Monday, May 4, 2026

महर्षि अगस्त्य का पंचवटी में आश्रम बनाकर रहने का आदेश देना

 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्


त्रयोदश: सर्ग:


महर्षि अगस्त्य का श्रीराम के प्रति अपनी प्रसन्नता प्रकट करके

 सीता की प्रशंसा करना, श्रीराम के पूछने पर उन्हें 

पंचवटी में आश्रम बनाकर रहने का आदेश देना 

तथा श्रीराम आदि का प्रस्थान 


राम !  आपका कल्याण हो, अतीव प्रसन्न हूँ मैं आप पर 

लक्ष्मण से भी संतुष्ट बहुत, मिलने आये मुझे यहाँ पर 


लंबा मार्ग तय करके आये, कष्ट और थकावट होगी 

दूर थकावट करने सीता, हृदय से उत्सुक जान पड़ती 


हैं अति ही सुकुमारी सीता, इससे पहले कष्ट न जाने 

पति प्रेम से प्रेरित होकर, वन प्रांतर में कई दुख झेले 


जैसे इनका मन प्रसन्न रहे, वैसा ही कार्य आप करें 

 साथ आपके आकर हे राम !, दुष्कर कार्य किया इन्होंने 


सृष्टिकाल से अब तक प्रायः, सुख में साथ निभाती पत्नी 

पति यदि रोगी या दरिद्री हो, त्यागकर उसे चली जातीं 


दामिनी की चपलता स्त्रियों में, तीक्ष्णता शस्त्रों की रहती

गरुड़ और वायु की गति का, जैसे वह अनुसरण हैं करतीं 


सीता इन दोषों से रहित है, पतिव्रताओं में श्रेष्ठ हैं 

जैसे देवियों में अरुंधती, जग में वैसे ही मान्य हैं 


शत्रु दमन श्रीराम ! आज से, शोभा बढ़ गई इस स्थान की 

लक्ष्मण संग निवास करेंगे, साथ में हैं विदेह नंदिनी 


मुनि के वचन सुनकर राम ने, जोड़े हाथ ये बोल कहे 

धन्य हो गया हूँ मैं आज, अगर आप संतुष्ट हैं हमसे 


ऐसा कोई स्थान बतायें, जहाँ निकट हो जल की सुविधा 

 जहाँ करूँ निवास सानंद, वन प्रदेश एक सुंदर ऐसा


सुनकर वचन श्रीराम के मुनि ने, दो घड़ी तक विचार किया 

फिर बोले, दो योजन दूर, पंचवटी में है सभी सुविधा 


बहुत से मृग निवास करते हैं, फल-मूल, शीतल जल मिलता 

सुखपूर्वक आप निवास करें, वहीं बनायें आश्रम अपना 

 

आप और राजा दशरथ का, सभी वृत्तांत मुझे विदित है 

आपके लिए स्नेह के कारण, तपोबल से कुछ जाना है 


तपोवन में मेरे साथ रहें, शेष समय बिताना चाहें 

यह थी अभिलाषा आपकी, अब अन्यत्र ही जाना चाहें 


इससे आपका क्या अभिप्राय, इसे भी मैंने जान लिया 

 राक्षस यहाँ नहीं आते हैं, आपने की वध की प्रतिज्ञा  

 

इसीलिए मैं आपसे कहता, पंचवटी में जायें आप 

विचरण करेंगी अति सुख पूर्वक, सीता वहाँ आपके साथ 


अधिक दूर नहीं वह भूमि यहाँ से, गोदावरी तट पर स्थित 

मैथिली का मन खूब लगेगा, अनेक पक्षियों  से सेवित 


 राम आप सदाचारी हैं, ऋषियों की रक्षा में संलग्न

पवित्र और रमणीय स्थान में, मुनियों का कीजिए पालन 


यह विशाल महुओं का वन, इसके उत्तर से होकर जायें 

बरगद का वृक्ष मिलेगा, बड़ा मैदान है जिसके आगे


मैदान को पार करते ही, दिखाई देगा पर्वत एक

उस पर्वत से जरा दूर ही, है पंचवटी नामक वन एक


 सुनकर मुनि की बात राम ने, उनका बहुत माना आभार 

जाने की आज्ञा माँगी, दे धन्यवाद, जो मिला सत्कार  


आज्ञा पाकर की चरण वन्दना, सीता जी के साथ चले 

तरकस बाँध लिए पीठ पर, हाथ में अपने धनुष ले लिये 


युद्ध में कातरता दिखाएं, ऐसे नहीं थे दोनों भाई 

सावधानी से हुए प्रस्थित, महर्षि ने जो राह बतायी 


 

 इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ। 



 

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