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Wednesday, May 25, 2011

ईश्वर की प्रतिकृति


ईश्वर की प्रतिकृति

हर इंसान के भीतर कैद है
उसकी सही पहचान
बाहर मुखौटे लगाये घूमता है
चेहरा बदल-बदल देखता है !

कई बार माँगे हुए चेहरे, लगाये हुए मुखौटे
हो जाते हैं तार-तार...
वह बेचेहरा होकर तडपता है....

फिर एक नया मुखौटा तलाशा जाता है
दम तोड़ चुकी होती है
अपने भीतर झांक कर देखने की
ख्वाहिश...
जिए चला जाता है वह उधार की जिंदगी !

कुछ चेहरे उसे परिवार देता है
 कुछ थमा देता समाज
कुछ अपनी सुविधा के लिये जुटा लेता...
और इस तरह ईश्वर की प्रतिकृति यह मानव
ईश्वर से विपरीत दिशा में चलने लगता है...

अनिता निहालानी
२५ मई २०११  

Monday, May 9, 2011

शहंशाहों की रीत निराली



शहंशाहों की रीत निराली

मंदिर और शिवाले छाने
कहाँ-कहाँ नहीं तुझे पुकारा,
चढ़ी चढ़ाई, स्वेद बहाया
मिला न किन्तु कोई किनारा !

व्रती रहे, उपवास भी किये
अनुष्ठान, प्रवास अनेकों,
योग, ध्यान, साधना साधी
माला, जप, विश्वास अनेकों !

श्राद्ध, दान, स्नान पुण्य हित
किया सभी कुछ तुझे मान के,
सेवा के बदले तू मिलता
झेले दुःख भी यही ठान के !

किन्तु रहा तू दूर ही सदा
अलख, अगाध, अगम, अगोचर
भीतर का सूनापन बोझिल
ले जाता था कहीं डुबोकर !

तभी अचानक स्मृति आयी
सदगुरु की दी सीख सुनाई,
कृत्य के बदले जो भी मिलता
कीमत उससे कम ही रखता !

जो मिल जाये अपने बल से
मूल्य कहाँ उसका कुछ होगा ?
कृत्य बड़ा होगा उस रब से
पाकर उसको भी क्या होगा ?

कृपा से ही मिलता वह प्यारा
सदा बरसती निर्मल धारा,
चाहने वाला जब हट जाये
तत्क्षण बरसे प्रीत फुहारा !

वह तो हर पल आना चाहे
कोई मिले न जिसे सराहे,
आकाक्षाँ चहुँ ओर भरी है
किससे अपनी प्रीत निबाहे !

इच्छाओं से हों जब खाली
तभी समाएगा वनमाली,
स्वयं से स्वयं ही मिल सकता
शहंशाहों की रीत निराली !

अनिता निहालानी
९ मई २०११  







Thursday, May 5, 2011

अब न कोई राज छिपे


अब न कोई राज छिपे

बहुत हो गयी आंखमिचौली
बहुत छकाया है तुमने,
बहुत झुलाया उड़नखटोला
बहुत दिखाए हैं सपने !

सांपसीढ़ी का खेल नहीं अब
 फलक कभी, जमीं दिखाते
पल भर की बस झलक दिखा के
फिर पर्दों में छिप जाते !

अब तो अंतिम बेला आयी
आर-पार का युद्ध चले
मान मनौवल बहुत हो गया
अब ना कोई राज छिपे !

जो त्याज्य है जायेगा अब
सिहांसन खाली होगा
आकर वही विराजेगा जो
 उपवन का माली होगा !

अनिता निहालानी
५ मई २०११ 

Thursday, April 28, 2011

जीवन की अब शाम हो चली


जीवन की अब शाम हो चली

कितनी पीड़ा, कितने दर्द
कितने जख्म छिपाए भीतर,
ऊपर से हँसता है मानव
डर-डर कर जीता है भीतर !

इक कांटा तो चुभता हर पल
‘मैं भी कुछ हूँ’ मुझे सराहो,
इस होने को कुछ तो अर्थ दो
दुनिया की यह रीत निबाहो !

होश संभाला जब से उसने
स्वयं को सदा माँगते पाया,
औरों की नजरों में खुद को
कुछ साबित करना ही भाया !

अपनी इक तस्वीर बनायी
मन मंदिर में उसे सजाया,
जरा ठेस जो लगी कभी भी
दिल आंसुओं से भर आया !

जीवन की अब शाम हो चली
खेल वही पुराना चलता,
कुछ न कुछ करके दिखला दें
न होने से मन न भरता !

न जाने क्या मिल जायेगा
नाम यदि रह भी जायेगा,  
संतोषी यदि हुआ न अंतर
चैन न स्वर्ग भी दे पाएगा !

अनिता निहालानी
२९ अप्रैल २०११  

Monday, April 25, 2011

हृदय वृक्ष से शब्द झरे



हृदय वृक्ष से शब्द झरे

हृदय वृक्ष से शब्द झरे कुछ अनायास ही
ज्यों बिखराएँ आँसूं आँखें हो उदास सी !

हवा चली औ शब्द उड़ गए
सँग मेघ के फिर बिखर गए

बूंदों की लड़ियों सँग आकुल
पानी की झड़ियों में व्याकुल

यूँ ही डोलते राज खोलते अनायास ही
ज्यों बिखराएँ आँसूं आँखें हो उदास सी !

शब्द कभी कोमल बन जाते
बन माला उर से लिपटाते

कभी क्रुद्ध हो दूर भागते
बेगाने से रहे सताते

यूँ ही चिढ़ाते कभी बुलाते अनायास ही
 ज्यों बिखराएँ आँसूं आँखें हो उदास सी !

अनिता निहालानी
२५ अप्रैल २०११ 

Tuesday, April 19, 2011

बहो, बस बहो


बहो, बस बहो

वीराने वन में, जलधार बन बहो
सोंधे सावन में, फुहार बन बहो !

उन्मुक्त पवन सँग, पत्तों से तुम तिरो
अनंत गगन में, विहंग से फिरो

विभक्त जगत में, सम्पूर्ण हो रहो
बहो, बस बहो !

बांधे न कोई तीर, ऐसी नाव तुम बहो
रोके न कोई राह, बने फकीर तुम बहो !

सिमटो न किसी तौर, निस्सीम हो रहो
रीते अधर में मुक्त, बस शून्य ही कहो

अनंत की हो चाह, अमरत्व ही गहो
बहो, बस बहो !

अनिता निहालानी
१९ अप्रैल २०११  

Tuesday, April 5, 2011

नियति है मिलन अपना

नियति है मिलन अपना

तुम कसो कसौटी पर
लो चाहे कितनी ही परीक्षाएं
चूर-चूर कर डालो वह अभिमान
जो मुझे तुमसे दूर किये हुए है
न रहे शेष कोई आस
न चाह
हो जाये जीते जी मृत्यु
न उठे कोई सवाल न जगे प्रतिक्रिया
पत्थर की मानिंद सहूँ
तपन, बौछार और बर्फीली पवन
हो जाये जर्जर तन
मर जाये भले मन
हूँ मैं तैयार
तुम करो वार
इस पीड़ा के पीछे छुपा है आनंद
मरता है जब बीज  
पौधा जन्मता है उसी क्षण
मरना होगा इस जिजीविषा को
अस्मिता को भी
हर उस शै को
जो तुम्हें मुझसे जुदा करती है
परखो मुझे
डालो परीक्षाओं में
चाहे जितना घिसो
तपाओ मुझे
 मेरी नियति है वह मिलन जो
होगा मेरा तुमसे !

अनिता निहालानी
५ अप्रैल २०११

Monday, April 4, 2011

वासंतिक नवरात्र

वासंतिक नवरात्र

नव वर्ष का शुभ आगमन
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा,
नव संवत्सर हुआ आरम्भ  
प्रकृति मन मोहक सुखदा  !

स्रष्टि हुई आरम्भ इसी दिन  
झूलेलाल की जन्म जयंती, 
विक्रम संवत का शुभारम्भ
नवरात्र का प्रथम दिवस भी !

आद्याशक्ति की करें आराधना
घर-घर घट की हुई स्थापना,
दक्षिण भारत में मने उगादि
विश्व के मंगल की कामना !

शक्ति से ही सृजन है संभव
शक्ति से ही जग परिपालन
शक्ति बिन संहार असम्भव
युगों युगों से शक्ति पूजन !

अनिता निहालानी
४ अप्रैल २०११


Friday, March 18, 2011

आज ईश सँग खेलें होली


आज ईश सँग खेलें होली
आज कान्ह सँग करें ठिठोली !

जब से तुम सँग जोड़ा नाता
रंगों का साथ है भाता
मन निर्मल इक सुर में गाता
हरपल रंगमय होता जाता !

आज भरी है अपनी झोली
आज शम्भु सँग खेलें होली !

अनुभव का गुलाल लगाया
प्रीत का अबीर बिखराया
रंग सुनहरा छिड़का तुमने
जैसे जामे खुशी पिलाया !

आज चली मस्तों की टोली
  आज गुरु सँग खेलें होली !

सेवा का है रंग रुपहला
प्रभु भक्ति का रंग है नीला
रंग गुलाबी में भीगा जो
अंतर हो जायेगा पीला !

आज  लगाएँ चन्दन रोली
आज श्याम सँग खेलें होली

हरा रंग बरसाया तुमने
शांति नीर बहाया तुमने
भीतर की ऊर्जा जगाई
रंग श्वेत जब पाया हमने !

आज प्रेम की मदिरा घोली
 आज राम सँग खेलें होली !

नयनों से झरता अनुराग
मस्ती से खेलें हम फाग
थिरकन कदमों की यह बोले
कब से सोया अब तो जाग !

चलो बना लें सूरत भोली
आज ईश सँग खेलें होली !


अनिता निहालानी
१८ मार्च २०११   









Tuesday, March 15, 2011

जापान में सुनामी


जापान में सुनामी

ढाया कहर सुनामी ने फिर  
भू कांपी, लहरें थर्रायीं,
ऊँची ऊँची जल दीवारें
सब कुछ सँग बहाने आयीं !

कितना बेबस और निरीह है
मानव इस कुदरत के आगे,
चला जीतने था वह इसको
लेकिन वह चाहे यह जागे !

हिला दीं पल में दृढ़ इमारतें
लपटें उठीं भयंकर नभ में,
प्राणों पर सबके बन आयी
ताश के पत्तों से घर बिखरे !

हुआ अँधेरा, फोन कटे सब
प्रियजन की बस करे प्रतीक्षा,
कुछ भी सूझ न पाए मन को
क्या खोया, क्या करे समीक्षा !

अनिता निहालानी
१६ मार्च २०११