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Monday, October 3, 2011

गुरुद्वार पर


गुरुद्वार पर 

आत्मतत्व का जो जिज्ञासु, जिसने वैराग्य साधा
षट् सम्पत्ति, विवेक पास हैं, पथ में कोई न बाधा

सद्गुरु के निकट वह जाये, जिसे मोक्ष की अभिलाषा
साधन चार में कुशल हुआ जो, आत्म ज्ञान की हो आशा

ब्रह्म निष्ठ दया के सागर, शांत मना निष्पाप हों जो
प्रसन्न चित्त, निकट जा उनके, प्रश्न करे सद्गुरु से वो

करुणा सागर सद्गुरु को, नमन करे वह बारम्बार
भव सिंधु में डूब रहा हूँ, कृपा प्रदान कर, करो उद्धार

जगत अग्नि में मैं दग्ध हूँ, कंपित व भयभीत अति
शरण में आया हूँ गुरुवर, रक्षक तुम बिन कोई नहीं

आप स्वयं तो पार हुए हैं, अन्यों पर भी कृपा अपार
लोक हित स्वभाव आपका, मृदु हो जैसे वसंत बहार

सूर्य जिसे तपाया करते, चन्द्र करे धरा को शीतल
सब लोगों की पीड़ा हरते, करुणा के सागर तुम निर्मल

स्वर्ण कलश सम हृदय तुम्हारा, जिसमें अद्भुत वचन भरे हैं
एक दृष्टि में हर लेते हो, कृपा दृष्टि से कई तरे हैं

मेरी गति क्या होने वाली, नहीं जानता, हे सद्गुरु !
कैसे, क्या उपाय करूं मैं, रक्षा करो, दुःख नाश ! प्रभु  
  

Monday, September 26, 2011

आत्म ज्ञान का अधिकारी कौन


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित

विवेक – चूड़ामणि



आत्म ज्ञान का अधिकारी कौन

जो अधिकारी है ज्ञान का, फल सिद्धि उसी को सम्भव
मन में यदि जिज्ञासा उत्तम, देश, काल भी हैं सहायक

सद्गुरु श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी है, शरण में उनकी जाना होगा
आत्म तत्व का जो जिज्ञासु, अहंकार मिटाना होगा

बुद्धिमान हो व विद्वान, तर्क वितर्क जिसे आता है
आत्म ज्ञान का अधिकारी भी, वह चाहे तो बन सकता है

विवेक वान, वैरागी मन का, शम, दम आदि से संयुक्त
ब्रह्म को वह ही पा सकता, जिसके भीतर जगा मुमुक्षत्व