Monday, April 27, 2026

श्रीराम आदि का अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

एकादश: सर्ग:


पंचाप्सर तीर्थ एवं माँडकर्णि  मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में

घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना, वहाँ कुछ

काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के

आश्रम पर जाना तथा अगस्त्स्य के प्रभाव का वर्णन 


ब्राह्मणों पर कृपा अति करके, जिन्होंने किया दुष्पार्य कृत्य 

उन्हीं अगस्त्य मुनि के भाई का, सुंदर आश्रम यह अति भव्य 


संध्या काल तभी हो आया, भाइयों ने करी उपासना 

आश्रम में प्रवेश किया फिर, मुनि चरणों में झुकाया माथा 


एक रात्रि बितायी वहाँ पर, मुनि ने समुचित सत्कार किया

प्रातः काल उठे, आज्ञा माँगी, तीनों ने प्रस्थान किया 


मिले मार्ग में वृक्ष अनेकों, जल कदंब, कटहल, साखू के 

तिनिश, बेल महुआ, अशोक, तेंदू, चिरिबिल्व, कुछ जंगली थे 


कुछ को मसल दिया सूंड़ों से, मतवाले हाथी समूह ने 

वानर बैठे शाख़ों ऊपर, मतवाले खग वहाँ चहकते 


कमलनयन श्रीराम ने तभी, वचन कहे छोटे भाई से 

जैसे सुना, चिकने हैं वैसे, यहाँ के पेड़ों के पत्ते 


पशु, पक्षी भी शांत बहुत हैं, इससे यही जान पड़ता है 

शुद्ध ह्रदय अगस्त्य ऋषिवर का, आश्रम अब आने वाला है 


निज कर्मों से हुए विख्यात, अगस्तय नाम से इस जग में 

उन्हीं का आश्रम अति सुन्दर, हर लेता है कष्ट पथिकों के 


यज्ञ-याग के धूम से व्याप्त, चीर वस्त्र शोभित होते हैं 

शांत अति यहाँ  झुंड मृगों के, कलरव नित गूँजा करते हैं 


 दक्षिण दिशा को जिन मुनि ने, कर दिया सुरक्षित राक्षसों से 

दूर से ही अब रहे निहार , निकट नहीं अब आ सकते वे 


जब से आये इस दिशा में, तभी से  वैर रहित और शांत 

अगस्तय दिशा भी कहते इसको, दक्षिणा भी इसका नाम 


एक बार बढ़ा विंध्य पर्वत,  रोकने हेतु मार्ग सूर्य का

  अगस्त्य  मुनि के आदेश से,  रहे विंध्य आज तक झुका हुआ


वे दीर्घायु महात्मा पूज्य,  कर्म हैं उनके बहुत विख्यात 

सब लोकों से पूजित हैं वे, हमारा भी होगा कल्याण 


यहाँ निवास करता हुआ मैं, उनकी आराधना करूँगा 

 बाक़ी दिवस भी वनवास के, रहकर यहीं व्यतीत करूँगा 

 

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