Wednesday, May 18, 2011

इस वर्ष


इस वर्ष

हवा की छुवन, सोंधी महक माटी की
और इस जग की जितनी भी प्यारी सौगातें है

इस जन्मदिन पर इन्हें
ईश्वर का उपहार मान कर देखो !

प्यार, जो नसों में रक्त के साथ बहता है
हँसी, जो शिराओं में हर उस वक्त घुली रहती है
जब मन साफ धुला होता है

प्यार, हँसी और इस जग की
जितनी भी अनमोल सौगातें है

इस वर्ष इन्हें
त्योहार मान कर देखो !

अनिता निहालानी
१८ मई २०११ 

Monday, May 16, 2011

इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले


इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले

घर खाली देख चला आये
उसे निरालापन भाता है,
सदा भीड़ में रहे अकेला
एक में सब समा जाता है !

तब कहाँ गयी पीड़ा उर की
जब कोई खुद में ठहर गया,
 आस रही न कोई निराशा
विषाद न जाने कहाँ गया !

ना ज्वार रहा ना ही भाटा
इक रसता भीतर व्याप रही,
इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले
सम रसता ही तब शेष रही !

अनिता निहालानी
१६ मई २०११

   


Sunday, May 15, 2011

श्रद्धा सुमन





श्रद्धा सुमन

दीप जला श्रद्धा का मन में
जिस क्षण हमने तुम्हें निहारा,
भाव उठा समर्पण का तब
जब से तुमने हमें पुकारा !

उठी प्रार्थना गहरे तल से
पल में जा पहुंची जो तुम तक,
डोर बंधी है एक अगोचर  
भेज रहे संदेशे हम तक !

ज्ञान की ज्योति जलाते भीतर
दुःख अग्नि पर जल बरसाते,
खुशियों की बरसात बन सदा
अंतर आंगन को महकाते !

हम सा बन के रहते हम में
खुद में स्वयं बन के रहते,
उस अदृश्य, अगम रब से मिल
सहज स्नेह ही बांटा करते !

जग सीमित पर वह अनंत है
सत्य एक है सदा अटल,
मायाधीश बड़ा माया से
निरंकार, निर्भय, निर्मल !

प्रेम तत्व से बना ईश्वर
उससे एक हुए तुम रहते,
हमें बुलाते अपने घर में
‘मुक्त हो रहो’ इतना कहते !

‘ध्यान समाधि’ से उस घर के
रस्ते से पहचान बना लो,
फिर जब चाहे जा सकते हो
जरा हृदय में उसे बसा लो !

दिल के इतने हो करीब तुम
तुमसे कुछ भी नहीं छुपा है,
हम जो भी हैं जैसे भी हैं
सदा प्रेम से हमें भरा है !
   
हो आनंद के इक निर्झर तुम
भिगो रहे निज शीतलता में,
दिव्य चेतना की हो मूरत
जगा रहे हो हमें ज्ञान में !

उसी ज्ञान में भस्म हो रहे
संस्कार अशुभ कर्मों के,
द्वन्द्वों से पूर्ण है यह जग
परे आत्मा सब धर्मों से !

सहज रहें, संघर्ष भी करें
द्वन्द्वों का हम करें सामना,
तेरी नजरों से जब देखें
सहयोग की बढ़े भावना !

हर पल तुम हो साथ हमारे
इससे बड़ा न कोई आश्रय,
घर जा पहुँचे तुमसे मिलकर
मिटी ग्लानि और सारे संशय !

अनिता निहालानी
१५ मई  २०११ 

Monday, May 9, 2011

शहंशाहों की रीत निराली



शहंशाहों की रीत निराली

मंदिर और शिवाले छाने
कहाँ-कहाँ नहीं तुझे पुकारा,
चढ़ी चढ़ाई, स्वेद बहाया
मिला न किन्तु कोई किनारा !

व्रती रहे, उपवास भी किये
अनुष्ठान, प्रवास अनेकों,
योग, ध्यान, साधना साधी
माला, जप, विश्वास अनेकों !

श्राद्ध, दान, स्नान पुण्य हित
किया सभी कुछ तुझे मान के,
सेवा के बदले तू मिलता
झेले दुःख भी यही ठान के !

किन्तु रहा तू दूर ही सदा
अलख, अगाध, अगम, अगोचर
भीतर का सूनापन बोझिल
ले जाता था कहीं डुबोकर !

तभी अचानक स्मृति आयी
सदगुरु की दी सीख सुनाई,
कृत्य के बदले जो भी मिलता
कीमत उससे कम ही रखता !

जो मिल जाये अपने बल से
मूल्य कहाँ उसका कुछ होगा ?
कृत्य बड़ा होगा उस रब से
पाकर उसको भी क्या होगा ?

कृपा से ही मिलता वह प्यारा
सदा बरसती निर्मल धारा,
चाहने वाला जब हट जाये
तत्क्षण बरसे प्रीत फुहारा !

वह तो हर पल आना चाहे
कोई मिले न जिसे सराहे,
आकाक्षाँ चहुँ ओर भरी है
किससे अपनी प्रीत निबाहे !

इच्छाओं से हों जब खाली
तभी समाएगा वनमाली,
स्वयं से स्वयं ही मिल सकता
शहंशाहों की रीत निराली !

अनिता निहालानी
९ मई २०११  







Thursday, May 5, 2011

अब न कोई राज छिपे


अब न कोई राज छिपे

बहुत हो गयी आंखमिचौली
बहुत छकाया है तुमने,
बहुत झुलाया उड़नखटोला
बहुत दिखाए हैं सपने !

सांपसीढ़ी का खेल नहीं अब
 फलक कभी, जमीं दिखाते
पल भर की बस झलक दिखा के
फिर पर्दों में छिप जाते !

अब तो अंतिम बेला आयी
आर-पार का युद्ध चले
मान मनौवल बहुत हो गया
अब ना कोई राज छिपे !

जो त्याज्य है जायेगा अब
सिहांसन खाली होगा
आकर वही विराजेगा जो
 उपवन का माली होगा !

अनिता निहालानी
५ मई २०११ 

Tuesday, May 3, 2011

जीवन चलते-चलते बीता


जीवन चलते-चलते बीता

थके कदम दो पल सुस्ता लें
कहीं न मिलती छांव,
जीवन चलते-चलते बीता
पाया नहीं पड़ाव !

काल शिकारी घात लगाये
बैठा लेकर दांव,
कब पासा सीधा पड़ जाये
थम जाएँ कब पांव !

क्या खोया क्या पाया हमने
कोई नहीं हिसाब,
जीवन भूलभुलैया या फिर
इक जादुई किताब !

अनिता निहालानी
३ मई २०११
  

Sunday, May 1, 2011

तेरा मेरा मेल हो कैसे



तेरा मेरा मेल हो कैसे

तू अनंत आकाश सरीखा
यह नन्हा दिल एक झमेला 
तू सनातन शांत सदा है
यहाँ विचारों का इक मेला  
तू सत्य है सदा एक सा
बदल रहा यहाँ हर पल खेला
तू प्रेम है सुना यही है
यहाँ प्रेम सँग घृणा भी बसती
देख भाल के ठोंक बजा के
होठों पर मुसकान ठहरती
किसको दें किसको न दें
कितनी दें कितनी कम कर लें
भीतर रस्साकशी है चलती
तू दयालु नित बाँट रहा है
यहाँ तो मन बस छांट रहा है
तेरा मेरा मेल हो कैसे
मन कैसे हो तेरे जैसे
तू तृप्त है संतोषी भी
यहाँ सदा दिल मांगे मोर
तू सबका अन्तर्यामी है
यहाँ खुद से भी हाल छुपाते  
कुछ सदा भुलावे में रहते
कुछ बहला के गम भुलाते
तू दाता है दानी ज्ञानी
हम बचा-बचा रखते खाते  
स्विस बैंकों के हम दीवाने
सड़ जाये भले गोदामों में
भूखों को अन्न नहीं देते
तू माखन चोर कहाये है
हम लाखों कोटि डकार गए
तेरा बस नाम ही प्यारा है
तुझसे कोई सरोकार नहीं
जब काम निकलता है उससे
तब तू भी हमें स्वीकार नहीं
तू नजर नहीं आता हमको
हमने विज्ञापन दे डाले
मंदिर में दान दिया था कुछ
पत्थर पे नाम खुदवा डाले
तू प्रेम करे बेशर्त सदा
हम सट्टेबाज बड़े शातिर
तुझको भी न हम छोड़ेंगे
कुछ कागज के नोटों खातिर
कभी नाश नहीं होता तेरा
तू अविनाशी अखंड सदा
हम बम बनाये जाते हैं
भाते हैं युद्ध प्रचंड सदा
तेरा मेरा मिलन क्या संभव
तू जीवन है और मृत्यु भी
अमृत भी तू और महा गरल
तू कठिन बड़ा और सरल भी तू
तू जग भी है जगदीश्वर भी
अरदास भी तू आशीष भी तू !

अनिता निहालानी
१ मई २०११