श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
द्वादश: सर्ग:
श्रीराम आदि का अगस्त्यके आश्रम में प्रवेश,
अतिथि सत्कार तथा मुनि की ओर से
उन्हें दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति
लक्ष्मण ने प्रवेश कर आश्रम में, मुनि के शिष्य से बात की
दशरथ पुत्र राम आये हैं, सीता साथ हैं, सहधर्मिणी
मैं उनका छोटा भाई हूँ, उनका भक्त व सदा हितैषी
लक्ष्मण मेरा नाम संभवत:, कान में आपके पड़ा कभी
पितृ आज्ञा से वन को आये, मुनि अगस्त्य से मिलना चाहें
कृपया आप उन्हें जाकर, श्रीराम का यह सन्देश दे दें
तब ‘अच्छा’ कहकर वह तपोधन, अग्निशाला में चला गया
हाथ जोड़कर मुनि अगस्त्य को, लक्ष्मण का यह संदेश कहा
राजा दशरथ के दो पुत्र, श्रीराम व लक्ष्मण हैं पधारे
जो कुछ भी कहना या करना, अब इस बारे में, आप कहें
कहा मुनि ने, सौभाग्य है मेरा, स्वयं राम मिलने आये
मेरे मन में अभिलाषा थी, एक बार वह यहाँ पधारें
पत्नी सहित राम, लक्ष्मण को, मेरे पास यहाँ ले आओ
पहले ही क्यों नहीं लाए, जाओ, शीघ्र ही उनको लाओ
हाथ जोड़कर कहा शिष्य ने, ले आता हूँ मैं, अभी उन्हें
शीघ्रता से लक्ष्मण से कहा, राम आश्रम में प्रवेश करें
शिष्य को ले गये द्वार पर, लक्ष्मण ने राम से मिलवाया
बड़ी विनय से शिष्य उन्हें तब, आश्रम के भीतर ले आया
शांतभाव से रहने वाले, हिरणों से वह भरा हुआ था
ब्रह्माजी और अग्निदेव का, स्थान आश्रम में तब देखा
विष्णु, महेंद्र, सूर्य,व चंद्रमा, भग, कुबेर,गायत्री व धाता
वायु, वरुण, वासु, अनंत, गरुड़, कार्तिकेय तथा विधाता
के स्थानों का किया निरीक्षण, पृथक-पृथक व धर्मराज के
इतने में मुनि अगस्त्य भी, बाहर आ गये अग्निशाला से
मुनियों के आगे-आगे थे, देख अगस्त्य को, कहा राम ने
तपस्या के निधि हैं मुनिवर, विशिष्ट तेज से दीप्त हो रहे
सूर्यतुल्य महर्षि अगस्त्य के, बारे में ऐसा शुभ कहकर
उनके चरणों का स्पर्श किया, रामचंद्र ने आगे बढ़कर
हाथ जोड़कर खड़े हुए जब, मुनि ने निज ह्रदय से लगाया
कुशल-क्षेम तब उनका पूछा, आसन, जल देकर बैठाया
प्रथम अग्नि में आहुति दी, फिर भोजन भी दिया अर्घ्य देकर
फल, मूल, फूल आदि से उनका, पूजन किया प्रसन्न होकर
तत्पश्चात् मुनि अगस्त्य ने, श्रीराम से सुंदर वचन बोले
दिव्य धनुष आपको देता, किया निर्माण विश्वकर्मा ने
सुवर्ण और हीरे जड़े हैं, विष्णु भगवान ने दिया इसे
सूर्य समान हैं उत्तम बाण, ब्रह्मा जी द्वारा दिये हुए
इंद्र देव के दिये दो तरकस, बाण से सदा भरे रहते
सुवर्ण मूठ वाली तलवार, म्यान भी बनी है सोने से
पूर्वकाल में श्रीविष्णु जी ने, इस धनुष से संग्राम किया
असुरों को पराजित करके, देवताओं का धन लौटाया
आप ग्रहण करें इन सबको, जैसे इंद्र वज्र ग्रहण करते
ऐसा कहकर दिये वे आयुध, तत्पश्चात् वचन यह कहते
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।
बहुत सुंदर
ReplyDeleteWelcome to blog new post
स्वागत व आभार!
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