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Friday, May 1, 2026

श्रीराम का अगस्त्यके आश्रम में प्रवेश, मुनि की ओर से दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्



द्वादश: सर्ग:


श्रीराम आदि का अगस्त्यके आश्रम में प्रवेश, 

अतिथि सत्कार तथा मुनि की ओर से  

उन्हें दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति 


लक्ष्मण ने प्रवेश कर आश्रम में, मुनि के शिष्य से बात की 

दशरथ पुत्र राम आये हैं, सीता साथ हैं, सहधर्मिणी 


मैं उनका छोटा भाई हूँ, उनका भक्त व सदा हितैषी 

लक्ष्मण मेरा नाम संभवत:, कान में आपके पड़ा कभी 


पितृ आज्ञा से वन को आये, मुनि अगस्त्य से मिलना चाहें 

कृपया आप उन्हें जाकर, श्रीराम का यह सन्देश दे दें 


तब ‘अच्छा’ कहकर वह तपोधन, अग्निशाला में चला गया 

हाथ जोड़कर मुनि अगस्त्य को, लक्ष्मण का यह संदेश कहा 


राजा दशरथ के दो पुत्र, श्रीराम व लक्ष्मण हैं पधारे 

जो कुछ भी कहना या करना, अब इस बारे में, आप कहें 


कहा मुनि ने, सौभाग्य है मेरा, स्वयं राम मिलने आये 

मेरे मन में अभिलाषा थी, एक बार वह यहाँ पधारें 


पत्नी सहित राम, लक्ष्मण को, मेरे पास यहाँ ले आओ 

पहले ही क्यों नहीं लाए, जाओ, शीघ्र ही उनको लाओ 


हाथ जोड़कर कहा शिष्य ने, ले आता हूँ मैं, अभी उन्हें

शीघ्रता से लक्ष्मण से कहा, राम आश्रम में प्रवेश करें 


शिष्य को ले गये द्वार पर, लक्ष्मण ने राम से मिलवाया 

बड़ी विनय से शिष्य उन्हें तब, आश्रम के भीतर ले आया 


शांतभाव से रहने वाले, हिरणों से वह भरा हुआ था 

ब्रह्माजी और अग्निदेव का, स्थान आश्रम में तब देखा 


विष्णु, महेंद्र, सूर्य,व चंद्रमा, भग, कुबेर,गायत्री व धाता  

वायु, वरुण, वासु, अनंत, गरुड़, कार्तिकेय तथा विधाता 


 के स्थानों का किया निरीक्षण, पृथक-पृथक व धर्मराज के

इतने में मुनि अगस्त्य भी, बाहर आ गये अग्निशाला से 


मुनियों के आगे-आगे थे, देख अगस्त्य को, कहा राम ने

तपस्या के निधि हैं मुनिवर, विशिष्ट तेज से दीप्त हो रहे 


सूर्यतुल्य महर्षि अगस्त्य के, बारे में ऐसा शुभ कहकर 

उनके चरणों का स्पर्श किया, रामचंद्र ने आगे बढ़कर 


हाथ जोड़कर खड़े हुए जब, मुनि ने निज ह्रदय से लगाया 

 कुशल-क्षेम तब उनका पूछा, आसन, जल देकर बैठाया


प्रथम अग्नि में आहुति दी, फिर भोजन भी दिया अर्घ्य देकर 

फल, मूल, फूल आदि से उनका, पूजन किया प्रसन्न होकर 


तत्पश्चात् मुनि अगस्त्य ने, श्रीराम से सुंदर वचन बोले 

दिव्य धनुष आपको देता, किया निर्माण विश्वकर्मा ने


सुवर्ण और हीरे जड़े हैं, विष्णु भगवान ने दिया इसे

सूर्य समान हैं उत्तम बाण, ब्रह्मा जी द्वारा दिये हुए


इंद्र देव के दिये दो तरकस, बाण से सदा भरे रहते 

सुवर्ण मूठ वाली तलवार, म्यान भी बनी है सोने से 


पूर्वकाल में श्रीविष्णु जी ने, इस धनुष से संग्राम किया 

असुरों को पराजित करके, देवताओं का धन लौटाया 


आप ग्रहण करें इन सबको, जैसे इंद्र वज्र ग्रहण करते

ऐसा कहकर दिये वे आयुध, तत्पश्चात् वचन यह कहते 


 

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ। 


 

 

Monday, April 27, 2026

श्रीराम आदि का अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:


पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में

घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ

काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के

आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


ब्राह्मणों पर कृपा अति करके, जिन्होंने किया दुष्पार्य कृत्य 

उन्हीं अगस्त्य मुनि के भाई का, सुंदर आश्रम यह अति भव्य 


संध्या काल तभी हो आया, भाइयों ने करी उपासना 

आश्रम में प्रवेश किया फिर, मुनि चरणों में झुकाया माथा 


एक रात्रि बितायी वहाँ पर, मुनि ने समुचित सत्कार किया

प्रातः काल उठे, आज्ञा माँगी, तीनों ने प्रस्थान किया 


मिले मार्ग में वृक्ष अनेकों, जल कदंब, कटहल, साखू के 

तिनिश, बेल महुआ, अशोक, तेंदू, चिरिबिल्व, कुछ जंगली थे 


कुछ को मसल दिया सूंड़ों से, मतवाले हाथी समूह ने 

वानर बैठे शाख़ों ऊपर, मतवाले खग वहाँ चहकते 


कमलनयन श्रीराम ने तभी, वचन कहे छोटे भाई से 

जैसे सुना, चिकने हैं वैसे, यहाँ के पेड़ों के पत्ते 


पशु, पक्षी भी शांत बहुत हैं, इससे यही जान पड़ता है 

शुद्ध ह्रदय अगस्त्य ऋषिवर का, आश्रम अब आने वाला है 


निज कर्मों से हुए विख्यात, अगस्तय नाम से इस जग में 

उन्हीं का आश्रम अति सुन्दर, हर लेता है कष्ट पथिकों के 


यज्ञ-याग के धूम से व्याप्त, चीर वस्त्र शोभित होते हैं 

शांत अति यहाँ  झुंड मृगों के, कलरव नित गूँजा करते हैं 


 दक्षिण दिशा को जिन मुनि ने, कर दिया सुरक्षित राक्षसों से 

दूर से ही अब रहे निहार , निकट नहीं अब आ सकते वे 


जब से आये इस दिशा में, तभी से  वैर रहित और शांत 

अगस्तय दिशा भी कहते इसको, दक्षिणा भी इसका नाम 


एक बार बढ़ा विंध्य पर्वत,  रोकने हेतु मार्ग सूर्य का

  अगस्त्य  मुनि के आदेश से,  रहे विंध्य आज तक झुका हुआ


वे दीर्घायु महात्मा पूज्य,  कर्म हैं उनके बहुत विख्यात 

सब लोकों से पूजित हैं वे, हमारा भी होगा कल्याण 


यहाँ निवास करता हुआ मैं, उनकी आराधना करूँगा 

 बाक़ी दिवस भी वनवास के, रहकर यहीं व्यतीत करूँगा 

 

Saturday, April 25, 2026

श्रीराम आदि का अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:


पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा,

विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का

सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर

उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के

आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


जहाँ-तहाँ लकड़ी के ढेर, वैदूर्यमणि से कटे हुए कुश 

आश्रम की अग्नि का धुआँ, काले मेघों सा ढकता है नभ 


 यहाँ स्थित पावन तीर्थों में, करके स्नान फूल स्वयं चुनकर 

देवता को समर्पित करते, ब्राह्मण अतीव हर्षित होकर 


सुतीक्ष्ण मुनि से जैसे सुना था, वैसा ही दिखाई देता 

इन्हीं के भाई अगस्त्य मुनि ने, दक्षिण दिशा को अभय दिया 


एक समय की बात सुनो, वातापि व इल्वल दो भाई थे

अति क्रूर स्वभाव दोनों का, ब्राह्मणों की हत्या करते थे 


निर्दयी इल्वल ब्राह्मण बनकर, संस्कृत बोलता हुआ जाता 

श्राद्ध के लिए निमंत्रण देकर, ब्राह्मणों को बुला लाता 


मेष रूप धरे वातापि का, कर संस्कार उनको खिलाता 

भोजन कर लेने पर उनके, भाई को आवाज़ लगाता 


वातापि तभी पेट फाड़कर, बाहर आ जाता 'मैं' 'मैं' कर

इस प्रकार दोनों भाई ने, कईयों का जीवन लिया हर 


देवताओं की प्रार्थना सुनकर, इल्वल ने जब श्राद्ध किया था

शाक बने वातापि का तब, अगस्त्य मुनि ने भक्षण कर डाला

 

ब्राह्मण के हाथ में इल्वल ने, अवनेजन का जल सौंपा

‘बाहर निकलो’ कह भाई को, तब उसने संबोधित किया 

 

हँसकर कहा मुनि अगस्त्य ने, जीव शाक रूपी भाई को 

खाकर पचा लिया है मैंने, तू न देख सकेगा उसको 


भाई की मृत्यु हुई सुनकर, उसने मुनि पर प्रहार किया 

अग्निरूपी अपनी दृष्टि से, वहीं उसको भी दग्ध किया 


Friday, April 24, 2026

सुतीक्ष्ण मुनि की आज्ञा से राम का अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:



पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


कुछ काल तक बसे रहे वहाँ, सम्मानित होकर मुनियों से

कहा एक दिन श्रीराम ने, विनीत भाव से मुनि सुतीक्ष्ण से 


मैंने सुना है, निकट कहीं पर, मुनि अगस्त्य वास करते हैं 

अति विशाल जंगल के कारण, उनके दर्शन नहीं किए हैं 


उनका वह आश्रम कहाँ हैं, मनोरथ मेरा उनसे मिलना

सीता और लक्ष्मण सहित, मैं चाहूँ उनके दर्शन पाना


‘स्वयं उनकी सेवा करना चाहूँ’,  श्रीराम का वचन सुना

सुतीक्ष्ण मुनि अति हुए प्रसन्न, तब दशरथनंदन से यह कहा 


मैं भी यही चाहता था, कि, आप सभी मिलें जाकर उनसे 

उसका पता मैं अभी बताता, अगस्त्य मुनि जहाँ हैं रहते 


चार योजन दक्षिण में जायें, वहाँ रहते उनके भाई 

बहुत सुंदर विशाल आश्रम, पिप्पली वन पड़ेगा दिखाई 


धरती वहाँ अति समतल है, बहुतायत है फूलों-फलों की

चक्रवाक, हंस, कारंडव,  सरवर में आबादी खगों की 


एक रात्रि वहीं बिताकर, प्रातः दक्षिण दिशा को जायें 

योजन भर चलने के बाद, मुनि अगस्त्य का आश्रम पाएँ 


आश्रम अति ही रमणीक है, घिरा है बहु संख्यक वृक्षों से 

सीता व लक्ष्मण के साथ, वहाँ सानंद विचरण आप करें 


निश्चय किया है यदि आपने, इसी मार्ग पर बढ़ते जायें 

आज ही आरंभ करें गमन, मुनि अगस्त्य के दर्शन पाएँ 


मुनि का वचन जब सुना राम ने, भाई सहित प्रणाम किया 

सीता तथा उसे संग लेकर, आश्रम से प्रस्थान किया 


राह में मिले विचित्र वन कई, पर्वतमाला व नदियाँ भी 

 हुए देखकर अति सुखी वे, लक्ष्मण को राम ने बात कही 


पुण्यकर्म का करते अनुष्ठान, अगस्त्य मुनि के भाई का 

सुतीक्ष्ण मुनि के कहे अनुसार, आश्रम यहाँ दिखाई पड़ता 


फूलों, फलों के भार से झुक, वृक्ष सहस्रों शोभा पाते 

पकी पीपलियों की कटु गंध, संग पवन देव लिए आते 


Monday, April 16, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्


श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
नारद जी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेप से श्रीरामचरित्र सुनाना 


लौट गए जब भरत अयोध्या, सत्यप्रतिज्ञ जितेन्द्रिय राम ने  
नागरिकों से बचने हेतु, धाम बनाया दण्डक वन में

उस महान वन में राम ने, विराध राक्षस को मारा
शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य मुनि सँग, मिले वहाँ उनके भ्राता

एंद्र धनुष प्रसन्न हो पाया, अगस्त्य मुनि की थी विनती
जिसके बाण कभी न घटते, दो तुणीर व एक खड्ग भी

वनचरों के साथ थे रहते, सभी ऋषि मिलने आये
असुर, राक्षसों के वध हेतु, राम से थे कहने आये

दण्डक वन की अग्नि के सम, तेजस्वी थे सभी ऋषि
वचन दिया राक्षस वध का, प्रतिज्ञा की राम ने रण की

जनस्थान निवासिनी थी जो, इच्छानुसार रूप धरती थी
शूर्पणखा को किया कुरूप, जो अशोभनीय कृत्य करती थी

शूर्पणखा के कहने से जो, राक्षस गण युद्ध को आये
खर, दूषन, त्रिशिरा व अन्य, राम के हाथों मृत्यु पाए

चौदह हजार थे संख्या में जो, राक्षस जनस्थानवासी
मारे गए राम के हाथों, मृत्यु आयी थी उनकी