Friday, May 15, 2026

लक्ष्मण द्वारा भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का गोदावरी नदी में स्नान


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षोडश: सर्ग:

लक्ष्मण के द्वारा हेमंत ऋतु का वर्णन

और भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का

उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान 


 आँखें जिनकी कमल सी सुंदर, अंगकांति श्याम है जिनकी 

उदर का जिनके भान न होता, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, मृदुभाषी 


शत्रु दमन श्रीमान भरत ने, आपका ही आश्रय लिया है 

स्वर्गलोक पर विजय भी पा ली, स्थित तप में, वनवास लिया है 


प्राय: माता के ही गुणों का, अधिक अनुसरण मानव करते

मिथ्या किया प्रमाणित इसको, भरत ने अपने बर्ताव से 


 जिनके स्वामी हैं राजा दशरथ, साधु समान पुत्र भरत सा 

कैसे उन माता कैकेयी ने, की क्रूरता दुष्ट बुद्धि पा  


धर्मपरायण लक्ष्मण जिस घड़ी, स्नेहवश ऐसा कहते थे

निंदा सही नहीं गयी माँ की, श्री राम ने कहे वचन ये 


 मत करो माता की निंदा, भरत के बारे में ही बोलो 

परम प्रिय और मनभावनी, याद आ रहीं भरत की बातें, 


दृढ़ता पूर्वक यद्यपि मैंने, निश्चय किया वन में रहूँगा 

भरत के स्नेह में हो संतप्त, विचलित हो उठा मन मेरा 


कब आएगा वह दिन भाई, जब मैं साथ तुम्हारे चल कर 

भरत-शत्रुघ्न से मिलूँगा, कहते हुए वे पहुँचे तट पर 


लक्ष्मण व सीता के साथ, गोदावरी नदी में किया स्नान 

 देवों व पितरों का तर्पण, सूर्यदेव का किया उपस्थान 


सीता और लक्ष्मण के संग, उसी तरह शोभा पाते थे, 

देवी व नंदी संग ज्यों शिव, अवगाहन करके गंगा में 


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ।


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