Showing posts with label परमात्मा. Show all posts
Showing posts with label परमात्मा. Show all posts

Wednesday, July 20, 2022

वसिष्ठजी का सृष्टि परंपरा के साथ इक्ष्वाकु कुल की परंपरा बताना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

 दशाधिकततम: सर्ग:

वसिष्ठजी  का सृष्टि परंपरा के साथ इक्ष्वाकु कुल की परंपरा बताकर ज्येष्ठ के हाई राज्याभिषेक का औचित्य सिद्द्ध करना और श्रीराम जी से राज्य ग्रहण करने के लिए कहना 


श्री रामचंद्र को रुष्ट जान, यह कहा महर्षि वसिष्ठ ने 

अस्तित्त्व है परलोक का, ब्राह्मण जाबालि भी यह जानते      


तुमको लौटाने की ख़ातिर, ऐसी बात कही उन्होंने 

इस लोक की उत्पत्ति का, अब यह वृत्तांत सुनो तुम मुझसे 


सभी जलमय था आरम्भ में, जल से भू का निर्माण हुआ 

ब्रह्मा प्रकटे देवों के सँग, बन विष्णु वराहावतार लिया      


जल के भीतर से पृथ्वी को, इसी रूप में बाहर निकाला 

कृतात्मा पुत्रों के संग मिल, ब्रह्मा ने जग निर्माण किया 


परब्रह्म  परमात्मा से, प्रादुर्भाव हुआ ब्रह्मा का 

नित्य,सनातन, अविनाशी जो, फिर मरीचि, जिनसे कश्यप का 


कश्यप से हुए विवस्वान फिर, प्रजापति वैवस्त मनु थे 

मनु के पुत्र हुए इक्ष्वाकु, राजा जिन्हें बनाया मनु ने     


प्रथम नरेश अयोध्या के थे वे, उनसे कुक्षि, फिर विकुक्षि

महाप्रतापी बाण हुए फिर, अनरण्य थे जिनके पुत्र श्री 


सत्पुरुषों में श्रेष्ठ राजा थे, नहीं अकाल, सूखा देखा 

कोई चोर नहीं था राज्य में,  उनके पुत्र थे पृथु राजा


महातेजस्वी त्रिशंकु की, उत्पत्ति हुई राजा पृथु से    

विश्वामित्र के सत् प्रभाव से, स्वर्ग सदेह वे चले गए  


महायशस्वी धुँधुमार फिर, राजा त्रिशंकु के पुत्र हुए 

धुँधुमार के युवनाश्व थे,  जिनके पुत्र श्री मांधाता थे


सुसंधि पुत्र मांधाता के, ध्रुवसंधि व प्रसेनजित उनके 

ध्रुवसंधि के पुत्र भरत थे, असित का जन्म हुआ था जिन से   


तालजाँघ व शशबिंदु से मिल, शत्रु हैहय ने उन्हें हराया  

शैल शिखर पर मुनिभाव से, चिंतन करते परमात्मा का


Friday, September 26, 2014

शुभकामना

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
आने वाले सभी पर्वों के लिए शुभकामना के साथ अगले दस-बारह दिनों के लिए विदा. आज ही हम बंगलुरु तथा कुर्ग की यात्रा पर जा रहे हैं. आशा है आप सभी के जीवन में विजयादशमी का उत्सव नई विजय की सूचना लेकर आएगा. परमात्मा हर क्षण हम सभी के साथ है.

अनिता 

Monday, February 6, 2012

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)


सदा एकरस और निरवयव, एक रूप मैं घनीभूत हूँ
कैसे हो प्रवृत्ति मुझमें, निवृत्ति से भी अशेष हूँ

इंद्रिय, चित्त, विकार नहीं हैं, निराकार आनंद स्वरूप
पाप-पुण्य से रहित सदा मैं, श्रुति भी कहे बोध स्वरूप

उष्ण-शीत या भली-बुरी हो, वस्तु कोई छाया को छू ले
व्यक्ति को न छू सकती है, ज्यों प्रकाश को कुछ न छुए

देह के धर्म न छू सकते हैं, देह से परे आत्मा को
निर्विकार, उदासीन जो, क्या छुए परमात्मा को

सूर्य साक्षी सब कर्मों का, अग्नि साक्षी है ज्वलन की
रज्जु से ज्यों सँग सर्प का, आत्मा साक्षी है विषयों की

न मैं कर्ता, न ही कराता, न भोक्ता न भुगतवाता
न ही देखता, न दिखलाता, हूँ विलक्षण साक्षी आत्मा

चंचल जल में बिम्ब भी चंचल, सूर्य किन्तु अचल है नभ में
सूर्य समान आत्मा निश्चल, चित्त ही चंचल होता देह में

घट से ज्यों अलिप्त आकाश, देह से भिन्न आत्मा है
बुद्धि का ही खेल है सारा, प्रकृति से अतीत आत्मा  

प्रकृति में विकार हजारों, क्या संबंध आत्मा का है
मेघ न छू सकते हैं नभ को, बस आभास दृष्टि का है

अव्यक्त से स्थूल भूत तक, जिसमें यह आभास मात्र है
आदि-अंत से रहित सूक्ष्म यह, परम ब्रह्म आत्मा है 

Saturday, August 20, 2011

त्र्योदशोऽध्यायः (अंतिम भाग) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग



त्र्योदशोऽध्यायः (अंतिम भाग)
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

कार्य व कारण हैं प्रकृति में, जीवात्मा सुख-दुःख भोगे
संग गुणों का कारण बनता, विभिन्न योनियों को वह धारे

देह में स्थित जो है आत्मा, जान उसे ही तू परमात्मा
साक्षी रूप में वही उपद्रष्टा, सम्मति देने से अनुमन्ता

वही है भर्ता और भोक्ता, महेश्वर भी वही कहाए
शुद्ध सच्चिदानन्द घन है, परमात्मा भी वही कहाये

जो जानता इन दोनों को, वह फिर जन्म नहीं लेता  
कोई शुद्ध बुद्धि से जाने, ध्यानयोग से कोई पाता

श्रवण मात्र से भी हे अर्जुन, भवसागर को तर जाते हैं
भिन्न भिन्न मार्ग से जाकर, एक उसी को सब पाते हैं

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संयोग से, सारे प्राणी सदा उपजते
स्थावर-जंगम जो भी दीखते, चर-अचर सब इससे होते

नष्ट हो रहे इन भूतों में, परमात्मा को जो भी देखता
सम भाव को प्राप्त हुआ वह, बस यथार्थ में वही देखता

जो सबमें परम को देखे, स्वयं को स्वयं से नष्ट न करता
देख आत्मा को अकर्ता, परमगति को वह है पाता

प्रकृति में सब कार्य हो रहे, विकार ग्रस्त होती है वही
पुरुष सदा एक सा रहता, अकम्पित, निर्लिप्त सदा ही

जैसे लिप्त नहीं होता है, सूक्ष्म अति आकाश किसी में
देह में स्थित होने पर भी, है अलिप्त आत्मा देह से

एक सूर्य प्रकाशित करता, ज्यों सारे जग को हे अर्जुन
एक आत्मा के प्रकाश से, प्रकाशित है यह सारा तन  

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस भेद को, जो तत्व से है जानता
मुक्त हुआ वह जड़ प्रकृति से, कर्म उसे फिर नहीं बांधता 

Monday, June 20, 2011

भगवद्गीताका भावानुवाद, पंचमोऽध्यायः


पंचमोऽध्यायः
कर्मसन्यासयोग (शेष भाग)

नव द्वारों वाले इस घर में, ज्ञानीजन है सुख से रहता
न करता न ही करवाता, मन से सब कर्मों को तजता

रचता नहीं संयोग ईश्वर, कर्मों व कर्मों के फलों का
निज स्वभाव ही करा रहा है, वह न रचे कर्तापन को

ग्रहण करे न पाप-पुण्य को, ईश्वर सबसे रहे अलिप्त
ज्ञान ढका है अज्ञान से, मानव होते जिससे मोहित

तत्वज्ञान से नष्ट हो गया, जिसका वह घोर अज्ञान
सूर्य समान चमकता ईश्वर, उसके अंतर में यह मान

जिसका मन, बुद्धि है अर्पित, एकीभाव से उसमें स्थित
परमगति को पा लेता वह, हो जाता है पाप रहित

ऐसा ज्ञानी भेद करे न, ब्राह्मण, गज, गौ, चांडाल, श्वान में
समदर्शी है सदा विनयी वह, बढ़ा हुआ है जो ज्ञान में

समभाव में टिका हुआ जो, जीत लिया उसने संसार
सच्चिदानंद घन परमात्मा में, स्थित सम और निर्विकार

प्रिय पाकर जो हो न हर्षित, न उद्वगिन हो पाकर अप्रिय
स्थिर बुद्धि, संशय रहित वह, ब्रह्म वेत्ता परम को प्रिय

बाहर से टूटी आसक्ति, आत्मा के आनंद में डूबा
परमात्मा के ध्यानयोग में, अक्षय परमानंद को पाता

दुःख के हेतु भोग हैं सारे, हैं अनित्य जो लगें प्रिय
बुद्धिमान जो, दूर ही रहता, नहीं हैं उसके हित रम्य

देह नाश से पहले जो नर, काम-क्रोध पर विजय पा सके
वही पुरुष कहलाता योगी, केवल वही सुखी हो सके  

आत्मा में ही सुख पाता जो, आत्मा में रमण करता है
परमात्मा से एक हुआ जो, शांत ब्रह्म को पा लेता है

पाप नष्ट हुए हैं जिसके, संशय ज्ञान से मिट गए सारे
सर्व हितैषी, परम में स्थित, शांत ब्रह्म नित उसे पुकारे

काम-क्रोध से रहित हुआ, मन वश में, परम को पाया
ऐसा ज्ञानी चहुँ ओर से, शांत ब्रह्म में ही समाया

विषय भोग तज ध्यान निमग्न, इच्छा, भय क्रोध को त्यागे
प्राण-अपान को सम करके, आज्ञा चक्र में ध्यान टिकाये

मोक्ष की इच्छा प्रबल है जिसमें, मुक्त हुआ ही उसको जानो
मन, बुद्धि, इन्द्रियों को जीते, सदा परम में स्थित मानो  

ईश्वरों का भी जो ईश्वर है, सारे यज्ञों का जो भोक्ता
जन-जन का सुहृद है वह, ज्ञानी ऐसा ही मानता