Friday, January 15, 2021
भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम पर जाने का मार्ग जानना
Friday, January 8, 2021
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
एकनवतितम: सर्ग:
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
पिठर, घड़े, छोटे-बड़े मटके, सुस्वादु दही से भरे थे
केसर मिश्रित पीतवर्ण के, तक्र के तालाब भरे थे
जीरा, सोंठ मसालों से, मिश्रित तक्र के कुंड वहाँ थे
दूध, दही के थे तालाब, शक्कर के भी ढेर लगे थे
स्नान के थे जो भी अभिलाषी, उनको घाटों पर नदी के
पिसे आंवले, चूर्ण सुगन्धित, रखे दिखे नाना पदार्थ थे
ढेरों, दातुन, सफेद कूँचे के, चन्दन भी विद्यमान थे
स्वच्छ दर्पण, वस्त्र अनेकों, खड़ाऊं और जूते भी थे
काजल सहित कजरौटे, कंघे, कूर्च, छत्र, धनुष पड़े थे
कवच, शय्या, आसन आदि भी, वहाँ दृष्टिगोचर होते थे
गधे, ऊंट, हाथी, घोड़ों हित, स्वच्छ कई जलाशय भरे थे
जिनके घाट उतरने योग्य, कमल और उत्पल भी खिले थे
निर्मल था जल गगन समान, तैरा जा सकता था जिसमें
पशुओं के भोजन हेतु भी, कोमल घास के ढेर वहाँ थे
महर्षि भारद्वाज के द्वारा, अनिवर्चनीय अतिथि सत्कार
अद्भुत तथा स्वप्न समान था, जैसे देवों का हो विहार
सभी हुए आश्चर्यचकित वे, सुख से बीती थी वह रात
ततपश्चात नदी, गन्धर्व, अप्सराओं ने किया प्रस्थान
हुआ सवेरा तब भी वे सब, उसी तरह उन्मत्त लग रहे
अंगों पर चंदन का लेप, पुष्पहार जहाँ-वहाँ पड़े थे
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.
Sunday, January 3, 2021
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
एकनवतितम: सर्ग:
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
इक्ष्वाकु कुल योद्धाओं की, सवारी में जो पशु लगे थे
गन्ने के टुकड़े, मीठा लावा, सेवक उन्हें खिला रहे थे
घुड़ सईस व हाथीवान को, निज वाहनों का भान नहीं था
सारी सेना प्रमत्त हुई थी, हर कोई आनंदमग्न था
तृप्त हुए सैनिक आपस में, एक-दूसरे से कहते थे
रहें भरत-राम कुशल से, नहीं अयोध्या हम जायेंगे
साथ भरत जो जन आये थे, हर्ष से फूले नहीं समाते
कहने लगे यही स्वर्ग है, हँसते, गाते, नृत्य करते थे
अमृत सम दिव्य भोजन करके, पुनः खाने की इच्छा जगती
दासियाँ व स्त्रियां सैनिकों की, नूतन वस्त्र पहन हर्षित थीं
हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग, सभी पक्षी तृप्त थे
कोई भूखा, मलिन नहीं था, वस्त्र सभी के शुभ्र श्वेत थे
अजवाइन मिला बनाये गए, वराही कन्द से बने थे
आम आदि फलों के रसों में, पके हुए कई व्यंजन थे
सुगन्ध युक्त रसवाली दालें, श्वेत भात से पात्र भरे थे
आश्चर्य से भर सबने देखा, फूलों से जो सजे हुए थे
वन के निकट जितने कुएँ थे, उनमें गाढ़ी खीर भरी थी
गौएँ कामधेनु हो गयीं, पेड़ों से मधु वर्षा होती थी
निषाद आदि निम्न वर्ग हित, मधु से भरी बावड़ियाँ प्रकटीं
तपे हुए कुंड में पकाये, स्वच्छ मांस तटों पर सजे थे
थे सहस्त्रों स्वर्ण के पात्र, व्यंजन पात्र भी लाखों में थे
एक अरब थालियाँ रखी थीं, ढेरों व्यंजनों के संग्रह थे
Friday, December 25, 2020
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
एकनवतितम: सर्ग:
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
ब्रह्मर्षि भरद्वाज कृपा से, चूने से जो पुते हुए थे
ब्रह्माजी की भेजी हुईं जो, दिव्य गहनों से आभूषित
बीस हजार दिव्यांगनाएँ, उसी घड़ी में हुईं उपस्थित
सुवर्ण, मणि, मुक्ता, मूंगों से, विभूषित अन्य बीस हजार
भेजा था कुबेर ने उनको, स्पर्श से जिनके हो उन्माद
इसके सिवा नन्दन वन से, बीस हजार अप्सराएं आयीं
गोप, तुम्बुररू व नारद, गन्धर्वों ने थी तान लगायी
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, अप्सरा, पुण्डरीका व वामना भी
करने लगीं नृत्य चारों ये, पाकर आज्ञा मुनिराज की
देवों के उद्यान में मिलते, व चैत्ररथ वन में जो फूल
प्रयाग में वे पड़े दिखाई, मुनि भरद्वाज के अनुकूल
बेल के वृक्ष मृदंग बजाते, शम्या ताल देते बहेड़े
नृत्य कर रहे पेड़ पीपल के, भरद्वाज मुनि के तप से
देवदारु, ताल, तिलक, तमाल, आदि बनकर कुबड़े व बौने
भरत की सेवा में आये, पादप सभी वे बड़े हर्ष से
शिंशपा, आमलकी, जम्बू वृक्ष, मालती, मल्लिका लताएं
नारी रूप धार कर आयीं, सैनिकों को आवाज लगाएं
मधु का पान करो, यह खाओ, फलों के गूदे प्रस्तुत हैं
जिसकी जो इच्छा हो पाओ, यह अति सुस्वादु खीर भी है
सात-आठ तरुणियाँ मिलकर, एक-एक को नहलाती थीं
अतिथियों का करती सत्कार, स्वादिष्ट पेय पिलाती थीं
पश्चात वाहन रक्षकों ने, पशुओं को दाना घास दिया
हाथी, घोड़े, ऊंट, बैलों को, समुचित सभी आहार दिया
Thursday, September 10, 2020
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
एकनवतितम: सर्ग:
भरद्वाज मुनि के द्वारा सेनासहित भरत का दिव्य सत्कार
उत्तम व्रत का पालन करते, तेज युक्त भरद्वाज मुनि ने
आवाहन किया उन सबका, हो सम्पन्न एकाग्र चित्त से
पूर्व दिशा में दो हाथ जोड़कर, मन ही मन फिर ध्यान किया
एक-एक कर सभी देवता, आ पहुँचे ज्यों ही स्मरण किया
मलय व दर्दुर पर्वत को छू, बही पवन सुख देनेवाली
दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई, दुंदुभियों का शब्द सुनायी
नृत्य, गान, वीणा के स्वरों से, धरती व आकाश भर गए
कोमल, मधु, लयगुण से सम्पन्न, कर्ण प्रिय था शब्द वह दिव्य
विश्वकर्मा का वास्तु कौशल, भरत की सेना ने निहारा
समतल हो गयी भूमि दूर तक, उग आयी उस पर दूर्वा
आम, बेल, बिजौरा, आंवला, भांति-भांति के वृक्ष लगे थे
चैत्ररथ वन आ पहुँचा था, भरा भोग की सामग्रियों से
तटवर्ती वृक्षों से शोभित, नदियां भी वहाँ आ पहुंची
उज्ज्वल घर, चबूतरे बन गए, निर्मित हुए नगर द्वार भी
हाथी, घोड़ों के रहने हित, शालाएं भी बनीं सुविशेष
अट्टालिकाएं, महल विशाल, लखते सब थे जिन्हें अनिमेष
राजा के परिवार हेतु इक, दिव्य भवन था श्वेत मेघ सा
सुंदर द्वार, सजा फूल से, दिव्य सुगन्धित जल से सींचा
चौकोना व अति विशाल था, सोने, बैठने लिए थे स्थान
भोजन, रस, वस्त्र सब कुछ थे, हरेक प्रकार के दिव्य पदार्थ
तरह-तरह के अन्न पात्र थे, सब प्रकार के आसन भी थे
सोने हित सुंदर शय्याएँ, किया प्रवेश भरत ने उसमें
गए पुरोहित और मंत्री, भवन देखकर हुए आनंदित
राज सिंहासन, चँवर छत्र भी, रखे हुए थे वहाँ सज्जित
श्रीराम की भरे भावना, प्रदक्षिणा की भरत ने उनकी
सिंहासन पर राम विराजते, यही सोच वन्दना भी की
चँवर हाथ में लेकर फिर वे, मंत्री के आसन पर बैठे
पुरोहित, मंत्री, सेनापति भी, यथोचित स्थानों पर बैठे
दो घड़ी में हुईं उपस्थित, नदियां भरत की सेवा में फिर
भरद्वाज मुनि के तप से, जल के स्थान पर जिनमें थी खीर






