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Thursday, January 5, 2012

दृश्य की उपेक्षा


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


दृश्य की उपेक्षा

तन केवल छाया ही है, आभास रूप से जो दिखता है
इसका अंत मृत्यु है केवल, आत्मा नहीं मरा करता है

नित्य और निर्मल स्वरूप को, जड़ शरीर से श्रेष्ठ ही मानो
पुनः न स्वयं को देह मानना, अपने को आत्मा जानो

विचारवान श्रेष्ठ मनुष्य, माया को ज्ञान से हरते
नित्य, विशुद्ध आनंद बोध में, नित्यप्रति निवास फिर करते

गले में माला रहे या गिरे, गौ इसका ध्यान नहीं रखती
प्रारब्ध से मिला है यह तन, वृत्ति योगी की इससे नहीं बंधती

सुख स्वरूप जब स्वयं को जाना, देह से किसकी चाह रखना
नित्य स्वरूप आत्मा जानी, पुनः न भव बंधन से बंधना

 

Sunday, December 18, 2011

वैराग्य निरूपण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


वैराग्य निरूपण

वैरागी जन त्यागी होते, भीतर-बाहर दोनों के ही
जिसे मोक्ष की इच्छा जागी, वैरागी जन हुआ वही

इन्द्रियों का संयम भी करता, अहंकार को भी तज देता
ब्रह्मनिष्ठ विरक्त पुरुष ही, सदा अमानी होकर रहता

बोध और वैराग्य दोनों, जैसे पंछी के दो पर होते
बिना एक के मोक्ष न संभव, एक पंख से खग न उड़ते

वैरागी समाधि को पाता, समाधिस्थ ही बोधवान है
जगबंधन भी छूटे उसका, वही हुआ आनंद वान है

वैराग्य में छिपा महासुख, आत्मज्ञान भी स्वर्गिक सुख 
मुक्ति का यह खुला द्वार है, क्यों सहते हो जग में दुःख

विषसम तज विषयों की आशा, मृत्युरूप अभिमान को त्यागो
देहाध्यास को छोड़ निरंतर, शुद्ध आत्मा में जागो 

Saturday, December 3, 2011

असत् परिहार


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

असत् परिहार

जीते जी जो मुक्ति पा ले, बाद मृत्यु के वही मुक्त है
अल्प मात्र भी भेद जो माने, नहीं हुआ वह ब्रह्म युक्त है

अणु मात्र भी भेद जो माने, उस अनंत ब्रह्म में साधक
भय को प्राप्त हुआ करता है, आत्मा का प्रमाद ही बाधक

दृश्य को जो माने द्रष्टा, दुःख का भागी ही होता है
श्रुति, स्मृति व युक्ति से, न आत्मा में स्थित रहता है

परम सत्य की खोज जो करता, मुक्त हुआ वह निज को जाने,
मिथ्या दृश्य के पीछे रहता, नष्ट हुआ वह दुःख ही जाने

तज असत् को आत्मनिष्ठ हो, दुःख को दूर हटा सकता है
विषयों का चिंतन दुःख भारी, आत्मज्ञान सुख दे सकता है

विषयों का निषेध हुए से, मन सहज आनंद से भरता
आनंद ही ईश्वर का लक्षण, जग का फिर हर बंधन कटता

जो विवेकी ज्ञानवान है, स्वाद मुक्ति का जिसने पाया
जानबूझ कर बालक वत् वह, नहीं असत् के पीछे धाया

जो देह आदि में आसक्त, मुक्त नहीं वह हो सकता
जिसने पायी है मुक्ति वह, देहासक्त नहीं हो सकता

जगा हुआ ज्यों नहीं सुप्त है, सोया हुआ नहीं जाग्रत
देहासक्त न मुक्त हुआ है, मुक्त नहीं देह में आसक्त
   



Sunday, November 27, 2011

अहं पदार्थ निरूपण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

अहं पदार्थ निरूपण

दृश्य जगत क्षणिक दिखता है, अहं पदार्थ नहीं हो सकता
सत् असत् से है विलक्षण, सुषुप्ति में भी जाना जाता

स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों का, अभाव भी देखा जाता है
जो विकारी को जाने, स्वयं अविकारी हो सकता

तीनों काल में है अबाधित, ज्ञान स्वरूप अखंड आत्मा
देह अध्यास को तज हे साधक, त्यागो भाव कर्ता, भोक्ता

अहंकार निंदा

अहंकार है मूल विकार, आत्मा को ढके है रहता
अहंकार मुक्त हुए से, स्वयं प्रकाश आत्मा प्रकटता

मोह और अज्ञान से बुद्धि, देह को ही ‘मैं’ करके जाने
इसका जब भी हुआ निषेध, आत्मा निज स्वरूप को जाने

ब्रह्मानंद परम धन है, अहं सर्प ने इसे लपेटा
ज्ञानस्वरूप कटार से भेदे, तभी आत्मा पा सकता

देह में अल्प विष भी हो यदि, नहीं निरोगी रहने देता
लेश मात्र भी अहंकार हो, आत्मा को ढके रहता

अहंकार का नाश हुए से, आत्म तत्व प्रकट होता है
कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि तज, आत्मानंद प्राप्त होता है

Monday, November 21, 2011

ब्रह्म भावना


ब्रह्म भावना

स्थिर नहीं है जग में कुछ भी, एक तत्व आकाश समान
देह आदि मिथ्या लगते, जब शुद्ध ब्रह्म का होता ज्ञान

मृतिका का घट मृतिका ही है, सत् से उत्पन्न जगत भी सत्
सत् से परे न कुछ भी स्थित, तुम भी वही ब्रह्म हो सत्

स्वप्न जगत ज्यों मिथ्या होता, जाग्रत में भी ऐसा मानो
शांत, निर्मल और अद्वितीय, वही ब्रह्म तुम स्वयं को जानो

नीति, कूल गोत्र से परे, नाम-रूप, गुण-दोष रहित
देश, काल,वस्तु से पृथक, वही ब्रह्म हो करो भावना !

वाणी जिस तक पहुँच न पाती, परे प्रकृति से है अनादि
ज्ञान चक्षुओं से ही जानें, उसी ब्रह्म की करो भावना

क्षुधा-पिपासा आदि न जिसमें, इन्द्रियों से न ध्याया जाता
ऐश्वर्यवान परे बुद्धि से, उसी ब्रह्म की करो भावना

जो आधार इस भ्रांत जगत का, स्वयं के ही आश्रित है जो
सत् असत् परे दोनों से, निरवयव अनुपम है जो

जन्म, वृद्धि, परिणति, अपक्षय, व्याधि और नाश न जिसमें
सृष्टि, पालन, विनाश का कारण, उसी ब्रह्म की करो भावना

एक है पर अनेक का कारण, अन्यों के निषेध का कारण
स्वयं पृथक कार्य कारण से, उसी ब्रह्म की करो भावना

निर्विकल्प, महान अविनाशी, क्षर, अक्षर परे दोनों से
नित्य अव्यय, निष्कलंक जो, उसी ब्रह्म में करो भावना

सत् सर्वदा निर्विकार है, भ्रम वश नामरूप में भासे
गुणातीत है निर्विकल्प भी, उसी ब्रह्म की करो भावना  

जिसके परे और न कोई, स्वयं प्रकाशित है जो सत्ता
 अव्यय यह आनंद स्वरूप है, जो अनंत अंतर आत्मा

वही ब्रह्म हो तुम विचारो, बुद्धि से फिर करो यह बोध
ज्यों अंजुरी में जल भरा हो, संशय रहित तत्व का बोध

ज्यों सेना में राजा शोभे, रहे आत्मा पंच भूतों में
स्वयंप्रकाश विशुद्ध तत्व है, दृश्य जगत हो लीन उसी में

सत् असत् से परे विलक्षण, बुद्धिरूप गुहा में रहता
परब्रह्म का बोध जिसे हो, पुनः जन्म न उसका होता  



Thursday, November 17, 2011

महावाक्य विचार


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

ब्रह्म और जगत की एकता


यदि सत्य होता विश्व तो, सुषुप्ति में भी प्रतीति होती  
खो जाता है यह निद्रा में, स्वप्न समान अनुभूति होती

जैसे गुण से गुणी पृथक नहीं, ब्रह्म जगत से पृथक नहीं है
आरोपित है अधिष्ठान में, भ्रम से वही भास रहा है

जैसे चांदी दिखे सीपी में, जगत ब्रह्म में नजर आता है
इदं जगत में इदं ब्रह्म है, जगत भ्रम से देखा जाता है

महावाक्य विचार

‘तत्त्वमसि’ महावाक्य है, ब्रह्म-आत्मा एकत्व बताता
लक्ष्यार्थ में है एकता, वाच्यार्थ में कहा न जाता

ब्रह्म सूर्य, आत्मा जुगनू, वह दाता और यह सेवक है
वह सागर यह कूप है, ब्रह्म सुमेरु, आत्मा अणु है

मात्र उपाधि ही भेद का कारण, सत्य नहीं उपाधि भी
ईश्वर की उपाधि माया, पंचकोश है जीव उपाधि

राज्य उपाधि से है राजा, ढाल उपाधि से है सैनिक
राज्य, ढाल के न रहने पर, न ही राजा न ही सैनिक

ब्रह्म में कल्पित हुआ द्वैत जो, श्रुति निषेध करती है उसका
शेष बचे जो परे उपाधि के, वही जानने योग्य है सत्ता

जीव ब्रह्म का एक्य सिद्ध हो, तभी ज्ञान उनका होता है
‘वह यह है’ में ज्यों एकता तत्त्वमसि यही कहता है

इसी लक्षणा द्वारा ज्ञानी, जीव-ब्रह्म का ज्ञान हैं पाते
युगों युगों से इन्हीं वाक्यों से, दोनों की एकता बताते  
      


   

Monday, November 14, 2011

ब्रह्म और जगत की एकता


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

ब्रह्म और जगत की एकता


सत्य, नित्य, शुद्ध है जो, ज्ञानस्वरूप, अनंत, अभिन्न
अंतरतम वह ब्रह्म तत्व है, उन्नति स्रोत, आनंद का घन

परम अद्वैत ही सत्य पदार्थ, कोई न दूजा सिवा आत्मा
जिसको बोध हुआ है इसका, एक है उसको ब्रह्म-आत्मा

विविध रूप का जो दिखता है, है अज्ञान ही इसका कारण
एक ब्रह्म ही इसके पीछे, निर्विकल्प, आनंद घन

मिट्टी से जो बना है घट, नहीं पृथक है वह मिट्टी से
कल्पित नाम मात्र की सत्ता, मिट्टी ही कण-कण में उसके

कथन श्रुति का यह उत्तम है, सकल विश्व है यह ब्रह्म ही
अधिष्ठान में जो आरोपित, पृथक नहीं है सत्ता उसकी

यदि सत्य मानें जगत भी, आत्मा की अनंतता कैसे 
श्रुति अप्रमाणिक होती, ईश्वर भी सत्य हो कैसे

परम तत्व के जो ज्ञाता हैं, ईश्वर ने किया है निश्चित
न तो मैं भूतों में स्थित, न ही वे मुझमें हैं स्थित   

 
      


   
  

Monday, October 31, 2011

अन्नमय कोष


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

अन्नमय कोष

अन्न से ही जो उत्पन्न होता, अन्न से जीता अन्नमय है
त्वचा, चर्म आदि से बना जो, शुद्ध आत्मा यह नहीं है

जन्म पूर्व व बाद मृत्यु के, अन्न मय कोष नहीं रहता
क्षणिक, अस्थिर, जड़ तन यह, भाव, विकारों का है ज्ञाता

अंग-भंग होने पर भी, जीवित पुरुष रहा करता है
शासित है जो स्वयं देह यह, शासक कैसे हो सकता है

वह आत्मा पृथक है इससे, देह के धर्म, कर्म जो जाने
जड़ ही स्वयं को देह मानते, विवेकी सत्य खुद को माने

असत् देह में भ्रम से उत्पन्न, अहंता को जो न त्यागे
मोक्ष का वह नहीं अधिकारी, जो नर ब्रह्म में ना जागे

छाया, स्वप्न, मन में उपजी, देह को जैसे असत् जानते
ज्ञानी जन इस जीवित देह को, उसी प्रकार न सत् मानते

प्राणमय कोष

कर्मेंद्रियों से युक्त प्राण जो, स्थूल देह में विचरण करता
श्वास रूप में आये-जाये, वही प्राणमय कोष कहलाता

इसे नहीं प्रतीति कोई, इष्ट-अनिष्ट यह नहीं जानता
आत्म तत्व इससे पृथक है, ज्ञानी ऐसा ही मानता

मनोमय कोष
अन्नमय व प्राण मय को, व्याप्त किये ही जो रहता है
ज्ञानेन्द्रियाँ व मन मिलकर, मनोमय कोष कहाता है

मै, मेरा इसमें ही होते, है बलवान यह मोहित करता
विषयों में संलिप्त करे यह, इच्छाओं को उत्पन्न करता
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Thursday, October 27, 2011

आत्म-अनात्म विवेक


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


आत्म-अनात्म विवेक

परम पिता की शुद्ध कृपा का, जब साधक पर नीर बहेगा
बंधन घोर अविद्या का, विवेक खड्ग से तभी कटेगा

कोटि कर्म करके भी साधक, इस बंधन को काट न सकता 
व्यर्थ अस्त्र-शस्त्र हैं सारे, ज्ञान खड्ग से ही यह कटता

सुने हुए में निश्चय करता, स्वधर्म में हो प्रतिष्ठित
चित्त शुद्ध होता है उसका, परमात्मा में होता स्थित

 जल से ही उत्पन्न होती है, ज्यों तालाब पे छाई काई
जल को ही ढक लेती है, जिससे जल न पड़े दिखाई

ऐसे ही यह सत् आत्मा, स्वयं ही अहं को उत्पन्न करता
अज्ञान से ढका हुआ यह, स्वयं को ही नजर न आता

काई को यदि कोई हटा दे, शुद्ध नीर पी प्यास बुझाये
पंच कोष के पार जा सके, आत्मा का वह दर्शन पाए

बंधन यदि काटना चाहे, आत्म-अनात्म का करे विवेक
स्वयं को सत् चिद् आनंद जाने, रहे प्रसन्न वह मानव नेक

मूँज से जैसे सींक पृथक कर, उपयोगी हम उसे बनाते
द्रष्टा से दृश्य पृथक कर, आत्म भाव में मुक्त कहाते 

Sunday, October 23, 2011

देह अध्यास



श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


देह अध्यास

अनात्म में जो आत्म देखता, जन्म मरण क्लेशों को पाता
असत् देह को सत् मानकर, रक्षण, पोषण आदि करता

तमोगुण अज्ञान का कारण, कुछ का कुछ है दिखलाता
यही है बंधन घोर सदा जो, रस्सी को है सर्प बताता

नित्य, अखंड आत्मतत्व को, तमोमय अज्ञान ढक लेता
जैसे परम सूर्य को नभ में, राहू है आच्छादित करता

निर्मल अति तेज युक्त जो, आत्म तत्व जब ढक जाता
देह को ही मैं मानकर, काम, क्रोध आदि से बंधता

भ्रमित हुआ सा तब यह जीव, भव सागर में गोते खाता
महामोह ग्राह के द्वारा भी, निज बुद्धि से भी ठगा जाता

सूर्य तेज से उत्पन्न होती, बदली ज्यों सूरज को ढकती
प्रकट आत्म से अहंकार भी, आत्मा को आवृत करता

नभ पर जब घनघोर घटा हो, शीत पवन तन को चुभती है
बुद्धि पर जब तमस घना हो, नाना यह दुःख उपजाती है

आवरण व विक्षेप ही जग में, बंधन जीव के हैं भारी
इनसे ही मोहित हो मानें, देह को आत्मा सब नर-नारी

यह संसार इक वृक्ष है यदि, अज्ञान ही बीज है इसका
देह अध्यास है अंकुर सम, पत्र राग, कर्म जल जिसका

विषय पुष्प हैं इसके मोहक, शाखा प्राण, उपशाख इन्द्रियाँ
नाना कर्मों से जो उपजा, दुःख वह फल, जीव भोक्ता

है अनादि और अनंत, बंधन जो अज्ञान से उपजा
उत्पन्न करता यही प्रवाह, जन्म, मरण, जरा, मृत्यु का

Wednesday, October 19, 2011

सत्व गुण


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

सत्व गुण

जल सम निर्मल सत्व गुण है, रज, तम से मिल प्रेरित करता
प्रतिबिम्बित हो इसमें आत्मा, जड़ पदार्थ प्रकाशित करता

यम, नियम के प्रति हो श्रद्धा, भक्ति व मोक्ष अभिलाषा
त्याग असत् का, दैवी सम्पति, धर्म यही है सत गुण का

रहे अमानी, सदा प्रसन्न, तृप्त, शांत, परम में स्थित
सतो गुणी को यही शोभते, नित्य रहे आनंद समाहित

कारण शरीर

तीनों गुणों से युक्त हुआ जो, कारण देह यही कहलाता
बुद्धि जब विलीन हो जाती, सुषुप्ति में अभिव्यक्ति पाता

अनात्मा

देह, इन्द्रिय, मन व प्राण, अहं, विषय, भूत, अव्यक्त
हैं असत् ये सभी कार्य, अनात्म कह कर करते व्यक्त

आत्मा

परम का स्वरूप है सुंदर, जिसे जानकर मोक्ष है मिलता
नित्य पदार्थ, आधार अहं का, पंचकोश से पार जो मिलता

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति का, जो मन, बुद्धि का साक्षी
अहं भाव से स्थित रहता, पल-पल जो देखे वृत्ति

जो स्वयं सबको देख रहा है, किन्तु जिसे न कोई देखे
बुद्धि को प्रकाशित करता, बुद्धि न पर उसको देखे

जिसने सारे विश्व को व्यापा, जिसे न कोई व्याप्त कर सके
आभास रूप यह जगत अखिल, जिसके भासने पर ही दिखे

जिसके होने मात्र से ही, देह, इन्द्रियाँ, मन वर्तते
नित्य ज्ञान स्वरूप जो सत्ता, जिससे विषय जाने जाते

एक रूप है, बोध मात्र भी, आनंद रूप, नित्य अखंड
अंतर आत्मा, पुराण पुरुष भी, प्राण, इन्द्रियों का वाहक

बुद्धि रूप गुफा में स्थित, इक अव्यक्त आकाश के भीतर
सूर्य समान तेज से अपने, प्रकाशित है परम सुखकर

मन व अहंकार का ज्ञाता, अनात्म को वही जानता
अविकारी, अकर्ता है वह, उनसा बन भी भिन्न ही रहता

न जन्मता, न ही मरता, बढ़ता नहीं है कभी न घटता
नित्य तत्व है इस घट में, घटाकाश सा लीन न होता

पर प्रकृति से, ज्ञान स्वरूप, निर्विशेष परम आत्मा
सत्-असत् का ज्ञान कराए, साक्षी है वह, वही है द्रष्टा

संयत चित्त हुआ जो साधक, प्रसन्न चित्त से उसको जाने
भव सागर को तर जायेगा, ब्रह्म रूप में उसको माने