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Saturday, April 25, 2026

श्रीराम आदि का अगस्त्य के आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:


पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा,

विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का

सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ काल तक रहकर

उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के

आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


जहाँ-तहाँ लकड़ी के ढेर, वैदूर्यमणि से कटे हुए कुश 

आश्रम की अग्नि का धुआँ, काले मेघों सा ढकता है नभ 


 यहाँ स्थित पावन तीर्थों में, करके स्नान फूल स्वयं चुनकर 

देवता को समर्पित करते, ब्राह्मण अतीव हर्षित होकर 


सुतीक्ष्ण मुनि से जैसे सुना था, वैसा ही दिखाई देता 

इन्हीं के भाई अगस्त्य मुनि ने, दक्षिण दिशा को अभय दिया 


एक समय की बात सुनो, वातापि व इल्वल दो भाई थे

अति क्रूर स्वभाव दोनों का, ब्राह्मणों की हत्या करते थे 


निर्दयी इल्वल ब्राह्मण बनकर, संस्कृत बोलता हुआ जाता 

श्राद्ध के लिए निमंत्रण देकर, ब्राह्मणों को बुला लाता 


मेष रूप धरे वातापि का, कर संस्कार उनको खिलाता 

भोजन कर लेने पर उनके, भाई को आवाज़ लगाता 


वातापि तभी पेट फाड़कर, बाहर आ जाता 'मैं' 'मैं' कर

इस प्रकार दोनों भाई ने, कईयों का जीवन लिया हर 


देवताओं की प्रार्थना सुनकर, इल्वल ने जब श्राद्ध किया था

शाक बने वातापि का तब, अगस्त्य मुनि ने भक्षण कर डाला

 

ब्राह्मण के हाथ में इल्वल ने, अवनेजन का जल सौंपा

‘बाहर निकलो’ कह भाई को, तब उसने संबोधित किया 

 

हँसकर कहा मुनि अगस्त्य ने, जीव शाक रूपी भाई को 

खाकर पचा लिया है मैंने, तू न देख सकेगा उसको 


भाई की मृत्यु हुई सुनकर, उसने मुनि पर प्रहार किया 

अग्निरूपी अपनी दृष्टि से, वहीं उसको भी दग्ध किया