इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले
घर खाली देख चला आये
उसे निरालापन भाता है,
सदा भीड़ में रहे अकेला
एक में सब समा जाता है !
तब कहाँ गयी पीड़ा उर की
जब कोई खुद में ठहर गया,
आस रही न कोई निराशा
विषाद न जाने कहाँ गया !
ना ज्वार रहा ना ही भाटा
इक रसता भीतर व्याप रही,
इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले
सम रसता ही तब शेष रही !
अनिता निहालानी
१६ मई २०११