Tuesday, May 19, 2020

भरत का सेनासहित गंगा पार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


एकोननवतितम: सर्ग:
भरत का सेनासहित गंगा पार करके भरद्वाज के आश्रम पर जाना 

श्रृंगवेरपुर में गंगा तट पर, रात्रि बिताकर भरत जगे 
गुह को शीघ्र बुलाकर लाओ, शत्रुघ्न को उठाकर बोले 

श्रीराम का चिंतन करता था, सोया नहीं आपकी भांति 
कह रहे थे शत्रुघ्न भरत से, आ पहुँचा था तब गुह वहीं 

हाथ जोड़कर उनसे बोले, सुख से बीती आपकी रात ? 
सेना सहित रहे बिना कष्ट के,बन्धु सहित स्वस्थ हैं आप  

गुह के स्नेहिल वचन सुने जब, कहा भरत ने तब यह उससे 
सुख से बीती रात हमारी, बड़ा सत्कार किया आपने 

अब व्यवस्था करें कुछ ऐसी, मिलकर ये मल्लाह तुम्हारे 
बहुत सी नौकाएं लाकर, गंगा से हमको पार उतारें

भरत का यह आदेश सुना तो, जाकर बोला गुह नगर में 
नौकाओं को घाट पर लाओ, सेना को हम पर उतारें 

राजा की आज्ञा मानकर, मल्लाह सभी उठ खड़े हुए 
पांच सौ नौकाएं ले आये, कर एकत्र चारों ओर से 

स्वस्तिक के चिन्हों से अलंकृत, अति मजबूत नौकाएं भी थीं 
बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटकीं थी, पताकाएं फहराती थीं  

कल्याणमयी नाव गुह लाया, जिसमें बिछे श्वेत कालीन 
मांगलिक शब्द भी होता था, स्वस्तिक नाम वाली नाव  पर 

पहले पुरोहित व गुरु बैठे, तत्पश्चात भरत व शत्रुघ्न 
कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी, अन्य रानियां हुईं आसीन  

गाड़ियाँ व अन्य सामग्री, लादी गयीं अन्य नावों पर 
सैनिक निज सामान उठाते, करने लगे महान रौरव  

पताकाएं फहराती थीं, सब पर कुशल मल्लाह बैठे  
तीव्र गति से वे उन सबको, उस पार लेकर जा रहे थे 

 कुछ पर केवल स्त्रियां ही थीं, कुछ नौकाओं पर अश्व सवार
कुछ पर खच्चर, बैल लदे थे, कुछ रत्नों को ले जातीं पार

दूसरे तट पर पहुँचाकर, जब वे नावें लौट रही थीं 
प्रदर्शन करते थे गतियां, मल्लाह बंधु जल में उनकी 

वैजयंती पताकाओं से सजे, हाथी नदी पर करते थे 
पँखधारी पर्वतों के समान, उस समय वे प्रतीत होते थे 

कितने ही जन नावों पर थे, कितने बांस के बेड़ों पर थे 
कुछ  कलशों या घड़ों के द्वारा, कुछ तैर कर पार जाते थे 

इस प्रकार वह  पावन सेना, गंगा के उस पार उतर गयी 
 मैत्र नामक मुहूर्त में स्वयं, प्रयागवन की ओर बढ़ गयी 

वहाँ पहुँच कुमार भरत, विश्राम की आज्ञा सेना को दे 
ऋत्विज व राजसदस्यों संग, भरद्वाज के दर्शन हित गए 

देवपुरोहित भारद्वाज के, आश्रम पर भरत जी पहुँचे
दर्शन किये पर्णशाला सहित, रमणीय व विशाल वन के  

  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.
 

Thursday, April 30, 2020

भरत का स्वयं वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


अष्टाशीतितम: सर्ग: 

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना 


यह है शय्या श्रीराम की, बदलीं होंगी यहीं करवटें
दबा हुआ तृण पड़ा यहां पर, इस कठोर वेदी पर सोये 

ऐसा लगता शुभ लक्षणा, सीता पहन आभूषण सोयीं
यत्र-तत्र बिखरे स्वर्ण कण, सटे हुए धागे भी रेशमी 

पति की शय्या कैसी भी हो, सुखदायिनी साध्वी को है 
सुकुमारी बाला सीता को, दुःख का लेशमात्र नहीं है 

व्यर्थ हुआ है जीवन मेरा, अति कठोर हूँ बड़ा अभागा 
जिसके कारण ही श्रीराम को, सीता संग वनवास मिला 

चक्रवर्ती सम्राट के कुल में, जन्म हुआ है श्रीराम का 
सुख देते, सबका हित करते, प्रिय लगता है दर्शन जिनका 

नीलकमल समान तन श्यामल, नयन लाल, अधिकारी सुख के 
वे रघुनाथ भू पर सोते, परित्याग निज राज्य का करके 

उत्तम लक्षण वाले लक्ष्मण, धन्य और बड़भागी अति हैं 
संकटकाल में निकट राम के, उनकी नित सेवा करते हैं 

हुईं कृतार्थ विदेहनन्दिनी, किया अनुसरण अपने पति का
संशय में तो हम सब ही हैं, छूट गया संग श्रीराम का 

महाराज चले गए स्वर्ग को, हो गए श्रीराम वनवासी 
बिन नाविक की नौका जैसी, सूनी सी लगती यह धरती 

वन में वास करें वह चाहे, यह वसुधा उनसे ही सुरक्षित 
कोई शत्रु जिसे मन से भी, लेना नहीं चाहे है रक्षित 

इस समय अयोध्या नगरी की, चारदीवारी खुली हुई है 
हाथी, घोड़े बंधे नहीं, नगरद्वार भी बन्द नहीं है 

पूर्ण अरक्षित राजधानी है, सेना में उत्साह नहीं है 
है आवरण रहित यह नगरी, अति संकट में पड़ी हुई है 

शत्रु ग्रहण नहीं करते लेकिन, विष मिश्रित भोजन की भांति
श्रीराम के बाहुबल से ही, इसकी रक्षा होती रहती 

भूमि पर मैं भी सोऊँगा, आज से वल्कल ही धारूँगा
फल-मूल का भोजन करके, जटा ही धारण किये रहूँगा 

मैं ही वहां निवास करूँगा, जितने दिन वनवास के बाकी
श्रीरामचन्द्र  की प्रतिज्ञा भी, नहीं असत्य सिद्ध तब होगी 

शत्रुघ्न मेरे साथ रहंगे, राम अयोध्या लौटेंगे
ब्राह्मण गण अभिषेक करेंगे, क्या दैव यह सफल करेंगे 

उनके चरणों पर सिर रखकर, मनाने का प्रयत्न करूंगा 
लौटने को यदि हुए न राजी, मैं भी वहीँ निवास करूँगा


  इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठ्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Tuesday, April 21, 2020

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार



 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम् अयोध्याकाण्डम्


अष्टाशीतितम: सर्ग: 

श्रीराम की कुश शैया देखकर भरत का शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल वस्त्र और जटाधारण करके वन में रहने का विचार प्रकट करना
सुनीं ध्यान से भरत ने सारी, निषादराज की बातें उस क्षण
मंत्रियों सहित निकट आये फिर, इंगुदी वृक्ष का किया निरीक्षण 

 कहा उहोंने माताओं से, राम ने रात्रि बितायी यहीं पर 
हुआ विमर्दित उनके अंगों से, यही कुश समूह सोये जिस पर  

महाराजों के कुल में उत्पन्न, राजा दशरथ के पुत्र यह 
धरती पर शयन करने के, नहीं योग्य हैं किसी तरह वह 

पुरुषसिंह श्रीराम सदा ही, उस पलंग पर सोते आए 
कोमल मृगचर्म की चादर, सुंदर बिछौनों से जो सजाये  

कैसे सोते होंगे भू पर, सदा रहे हैं महलों में ही  
स्वर्ण, रजत के फर्श हैं जिनके, पुष्पों से शोभा है जिनकी 

श्रेष्ठ भवन व अट्टालिकाएं, श्वेत बादलों सी जो उज्ज्वल 
चन्दन, अगुरु से सुगंधित, शुक समूहों का होता कलरव

शीतल कपूर की सुवास से, स्वर्ण सुशोभित दीवारों पर
सोते होंगे कैसे श्रीराम, वन में कुश की शैया पर 

गीतों और वाद्य ध्वनियों से, जो सदा जगाये जाते थे
आभूषण की झंकार सहित, मृदङ्ग के उत्तम शब्दों से 

समय-समय पर कई वंदीजन जिनकी, स्तुति किया करते थे 
सूत और मागध भी जिनकी, वन्दना  कर जिन्हें जगाते थे 

कैसे सोते होंगे भूमि पर, शत्रुहन्ता श्रीराम वह
यह विश्वास के योग्य नहीं है, सच नहीं मुझको लगता यह 

हुआ अवश्य मोहित मन मेरा, जैसे यह कोई स्वप्न है
काल समान नहीं कोई देव, जिसके कारण यह सम्भव है 

काल के प्रभाव के कारण, विदेहराज की परम् सुंदरी 
सीता भी भू पर सोतीं, पुत्रवधू महाराज दशरथ की 

Monday, March 30, 2020

भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

सप्ताशीतितिमः सर्गः

भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुखी होना, होश में आने पर भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना और गुह का उन्हें सब बातें बताना 

जटा धारण के विषय में जब, गुह के वचन सुने भरत ने
श्रीराम ने जटा भी रख ली, सोचा अब शायद ही लौटें

सुकुमार होने के साथ ही, बलशाली भी अति भरत थे 
बड़ी भुजाएं, नयन विशाल, सिंह समान कंधे थे उनके 

धैर्य धारण किया कुछ पल तक, सुनकर भरत ने गुह की बात 
अंकुश - बिद्ध हुए गज सम फिर,  हुए मूर्छित पाकर आघात 

गुह के चेहरे का रंग उड़ा, मूर्छित हुआ देख भरत को 
भूकम्प में मथित वृक्ष सम,  हो उठा था अतीव व्यथित जो

शत्रुघ्न बैठे थे निकट ही,  भरत को हृदय से लगाया 
सुध-बुध वह भी खो बैठे अब, पीड़ित होकर शोक मनाया 

माताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं, दुर्बल और दीन लगती थीं 
पतिवियोग के दुःख से पीड़ित, उपवास से दुर्बल हुई थीं 

घेर लिया भरत को सबने, भूमि पर जो पड़े हुए थे 
कौसल्या हुईं अति कातर, लिया भरत को निज गोद में 

जैसे कोई गाय वत्सला, निज बछड़े को गले लगाती 
शोक से आकुल तपस्विनी ने, रोते हुए बात यह पूछी 

रोग तो कोई नहीं सताता, कहो पुत्र, तुम्हारे तन को  
अब इस राजवंश का जीवन, है अधीन तुम्हारे ही तो 

तुम्हें देखकर ही जीती हूँ, राम-लक्ष्मण गए हैं वन को 
स्वर्गवासी हुए महाराजा, रक्षक एक तुम्हीं तो हो 

सत्य कहो क्या तुमने कोई, अप्रिय बात सुनी है कोई 
लक्ष्मण के बारे में या फिर, सीता संग वन गए राम की 

दो घड़ी में स्वस्थ हुआ चित्त, कहा भरत ने रोकर माँ से 
नहीं सुनी ऐसी कोई बात, पूछा फिर निषादराज से 

उस दिन, रात कहाँ ठहरे थे, भाई राम, लक्ष्मण व सीता 
कैसा था बिछौना उनका, क्या भोजन में ग्रहण किया था 

हुआ प्रसन्न प्रश्न सुन ऐसे, गुह ने सारी बात सुनायी 
कैसे राम के आने पर, भांति-भांति सामग्री पहुँचाई

सत्य पराक्रमी श्रीराम ने, सभी वस्तुएं स्वीकारी थीं 
किन्तु स्मरण कर क्षत्रिय धर्म का, ग्रहण नहीं कर लौटा दी थीं   

फिर उन महात्मा राम ने, हम सब को यह समझाया था 
हमें किसी से कुछ नहीं लेना, अपितु सदा देना ही आता 

सीता सहित श्रीरामचन्द्र ने, उस रात उपवास ही किया 
लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उस जल को ही पीया

ग्रहण किया तब शेष बचा जल, लक्ष्मण ने उपासना करके 
सन्ध्योपासना भी की थी, एकाग्रचित्त से उन तीनों ने 

सुंदर एक बिछौना बनाया, कुश लाकर तब लक्ष्मण ने
सीता सहित राम विराजे, चरण पखारे उन दोनों के 

यही इंगुंदी वृक्ष की जड़ है, यही  बिछौने का तृण है 
जहाँ किया था शयन उस रात, राम और सीता दोनों ने 

भरे हुए बाणों से तरकस, बाँध पीठ पर वीर लक्ष्मण 
अँगुलियों  में दस्ताने पहने, पहरा देते रहे रात भर 

मैं भी धनुष-तीर लेकर तब, लक्ष्मण संग आ खड़ा हुआ 
निद्रा व आलस्य त्याग जो, थे सावधान, मैं जगा रहा 

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Wednesday, August 21, 2019

निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

षडशीतितिमः सर्गः


निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन

वनचारी निषादराज गुह ने, अतुलित शक्तिशाली भरत से
वर्णन किया तब सद्भाव का, राजकुमार वीर लक्ष्मण के

अधिक काल तक रहे जागते, भाई की रक्षा के हित वे
धनुष-बाण ले जब खड़े थे, कहे वचन ये मैंने उनसे

सुखदायिनी शय्या है यह, सुखपूर्वक सो जाइए इस पर
श्रीराम की रक्षा के हित, हम सभी जागेंगे रात भर

हम वनवासी दुःख सह सकते, पर पले-बढ़े हो तुम सुख में
फिर श्रीराम से बढ़कर दूजा, प्रिय नहीं कोई मुझे जग में

श्रीराम की कृपा प्रसाद से, हर पुरुषार्थ पाने की आशा
बन्धु-बांधवों सहित धनुष ले, श्रीराम की करूँगा रक्षा

इस वन में विचरण करने से, कुछ भी छुपा नहीं है मुझसे
चतुरंगिणी सेना का भी, अच्छी तरह सामना कर सकते

धर्म पर ही थी दृष्टि जिनकी, कहा लक्ष्मण ने विनय पूर्वक
जब देवी सीता संग श्रीराम, शयन कर रहे हैं भूमि पर 

संभव नहीं  नींद में सोना, मेरे हित उत्तम शय्या पर
ना ही अन्न सुस्वादु खाना, जीवनधारण करने के हित

देव-असुर मिलकर भी जिनके, आवेग को सह नहीं सकते
तिनकों पर शयन करते हैं, वे ही राम संग सीता के

महान तप व उपायों द्वारा, ज्येष्ठ पुत्र पाया राजा ने
जीवित नहीं रह पायेंगे, वन जाने से श्रीराम के 

विधवा हो जाएगी पृथ्वी, लगता है अब अल्प काल में
शांत हो चुकी होंगी स्त्रियाँ, आर्तनाद कर बड़े जोर से

माँ कौसल्या, राजा दशरथ, तथा मेरी माता सुमित्रा
जीवित रह पायेंगे क्या, आज रात तक कह नहीं सकता

शत्रुघ्न की बाट देखते, शायद मेरी माँ रह जाएँ  
किंतु वीर माता कौसल्या, कैसे अपने प्राण बचाएँ  

श्रीराम का राजतिलक हो, राजा का था यही मनोरथ
'सब कुछ नष्ट हो गया मेरा', कह करेंगे प्राणों का त्याग

उनके सम्मुख जो भी रहेंगे, जो उनका संस्कार करेंगे
वे  ही सफल मनोरथ हैं, भाग्यशाली ही वहाँ विचरेंगे

रमणीय चबूतरे जहाँ हैं, राजमार्ग विशाल बने हैं
देवमन्दिरों व अट्टालिकाओं से, रत्नों से जो सजे हुए हैं

हाथी, घोड़े और रथों के, आवागमन से भरी हुई है
वाद्यों का निनाद गूंजता, जो उद्यानों से शोभित है

अति भाग्यशाली हैं वे जन, अयोध्या में जो विचरेंगे
वनवास की अवधि पूर्ण कर, क्या हम वहाँ प्रवेश करेंगे

इस प्रकार विलाप करते ही, पूर्ण रात जाग कर बिताई
प्रातःकाल उगा जब सूरज, पूर्व दिशा में लालिमा छाई

दोनों के केशों की मैंने, वट दूध से जटा बनाई
सुखपूर्वक उन्हें पार उतारा, वल्कल धारी छवि सुहाई

महाबली, शत्रु सन्तापी, गज-यूथपति सम शोभा पाते
सुंदर तरकस व धनुष धरे, सीता के संग चले गये वे

  
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.



Tuesday, July 30, 2019

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक



बाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्
पंचाशीतितमः सर्गः
गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक 
हुआ संतोष बड़ा भरत को, गुह की ये प्रिय बातें सुनकर
सेना को विश्राम हित कहा, शयन हित गये शत्रुघ्न संग

धर्म पर दृष्टि रखने वाले, भरत नहीं थे योग्य शोक के
फिर भी करते शोक राम हित, अचिन्त्य जिस दुःख का वर्णन है

वन में फैले दावानल से, दग्ध वृक्ष को और जलाती
उसी वृक्ष के खोखल में ही, छिपी हुई ज्वाला अग्नि की

उसी प्रकार पिता मरण की, जो चिंता की अग्नि से पीड़ित
रामवियोग की भीषण अग्नि भी, करने लगी अति संतप्त

रविकिरणों से तपा हिमालय, पिघलाने लगता ज्यों बर्फ
शोकाग्नि से पीड़ित होकर, स्वेद बिंदु बहाते थे भरत

आक्रांत करता था उनको, दुःख का एक विशाल पहाड़
छिद्र रहित शिलाओं का समूह, मानो था राम का ध्यान

अति दुःख पूर्ण श्वास-निश्वास, ज्यों गैरिक धातु से बहते थे
गहन दीनता प्रकट होती थी, वृक्ष समूहों के रूप में

शोक जनित उनका आयास, था दुःख रूपी पर्वत का शिखर
अतिशय मोह अनंत प्राणी थे, ओषधियाँ अति दुःख संताप

अति पीड़ित था उनका अंतर, दीर्घ श्वास ले सुधबुध खोयी
मानसिक पीड़ा के कारण, हृदय को शांति नहीं मिलती थी

झुण्ड से बिछुड़े बैल की भांति, उनकी दशा बहुत दीन थी
मिले गुह से परिवार संग, भाई के लिए अति चिंता थी

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Monday, July 29, 2019

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

पंचाशीतितमः सर्गः

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक

निषादराज गुह के कहने पर, महा बुद्धिशाली भरत ने
कहकर  भाई  किया संबोधित, युक्तिपूर्ण समुचित वचन से

अति विशाल इस सेना का तुम, करना चाहते हो सत्कार
है महान मनोरथ तुम्हारा, समझो हुआ है वह स्वीकार

श्रद्धा से ही हुआ सत्कार, यह कहकर श्रीमान भरत ने
गन्तव्य मार्ग दिखाकर, पूछा गुह से उत्तम वाणी में

दो मार्गों में किसके द्वारा, मुनि आश्रम पर हम जाएँ
अति सघन है गंगा तट यह, कैसे इसको पार लगायें

वनचारी गुह ने यह सुनकर, हाथ जोड़कर कहा भरत से
साथ आपके मैं भी चलूँगा, कई मल्लाह भी संग ले

भलीभांति परिचित हैं वे सब, इस प्रदेश के सभी मार्ग से
सेना इतनी बड़ी देख कर, किंतु एक शंका है मन में

अनायास जो हैं पराक्रमी, राम के प्रति कुभाव तो नहीं
 नभ सम निर्मल कहा भरत ने, जब गुह की ऐसी बात सुनी

ऐसा समय कभी न आये, कष्ट हुआ सुन बात तुम्हारी
बड़े भाई पिता समान हैं,  मुझ पर करो संदेह नहीं

लौटाने राम को जाता, सत्य वचन कहता मैं तुमसे
नहीं अन्यथा करो विचार, श्रीराम हैं प्रिय भाई मेरे

खिला हर्ष से मुख निषाद का, अति प्रसन्न होकर वह बोला
आप धन्य हैं, राज्य त्यागा, बिना प्रयास ही जो था पाया

नहीं दिखाई देता मुझको, धर्मात्मा आप सम जग में
लौटाना राम को चाहते, कष्टप्रद वन में जो रहते

अक्षय कीर्ति फैलेगी इससे, आपकी समस्त लोकों में
उसी समय संध्या हो आयी, गुह जब कहता था ये बातें