श्रद्धा सुमन
दीप जला श्रद्धा का मन में
जिस क्षण हमने तुम्हें निहारा,
भाव उठा समर्पण का तब
जब से तुमने हमें पुकारा !
उठी प्रार्थना गहरे तल से
पल में जा पहुंची जो तुम तक,
डोर बंधी है एक अगोचर
भेज रहे संदेशे हम तक !
ज्ञान की ज्योति जलाते भीतर
दुःख अग्नि पर जल बरसाते,
खुशियों की बरसात बन सदा
अंतर आंगन को महकाते !
हम सा बन के रहते हम में
खुद में स्वयं बन के रहते,
उस अदृश्य, अगम रब से मिल
सहज स्नेह ही बांटा करते !
जग सीमित पर वह अनंत है
सत्य एक है सदा अटल,
मायाधीश बड़ा माया से
निरंकार, निर्भय, निर्मल !
प्रेम तत्व से बना ईश्वर
उससे एक हुए तुम रहते,
हमें बुलाते अपने घर में
‘मुक्त हो रहो’ इतना कहते !
‘ध्यान समाधि’ से उस घर के
रस्ते से पहचान बना लो,
फिर जब चाहे जा सकते हो
जरा हृदय में उसे बसा लो !
दिल के इतने हो करीब तुम
तुमसे कुछ भी नहीं छुपा है,
हम जो भी हैं जैसे भी हैं
सदा प्रेम से हमें भरा है !
हो आनंद के इक निर्झर तुम
भिगो रहे निज शीतलता में,
दिव्य चेतना की हो मूरत
जगा रहे हो हमें ज्ञान में !
उसी ज्ञान में भस्म हो रहे
संस्कार अशुभ कर्मों के,
द्वन्द्वों से पूर्ण है यह जग
परे आत्मा सब धर्मों से !
सहज रहें, संघर्ष भी करें
द्वन्द्वों का हम करें सामना,
तेरी नजरों से जब देखें
सहयोग की बढ़े भावना !
हर पल तुम हो साथ हमारे
इससे बड़ा न कोई आश्रय,
घर जा पहुँचे तुमसे मिलकर
मिटी ग्लानि और सारे संशय !
अनिता निहालानी
१५ मई २०११