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Monday, October 10, 2011

स्थूल देह


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


प्रश्न किया जो तूने साधक, सूक्ष्म और गम्भीर अति
भव बंधन से तरना चाहे, सावधान हो, दूँ यह मति

प्रथम हेतु वैराग्य मोक्ष का, आसक्ति का त्याग है दूजा
श्रवण, मनन, ध्यान करे फिर, द्वार खुलेगा फिर मुक्ति का

आत्म-अनात्म विवेक कह रहा, भली-भांति तू इसे विचार
मन में धारण कर ले इसको, यदि चाहे निज का उद्धार

स्थूल देह

मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा
सप्त धातुओं से निर्मित हैं, चरण, पीठ, मस्तक व भुजा

कोई ‘मैं’ इस देह को मानता, कोई ‘मेरा’ है कहता
मोह आश्रय तन मानव का, स्थूल शरीर कहा जाता

क्षिति, जल पावक, गगन, समीर, पंच भूत जब मिल जाते
स्थूल देह के कारण होते, पांच विषय इनसे बन जाते

इन विषयों में बंधे हुए जन, कर्म दूत से प्रेरित होते
उच्च-निम्न अनेक योनियाँ, कर्मों के बल पर पाते

पांच विषय

मीन, पतंग, गज, सारंग, भ्रमर मृत्यु को हैं पाते
एक-एक विषय से बंध कर, व्यर्थ में वे मारे जाते

पांचों से जो बंधा हुआ है, मानव कैसे बच सकता है
विष सम घातक विषय हैं जो, क्यों न उनमें फँस सकता है

वही मोक्ष का भागी होगा, जो इस बन्धन से छूटे
दर्शन छहों पढ़ें हो चाहे, विषयी न मुक्ति पाए

क्षणिक हुआ वैराग्य जिसका, आशा ग्राह डूबा देगा
दृढ़ वैराग्य से जो मारे, वही पार भव सागर होगा

पग-पग पर मृत्यु ने घेरा, जो विष रूपी विषय न त्यागे
जो सन्मार्ग पर चल पड़ता है, इक न इक दिन वह जागे

यदि तुझे मुक्ति की इच्छा, विष रूपी विषयों को तज दे
शम, दम, दया और सरलता, संतोष, क्षमा का पी अमृत ले






  




Wednesday, October 5, 2011

आश्वासन


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


आश्वासन

संसार अनल से तप्त शिष्य पर, सद्गुरु करुणा जल बरसाते
एक दृष्टि दे अभय लुटाते, जो उनके चरणों में जाते

मोक्ष की इच्छा जिसके मन में, शांत चित्त जो आज्ञाकारी
शम, दम आदि साध लिए हैं, गुरु उपदेश करे फिर भारी

नहीं डरो तुम, नाश न होगा, भव तरने की युक्ति कहूँगा
जिस मार्ग से और गए हैं, वही मार्ग मैं तुम्हें कहूँगा

एक महान उपाय ऐसा, जिससे तू सहज तर जाये
परम आनंद मिलेगा तुझको, यदि उस पर तू चल पाए

वेदांत का अर्थ विचार, उत्तम ज्ञान को तू पायेगा
जग के दुःख का नाश भी होगा, सहज सुख राशि पा जायेगा

श्रद्धा, भक्ति, ज्ञानयोग, श्रुति इन्हें ही हेतु बताती
जो इनमें स्थित हो जाता, उन्हें शीघ्र मुक्ति मिल जाती

अज्ञान से हुआ है मोहित, अनात्म भाव में तू स्थित  
आत्म-अनात्म विवेक जगे जब, भस्म जग होता मूल सहित

साधक पूछे

बंधन क्या है, हुआ यह कैसे, कैसे अब तक टिका हुआ है ?
कैसे इससे होगी मुक्ति, आत्म-अनात्म, परमात्म भी क्या है ?

सद्गुरु बोले
धन्य है तू, कुल पावन तेरा, बंधन से छूटना चाहे
अज्ञान से मुक्ति पाकर, ब्रह्म भाव में टिकना चाहे

स्वप्रयत्न से  ही ज्ञान संभव है

पुत्र चुका सकता पितृ ऋण, भव बंधन से स्वयं ही छूटता
स्वयं ने ही बांधा है इसको, अन्य न कुछ भी कर सकता

सिर का बोझ उतारे कोई, तन का दुःख स्वयं ही मिटता
भूख-प्यास से पीड़ित हो तो, स्वयं को भोजन करना पड़ता

रोगी हो जो वही दवा ले, पथ्य-अपथ्य वही सेवे
किसी और के द्वारा औषधि, नहीं रोग हर, फल देवे

वैसे ही विवेकी जन को, स्वयं से ही ज्ञान होता है
चन्द्र दिखेगा निज नयनों से, दूजे से न दिख सकता है

अविद्या का बंधन है ऐसा, जाल कामना का है ऐसा

सौ करोड कल्प भी बीतें, स्वयं से खुले बंध यह ऐसा 

Monday, September 26, 2011

ज्ञानप्राप्ति का उपाय



श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित

विवेक – चूड़ामणि


ज्ञानप्राप्ति का उपाय

सुख भोग की तज कामना, साधक सद्गुरु शरण में जाये
उनके उपदेशों को सुन कर, मुक्ति के लिए करे उपाय

सत्य आत्मा में स्थित हो, योग में हो आरूढ़ रहे
डूब रहा जो भवसागर में, स्वयं का स्वयं उद्धार करे

व्यर्थ चेष्टा तज दे सारी, एक साधना में तत्पर हो
भव बंधन से पानी मुक्ति, लक्ष्य सदा सम्मुख हो

कर्म से होती चित्त की शुद्धि, ज्ञान नहीं होता कर्मों से
‘तत्व’ विचार से ही मिलता है, न क्रियाकांड के धर्मों से

रज्जु में सर्प भ्रम हो गया, अति दुःख जो देने वाला
विचार किये से ही छूटेगा, स्वयं को जिस बंधन में डाला

ज्ञान से ही भ्रम दूर हो सके, स्नान, दान जितने कर ले
दृढ विचार से दुःख मिटता है, प्राणायाम भी कितने कर ले
    

Friday, September 16, 2011

अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग) मोक्षसंन्यासयोग


अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग)
मोक्षसंन्यासयोग

ज्ञान, कर्म व कर्ता के भी, तीन भेद गुणों अनुसार
मैं तुझसे ये सभी कहूँगा, भली प्रकार तू इन्हें विचार

जिस ज्ञान से पृथक जनों में, व्यापक एक आत्मा दिखता
ऐसा ज्ञान सात्विक होता, सम भाव को जो बढ़ाता

जिस ज्ञान के द्वारा मानव, भिन्न भाव भिन्न में देखे
उस ज्ञान को राजस जान, जो भेद बुद्धि को बढाये

एक देह में हुआ आसक्त, युक्ति हीन जो तुच्छ ज्ञान है
तत्व का जिसमें अर्थ नहीं है, ऐसा ज्ञान तामसिक ही है

शास्त्रविधि से नियत कर्म जो, कर्ता का अभिमान न हो
वह सात्विक कहलाता है, जो राग-द्वेष के बिना किया हो

अहंकारी पुरुष के द्वारा, कर्म हुआ जो अत्यधिक श्रम से
 राजस कर्म वह कहलाता है, शीघ्र ही जिसका फल वह चाहे

बिना विचारे शुरू किया जो, करने की क्षमता न जांची
हानि उठाकर हिंसा द्वारा, तामसिक है, कर्म हो जो भी

असंग, निरहंकारी कर्ता हो, धैर्य और उत्साह युक्त
कार्य सिद्ध हो अथवा न हो, सात्विक कर्ता सम भावित

लोभी, आसक्त, कर्म फल चाहे, कष्ट दूसरों को देता
अशुद्ध आचारी राजस है वह, हर्ष-शोक में लिप्त हुआ

जो कर्ता है धूर्त, अशिक्षित, अभिमानी, आलसी, चिंतित
नष्ट करे अन्यों की जीविका, दीर्घसूत्री वह है तामसिक

तीन तरह की ही होती है, बुद्धि और धृति  भी अर्जुन
सतो, रजो व तमो गुणी, अब करता मैं इनका वर्णन

प्रवृत्ति- निवृत्ति क्या है, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के भेद को
बुद्धि सात्विक जो जानती, भय-अभय, बंधन-मोक्ष को

धर्म-अधर्म जो नहीं जानती, कर्त्तव्य भी न पहचाने
वह बुद्धि राजसिक जान, क्या है अकर्त्तव्य, न जाने

तमोगुण से घिरी जो बुद्धि, अधर्म को ही धर्म मानती
सबमें ही विपरीत देखती, दुःख में ही सुख माना करती

मन, प्राण व इन्द्रियों को, भजन, ध्यान आदि में लगाती
बुद्धि योग में युक्त करे जो, वह धृति सात्विकी कहलाती 

Wednesday, August 24, 2011

चतुर्द्शोऽध्यायः गुणत्रयविभागयोग


चतुर्द्शोऽध्यायः
गुणत्रयविभागयोग

सब ज्ञानों में परम ज्ञान है, पुनः कहूँ मैं उसे तुम्हें
जिसे जान जन मुक्त हो गए, परम सिद्धि को प्राप्त हुए

जो इस ज्ञान को धारण करते, प्राप्त मुझे ही वे नर होते
प्रलयकाल में न घबराते, कल्प आदि में नहीं जन्मते

महत्-ब्रह्म मूल प्रकृति ही, गर्भ योनि है सब भूतों की
चेतन मैं स्थापित करता, इन दो के मेल से होती सृष्टि

प्रकृति है माता, मैं ही पिता हूँ, जन्माते जो सब जीवों को
सतो, रजो, तमो, तीनों गुण, ये बांधते हैं आत्मा को

सत गुण सदा प्रकाश युक्त है, निर्मल और विकार रहित है
ज्ञान के अभिमान से बांधे, सुख हेतु बंधन सहित है

इच्छा से उपजे है रजोगुण, कर्मों से यह सदा बांधता
कर्मों का फल भी तो प्राणी, इसके कारण ही चाहता

तमो गुण अज्ञान से उपजे, करता मोहित सब भूतों को
निद्रा व आलस्य रूप में, या प्रमाद से बांधे जीवों को

सुख मिलता है सतो गुणी को, कर्म में रत है रजो गुणी
ज्ञान को ढककर सदा मोह में, डूबे प्रमाद में तमो गुणी

रज, तम दबा के सत गुण बढ़ता, सत, तम दबा बढ़े रजो गुण
ऐसे ही सत, रज को दबा के,  बढ़ता जाता है तमो गुण

चेतनता व विवेक बढ़ा हो, मन में न विकार उपजता
भीतर छाया हो प्रकाश जब, तब तन में सत गुण बढ़ता

कर्मों में जब मन लगता हो, भीतर स्वार्थ व लोभ बढ़ा हो
जगी लालसा, बढ़े अशांति, जब तन में रज गुण बढता हो

अंतः करण में अप्रकाश है, जब तमो गुण बढ़ जाता
व्यर्थ चेष्टा इन्द्रियों की, निद्रा व आलस्य सताता

मृत्यु मिले यदि सतो गुणी को, निर्मल दिव्य लोक को पाता
रजो गुणी मृत होकर पुनः, मानव लोक में लौट के आता

कीट, पशु आदि योनि में, तमो गुणी मर कर जाता है
राजस कर्म का फल दुःख है, श्रेष्ठ कर्म का फल निर्मल है

सत्व गुण से ज्ञान उपजता, लोभ रजो गुण से उपजे
मोह, प्रमाद तमो गुण से, साथ ही अज्ञान भी उपजे

तीनों गुण ही हैं कर्ता, जो इनको ऐसा जानता
गुणातीत मुझ परमात्मा को, तत्वज्ञानी वह पा जाता

तीनों गुण ही जन्म के कारण, जो इनका उल्लंघन करता  
जन्म, मृत्यु, जरा का दुःख वह, तज के परमानंद को पाता


Wednesday, June 15, 2011

भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय


चतुर्थ अध्याय (अंतिम भाग)
ज्ञानकर्मसन्यासयोग 


यज्ञ से प्राप्त हुए अमृत का, कर अनुभव परमसुख पाते
जो न करते कोई साधना, दोनों लोकों में दुःख पाते

न जाने ऐसे कितने ही, यज्ञ कहे गए हैं वेदों में
मन, इन्द्रियों, तन से होते, तत्व से तू जान उन्हें

द्रव्यों से जो यज्ञ हो सम्पन्न, उनसे ज्ञान यज्ञ उत्तम है
सारे कर्मों का समापन, हो जाता है ज्ञान यज्ञ में

जो उस ज्ञान को पाना चाहे, ज्ञानीजन के निकट चला जा 
भली भांति दंडवत करके, कपट रहित सेवा से पा

वे परम में रहने वाले, ज्ञानीजन हैं अति दयालु
तत्वज्ञान की बात कहेंगे, रख श्रद्धा, वे हैं कृपालु

फिर न कभी तू मोहित होगा, तत्वज्ञान उत्तम ज्ञानों में 
पहले स्वयं में जग देखेगा, फिर दर्शन होंगे मुझ में

पापी से भी हो जो पापी, ज्ञान की  नौका से तर जाये
जैसे अग्नि भस्मित करती, ज्ञानाग्नि कर्मों को जलाये

ज्ञान से बढ़कर कुछ न पावन, उसी ज्ञान को तू पायेगा
कर्मयोग से शुद्ध हुआ जो, उस मन में वह प्रकटायेगा

श्रद्धावान, जितेन्द्रिय साधक, सहज ज्ञान वह पा जाता
परम ज्ञान को पाकर तत्क्षण, परम शांति को पा जाता

जो संशय से ग्रस्त सदा है, अविवेकी, अश्रद्धालु भी
न लोक न परलोक ही, उसके लिये कभी सुखदायी

जो समस्त निज कर्मों को, प्रभु अर्पण कर देता है
संशय जिसके नष्ट हुए, जिसे विवेक का आश्रय है

जिसका अंतर वश में उसके, कर्म नहीं उसको बांधते
हे अर्जुन ! नाश कर तू भी, इस संशय का ज्ञान खड्ग से

समता को प्राप्त कर तू भी, कर्मयोग में हो स्थित
युद्ध हेतु फिर हो तत्पर, कर इसको भी परम समर्पित   

   

  




Sunday, November 28, 2010

भावांजलि

तुम हो ! तुम अपने हो प्रियतम
यह भान मुझे हर्षित करता,
दिन रात प्रेम की धार बहे
फिर भी न तृषित अंतर भरता !

ज्ञान मुक्त हो भयविहीन अंतर अपना
टुकड़ों में नहीं बंटा, हो साझा सपना
कर्मशील मानव हो, प्रभु ! और प्रेम का स्रोत
हो प्रकाशित बिखर जग में परम जीवन ज्योत !

सुख पाकर मैं न इतराऊँ
दुःख को दुःख न जानूँ,
दो इतनी समता, दृढ़ता तुम
कुछ भी क्षुद्र न मानूँ !