श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
एकादश: सर्ग:
पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर
श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक
रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा
अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन
देव, गंधर्व, सिद्ध व महर्षि, नियमित यहाँ वास करते हैं
सेवा में रह अगस्त्य मुनि की, उनकी उपासना करते हैं
यह ऐसे प्रभावशाली हैं, अस्त्यवादी नहीं टिक सकता
क्रूर, नृशंस, शठ, पापचारी, जीवित यहाँ नहीं रह सकता
धर्म की आराधना के लिए , देव, यक्ष, नाग, खग रहते
वपु त्याग कर इस आश्रम में, सिद्ध महात्मा स्वर्ग को जाते
नियमित सत्कर्म जो करते, करते देवताओं की पूजा
यक्षत्व,अमरत्व व राज्यों की, प्राप्ति होती उनके द्वारा
हम लोग यहाँ आ पहुँचे हैं, लक्ष्मण ! तुम पूर्व प्रवेश करो
सीता और मेरे आने की, महर्षियों को सूचना दो
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के
अरण्यकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ।

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