श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
षष्ठ: सर्ग:
वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचारों से अपनी रक्षा के लिए श्रीरामचंद्र जी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना
रक्षक आप बनें हमारे, वानप्रस्थ समूह से आते
पंपा, तुंगभद्रा तट पर, मंदाकिनी के तट पर रहते
चित्रकूट पर्वत के किनारे, राक्षसों से पीड़ित होते
उनसे अपनी रक्षा के हित, शरण आपकी लेने आये
नहीं कोई आपसे बढ़कर, इस आपद से हमें बचायें
उन तापसी मुनियों के मुख से, विनय सुनकर कहा राम ने
मुनियों का आज्ञा पालक हूँ, आप प्रार्थना करें न ऐसे
पिता की आज्ञा पालन हित, मैं इस वन में प्रवेश करूँगा
आपकी सेवा के अवसर से, खुद को मैं धन्य मानूँगा
करूँ सिद्ध प्रयोजन आपका, दैव वश मैं यहाँ आ पहुँचा
सेवा का अवसर मिला है, वनवास शुभ फलदायक होगा
मुनियों से जो शत्रुता रखें, उनका मैं संहार चाहता
आप सभी महर्षिगण देखें, भाई सहित पराक्रम मेरा
इस प्रकार देकर आश्वासन, धर्मशील श्रीराम व लक्ष्मण
तपस्वी महात्मा जनों के साथ, गये सुतीक्ष्ण मुनि के निकट
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्डमें
छठा सर्ग पूरा हुआ।
