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Friday, April 24, 2026

सुतीक्ष्ण मुनि की आज्ञा से राम का अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:



पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


कुछ काल तक बसे रहे वहाँ, सम्मानित होकर मुनियों से

कहा एक दिन श्रीराम ने, विनीत भाव से मुनि सुतीक्ष्ण से 


मैंने सुना है, निकट कहीं पर, मुनि अगस्त्य वास करते हैं 

अति विशाल जंगल के कारण, उनके दर्शन नहीं किए हैं 


उनका वह आश्रम कहाँ हैं, मनोरथ मेरा उनसे मिलना

सीता और लक्ष्मण सहित, मैं चाहूँ उनके दर्शन पाना


‘स्वयं उनकी सेवा करना चाहूँ’,  श्रीराम का वचन सुना

सुतीक्ष्ण मुनि अति हुए प्रसन्न, तब दशरथनंदन से यह कहा 


मैं भी यही चाहता था, कि, आप सभी मिलें जाकर उनसे 

उसका पता मैं अभी बताता, अगस्त्य मुनि जहाँ हैं रहते 


चार योजन दक्षिण में जायें, वहाँ रहते उनके भाई 

बहुत सुंदर विशाल आश्रम, पिप्पली वन पड़ेगा दिखाई 


धरती वहाँ अति समतल है, बहुतायत है फूलों-फलों की

चक्रवाक, हंस, कारंडव,  सरवर में आबादी खगों की 


एक रात्रि वहीं बिताकर, प्रातः दक्षिण दिशा को जायें 

योजन भर चलने के बाद, मुनि अगस्त्य का आश्रम पाएँ 


आश्रम अति ही रमणीक है, घिरा है बहु संख्यक वृक्षों से 

सीता व लक्ष्मण के साथ, वहाँ सानंद विचरण आप करें 


निश्चय किया है यदि आपने, इसी मार्ग पर बढ़ते जायें 

आज ही आरंभ करें गमन, मुनि अगस्त्य के दर्शन पाएँ 


मुनि का वचन जब सुना राम ने, भाई सहित प्रणाम किया 

सीता तथा उसे संग लेकर, आश्रम से प्रस्थान किया 


राह में मिले विचित्र वन कई, पर्वतमाला व नदियाँ भी 

 हुए देखकर अति सुखी वे, लक्ष्मण को राम ने बात कही 


पुण्यकर्म का करते अनुष्ठान, अगस्त्य मुनि के भाई का 

सुतीक्ष्ण मुनि के कहे अनुसार, आश्रम यहाँ दिखाई पड़ता 


फूलों, फलों के भार से झुक, वृक्ष सहस्रों शोभा पाते 

पकी पीपलियों की कटु गंध, संग पवन देव लिए आते 


Friday, April 17, 2026

प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

अष्टम: सर्ग:


प्रातः काल सुतीक्ष्ण से विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीता का वहाँ से प्रस्थान 


सुतीक्ष्ण मुनि से पूजित होकर, भली-भाँति वह रात्रि बितायी 

प्रातःकाल समय से उठकर, स्नानादि दिनचर्या निभायी 


विधिपूर्वक तीनों ने मिलकर, अग्नि व देवों की पूजा की 

सूर्यदेव का दर्शन करके, स्वयं जा मुनिवर से भेंट की 


भगवन ! आपने वन्द्य  होकर, हम लोगों का किया सत्कार  

अब यहाँ से जाना चाहते, करें हमारी विनय स्वीकार  


दण्डकारण्य में रहने वाले, मुनियों से मिलना चाहें 

तेजस्वी, श्रेष्ठ तापसों संग, जाने की हमें आज्ञा दें 


सूर्य प्रचंड नहीं हुए जब तक, उससे पूर्व  प्रस्थान करें 

ऐसी ही अभिलाषा रखते, राम ने अति मधुर  वचन कहे 


चरणों का स्पर्श कर रहे थे, उन्हें उठाया सुतीक्ष्ण मुनि ने 

लगा ह्रदय से कहा स्नेह से , जायें संग सिया -लक्ष्मण के 


मंगलमय हो मार्ग आपका, विघ्न और बाधा मत आयें 

पुनीत ह्रदय वाले मुनियों के, आश्रमों के दर्शन पाएँ 


सुंदर वन, सरवर, झरने भी, इस मार्ग में अनेक मिलेंगे 

झुंड मृगों के, सुंदर पंछी, पंकज आदि पुष्प देखेंगे 


हे लक्ष्मण !  तुम भी संग जाओ, किंतु लौट पुन: आओ यहीं 

 उन दोनों ने की परिक्रमा, अच्छा, कहकर उन मुनिवर की


बड़े नेत्र वाली सीता ने, उनको धनुष-बाण पकड़ाये

बाँध पीठ पर तूणीरों को, धनुष लिए वे बाहर निकले 


दोनों वीर अति रूपवान थे, खड्ग और धनुष धारण कर 

सीता सहित  किया प्रस्थान, पूज्य मुनिवर की आज्ञा लेकर 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 




Wednesday, April 15, 2026

सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम में ठहरना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

सप्तम: सर्ग: 


 सीता और भ्राता सहित श्रीराम का सुतीक्ष्ण के आश्रम पर

जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो

रात में वहीं ठहरना 


सीता, लक्ष्मण व ब्राह्मणों को, लेकर अपने साथ श्री राम 

चल पड़े सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम, तय किया दीर्घ मार्ग अगाध 


कुछ नदियों को पार किया, फिर ऊँचा पर्वत पड़ा दिखायी 

उससे आगे बढ़ते गये, इक्ष्वाकु कुल के दोनों भाई 


अति घोर वन के एकांत में, मुनिवर आश्रम में बैठे थे 

वृक्ष प्रचुर फल-फूल से लदे, इधर-उधर कई चीर टंगे 


श्रीराम ने विधिवत् मुनि को, करके प्रणाम दिया निज परिचय 

श्रीरामचन्द्र  का दर्शन करके, सुतीक्ष्ण मुनि हुए ज्यों धन्य 


आलिंगन में बाँधा उनको, दोनों बाहों से मुनिवर ने 

मैं प्रतीक्षा किया करता था, हुआ सनाथ आश्रम आपसे 


इस पृथ्वी पर देह त्यागकर, इसके कारण गया नहीं मैं 

चित्रकूट पर जब रहते, सुनी थी आपकी गाथा मैंने


देवराज इंद्र ने स्वयं आ, मुझको शुभ लोक प्रदान किए 

उन लोकों में आप विहारें, देता हूँ मैं आपको उन्हें 


जैसे इंद्र से ब्रह्मा बोलें,  राम ने कहे वचन वैसे

प्रदान कराऊँगा आपको, वे सब लोक तो स्वयं ही मैं


इस समय भिन्न अभिलाषा लाया, आप इसे ही पूर्ण करें 

सबके हित में तत्पर मुनि, कहिए, मैं कहाँ रहूँ इस वन में ?


श्रीराम के यह कहने पर, मधुर वाणी में मुनि यह बोले 

यही आश्रम है उत्तम अतीव, यहीं पर आप निवास करें 


फल-मूल उपलब्ध सदा रहें, ऋषिगण आते-जाते रहते 

बिना भय के झुंड मृगों के, शोभा दिखाकर वापस जाते 


थोड़ा सा उपद्रव मृगों का, और नहीं कोई दोष यहाँ 

वचन सुना महर्षि का जब, लेकर धनुष-बाण राम ने कहा 


यदि उपद्रवकारी मृग को, कभी बाण की नोक से मारूँ 

होगा यह अपमान आपका, जिसको मैं कैसे सह पाऊँ 


इसीलिए मैं अधिक समय तक, नहीं रहूँगा इस आश्रम में

इतना कहकर चुप हुए, गये सांध्यकाल उपासना करने 


रात हुई स्वयं सुतीक्ष्ण मुनि, गये उनके हित भोजन लेकर 

पुरुष शिरोमणि भाई  व सीता, तृप्त हुए अन्न वह पाकर 




इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के

अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 


Tuesday, April 14, 2026

वानप्रस्थ मुनियों को श्रीराम का आश्वासन देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षष्ठ: सर्ग:

वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचारों से अपनी रक्षा के लिए श्रीरामचंद्र जी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना 

 
इस वन के निवासी मुनिजन, अनाथ की भाँति मारे जाते

 रक्षक आप बनें हमारे, वानप्रस्थ समूह से आते 


पंपा, तुंगभद्रा तट पर, मंदाकिनी के तट पर रहते 

चित्रकूट पर्वत के किनारे, राक्षसों से पीड़ित होते 


उनसे अपनी रक्षा के हित, शरण आपकी लेने आये 

नहीं कोई आपसे बढ़कर, इस आपद से हमें बचायें 


उन तापसी मुनियों के मुख से, विनय सुनकर कहा राम ने 

मुनियों का आज्ञा पालक हूँ, आप प्रार्थना करें न ऐसे


पिता की आज्ञा पालन हित, मैं इस वन में प्रवेश करूँगा 

आपकी सेवा के अवसर से, खुद को मैं धन्य मानूँगा 


करूँ  सिद्ध प्रयोजन आपका, दैव वश मैं यहाँ आ पहुँचा 

सेवा का अवसर मिला है,  वनवास शुभ फलदायक होगा


मुनियों से जो शत्रुता रखें, उनका मैं संहार चाहता 

आप सभी महर्षिगण देखें, भाई सहित पराक्रम मेरा


इस प्रकार देकर आश्वासन, धर्मशील श्रीराम व लक्ष्मण 

तपस्वी महात्मा जनों के साथ, गये सुतीक्ष्ण मुनि के निकट   



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्डमें

छठा सर्ग पूरा हुआ।