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Saturday, May 14, 2022

श्रीराम के द्वारा ज़ाबालि के मत का खंडन करके आस्तिक मत का स्थापन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


नवाधिकशततम: सर्ग:  


श्रीराम के द्वारा ज़ाबालि के मत का खंडन करके आस्तिक मत का स्थापन 



 धरा, कीर्ति, यश, लक्ष्मी,चारों, वरण सत्यवादी का करतीं 

शिष्ट पुरुष करें सत्य पालन, यही है सुंदर जीवन नीति 


तर्कपूर्ण वचनों के द्वारा, सिद्ध किया है जो आपने 

श्रेष्ठ प्रतीत भले होता हो,नहीं उपयुक्त आचरण के 


वन में रहने की प्रतिज्ञा, मैंने पिता के सम्मुख की है

कैसे मानूँ बात भरत की, मेरी यह प्रतिज्ञा अटल है 


जब मैंने प्रतिज्ञा की थी, कैकेयी माँ हर्षित हुईं थीं 

भीतर-बाहर बनूँ मैं पावन, अब वन ही शरण स्थली होगी 


फल, मूल, पुष्पों के द्वारा, देवों, पितरों को तृप्त करूँगा

निर्णय किया उचित,अनुचित का, श्रद्धापूर्वक पूर्ण करूँगा 


पाकर सब इस कर्मभूमि को, शुभ कर्मों का करें अनुष्ठान 

अगिन, वायु, सोम आदि को कर्मों के कारण मिला सम्मान 


सौ यज्ञों का किया अनुष्ठान, स्वर्गलोक इंद्र ने पाया 

उग्र तपस्या कर तापसों ने, स्थान दिव्य लोक में पाया 


परलोक की सत्ता का खण्डन, जाबालि ने जो किया था 

श्रीराम सहन न कर पाए, निंदा करते यह वचन कहा 


सत्य, धर्म, पराक्रम, प्रिय वाणी, सभी प्राणियों के प्रति दया 

देवों, अतिथि, ब्राह्मणों की पूजा, यही स्वर्ग का मार्ग कहा 


धर्म का शुद्ध स्वरूप जानकर, तर्क से निश्चय पर पहुँच कर

उत्तम लोक प्राप्त करते हैं,  ब्राह्मण धर्म का आचरण कर 


विषम-मार्ग में स्थित होकर, वेद विरुद्ध हुई बुद्धि आपकी 

दूर धर्म से, बने नास्तिक, निंदा करता हूँ इस कार्य की 


पिताजी ने अपना याजक, कैसे बना लिया था आपको

जैसे चोर निंदनीय सदा,  वेद विरोधी दंडनीय हो 


श्रेष्ठ  ब्राह्मणों ने सदा ही, शुभ कर्मों का  किया अनुष्ठान  

वेदों को प्रमाण मानकर, कृत, हुत आदि का किया सम्पादन    


धर्म में तत्पर रहने वाले, सत्पुरुषों का संग जो करें  

तेज से सम्पन्न, युक्त दान से, श्रेष्ठ मुनि ही पूजित होएं 


दैन्य भाव से रहित राम ने, रोषयुक्त ये शब्द कहे जब 

विनयपूर्वक जाबालि ने, हितकारी व सत्य वचन कहे तब 


नहीं नास्तिक हूँ मैं राम, न ही नास्तिकों की बातें करता 

आवश्यकता पड़ने पर केवल, मैं पुनः नास्तिक हो सकता 


ऐसा ही अवसर आया था, नास्तिकता की कहीं थीं बातें 

एक मात्र उद्देश्य था इसमें,  आप पुनः अयोध्या लौटें 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ नौवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Thursday, May 5, 2022

श्रीराम के द्वारा ज़ाबालि के मत का खंडन करके आस्तिक मत का स्थापन

 श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्


नवाधिकशततम: सर्ग:  


श्रीराम के द्वारा ज़ाबालि के मत का खंडन करके आस्तिक मत का स्थापन 


ज़ाबालि का वचन सुना जब, सत्यप्रतिज्ञ श्री रामचंद्र ने 

श्रुति सम्मत उक्ति के द्वारा, हो संशय रहित ये वचन कहे 


मेरा प्रिय करने की ख़ातिर, कर्तव्य की जो बात कही 

ज्यों अपथ्य,पथ्य सम लगता, किसी भांति भी करने योग्य नहीं 


धर्म, वेद की तज मर्यादा, जो नर पाप कर्म में लगता 

भ्रष्ट हुआ आचार-विचार से, सत्पुरुषों में यश न पाता 


आचार ही यह बतलाता, किस कुल में जन्म किया धारण 

कौन वीर, कौन बकवादी, कौन पवित्र  है कौन अपावन 


आपने जो आचार बताया, अनार्य पुरुष उसे अपनाते 

भीतर से अपवित्र रहे जो, शीलवान ऊपर से दिखते 


चोला पहने हुए धर्म का, उपदेश आपका है अधर्म  

माना जाऊँगा दुराचारी,त्याग दूँ यदि मैं शुभकर्म 


जग में वर्णसंकरता बढ़े, कर्तव्य भान खो जाएगा 

लोक कलंकित होगा इससे, कोई न श्रेष्ठ मान पाएगा 


निज प्रतिज्ञा यदि कोई तोड़े, किस साधन से पाए स्वर्ग  

यदि मैं नहीं कोई किसी का, किसका है फिर यह उपदेश 


यदि चलूँ आपके मार्ग पर, स्वेच्छा चारी बन जाऊँगा 

लोक भी वैसा ही करेगा, प्रजा भी वैसी जैसा राजा 


सत्य का सदा पालन करना, राजाओं का दया धर्म है 

सत्य स्वरूप राज्य होता है, सत्य में ही लोक टिका है 


सत्य का आदर करते आए, सदा ऋषि गण और देवता 

सत्यवादी पुरुष लोक में, अक्षय परम धाम को जाता 


जैसे सर्प से भय लगता, असत्य वक्ता से सभी डरते 

सत्य पराकाष्ठा धर्म की, वही सबका मूल कहा जाता  


जगत में सत्य ईश्वर ही है, धर्म टिका है  इसके बल पर 

मूल सभी का सत्य है केवल, नहीं परम पद उससे बढ़कर 


दान, यज्ञ, तप, वेद, होम का, एक सत्य ही सदा आधार 

सत्यपरायण बनें सभी जन, इसका ही करें सब व्यवहार 


कोई जगत का पालन करता, कोई कुल को करता पोषित 

कोई यहाँ नर्क जाता है, कोई स्वर्गलोक में प्रमुदित 


सत्य प्रतिज्ञ हूँ मैं यदि, पिता के सत्य को किया है धारण 

ऐसी दशा में क्यों न करूँ, उनके इस आदेश का पालन 


पहले कर प्रतिज्ञा इसकी,लोभ, मोह अज्ञान के कारण 

हो विवेकशून्य क्यों अब, नहीं मर्यादा का करूँ पालन  


सुना है जो भी भ्रष्ट हुआ नर, वचन तोड़ने का कारण से 

उसके दिए हवय-कव्य को, देवता भी  ग्रहण नहीं करते 


सत्य रूपी धर्म का पालन, हितकर सबके लिए मानता

सत्पुरुषों ने किया है धारण, सब धर्मों में श्रेष्ठ जानता


वल्कल, जटा आदि धार कर, तापस धर्म का पालन करते 

सत्पुरुषों ने मार्ग दिखाया, हम उसका अभिनंदन करते 

 

लगे धर्म पर हो अधर्म उस, क्षात्र धर्म को नहीं मानता 

नीच, क्रूर, लोभी जन चलते, उस मार्ग का त्याग करूँगा


देह से जो पाप करे नर, पहले मन से निश्चित करता 

फिर जिव्हा से उसे बता कर, अन्य के सहयोग से करता 


कायिक, वाचिक, मनसा आदि, तीन तरह का पातक होता 

सत्यवादी पुरुष सदा ही, हर प्रकार के पाप से बचता 





Thursday, April 28, 2022

जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

 अष्टाधिकशततम: सर्ग:

जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना


जब धर्मज्ञ श्रीराम भरत को, समझा बुझा रहे प्रेम से 

तब ब्राह्मण शिरोमणि जाबालि ने, धर्म विरुद्ध ये वचन कहे 


रघुनंदन आप बुद्धिमान हैं, अपढ़ जन सम विचार न करें

कौन यहाँ किसका बंधु है, जीव अकेला जन्मता व मरे 


कोई न माता-पिता किसी का, आसक्ति सब व्यर्थ है यहाँ 

दुनिया एक सराय जैसी, सज्जन न होते आसक्त जहाँ 


त्याग पिता का राज्य आपको, उचित नहीं है वन में रहना 

अयोध्या नगरी प्रतीक्षित, राज्य अभिषेक कराएं अपना


देवराज ज्यों स्वर्ग में रहते, वैसे ही विचरें आप भी 

पिता आपके कोई नहीं थे, नहीं जुड़ें उनसे आप भी 


पिता जन्म में निमित्त मात्र है, रज-वीर्य संयोग है कारण 

नहीं हैं राजा अब दुनिया में, दुःख उठाते आप किस कारण 


प्राप्त हुए अर्थ का जो नर, धर्म के नाम पर त्याग कर गए 

उनके लिए अति शोक मुझे है, व्यर्थ ही मृत्यु को प्राप्त हुए 


अष्टका आदि जो श्राद्ध हैं, उनके देव पितर कहलाते 

किन्तु विचार यदि हम देखें, इसमें अन्न का नाश ही करते  


एक का खाया कहाँ लग सकता, भला दूसरे की देह में 

ऐसा नहीं संभव हो सकता, मृत मनुष्य पा सकते कैसे 


यदि कहीं ऐसा होता तो, यात्रियों का श्राद्ध कर देते 

उन्हें स्वयं ही मिल जाता फिर, मार्ग के लिए पथ्य न देते 


देवों के हित यज्ञ व पूजा, तप करने हित बनो सन्यासी 

यह बातें ग्रन्थों में लिखीं हैं, ज्ञानियों ने दान की खातिर 


इस लोक के सिवा दूसरा, लोक नहीं कोई इसको जानें 

राज्य लाभ का लेकर आश्रय, पारलौकिक को नहीं मानें 


सत्पुरुषों की बुद्धि जगत में, राह दिखाती प्रमाण भूत है 

मान कर अनुरोध भरत का, ग्रहण करें राज्य आप सुख से 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में 

एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ.