Tuesday, May 12, 2026

लक्ष्मण द्वारा सुंदर पर्णशाला का निर्माण तथा उसमें सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का निवास


 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

पञ्चदश: सर्ग:


पञ्चवटी के रमणीय प्रदेश में श्रीराम की आज्ञा से 

लक्ष्मण द्वारा सुंदर पर्णशाला का निर्माण 

तथा उसमें सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का निवास 


पुष्पों, गुल्मों व लता-वल्लरी, ताल, तमाल, साल से युक्त 

खजूर, कटहल, जलकदंब, तिनिश, पुंनाग, आम, केवड़ा, धव


चंपा, स्यंदन, चंदन, कदंब, पर्णास, लक, अश्वकर्ण, शमी 

पाटल, खैर पलाश वृक्ष से, घिरे हुए पर्वत शोभित अति 


अति पवित्र व रमणीय स्थान, अनेक पशु-पक्षी यहाँ रहते 

हम पक्षिराज  जटायु के साथ, सुखपूर्वक निवास करेंगे  


श्रीराम के ऐसा कहने पर, अरिहंता वीर लक्ष्मण ने 

 आश्रम का निर्माण किया तब , शीघ्र निवास हेतु  भाई के  


विस्तृत पर्णशाला रूप में, आश्रम का निर्माण हुआ था 

पहले वहाँ एकत्र की मिट्टी, एक दीवार खड़ी कर दी 


फिर सुंदर व सुदृढ़ खम्भों पर, तिरछे विशाल  बांस रखे थे  

 बांसों के रख जाने से वह, कुटी सुंदर प्रतीत होती थी 


उन बाँसों पर फिर उन्होंने, शमी की शाखाएँ फैला दीं 

बाँध दिया मज़बूत रस्सी से, ऊपर से कुछ, कास, बिछाए 


सरकंडे, पत्ते बिछाकर, भली भाँति छा डाला कुटी को 

समतल कर नीचे की भूमि,कुटी को बड़ा रमणीय बनाया 


इस प्रकार लक्ष्मण जी ने, सर्वोत्तम एक  निवास बनाया 

श्रीराम के योग्य था जो, देखने में भी बहुत सुंदर था 


तब सीता के साथ श्रीराम,  सुंदर नये आश्रम में गये 

बहुत प्रसन्न हुए देखकर, कुछ काल तक भीतर खड़े रहे 


तत्पश्चात हर्ष में भरकर, लक्ष्मण को हृदय से लगाया

दोनों भुजाओं से कस पकड़, स्नेह के साथ उसे बताया 


सामर्थ्य शाली हे वीर लक्ष्मण ! मैं तुम पर अति प्रसन्न हूँ 

अति महान कार्य किया तुमने, उसके लिए भला मैं क्या दूँ 


तुम्हारे इस कृत्य के लिए, समुचित नहीं कोई पुरस्कार   

इसीलिए यह गाढ़ आलिंगन, तुमको मैंने किया प्रदान


मनोभाव अति शीघ्र समझते, तुम कृतज्ञ और हो धर्मज्ञ

  तुम जैसे पुत्र के कारण, अब भी जीवित पिता इस जग में 


अपनी शोभा को दिखाया, ऐसा कह लक्ष्मण से राम ने 

प्रचुर फलों से युक्त जो थी, पंचवटी में लगे थे रहने


सीता व लक्ष्मण से सेवित, वह कुछ काल रहे वहाँ ऐसे 

  निवास देवतागण करते हैं, महास्वर्गलोक में जैसे



 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ। 

 


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