Friday, May 15, 2026

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और भरत की प्रशंसा



 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षोडश: सर्ग:


लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और

भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का

उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान 


पछुआ हवा स्वभाव से शीतल, दुगनी ठंडी अब तुहिन से

जौ-गेहूं खेतों से युक्त, ढके हुए हैं वन कोहरे से


सूर्योदय काल में सुशोभित, क्रौंच व सारस कलरव करते

जल के पास ही बैठे पक्षी, नहीं उतरते हैं नीर में 


खजूर-पुष्प जैसा आकार, सुनहरी बालियों में धान हैं 

भरी हुए चावल से बालें, लटक गयीं शोभा पाती हैं 


ढकी कुहासे से व फैलतीं, किरणों से उपलक्षित होकर 

दूर उदित हुए सूर्यदेव अब, लगते हैं ज्यों हो निशाकर 


रक्तिम, पीली और सफ़ेद, धूप धरती पर फैल रही है 

सुबह तो बलहीन ही रहती, दोपहरी में सुखदात्री है 


ओस की बूँदे पड़ने से जहाँ, भीगी हुई सी है घास 

वनभूमि वहाँ शोभित होती, पाकर सूर्यदेव का उजास 


अति प्यासा है जंगली हाथी, जल का स्पर्श तो करता है 

ठंडक असह्य हो जाने से, सूंड तुरंत सिकोड़ लेता है 


अंधकार व तुहिन से रात, कोहरे से प्रातःकाल ढकीं

पुष्पहीन वन की श्रेणियाँ, जान पड़ती हैं सोयी हुईं


नदियों के जल ढके भाप से, तटों से ही प्रकाश में आतीं 

सारस आदि जलीय पक्षी भी, जाने जाते कलरव से ही


मंद सूर्य रश्मियों के कारण, शीतल हुआ जल शिखरों का 

कमलों के दल जर्जर हुए, पाले से घटी उनकी शोभा 


भरत आपके लिए दुखी हैं, नगर में ही तपस्या करते 

राज्य, मान, सभी भोग त्याग कर, शीतल भूमि पर ही सोते 


निश्चय ही इस घड़ी भरत भी, स्नान हेतु सरयू पर जाते 

मंत्री व प्रजाजनों संग, नदी के जल में डुबकी लगाते 


सुख में पले सुकुमार भरत, वनवासी हो रहते कैसे

रात्रि के पिछले प्रहर में, वह कष्ट शीत का सहते कैसे 


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