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Monday, July 29, 2019

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

पंचाशीतितमः सर्गः

गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक

निषादराज गुह के कहने पर, महा बुद्धिशाली भरत ने
कहकर  भाई  किया संबोधित, युक्तिपूर्ण समुचित वचन से

अति विशाल इस सेना का तुम, करना चाहते हो सत्कार
है महान मनोरथ तुम्हारा, समझो हुआ है वह स्वीकार

श्रद्धा से ही हुआ सत्कार, यह कहकर श्रीमान भरत ने
गन्तव्य मार्ग दिखाकर, पूछा गुह से उत्तम वाणी में

दो मार्गों में किसके द्वारा, मुनि आश्रम पर हम जाएँ
अति सघन है गंगा तट यह, कैसे इसको पार लगायें

वनचारी गुह ने यह सुनकर, हाथ जोड़कर कहा भरत से
साथ आपके मैं भी चलूँगा, कई मल्लाह भी संग ले

भलीभांति परिचित हैं वे सब, इस प्रदेश के सभी मार्ग से
सेना इतनी बड़ी देख कर, किंतु एक शंका है मन में

अनायास जो हैं पराक्रमी, राम के प्रति कुभाव तो नहीं
 नभ सम निर्मल कहा भरत ने, जब गुह की ऐसी बात सुनी

ऐसा समय कभी न आये, कष्ट हुआ सुन बात तुम्हारी
बड़े भाई पिता समान हैं,  मुझ पर करो संदेह नहीं

लौटाने राम को जाता, सत्य वचन कहता मैं तुमसे
नहीं अन्यथा करो विचार, श्रीराम हैं प्रिय भाई मेरे

खिला हर्ष से मुख निषाद का, अति प्रसन्न होकर वह बोला
आप धन्य हैं, राज्य त्यागा, बिना प्रयास ही जो था पाया

नहीं दिखाई देता मुझको, धर्मात्मा आप सम जग में
लौटाना राम को चाहते, कष्टप्रद वन में जो रहते

अक्षय कीर्ति फैलेगी इससे, आपकी समस्त लोकों में
उसी समय संध्या हो आयी, गुह जब कहता था ये बातें


Wednesday, July 3, 2019

निषादराज गुह का भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुर शीतितमः सर्गः
निषादराज गुह का अपने बन्धुओं को नदी की रक्षा करते हुए युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश दे भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिए अनुरोध करना 
गंगा तट पर ठहरी सेना, देख कहा निषाद राजा ने
है अपार सागर के समान, पार नहीं मिलता चिंतन से 

निश्चय ही दुर्बुद्धि भरत भी, संग आया इस सेना के
कोविदार चिह्नित पताका, फहराती उसके ही रथ पे

अपने मंत्रियों से यह पहले, वध हमारा करवाएगा
मुझे ज्ञात होता है ऐसा, फिर राम को मरवाएगा

राजलक्ष्मी दशरथ की यह, केवल स्वयं के लिए चाहता
श्रीराम को वन में मारने, इसीलिए यह वन में आया

किंतु राम सखा हैं मेरे, कामना उनके हित की रखो
हो सुसज्जित अस्त्र-शस्त्र से, गंगा तट पर मौजूद रहो

नदी की रक्षा करने हेतु, मल्लाह सभी रहें तट पर
रात आज की यहीं बिताएं, नौका पर रखे फल खाकर 

कुल पांच सौ नौकाएं हैं, एक-एक पर सौ जन बैठें
लैस हुए अस्त्रों-शस्त्रों से, प्रति पल सभी तैयार रहें

पुनः कहा निषादराजा ने, सेना भरत की पार लगेगी
यदि श्रीराम के प्रति भरत का, भाव हुआ संतोष जनक ही

ऐसा कहकर मिश्री, फल, मधु, ले गुह गये निकट भरत के
आते देख उसे सुमन्त्र ने, विनीत की भांति  शब्द  कहे

वृद्ध हुआ गुह संग परिजन के, यहाँ निवास किया करता
दंडकारण्य का मार्ग जानता, श्रीराम का यह है सखा

राम, लक्ष्मण कहाँ गये हैं, इसे ज्ञात है यह निश्चय ही
तुमसे आकर मिले दो अवसर, शीघ्र करो व्यवस्था इसकी

मिलने की अनुमति पाकर तब, गुह आया प्रसन्न चित्त से
बड़ी नम्रता से तब बोला, मिलकर राजकुमार भरत से

वन प्रदेश आपके लिए यह, घर में लगे बगीचे सा है
जो कुछ भी है पास हमारे, वन-जंगल सभी आपका है

रखा धोखे में हमें आपने, आने की नहीं दी सूचना
आपके स्वागत की तैयारी, कुछ भी तो हम कर पाए ना

सेवा में फल-मूल आपके, स्वयं निषाद तोड़ लाये हैं
कुछ सूखे, कुछ ताजे फल हैं, वन्य पदार्थ अन्य लाये हैं

आशा करते हैं आपकी, सेना रात यहीं ठहरेगी
दिया हुआ हमारा भोजन, आदि सहर्ष स्वीकार करेगी

नाना विध वस्तुओं से हम सब, सेना सहित सत्कार करें
प्रातः काल सैनिकों के संग,  यहाँ से आप प्रस्थान करें
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Wednesday, October 5, 2016

निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकपंचाश: सर्गः
निषादराज गुह के समक्ष लक्ष्मण का विलाप

स्वाभाविक अनुराग था मन में, लक्ष्मण जगे रहे रात भर
शय्या उनकी पड़ी थी सूनी, गुह को अति संताप हुआ लख

कहा लक्ष्मण से, सो जाओ, जगा हूँ संग सेवकों के मैं
हमको तो अभ्यास है इसका, भलीभांति परिचित हैं वन से

श्रीराम से बढ़कर मुझको, नहीं प्रिय है कोई दूसरा
उनकी कृपा से ही इस जग में, धर्म-लाभ की आशा रखता

लिए हाथ में धनुष रात भर, करूंगा रक्षा मैं उनकी
अनायास हरा सकता हूँ, चतुरंगिणी सेना को भी

सुनकर कहा लक्ष्मण ने तब, हे निष्पाप निषादराज ! सुनो
तुम जब रक्षक बने हमारे, नहीं कोई भी भय है हमको

फिर भी जब सोये भूमि पर, दशरथ नंदन सीता के संग
निद्रा का सुख लेना मेरा, कैसे हो सकता है सम्भव  

देव, असुर सब मिलकर भी, जिनका वेग नहीं सह सकते
वे ही श्रीराम भूमि पर, तिनकों ऊपर कैसे सोये

गायत्री आदि मन्त्रों के, जप, तप व व्रत अनुष्ठान से
महाराज दशरथ ने पाया, पुत्र युक्त उत्तम लक्षण से

जीवित नहीं अधिक रह सकते, उनके वन में आ जाने से
निश्चय ही विधवा होगी अब, शीघ्र ही पृथ्वी इस कारण से

बड़े जोर से आर्तनाद कर, रनवास की सभी स्त्रियाँ
श्रम से थक चुप हो गयी होंगी, हाहाकार भी अति मचा

माताएं व राजा दशरथ, जीवित रहेंगे आज रात तक
कह नहीं सकता मैं इसको, होगा सबको ही भारी दुःख

शत्रुघ्न की बाट देखते, मेरी माँ जीवित रह सकती
किन्तु यदि न रहीं कौसल्या, दुःख की अति बात यह होगी

प्रिय वस्तु की प्राप्ति कराती, अनुरागी जहाँ श्रीराम के
पुरी अयोध्या नहीं बचेगी, निधनजनित दशरथ के दुःख से

कैसे टिकेंगे उनमें प्राण, जब नहीं देख पाएंगे राम
महाराज यदि नष्ट हुए तो, माता भी तज देंगी प्राण

मिले राज्य राम को उनका, पूर्ण मनोरथ नहीं हुआ यह
सब कुछ नष्ट हो गया मेरा, कहते हुए मरेंगे वह

जो इसके साक्षी होंगे, वे ही सफल मनोरथ नर हैं
यदि पिताजी रहेंगे जीवित, अयोध्या वासी भाग्यशाली हैं

सुंदर चौराहों से अलंकृत, देवमन्दिरों व महलों से
रथों, हाथियों से जो पूर्ण, बाग़-बगीचों उद्यानों से

सजी हुई है पुरी अयोध्या, जो लोग इसमें विचरेंगे
क्या लौटने तक महाराजा, पुनः हमको दर्शन देंगे  ?

क्या हम पुनः वहाँ जायेंगे ?, अवधि समाप्त जब होगी वन की
इस प्रकार विलाप करते ही, सारी रात जागते बीती 

लक्ष्मण थे प्रजा हितकारी, बड़े भाई के थे अनुरागी
उनकी बातें सुन निषाद को, हुई हार्दिक पीड़ा भारी


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ



Saturday, October 1, 2016

निषादराज गुह्द्वारा राम का सत्कार

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

पञ्चाशः सर्गः

श्रीराम का मार्ग में अयोध्यापुरी से वनवास की आज्ञा मांगना और श्रंगवेरपुर में गंगातट पर पहुँचकर रात्रिमें निवास करना, वहाँ निषादराज गुह्द्वारा उनका सत्कार 

देव, मनुज, गन्धर्व, सर्प, व पशु-पक्षी के लिए समान
जल जिनका समादरणीय, गंगा जो करतीं कल्याण

सरिताओं में जो श्रेष्ठ हैं, दर्शन यहाँ से होगा उनका
लक्ष्मण संग सुमन्त्र द्वारा, अश्व उन्हें ले गये वहाँ

खोल दिया उत्तम घोड़ों को, गये सुमन्त्र, थे राम जहाँ
श्रृंगवेरपुर का राजा तब, गुह नामक था मित्र राम का

जन्मा था निषाद्कुल में वह, शक्तिवान अति बलशाली
बन्धु-बांधवों के संग आया, जब सूचना उसे मिली थी  

लक्ष्मण सहित राम तब उससे, आगे बढ़कर मिले प्रेम से
दुखित हुआ गुह बहुत अधिक, देख राम को वल्कल धारे

कहा राम से, राज्य मेरा, अयोध्या समान है आपका
किसे सुलभ अतिथि आपसा, कैसे करूँ सम्मान आपका

भांति-भांति के अन्न लिए वह, सेवा में आया उनकी
हम सेवक, स्वामी हैं आप, स्वाकारें सब सामग्री

उत्तम शय्याएं कीं प्रस्तुत, अश्वों हेतु चने, घास भी
राज्य सौंपने को था आतुर, कहा, भूमि है यह आपकी

उत्तर दिया राम ने उसको, स्नेह तुम्हारा है पर्याप्त
आलिंगन में बाँध कहा यह, हो गया स्वागत सत्कार

जो कुछ तुमने भेंट किया है, स्वीकार कर वापस देता
इस समय अन्यों द्वारा दी, वस्तु ग्रहण नहीं कर सकता

वल्कल धारे, फल-मूल खा, तापसवेश में विचरण करता
अश्वों हेतु जो सामग्री, केवल उसकी मुझे आवश्यकता

उन्हें खिला-पिला देने से, हो जायेगा मेरा सत्कार
तब गुह ने आज्ञा की ऐसी, लाए सेवक अश्व आहार

सांयकाल का संध्या पूजन, किया पूर्ण जल ग्रहण किया
वृक्ष के नीचे भू शय्या पर, पत्नी सहित विश्राम किया

एक वृक्ष का ले आश्रय, कुछ दूर बैठे लक्ष्मण
जगा रहा था भर रात्रि, गुह भी कर धनुष धारण

देखा नहीं था दुःख जिन्होंने, थे योग्य सुख पाने के ही
उन दशरथ नन्दन की रात, अति देर से ही बीती थी

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ