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Tuesday, May 29, 2012

बालकाण्डम् तृतीयः सर्गः


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


तृतीयः सर्गः
वाल्मीकि मुनि द्वारा रामायण काव्य में निबद्ध विषयों का संक्षेप से उल्लेख

नारद जी से सुनी रामायण, धर्म, अर्थ, मुक्ति प्रदायिनी
पुनः हृदय में चिंतन करते, मुनि राम की कथा सुहावनी

कुश के आसन पर विराजे, हुए समाधि में निमग्न
रामचरित्र का चिंतन करते, साथ हृदय में अनुसंधान

राजा-रानी, राम-सीता की, कितनी बातें प्रकट हुईं
हँसना, बोलना, चलना आदि,  देखे साक्षात सभी

वन की सारी लीलाएं भी, सब उनकी दृष्टि में आयीं
योग आश्रय से मुनिवर ने, हर घटना प्रत्यक्ष पायी

सबके प्रिय राम का जीवन, योग समाधि में देखा
महाकाव्य रचने हेतु तब, वाल्मीकि ने की चेष्टा

नारद जी ने कहा था जैसे, बैठे लिखने क्रम में उसी
सागर रत्नों की खानि ज्यों, महाकाव्य गुण, अलंकार, की

सब श्रुतियों का सारभूत यह, हर चित्त को हरने वाला
चारों पुरुषार्थ का दाता, कर्णों को प्रिय लगने वाला

जन्म राम का, पराक्रम भी, क्षमा, सत्य व सौम्य भाव
वर्णन किया कवि ने इसका, लोकप्रियता व सर्व प्रिय भाव

विश्वामित्र के साथ घटीं थीं, जो अद्भुत घटनायें उस वन
धनुषभंग, ब्याह सीता सँग, उर्मिला का भी किया चित्रण

राम-परशुराम संवाद, गुण उनके, अभिषेक की सारी बातें
केकैयी की दुष्टता, शोक दशरथ का, विघ्न राज्यभिषेक में




Wednesday, March 14, 2012

शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

पिछले वर्ष अक्तूबर की २३ तारीख को मैंने यह श्रृखला आरम्भ की थी. आज १४ मार्च २०१२ को इसका अंतिम भाग प्रस्तुत कर रही हूँ. आप सभी का सहयोग मिला और यह कार्य सम्पन्न हुआ. आगे भी इसी तरह का कार्य करने की इच्छा है आपमें से कोई सुझाव दें तो स्वागत है.

 श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


उपसंहार
शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

बंधन, मुक्ति हैं माया में, नहीं आत्मा में हो सकते
सर्प का होना या न होना, भ्रम है क्रिया हीन रज्जु में

बंधन है अज्ञान के कारण, दूर हुआ तो मुक्ति घटती
ब्रह्म को कैसे ढके आवरण, द्वैत नहीं मानती श्रुति

सूर्य को ढका हम कहते, चाहे मेघ ढके आँखों को
ब्रह्म को न ढक सकता कोई, बुद्धि के ही गुण हैं दोनों

ब्रह्म सदा एक अविनाशी, होना, न होना न उसमें
बुद्धि में ही भाव, अभाव, बंध, मोक्ष कल्पित माया में  

निर्मल, शांत, निरंजन, है वह, नभ जैसा विस्तीर्ण विशाल
निरवयव, निष्क्रिय ब्रह्म में, कैसे हो कल्पना जाल

नहीं नाश होता है उसका, ना मृत्यु ही संभव है
न कोई साधक न मुमुक्षु, सदा आत्मा मुक्त ही है

दोष रहित, हे तृष्णा शून्य, तुझे पुत्र समान ही जान
गुह्य ज्ञान कहा है मैंने, सकल शास्त्र का अनुपम सार

शिष्य की विदा

किया शिष्य ने नमन गुरु को, मुक्त हुआ किया प्रस्थान
आनंद मग्न हुए गुरुवर भी, धरती पर फिर करें विहान

आत्मज्ञान का यह निरूपण, कहा गया साधक के हित में
बोध करें सुगमता से वह, पढ़ संवाद गुरु-शिष्य में

शास्त्र श्रवण से हुए शुद्ध जो, शांत चित्त, मुमुक्षु जन
 हितकारी उपदेश को पढ़कर, करें ज्ञान का समुचित आदर

जग के पथ में दाह बहुत है, हैं दुःख रूपी सूर्य की किरणें
जल की इच्छा से भ्रमते हैं, मरुथल में जन थके-थके से

अति निकट ही ब्रह्म सिंधु है, जिसमें भरा है अमृत सा जल
शंकराचार्य की मोक्ष प्रदायिनी, वाणी देती है अद्भुत फल   

इति

Wednesday, September 28, 2011

साधन-चतुष्टय (चार साधन)



श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

साधन-चतुष्टय (चार साधन)

ज्ञानी और मनस्वी जन ने, चार मुख्य साधन बतलाये
जिनका पालन करने से ही, मन आत्मा में टिक जाये

नित्य-अनित्य वस्तु विवेक ही, पहला साधन है ज्ञान का
वैराग्य जिसने साधा है, तजे लोभ दोनों ही लोक का

षट् सम्पति का अधिकारी, ज्ञान साधना कर सकता है
मोक्ष की हो अभिलाषा जिसमें, वही ब्रह्म को पा सकता है

शम, दम, उपरति और तितिक्षा, संग हो श्रद्धा व समाधान
कहलातीं ये षट् सम्पतियाँ, जिनके द्वारा होता ज्ञान

ब्रह्म सत्य है जगत है मिथ्या, जो ऐसा निश्यच रखता
नित्य-अनित्य वस्तु विवेक, उस के ही उर में पलता

निज देह से ब्रह्म लोक तक, सब कुछ है अनित्य, जो जाने
क्या देखना, सुनना, कहे जो, उसमें ही वैराग्य मानें

व्यर्थ हैं विषय सुख सारे, हो विरक्त स्वय में रहता
मन का यूँ निग्रह करना ही, शम ऐसा है कहलाता

कर्मेंद्रियां व ज्ञानेद्रियाँ, विषयों से लौटा ली जातीं
अपने में ही शांत हो रहतीं, यही दम सम्पति कहलाती

मन की वृत्ति स्वयं में रहती, बाहर जाकर नहीं भटकती
इसी अवस्था को चित्त की, ज्ञानी कहते हैं उपरति 

Friday, August 26, 2011

चतुर्द्शोऽध्यायः (अंतिम भाग) गुणत्रयविभागयोग



चतुर्द्शोऽध्यायः (अंतिम भाग)
गुणत्रयविभागयोग

अर्जुन बोले हे केशव, क्या लक्षण हैं गुणातीत के
गुणातीत कैसे हो कोई, कैसे हों आचरण उसके

सत्व गुण का कार्य प्रकाश है, प्रवृत्ति रजो गुण का
जो प्रमाद को सदा बढाये, मोह है कार्य तमो गुण का

जो न चाहे इन तीनों को, न ही द्वेष करे इनसे
साक्षी भाव में जो है रहता, गुणों को ही कारण समझे

आत्म भाव में रहता निशदिन, सुख-दुःख दोनों सम जिसको
मिटटी, पत्थर, स्वर्ण एक से, निन्दा-स्तुति सम जिसको

जिसकी भक्ति है अखंड, अनन्य भाव से मुझको भजता
तीनों गुणों से पार हुआ वह, मुझ ब्रह्म से आ मिलता

जो अविनाशी परब्रह्म है, मैं ही हूँ आश्रय उसका
जो अखंड आनंद एकरस, है शाश्वत उस अमृत का