ईश्वर की प्रतिकृति
हर इंसान के भीतर कैद है
उसकी सही पहचान
बाहर मुखौटे लगाये घूमता है
चेहरा बदल-बदल देखता है !
कई बार माँगे हुए चेहरे, लगाये हुए मुखौटे
हो जाते हैं तार-तार...
वह बेचेहरा होकर तडपता है....
फिर एक नया मुखौटा तलाशा जाता है
दम तोड़ चुकी होती है
अपने भीतर झांक कर देखने की
ख्वाहिश...
जिए चला जाता है वह उधार की जिंदगी !
कुछ चेहरे उसे परिवार देता है
कुछ थमा देता समाज
कुछ अपनी सुविधा के लिये जुटा लेता...
और इस तरह ईश्वर की प्रतिकृति यह मानव
ईश्वर से विपरीत दिशा में चलने लगता है...
अनिता निहालानी
२५ मई २०११
