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Friday, September 16, 2011

अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग) मोक्षसंन्यासयोग


अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग)
मोक्षसंन्यासयोग

ज्ञान, कर्म व कर्ता के भी, तीन भेद गुणों अनुसार
मैं तुझसे ये सभी कहूँगा, भली प्रकार तू इन्हें विचार

जिस ज्ञान से पृथक जनों में, व्यापक एक आत्मा दिखता
ऐसा ज्ञान सात्विक होता, सम भाव को जो बढ़ाता

जिस ज्ञान के द्वारा मानव, भिन्न भाव भिन्न में देखे
उस ज्ञान को राजस जान, जो भेद बुद्धि को बढाये

एक देह में हुआ आसक्त, युक्ति हीन जो तुच्छ ज्ञान है
तत्व का जिसमें अर्थ नहीं है, ऐसा ज्ञान तामसिक ही है

शास्त्रविधि से नियत कर्म जो, कर्ता का अभिमान न हो
वह सात्विक कहलाता है, जो राग-द्वेष के बिना किया हो

अहंकारी पुरुष के द्वारा, कर्म हुआ जो अत्यधिक श्रम से
 राजस कर्म वह कहलाता है, शीघ्र ही जिसका फल वह चाहे

बिना विचारे शुरू किया जो, करने की क्षमता न जांची
हानि उठाकर हिंसा द्वारा, तामसिक है, कर्म हो जो भी

असंग, निरहंकारी कर्ता हो, धैर्य और उत्साह युक्त
कार्य सिद्ध हो अथवा न हो, सात्विक कर्ता सम भावित

लोभी, आसक्त, कर्म फल चाहे, कष्ट दूसरों को देता
अशुद्ध आचारी राजस है वह, हर्ष-शोक में लिप्त हुआ

जो कर्ता है धूर्त, अशिक्षित, अभिमानी, आलसी, चिंतित
नष्ट करे अन्यों की जीविका, दीर्घसूत्री वह है तामसिक

तीन तरह की ही होती है, बुद्धि और धृति  भी अर्जुन
सतो, रजो व तमो गुणी, अब करता मैं इनका वर्णन

प्रवृत्ति- निवृत्ति क्या है, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के भेद को
बुद्धि सात्विक जो जानती, भय-अभय, बंधन-मोक्ष को

धर्म-अधर्म जो नहीं जानती, कर्त्तव्य भी न पहचाने
वह बुद्धि राजसिक जान, क्या है अकर्त्तव्य, न जाने

तमोगुण से घिरी जो बुद्धि, अधर्म को ही धर्म मानती
सबमें ही विपरीत देखती, दुःख में ही सुख माना करती

मन, प्राण व इन्द्रियों को, भजन, ध्यान आदि में लगाती
बुद्धि योग में युक्त करे जो, वह धृति सात्विकी कहलाती 

Wednesday, September 14, 2011

अष्टदशोऽअध्यायः मोक्षसंन्यासयोग



अष्टदशोऽअध्यायः

मोक्षसंन्यासयोग

 हे ! वासुदेव ! हे महाबाहो ! मुझे त्याग का अर्थ बताएं
सन्यास का क्या उद्द्शेय है, पृथकता से इसे समझाएं !

सकाम कर्म का त्याग ही, पंडित सन्यास से परिभाषित करते
सर्वकर्म के फल त्याग को, बुद्धिमान जन त्याग हैं कहते

कोई कहते कर्म मात्र ही, दोषपूर्ण है त्यागने योग्य
यज्ञ, तप, दान न त्यागें, कहें अन्य ये करने योग्य

गुणों के आधार पर अर्जुन, तीन तरह का त्याग भी होता
सात्विक, राजस व तामस को, पृथक-पृथक मैं तुझे बताता

मोह के वश में नियत कर्म का, जो कोई भी त्याग करे
ऐसा त्याग तामसिक होगा, जन का कोई न कल्याण करे

कष्टप्रद हैं कर्म सभी, कोई ऐसा जान यदि तजता है
रजोगुण से हुआ है प्रेरित, त्याग का फल नहीं मिलता है

कर्त्तव्य जान कर करता, फलासक्ति तज देता
वही त्याग सात्विक होगा, कल्याण को पा लेता

जो अकुशल से द्वेष करे न, कुशल कर्म में नहीं आसक्त
सतोगुणी वह बुद्धिमान जन, त्यागी है वह होगा मुक्त

जिसने फल की आशा की है, इष्ट, अनिष्ट वह फल पायेगा
मिलता मिश्रित फल भी उसको, पर सन्यासी मुक्त रहेगा  

किसी कर्म की सिद्धि अर्जुन, पांच हेतुओं पर निर्भर
कर्म का अधिष्ठान प्रथम है, कर्ता को तू दूजा मान

विभिन्न इन्द्रियां करण कहीं हैं, तीजा यह हेतु कहलाता
शेष क्रिया व दैव को जान, दैव कर्म संस्कार कहलाता

मन, वाणी, या देह से मानव जो भी कर्म किया करता
ये पाँचों ही कारण होते, यह निश्चय मैं तुझसे कहता


शुद्ध नहीं है जिसकी बुद्धि, केवल स्वयं को कर्ता माने
वह मलिन बुद्धि वाला जन, इस यथार्थ को न जाने

जिसकी बुद्धि हुई अलिप्त है, कर्मों व पदार्थों से भी
वह न किसी कर्म से बंधता, मारे न मारता हुआ भी

ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय की त्रिपुटी, कर्म प्रेरणा कहलाती
कर्ता, करण तथा क्रिया, तीनों की कर्म संग्रह जानी जाती


Monday, September 12, 2011

सप्तदशोऽअध्यायः (अंतिम भाग) श्रद्धात्रयविभागयोग


सप्तदशोऽअध्यायः (अंतिम भाग)
श्रद्धात्रयविभागयोग

देव, ब्राह्मणों, गुरुजनों का, सादर पूजन ज्ञानीजन का
शुद्धि, सरलता और अहिंसा, ब्रह्मचर्य, तप ये सब तन का

प्रिय, हितकारी, सत्यवचन जो, पठन वेद शास्त्रों का
नाम जप व सुमिरन आदि, वाणी का तप कहलाता

आह्लाद व शांत भाव, प्रभु स्मरण, मन का निग्रह
अंतःकरण की भाव शुद्धि, मन सम्बन्धी तप है यह

तन, मन, वाक् के तप सात्विक, यदि किये निष्काम भाव से
जो योगी श्रद्धा से करते, रहते हैं वे परम भाव में

आदर की यदि चाह हो मन में, दम्भ या स्वार्थ हित किया 
हो अनिश्चित, क्षणिक फलवाला, ऐसा तप राजस कहलाता

मूढ़ भाव से हठ पूर्वक, मन, वाणी, तन को पीड़ा दे
ऐसा तप तामस ही है, यदि अन्य का अनिष्ट चाह के

देश, काल, पात्रता लख के, कर्त्तव्य वश दान दिया है
प्रत्युपकार की नहीं है आशा, ऐसा दान सात्विक है

क्लेशपूर्वक, फलेच्छा से जो भी दान दिया जाता है
मान. बड़ाई की आशा हो, दान वह राजस कहलाता है

ॐ तत् सत् तीन तरह का, नाम ब्रह्म का है यह सुंदर
सृष्टि आदि काल में जिससे, रचे यज्ञ, वेद व ब्राह्मण

वेद मंत्रों को उच्चारें, शास्त्र विधि से यज्ञ जो करते
ॐ का ही उच्चारण करके, दान व तप आरम्भ वे करते

तत् अर्थात वही यह सब है, फल इच्छा वे न करते
मात्र लोक संग्रह हेतु, यज्ञ आदि किया करते

सत् से परम ‘सत्य’ कहाता, वही श्रेष्ठ है यह बताता
उत्तम कर्म भी सत् कहाते, प्रभु हित कर्म सत् कहाता

श्रद्धा बिन जो यज्ञ किया हो, दान, तप या कोई कर्म हो
वह असत् ही कहलायेगा, है विफल लोक या परलोक हो

 


     

Saturday, September 10, 2011

सप्तदशोऽअध्यायः श्रद्धात्रयविभागयोग



सप्तदशोऽअध्यायः
श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धायुक्त जो पूजन करता, न जाने पर शास्त्र विधि
निष्ठा उसकी होगी कैसी, सात्विक, राजस या तामसी

जो केवल स्वभाव से उत्पन्न, शास्त्रीय संस्कार रहित है
किसी के भीतर ऐसी श्रद्धा, तीनों तरह की हो सकती है

श्रद्धामय है पुरुष सदा यह, जैसी श्रद्धा उसे वैसा मान
उसके अंतःकरण से उपजी, श्रद्धा उसकी प्रकृति जान

सात्विक जन तो देव पूजते, यक्ष, राक्षस को राजस जन
जो तामस प्रकृति के नर हैं, वे पूजें प्रेत और भूतगण

दम्भ, अहम् से युक्त हुए जो, शास्त्रविधि से रहित तप करें
आसक्त व कामी जन जो, निज बल का अभिमान करें

जो शरीर को देते कष्ट, अंशरूप आत्मा को सताते
है आसुरी प्रकृति उनकी, कुछ अज्ञानी घोर तप करते

निज प्रकृति के अनुसार ही, भोजन भी सबको भाता है
यज्ञ, तप व दान भी अर्जुन, तीन तरह का ही होता है

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढाने वाला
रसयुक्त, स्निग्ध, सुस्वादु, सात्विक जन को भाने वाला

कटु, तीक्ष्ण, लवण युक्त हो, अति गर्म, रुक्ष, दाहकारक जो
दुःख, चिंता रोगों को लाता, राजस को भोजन भाता वो

अधपका और रस रहित हो, बासी, जूठा, दुर्गन्धित जो 
है अपावन ऐसा भोजन, तामस जन करे ग्रहण वो 

शास्त्र विधि से जो सम्मत हो, निष्काम जो यज्ञ है पावन
कर्त्तव्य मान जो किया गया हो, कर्ता उसके सात्विक जन

केवल दम्भ आचरण हेतु, फल की इच्छा से किया  
ऐसा यज्ञ राजसिक होता, सिद्ध न उससे हेतु होता

शास्त्र विधि का ध्यान नहीं हो, अन्नदान से रहित यज्ञ हो
बिना दक्षिणा व मंत्रों के, बिन श्रद्धा, तामस है यज्ञ वो 

Thursday, September 8, 2011

षोडशोऽध्यायः (अंतिम भाग) देवासुरसम्पदविभागयोग


षोडशोऽध्यायः (अंतिम भाग)
देवासुरसम्पदविभागयोग


आज किया, कल यह करना है, आज मिला, यह कल पाना है
इसे हराया, उसे हरा लूँ, सिद्धि युक्त, बलवान सुखी हूँ

मैं धनी, परिवार बड़ा है, मेरे जैसा कौन यहाँ है
यज्ञ करूँगा, दान भी दूँगा, बड़े मजे से यहाँ रहूँगा

ऐसे वे अज्ञान से मोहित, भ्रमित हुए, आसक्त हुए जन
ऐसी आसुर प्रकृति लिए वे, नरकों में जाते हैं अपावन

सुख को ही वे श्रेष्ठ मानते, धन व मान के मद में चूर
नाम मात्र के यज्ञ वे करते, शास्त्र विधि से रहते दूर

स्वयं के व अन्यों के भीतर, मुझ अन्तर्यामी के द्वेषी
क्रूर क्रम करते हैं जो नर, पाते हैं वे आसुरी योनि

मुझे प्राप्त न होकर वे नर, बार-बार नरकों में जाते
आसुरी प्रकृति को पुनः पाकर, नीच गति को प्राप्त वे होते

काम, क्रोध व लोभ ये तीनों, नाश आत्मा का करते हैं
यही नर्क के द्वार हैं अर्जुन, ज्ञानी इनको तज देते हैं

मुक्त हुआ जो इन द्वारों से, परम गति वह पा जाता है
स्वयं का ही कल्याण वह करता, मुझे प्राप्त फिर हो जाता है

जो मनमानी करता जग में, शास्त्र विधि को मान न देता,
सिद्धि उससे दूर ही रहती, न सुख न उच्च गति को पाता

अकर्त्तव्य व कर्त्तव्य का, ज्ञान शास्त्र से मिल सकता है
आदर कर शास्त्र का ही तू,  इससे आगे बढ़ सकता है 


 

Monday, August 29, 2011

पञ्चदशोऽध्यायः पुरुषोत्तमयोग


पञ्चदशोऽध्यायः
पुरुषोत्तमयोग

पीपल का इक वृक्ष शाश्वत, उर्ध्व मूल, अधो शाखाएं
वैदिक स्त्रोत पत्तियां जिसकी, जो जानें ज्ञानी कहलाएं

ऊपर-नीचे फैली डालियाँ, तीनों गुणों से होता सिंचित
इन्द्रिय विषय टहनियाँ इसकी, मूल सकाम कर्म से बंधित

कोई जान नहीं पाया है, रूप वास्तविक इस वृक्ष का
आदि नहीं अंत न जिसका, है कहाँ आधार इसका

दृढ मूल वाले वृक्ष को, वैराग्य के शस्त्र से काटो
खोज करो फिर उस धाम की, जहां से पुनः न वापस आओ

जिस परमेश्वर से उपजा है, जगत वृक्ष यह अति पुरातन
उसकी शरण में ही मुक्ति है, जिससे हुआ है यह जग, अर्जुन

मान, मोह नष्ट हुआ है, आसक्ति के दोष से मुक्त
नष्ट हुई कामना जिनकी, परमात्मा से जो हैं युक्त

सुखों-दुखों से पर हुए हैं, अविनाशी परमपद पाते
जिसे प्राप्त कर मानव जग में, पुनः लौट नहीं आते

मेरी ही शाश्वत अंश हैं, इस जग की सभी आत्माएं
मन-इन्द्रियों के वश में आकर, व्यर्थ ही बंधन में पड़ जाएँ

जैसे वायु गंध को हरता, दूर-दूर तक पहुंचाता है
जीवात्मा मन को हर ले, नूतन तन में ले जाता है

मन का ले आश्रय आत्मा, इन्द्रियों से विषयों को भोगे
तीनों गुणों से युक्त हुआ यह, तन में रह कर यह जग देखे

Friday, August 26, 2011

चतुर्द्शोऽध्यायः (अंतिम भाग) गुणत्रयविभागयोग



चतुर्द्शोऽध्यायः (अंतिम भाग)
गुणत्रयविभागयोग

अर्जुन बोले हे केशव, क्या लक्षण हैं गुणातीत के
गुणातीत कैसे हो कोई, कैसे हों आचरण उसके

सत्व गुण का कार्य प्रकाश है, प्रवृत्ति रजो गुण का
जो प्रमाद को सदा बढाये, मोह है कार्य तमो गुण का

जो न चाहे इन तीनों को, न ही द्वेष करे इनसे
साक्षी भाव में जो है रहता, गुणों को ही कारण समझे

आत्म भाव में रहता निशदिन, सुख-दुःख दोनों सम जिसको
मिटटी, पत्थर, स्वर्ण एक से, निन्दा-स्तुति सम जिसको

जिसकी भक्ति है अखंड, अनन्य भाव से मुझको भजता
तीनों गुणों से पार हुआ वह, मुझ ब्रह्म से आ मिलता

जो अविनाशी परब्रह्म है, मैं ही हूँ आश्रय उसका
जो अखंड आनंद एकरस, है शाश्वत उस अमृत का

Wednesday, August 24, 2011

चतुर्द्शोऽध्यायः गुणत्रयविभागयोग


चतुर्द्शोऽध्यायः
गुणत्रयविभागयोग

सब ज्ञानों में परम ज्ञान है, पुनः कहूँ मैं उसे तुम्हें
जिसे जान जन मुक्त हो गए, परम सिद्धि को प्राप्त हुए

जो इस ज्ञान को धारण करते, प्राप्त मुझे ही वे नर होते
प्रलयकाल में न घबराते, कल्प आदि में नहीं जन्मते

महत्-ब्रह्म मूल प्रकृति ही, गर्भ योनि है सब भूतों की
चेतन मैं स्थापित करता, इन दो के मेल से होती सृष्टि

प्रकृति है माता, मैं ही पिता हूँ, जन्माते जो सब जीवों को
सतो, रजो, तमो, तीनों गुण, ये बांधते हैं आत्मा को

सत गुण सदा प्रकाश युक्त है, निर्मल और विकार रहित है
ज्ञान के अभिमान से बांधे, सुख हेतु बंधन सहित है

इच्छा से उपजे है रजोगुण, कर्मों से यह सदा बांधता
कर्मों का फल भी तो प्राणी, इसके कारण ही चाहता

तमो गुण अज्ञान से उपजे, करता मोहित सब भूतों को
निद्रा व आलस्य रूप में, या प्रमाद से बांधे जीवों को

सुख मिलता है सतो गुणी को, कर्म में रत है रजो गुणी
ज्ञान को ढककर सदा मोह में, डूबे प्रमाद में तमो गुणी

रज, तम दबा के सत गुण बढ़ता, सत, तम दबा बढ़े रजो गुण
ऐसे ही सत, रज को दबा के,  बढ़ता जाता है तमो गुण

चेतनता व विवेक बढ़ा हो, मन में न विकार उपजता
भीतर छाया हो प्रकाश जब, तब तन में सत गुण बढ़ता

कर्मों में जब मन लगता हो, भीतर स्वार्थ व लोभ बढ़ा हो
जगी लालसा, बढ़े अशांति, जब तन में रज गुण बढता हो

अंतः करण में अप्रकाश है, जब तमो गुण बढ़ जाता
व्यर्थ चेष्टा इन्द्रियों की, निद्रा व आलस्य सताता

मृत्यु मिले यदि सतो गुणी को, निर्मल दिव्य लोक को पाता
रजो गुणी मृत होकर पुनः, मानव लोक में लौट के आता

कीट, पशु आदि योनि में, तमो गुणी मर कर जाता है
राजस कर्म का फल दुःख है, श्रेष्ठ कर्म का फल निर्मल है

सत्व गुण से ज्ञान उपजता, लोभ रजो गुण से उपजे
मोह, प्रमाद तमो गुण से, साथ ही अज्ञान भी उपजे

तीनों गुण ही हैं कर्ता, जो इनको ऐसा जानता
गुणातीत मुझ परमात्मा को, तत्वज्ञानी वह पा जाता

तीनों गुण ही जन्म के कारण, जो इनका उल्लंघन करता  
जन्म, मृत्यु, जरा का दुःख वह, तज के परमानंद को पाता


Saturday, August 20, 2011

त्र्योदशोऽध्यायः (अंतिम भाग) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग



त्र्योदशोऽध्यायः (अंतिम भाग)
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

कार्य व कारण हैं प्रकृति में, जीवात्मा सुख-दुःख भोगे
संग गुणों का कारण बनता, विभिन्न योनियों को वह धारे

देह में स्थित जो है आत्मा, जान उसे ही तू परमात्मा
साक्षी रूप में वही उपद्रष्टा, सम्मति देने से अनुमन्ता

वही है भर्ता और भोक्ता, महेश्वर भी वही कहाए
शुद्ध सच्चिदानन्द घन है, परमात्मा भी वही कहाये

जो जानता इन दोनों को, वह फिर जन्म नहीं लेता  
कोई शुद्ध बुद्धि से जाने, ध्यानयोग से कोई पाता

श्रवण मात्र से भी हे अर्जुन, भवसागर को तर जाते हैं
भिन्न भिन्न मार्ग से जाकर, एक उसी को सब पाते हैं

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संयोग से, सारे प्राणी सदा उपजते
स्थावर-जंगम जो भी दीखते, चर-अचर सब इससे होते

नष्ट हो रहे इन भूतों में, परमात्मा को जो भी देखता
सम भाव को प्राप्त हुआ वह, बस यथार्थ में वही देखता

जो सबमें परम को देखे, स्वयं को स्वयं से नष्ट न करता
देख आत्मा को अकर्ता, परमगति को वह है पाता

प्रकृति में सब कार्य हो रहे, विकार ग्रस्त होती है वही
पुरुष सदा एक सा रहता, अकम्पित, निर्लिप्त सदा ही

जैसे लिप्त नहीं होता है, सूक्ष्म अति आकाश किसी में
देह में स्थित होने पर भी, है अलिप्त आत्मा देह से

एक सूर्य प्रकाशित करता, ज्यों सारे जग को हे अर्जुन
एक आत्मा के प्रकाश से, प्रकाशित है यह सारा तन  

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस भेद को, जो तत्व से है जानता
मुक्त हुआ वह जड़ प्रकृति से, कर्म उसे फिर नहीं बांधता