Wednesday, October 7, 2026

रावण का पुनः मारीच के पास जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम:

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

पंचत्रिंश: सर्ग: 



खड़े हुए रोंगटे रावण के, शूर्पणखा की बातें सुनकर 

की सलाह मंत्रियों से अपने, चल दिया वहाँ से निश्चय कर 


क्या सीता का अपहरण कर लूँ, इस बारे में  विचार किया

गुण-दोष दोनों को देखा, निज बलाबल  का अनुमान किया 


निश्चय किया अंत में उसने, यही कार्य संपन्न करूँगा 

 निर्णय जब सुना दिया बुद्धि ने, रथशाला में प्रवेश किया 


गुप्त रूप से जाकर बोला, रथ तैयार करो झट मेरा

कुशल सारथी ने मनोनुकूल, रथ तुरंत ही जोत दिया 


सुवर्णमय, रत्नों से भूषित, इच्छा से चलने वाला था 

गधे जुते हुए थे उस रथ में, मुख जिनका पिचाशों सा था 


मेघ गर्जना के समान वह, घर घर की घन ध्वनि फैलाता 

हो आरूढ़ उसी रथ पर, सागर के तट पर रावण  पहुँचा 


श्वेत चंवर डोलता सिर पर, श्वेत छत्र भी तना हुआ था 

 अंग कांति वैदूर्यमणि सम, स्वर्णाभूषणों  से सज्जित था 


दस मुख, दस कंठ, भुजाएँ बीस, वस्त्राभूषण दर्शनीय थे 

देवशत्रु, मुनियों का घाती, दस सिर जैसे पर्वत शिखर थे 


मेघ समान सुशोभित होता, विद्युन्मण्डल से घिरा हुआ 

बगुलों की पंक्तियों से शोभित, रावण रथ पर आसीन हुआ 


सागर तट पर जा पहुँचा वह, जहाँ सहस्रों वृक्ष लगे थे 

पुष्करिणियाँ भी निकट भरी थीं, मंगलकारी शीतल जल से  


वेदिकाओं से मंडित सुंदर, आश्रम भी शोभा पाते थे

कदली वन, नारियल के कुञ्ज, ताल, तमाल, साल, उगते थे 


जो नियमित आहार ही करते, महर्षि, नाग, गरुड़, गंधर्व 

किन्नर भी वहाँ रहते थे, चारण, सिद्ध मनाते ज्यों पर्व 


माष गोत्र में उत्पन्न मुनी व, बालखिल्य महात्माओं से 

केवल सूर्य-किरण जो पीते, भरा था ऐसे तापसों से 


दिव्य आभूषण व माला धारे, अप्सराएँ वहाँ विचरतीं 

शोभा शालिनी देवांगणाएँ, तटसेवन करती बैठीं  

 

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