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Monday, May 16, 2011

इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले


इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले

घर खाली देख चला आये
उसे निरालापन भाता है,
सदा भीड़ में रहे अकेला
एक में सब समा जाता है !

तब कहाँ गयी पीड़ा उर की
जब कोई खुद में ठहर गया,
 आस रही न कोई निराशा
विषाद न जाने कहाँ गया !

ना ज्वार रहा ना ही भाटा
इक रसता भीतर व्याप रही,
इक मद्धिम-मद्धिम आंच जले
सम रसता ही तब शेष रही !

अनिता निहालानी
१६ मई २०११