हुआ चकित मन तुमसे मिलकर !
ज्यों ही झलक मिली मूरत की
टूटी जन्मों की बेहोशी !
मुस्कान तुम्हारी मोहित कर
मेरी सुधबुध ले गयी हर !
बरसायी अकारण करुणा तुमने,
ओ स्वामी करुणा वरुणालय !
दिया अहैतुक प्रेम तुम्हीं ने
प्रेमसरोवर ! ओ प्रेमालय!
Thursday, December 9, 2010
भावांजलि
बीती रात्रि प्रतीक्षा में
तुम कहाँ रहे प्रियतम मेरे
है सुंदर प्रभात का उत्सव
उनींदे नयन हैं मेरे !
टूटे मेरी नींद युगों की
मेरी पलकें तभी खुलें,
सम्मुख हो मुखड़ा उसका
उस ज्योति से चैतन्य मिले !
हम चला करें अपनी धुन में
खोये रहते निज उलझन में
होता प्रभात, पंछी गाते !
नदिया बहती, जंगल हँसते
उड़ते बादल, उपवन खिलते !
पर हम न जाने किस दुःख को
भर उर में गीत नहीं गाते,
न मुस्काते !
वह हमें बुलाता है हर पल,
उसकी पुकार भी पत्थर दिल
हम, सुनी अनसुनी कर जाते!
तुम कहाँ रहे प्रियतम मेरे
है सुंदर प्रभात का उत्सव
उनींदे नयन हैं मेरे !
टूटे मेरी नींद युगों की
मेरी पलकें तभी खुलें,
सम्मुख हो मुखड़ा उसका
उस ज्योति से चैतन्य मिले !
हम चला करें अपनी धुन में
खोये रहते निज उलझन में
होता प्रभात, पंछी गाते !
नदिया बहती, जंगल हँसते
उड़ते बादल, उपवन खिलते !
पर हम न जाने किस दुःख को
भर उर में गीत नहीं गाते,
न मुस्काते !
वह हमें बुलाता है हर पल,
उसकी पुकार भी पत्थर दिल
हम, सुनी अनसुनी कर जाते!
Wednesday, December 8, 2010
भावांजलि
युग-युग से तुम आते हो,
प्रतिदिन, प्रतिक्षण निज आहट से
उर आंगन को गुंजाते हो !
सुखमय दिवस, रात्रि दुखमय
स्पर्श तुम्हारा ही सहलाये,
चहुँ ओर संगीत तुम्हारा
गूंजे नित संदेशा लाए !
आज ही वह आने वाला है !
कोई कहकर गया कान में,
मीत वही, कह रही सुगंध
डोलें पात-पात पवन सँग
ऑंखें भी प्रतीक्षा में रत !
प्रतिदिन, प्रतिक्षण निज आहट से
उर आंगन को गुंजाते हो !
सुखमय दिवस, रात्रि दुखमय
स्पर्श तुम्हारा ही सहलाये,
चहुँ ओर संगीत तुम्हारा
गूंजे नित संदेशा लाए !
आज ही वह आने वाला है !
कोई कहकर गया कान में,
मीत वही, कह रही सुगंध
डोलें पात-पात पवन सँग
ऑंखें भी प्रतीक्षा में रत !
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