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Sunday, January 8, 2012

आत्म ज्ञान का फल


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


आत्म ज्ञान का फल

सम्यक सिद्धि आत्म ज्ञान में, पाकर योगी हर्षित होता
नित्य आनंद रस को पाता, बाहर-भीतर एक हो रहता

वैराग्य से बोध जगेगा, बोध से उपरामता विषयों से
उपरति से आनंद प्रकटता, चित्त शान्त हो सब समयों में

यदि न मिली आत्म शांति, उपरति होना तब निष्फल है
बोध भी व्यर्थ चला जायेगा, यदि उपरति न उसका फल है

वैराग्य का क्या अर्थ है, यदि बोध जगा न भीतर
विषयों से हटना है तृप्ति, यही परम आनंद मनोहर

प्रारब्ध वश जो दुःख मिल जाये, विचलित न होता ज्ञानी
अज्ञान में कर्म किये जो, ज्ञान हुए होते सब सानी

विद्या हमें छुडाती असत् से, अविद्या प्रबल किये जाती
यदि असत् में अब भी रूचि है, विद्या फल न दे पाती

हृदय ग्रंथि अज्ञान रूप जो, नाश हुआ जिसका ज्ञानी में
मिटी कामना जग से सुख की, विषय फंसाते न मोह में

भोग्य वस्तु लख लोभ जगे न, वैराग्य तब प्रकट हुआ है
अहंकार न रहता जिसमें, बोध भी उसका प्रबल हुआ है

भीतर वृत्ति शांत हुई है, उपरति सधी है ज्ञानी में
शांत हुआ आनंद में डूबा, बंधन काटे हैं योगी ने



Friday, October 7, 2011

कैसे हो आत्म ज्ञान


 श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

कैसे हो आत्म ज्ञान

ब्रह्म जीव के एक्य का अनुभव, जब तक खुद को नहीं हुआ हो  
मोक्ष सिद्ध न हो पायेगा, चाहे योग, ज्ञान में कुशल हुआ हो

सुंदर वीणा वादक छेड़े, मन का रंजन ही करती
विद्वत्ता, वकृत्व कुशलता, मोक्ष नहीं दिला सकती

परम तत्व को न जाना तो, शास्त्र पठन निष्फल ही है
जिसने जाना परम तत्व को, शास्त्र उसे भी अब व्यर्थ है

शब्द जाल भटका सकता है, किसी घने वन में ज्यों राही
तत्व ज्ञान ज्ञानी दे सकता, जिसने भीतर अलख जगाई

सर्प अविद्या का काटे जब, ब्रह्म ज्ञान औषधि उसकी
वेद, शास्त्र, मंत्र, औषध भी, कोई नहीं सहाय जिसकी

औषध का बस नाम ही रटें, रोग नहीं जाता तन का
ब्रह्म-ब्रह्म रटने भर से ही, अनुभव सिद्ध नहीं हो जाता

राजा हूँ कहने भर से, नहीं नरेश हुआ कोई
राज्य मिले, शत्रु भी हारें, कहलाये राजा सोई

धरती में यदि गड़ा खजाना, श्रम के बल हासिल होता
सदगुरु के उपदेश पर चलके, लक्ष्य को साधक पा लेता

दृष्य प्रपंच जो दीख रहा है, द्रष्टा में विलीन हो जाये
तभी मोक्ष का अनुभव होगा, शेष कहीं न कुछ रह जाये

भव बंधन से छूटना चाहे, करे मनन, निदिध्यासन भी
शक्ति पूर्ण लगा दे अपनी, पायेगा वह मोक्ष तभी  





Monday, September 26, 2011

आत्म ज्ञान का अधिकारी कौन


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित

विवेक – चूड़ामणि



आत्म ज्ञान का अधिकारी कौन

जो अधिकारी है ज्ञान का, फल सिद्धि उसी को सम्भव
मन में यदि जिज्ञासा उत्तम, देश, काल भी हैं सहायक

सद्गुरु श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी है, शरण में उनकी जाना होगा
आत्म तत्व का जो जिज्ञासु, अहंकार मिटाना होगा

बुद्धिमान हो व विद्वान, तर्क वितर्क जिसे आता है
आत्म ज्ञान का अधिकारी भी, वह चाहे तो बन सकता है

विवेक वान, वैरागी मन का, शम, दम आदि से संयुक्त
ब्रह्म को वह ही पा सकता, जिसके भीतर जगा मुमुक्षत्व