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Monday, May 23, 2011

वह कौन है


वह कौन है

कहीं भीतर कोई सोता फूट पड़ा हो जैसे
भाव ऐसे छलकाने लगता है मन
सब कुछ अच्छा, बेहद अच्छा लगने लगता है...

आँखें एक पल के लिये नम हो जातीं,
बिखर जाती होठों पर सतरंगी मुस्कान

वह कौन है अंदर जिसको छू जाता है प्यार
छू जाती है ओस की ठंडक
रातों की चाँदनी और सुबह की धूप
इतनी शिद्दत से कि पोर-पोर सिहर उठता है..

वह कौन है जो आँसू देखकर खुद आँसू बहाने लगता है
और बिखेर देता है हँसी दूसरों के सुख में
क्या वहीं कहीं ईश्वर का बसेरा है
जो निर्विकार रहता है, किन्तु कभी कहीं भीतर कोई ....

अनिता निहालानी
२३ मई २०११ 

Sunday, May 15, 2011

श्रद्धा सुमन





श्रद्धा सुमन

दीप जला श्रद्धा का मन में
जिस क्षण हमने तुम्हें निहारा,
भाव उठा समर्पण का तब
जब से तुमने हमें पुकारा !

उठी प्रार्थना गहरे तल से
पल में जा पहुंची जो तुम तक,
डोर बंधी है एक अगोचर  
भेज रहे संदेशे हम तक !

ज्ञान की ज्योति जलाते भीतर
दुःख अग्नि पर जल बरसाते,
खुशियों की बरसात बन सदा
अंतर आंगन को महकाते !

हम सा बन के रहते हम में
खुद में स्वयं बन के रहते,
उस अदृश्य, अगम रब से मिल
सहज स्नेह ही बांटा करते !

जग सीमित पर वह अनंत है
सत्य एक है सदा अटल,
मायाधीश बड़ा माया से
निरंकार, निर्भय, निर्मल !

प्रेम तत्व से बना ईश्वर
उससे एक हुए तुम रहते,
हमें बुलाते अपने घर में
‘मुक्त हो रहो’ इतना कहते !

‘ध्यान समाधि’ से उस घर के
रस्ते से पहचान बना लो,
फिर जब चाहे जा सकते हो
जरा हृदय में उसे बसा लो !

दिल के इतने हो करीब तुम
तुमसे कुछ भी नहीं छुपा है,
हम जो भी हैं जैसे भी हैं
सदा प्रेम से हमें भरा है !
   
हो आनंद के इक निर्झर तुम
भिगो रहे निज शीतलता में,
दिव्य चेतना की हो मूरत
जगा रहे हो हमें ज्ञान में !

उसी ज्ञान में भस्म हो रहे
संस्कार अशुभ कर्मों के,
द्वन्द्वों से पूर्ण है यह जग
परे आत्मा सब धर्मों से !

सहज रहें, संघर्ष भी करें
द्वन्द्वों का हम करें सामना,
तेरी नजरों से जब देखें
सहयोग की बढ़े भावना !

हर पल तुम हो साथ हमारे
इससे बड़ा न कोई आश्रय,
घर जा पहुँचे तुमसे मिलकर
मिटी ग्लानि और सारे संशय !

अनिता निहालानी
१५ मई  २०११ 

Sunday, May 1, 2011

तेरा मेरा मेल हो कैसे



तेरा मेरा मेल हो कैसे

तू अनंत आकाश सरीखा
यह नन्हा दिल एक झमेला 
तू सनातन शांत सदा है
यहाँ विचारों का इक मेला  
तू सत्य है सदा एक सा
बदल रहा यहाँ हर पल खेला
तू प्रेम है सुना यही है
यहाँ प्रेम सँग घृणा भी बसती
देख भाल के ठोंक बजा के
होठों पर मुसकान ठहरती
किसको दें किसको न दें
कितनी दें कितनी कम कर लें
भीतर रस्साकशी है चलती
तू दयालु नित बाँट रहा है
यहाँ तो मन बस छांट रहा है
तेरा मेरा मेल हो कैसे
मन कैसे हो तेरे जैसे
तू तृप्त है संतोषी भी
यहाँ सदा दिल मांगे मोर
तू सबका अन्तर्यामी है
यहाँ खुद से भी हाल छुपाते  
कुछ सदा भुलावे में रहते
कुछ बहला के गम भुलाते
तू दाता है दानी ज्ञानी
हम बचा-बचा रखते खाते  
स्विस बैंकों के हम दीवाने
सड़ जाये भले गोदामों में
भूखों को अन्न नहीं देते
तू माखन चोर कहाये है
हम लाखों कोटि डकार गए
तेरा बस नाम ही प्यारा है
तुझसे कोई सरोकार नहीं
जब काम निकलता है उससे
तब तू भी हमें स्वीकार नहीं
तू नजर नहीं आता हमको
हमने विज्ञापन दे डाले
मंदिर में दान दिया था कुछ
पत्थर पे नाम खुदवा डाले
तू प्रेम करे बेशर्त सदा
हम सट्टेबाज बड़े शातिर
तुझको भी न हम छोड़ेंगे
कुछ कागज के नोटों खातिर
कभी नाश नहीं होता तेरा
तू अविनाशी अखंड सदा
हम बम बनाये जाते हैं
भाते हैं युद्ध प्रचंड सदा
तेरा मेरा मिलन क्या संभव
तू जीवन है और मृत्यु भी
अमृत भी तू और महा गरल
तू कठिन बड़ा और सरल भी तू
तू जग भी है जगदीश्वर भी
अरदास भी तू आशीष भी तू !

अनिता निहालानी
१ मई २०११
   



Tuesday, April 26, 2011

पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे


पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे 

नृत्य समाया हर मुद्रा में
उर में वीणा की झंकार
कंठ उगाए गीत मधुरिमा
कहाँ छिपा था इतना प्यार ?

आधी रात उजाला बिखरा
नयनों में ज्यों भरी पुकार
जागे-जागे स्वप्न हो गए
लगता है कोई चमत्कार !

पुलक उठे है पोर-पोर में
धड़क रहा है यूहीं दिल
कोई खबर भोर की लाए
क्या करीब है अब मंजिल ?

इच्छा, ज्ञान, क्रिया शक्ति के
पार हुआ मन अब मुक्ति के
खुले पट सब स्पष्ट हो गया
पुष्प खिले हैं जब भक्ति के !

नर्तक कौन, कौन कवि है
कौन सुनाये, सुनता वीणा
कौन तलाश रहा मंजिल को
कोई भी नही वहाँ दीखता !

एक तत्व का खेल है सारा
वही प्रिय वही प्रियतम प्यारा
स्वयं ही गाये झूमे स्वयं ही
प्रेम गली में न दो का पसारा !

अनिता निहालानी
२७ अप्रैल २०११

   

Tuesday, April 19, 2011

बहो, बस बहो


बहो, बस बहो

वीराने वन में, जलधार बन बहो
सोंधे सावन में, फुहार बन बहो !

उन्मुक्त पवन सँग, पत्तों से तुम तिरो
अनंत गगन में, विहंग से फिरो

विभक्त जगत में, सम्पूर्ण हो रहो
बहो, बस बहो !

बांधे न कोई तीर, ऐसी नाव तुम बहो
रोके न कोई राह, बने फकीर तुम बहो !

सिमटो न किसी तौर, निस्सीम हो रहो
रीते अधर में मुक्त, बस शून्य ही कहो

अनंत की हो चाह, अमरत्व ही गहो
बहो, बस बहो !

अनिता निहालानी
१९ अप्रैल २०११  

Saturday, April 16, 2011

कोई हमसा भीतर रहता


कोई हमसा भीतर रहता

गहरी निद्रा में सोये हम
तब भी भीतर जागे है वह,
बड़े धैर्य से करे प्रतीक्षा
हर सुख-दुःख का साथी है वह !

अंतिम स्वप्न वही भेजता
नींद टूटती कुछ जग जाते,  
पर कैसे नादान बने हम
करवट बदल-बदल सो जाते !

जाने कब से आस लगाये
कोई हमसा भीतर रहता,
एक अनोखे लोक का वासी
हँस कर हर नादानी सहता !

नहीं एक बंटे टुकड़ों में
मन में द्वंद्व सदा रहता है,
बोलो किससे बात करूं मैं
भीतर से कोई कहता है !

एक बनो और घर आ जाओ
स्वप्न लोक से बाहर आओ,
तुम ही तो मिल सकते मुझसे
अपने इस हक को तुम पाओ !

अनिता निहालानी
१६ अप्रैल २०११


Saturday, April 9, 2011

मुक्ति का बाना सी लो

मुक्ति का बाना सी लो

चाहो तो इक पल में जी लो
घूंट अमरता का पी लो
तोड़ पुरातन श्रृंखलाओं को
मुक्ति का बाना सी लो !

या फिर सारी उम्र बिता दो
कदम कदम पर बंधन झेलो
बांध आत्मा को पहरों में
खुद जग के हाथों खेलो !

या जग में स्वयं को खो दो
या स्वयं में स्वयं को पालो
सत्य मार्ग पर चलो अकेले
या परम्परा के सँग हो लो !

अनिता निहालानी
९ अप्रैल २०११




Thursday, April 7, 2011

इस जग का खालीपन भर दें

इस जग का खालीपन भर दें

जाने कितने कोष छुपाये हम थक जाते
खो जाये ना, इस भय से मुस्कान छिपाते !
क्यों न मन को खाली कर दें
इस जग का खालीपन भर दें !
खोल झरोखों को अन्तर के
नया उजाला उनमें भर दें !

अनगिन निधियां छिपी हुई हैं मानव मन में
अंधियारों में बीज ढके हैं मानस भू में !
क्यों न स्वयं को हल्का कर दें
सारी निधियां यही लुटा दें
धूप, हवा, जल के छीटों से
क्यों न उनमें फूल खिला दें !

इक पावन सी पहले भीतर जगह बना लें
अपने हिस्से की खुशियाँ फिर जग से ले लें !
बस थोड़ा सा उद्यम करके
पल-पल मन को चेतन रख के
कुछ न कुछ इस जग को देके
हम रह सकते कमल सरीखे !

अनिता निहालानी
७ अप्रैल २०११   

Tuesday, April 5, 2011

नियति है मिलन अपना

नियति है मिलन अपना

तुम कसो कसौटी पर
लो चाहे कितनी ही परीक्षाएं
चूर-चूर कर डालो वह अभिमान
जो मुझे तुमसे दूर किये हुए है
न रहे शेष कोई आस
न चाह
हो जाये जीते जी मृत्यु
न उठे कोई सवाल न जगे प्रतिक्रिया
पत्थर की मानिंद सहूँ
तपन, बौछार और बर्फीली पवन
हो जाये जर्जर तन
मर जाये भले मन
हूँ मैं तैयार
तुम करो वार
इस पीड़ा के पीछे छुपा है आनंद
मरता है जब बीज  
पौधा जन्मता है उसी क्षण
मरना होगा इस जिजीविषा को
अस्मिता को भी
हर उस शै को
जो तुम्हें मुझसे जुदा करती है
परखो मुझे
डालो परीक्षाओं में
चाहे जितना घिसो
तपाओ मुझे
 मेरी नियति है वह मिलन जो
होगा मेरा तुमसे !

अनिता निहालानी
५ अप्रैल २०११