Thursday, May 14, 2026

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


षोडश: सर्ग:

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन और

भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का उन दोनों के

साथ गोदावरी नदी में स्नान 


उस आश्रम में रहते-रहते, शरद काल बीतने को आया 

हुआ आगमन हेमंत ऋतु  का, जो श्रीराम आदि को भाया 


एक प्रातः रघुकुल नंदन, गोदावरी के तट पर पहुँचे 

सीता जी उनके पीछे ही थीं, घड़ा लिए लक्ष्मण भी थे 


जाते-जाते लक्ष्मण यह बोले, प्रियभाषी हे ! भ्राता राम 

आ पहुँचा जो प्रिय आपको,  शीतल, कोमल हेमंत काल 


अलंकृत हो गया संवत्सर, फसल रबी की लहराती है 

जल शीतल प्रतीत होता है, अग्निशिखा सबको भाती है 


नवसस्येष्टि अनुष्ठान की, घड़ियों में जो पूजा करते 

देवों, पितरों को देकर अन्न, सत्पुरुष निष्पाप हो गये 


अन्नप्राप्ति की कामना, हर जनपद वासी की पूर्ण हुई 

गोरस की भी बहुतायत है, सेनाएँ राजा की विचरतीं 


यमसेवित दक्षिण दिशा का, सूर्यदेव सेवन करते अब

सिंदूर वंचित नारी सी, होती न उत्तर दिशा सुशोभित


स्वभाव से हिमालय पर्वत, घनीभूत हिम से सदा रहता 

किंतु सूर्य दक्षिणगामी हुए, अधिक हिम का संचय करता  


दोपहरी में स्पर्श धूप का, दिन में करने देता विचरण

सूर्यदेव सौभाग्यशाली बहुत, सुसेव्य होने के कारण


सेवन के अब योग्य नहीं हैं, छाँह व नीर अभागे लगते 

कुहासा भी छाया रहता, ठंडी पवन के झोंके लगते 


पाला पड़ने से वृक्ष के, पत्ते झर गये, जंगल सूने 

गलित हुए  कमल हिम स्पर्श से, बड़ी होने लगी हैं रातें


कोई नहीं रात्रि को सोता, खुले आसमान के नीचे  

पौषमास की ये रात्रियाँ , हुई हैं धूसर हिमपात से 


सौभाग्य चंद्रमा का अब तो, सूर्यदेव में चला गया है 

धूमिल जान पड़ता है चंद्रमा, मलिन हुए दर्पण की भाँति 


पूर्णिमा की चाँदनी रातें, तुहिन बिंदु से ढकी हुई है 

जैसे सीता हुई साँवली, पूर्ववत  न शोभा पाती है 


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