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Monday, March 12, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

नट जैसे पुरुष ही रहता, स्वांग करे या रहे अयुक्त
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है, उपाधि युक्त हो या हो मुक्त

जहाँ-तहाँ ज्यों पत्र गिरे हों, सूखे हुए किसी वृक्ष के
उसका तन भी दग्ध हुआ है, चाहे गिरे किसी स्थल पे

वृक्ष का सूखा पत्ता चाहे, कहीं भी गिरे न पड़ता अंतर
नाली, नदी, शिवालय में या, गिरे किसी चबूतरे पर

सत्स्वरूप में हुआ वह स्थित, देह भाव से मुक्त हुआ वह  
कहीं भी त्यागे देह, न अंतर,  देशकाल न देखे वह

हृदय की अविद्या ग्रंथि, जिसकी नष्ट हुई वह मुक्त
देह त्याग नहीं है मोक्ष, रहता वह आनंद से युक्त

वृक्ष के पत्ते, पुष्प, डाल सम, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ मिटते
आनंद रूप आत्मा अमर है, उसे न देखा किसी ने मरते

आत्मा का लक्षण प्रज्ञानघन, उसकी सत्यता को बतलाता
अविनाशी है यह आत्मा, उपाधि का ही नाश है होता

जैसे अन्न अग्नि बन जाता, जब अग्नि में उसे डालते
देह आदि भी ज्ञानाग्नि में, भस्म हुए परम हो जाते

सूर्य उदित होने पर जैसे, अंधकार का नाश हो जाता
ज्ञान हुए से दृश्य प्रपंच, ब्रह्म में ही लीन हो जाता

घट के नाश हुए से जैसे, घटाकाश, महाकाश बनता
लय होता जब उपाधि का, ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हो जाता

एक हुआ दूध मिल दूध, तेल, तेल से मिलकर एक
आत्मा में मिल ज्ञानी आत्मा, जल, जल से मिलकर हो एक

एक अखंड सत्ता शेष हो, वही विदेह-कैवल्य कहलाता
ब्रह्म भाव को प्राप्त हुआ जो, भव बंधन से मुक्त हो जाता

ब्रह्म-आत्मा के ऐक्य से, दग्ध हुए अज्ञान, अविद्या
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हुआ फिर, जन्म न फिर होता है उसका 

Monday, August 29, 2011

पञ्चदशोऽध्यायः पुरुषोत्तमयोग


पञ्चदशोऽध्यायः
पुरुषोत्तमयोग

पीपल का इक वृक्ष शाश्वत, उर्ध्व मूल, अधो शाखाएं
वैदिक स्त्रोत पत्तियां जिसकी, जो जानें ज्ञानी कहलाएं

ऊपर-नीचे फैली डालियाँ, तीनों गुणों से होता सिंचित
इन्द्रिय विषय टहनियाँ इसकी, मूल सकाम कर्म से बंधित

कोई जान नहीं पाया है, रूप वास्तविक इस वृक्ष का
आदि नहीं अंत न जिसका, है कहाँ आधार इसका

दृढ मूल वाले वृक्ष को, वैराग्य के शस्त्र से काटो
खोज करो फिर उस धाम की, जहां से पुनः न वापस आओ

जिस परमेश्वर से उपजा है, जगत वृक्ष यह अति पुरातन
उसकी शरण में ही मुक्ति है, जिससे हुआ है यह जग, अर्जुन

मान, मोह नष्ट हुआ है, आसक्ति के दोष से मुक्त
नष्ट हुई कामना जिनकी, परमात्मा से जो हैं युक्त

सुखों-दुखों से पर हुए हैं, अविनाशी परमपद पाते
जिसे प्राप्त कर मानव जग में, पुनः लौट नहीं आते

मेरी ही शाश्वत अंश हैं, इस जग की सभी आत्माएं
मन-इन्द्रियों के वश में आकर, व्यर्थ ही बंधन में पड़ जाएँ

जैसे वायु गंध को हरता, दूर-दूर तक पहुंचाता है
जीवात्मा मन को हर ले, नूतन तन में ले जाता है

मन का ले आश्रय आत्मा, इन्द्रियों से विषयों को भोगे
तीनों गुणों से युक्त हुआ यह, तन में रह कर यह जग देखे