Thursday, July 14, 2011

अष्टमोऽध्यायः अक्षरब्रह्मयोग (अंतिम भाग)

अष्टमोऽध्यायः
अक्षरब्रह्मयोग (अंतिम भाग)


अब मैं तुम्हें कहूँगा अर्जुन, उन दोनों कालों का विवरण
जिनमें जाकर पुनः लौटते, या नहीं होता पुनरागमन

जिस मार्ग में अग्निदेव हैं, शुक्ल पक्ष और दिवस काल है
नही लौटता योगी पुनः उनसे, जो उत्तरायण के छह मास हैं

धूम्र देव हैं जिस पथ पर, कृष्ण पक्ष और रात्रि काल है
चन्द्रलोक को जाता योगी, जब दक्षिणायण के छह मास हैं

प्रथम मार्ग से जो योगीजन, परमधाम को प्राप्त हो गए
नहीं लौटते पुनः धरा पर, मुक्त हुए वे मुझे पा गए

कृष्ण पक्ष में जो नर जाते, पुनः उनका आगमन होता
शुभ कर्मों का फल भोगते, स्वर्ग कभी न शाश्वत होता

इन दोनों को जान पार्थ तू, मोहित न पल भर को हो
समबुद्धि को प्राप्त हुआ तू, नित्य निरंतर योगयुक्त हो

योगीजन इस भेद को जानें, फिर न उन्हें पुण्य भी बांधे
यज्ञ, तप और दान धर्म का, कर उल्लंघन परम पद पा लें





Tuesday, July 12, 2011

अष्टमोऽध्यायः अक्षरब्रह्मयोग (शेष भाग)

अष्टमोऽध्यायः
अक्षरब्रह्मयोग (शेष भाग)

सब इन्द्रियों के द्वार रोककर, मन को रख हृदय केन्द्र में
प्राणों को ले जा मस्तक में, ऊँ कह जो देह त्यागे

ऐसा नर मुझे ही पाता, ब्रह्म का चिंतन जो करता
परमगति को प्राप्त हुआ वह, साधक मुक्ति को पाता

मुझ पुरुषोत्तम को जो भजता, सुलभ सदा उसे मैं रहता
नित्य निरंतर युक्त वह मुझमें, सहज उसे मैं हूँ मिलता

परम सिद्धि को प्राप्त हुआ वह, नहीं लौटता इस जग में
प्राप्त मुझे वह कर लेता, जो ध्याता है मुझको मन में

ब्रह्म लोक तक भी पहुँचा हो, पुनः उसे लौटना पड़ता
किन्तु मुझे जो प्राप्त हो गया, उसका पुनर्जन्म न होता

मैं हूँ कालातीत, शाश्वत, ब्रह्म लोक तक सभी अनित्य
काल के द्वारा सीमित हैं ये, परम ब्रह्म मैं ही नित्य

एक हजार युग की अवधि का, ब्रह्मा का इक दिन होता
एक हजार युग की अवधि की, ब्रह्मा की रात्रि होती

ब्रह्मा का जब दिन होता, सारे जीव व्यक्त होते हैं
ब्रह्मा की रात्रि काल में, पुनः जीव अव्यक्त हैं होते

यही भूत समुदाय पुनः पुनः, प्रकृति के वश में आता
प्रकट हुआ करता दिन में, रात्रि में विलीन हो जाता

उस अव्यक्त से परे एक है, परम विलक्षण इक अव्यक्त
परा, सनातन भाव श्रेष्ठ वह, नष्ट हुए सब वही शाश्वत

वह अव्यक्त कहाए अक्षर, उसे ही परम गति कहते
उस सनातन परम धाम को, प्राप्त हुए नर मुक्ति पाते

जिसके भीतर हैं सब प्राणी, जिससे यह संसार भरा है
उस सनातन परम पुरुष को, पाये वही जो भाव भरा है

Sunday, July 10, 2011

अष्टमोऽध्यायः अक्षरब्रह्मयोग



अष्टमोऽध्यायः
अक्षरब्रह्मयोग

ब्रह्म क्या है, हे पुरुषोत्तम !, और किसे कहते अध्यात्म
अधिभूत किसे कहते  हैं, क्या है, हे केशव ! यह कर्म

अधियज्ञ किसे कहते हैं, कैसे वह रहता है तन में
युक्तचित्त ज्ञानी जन तुमको, कैसे जानें अंतकाल में

परम अक्षर है ब्रह्म, हे अर्जुन !, जीवात्मा को जान अध्यात्म
भूतों का भाव उपजाये, ऐसा त्याग कहलाये कर्म

जो उपजे व नष्ट हो गए, वे पदार्थ अधिभूत तू जान
अधिदैव ब्रह्मा को कहते, अधियज्ञ तू मुझको मान

अंतकाल में मेरा स्मरण, करके जो नर प्राण त्यागता
मुझे प्राप्त होता निसंशय, हे अर्जुन ! मैं तुझे बताता

जिस-जिस भाव को स्मरण करेगा, प्राप्त उसी को वह होगा
 जिसमें जीवन भर रमा है, अंतकाल में वही रुचेगा

इसीलिए हे प्रिय अर्जुन तू, क्षण-क्षण में कर चिंतन मेरा
युद्ध भी कर तू मुझमें रहकर, निस्संदेह तू मुझे मिलेगा

एकीभाव से परमब्रह्म में, ध्यानयोग से युक्त हुआ जो
दिव्य पुरुष जो परम प्रकाशित, प्राप्त करेगा उस ईश्वर को

सृष्टि का यह नियम अटल है, जो भी ध्यान योग में रत
उसे प्राप्त होगा परमेश्वर, दिव्यपुरुष वह परम प्रकाशित

सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ, है अनादि वह अति सूक्ष्म
सबको धारण-पोषण करता, अचिन्त्य चेतन सूर्यसम

विद्यावान, शुद्ध, चेतन, अन्तर्यामी जो भजता है
अंतकाल में स्मरण करता, प्रभु को प्राप्त हुआ करता है

भृकुटी के मध्य में अपने, प्राण टिकाकर ध्यान करे
निश्चल मन से अंतकाल में, दिव्य परम पुरुष को भजे

 सच्चिदानंद घन रूप परमेश्वर, अविनाशी वेदज्ञ कहते
आसक्ति रहित महात्मा, जिस परम पद को चाहते

परम पद की करें कामना, ब्रह्मचारी सदा मन में
उस श्रेष्ठ पद का विवरण, संक्षेप में सुन तू मुझसे 

Friday, July 8, 2011

सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग (अंतिम भाग)



सप्तमोऽध्यायः
ज्ञानविज्ञानयोग (अंतिम भाग)

बुद्धिहीन जन मुझे न जानें, अविनाशी जो परम ईश्वर
मनुज भाव से मुझे देखते, मैं हूँ मन-इन्द्रियों से पर

मैं अदृश्य बना रहता हूँ, योगमाया का ले आश्रय
मैं अजन्मा, अविनाशी हूँ, नहीं जानता जन समुदाय

चले गए जो अब भी हैं, त्तथा भविष्य में जो होंगे
मैं जानता सब भूतों को, अश्रद्धालु ये नहीं जानते

इच्छा और द्वेष उपजाते, सुख-दुःख आदि द्वंद्व जगत में
घने मोह से हो आवृत, अज्ञानी रहते व्याकुल से

किन्तु सदा है श्रेष्ठ आचरण, निष्कामी, द्वन्द्वातीत जो
इच्छाओं से मुक्त हुए नर, भजते हैं मुझ परमेश्वर को

आकर शरण में करें प्रार्थना, जरा, मरण से मुक्ति चाहें
वे ही जानते परम ब्रह्म को, अध्यात्म कर्मों को जानें

Monday, July 4, 2011

सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)


  सप्तमोऽध्यायः
ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)

त्रिगुणों से मोहित है जग यह, मुझ अविनाशी से अनभिज्ञ
नहीं जानता मुझको कोई, जन समुदाय है अल्पज्ञ

दुस्तर है मेरी यह माया, पार न उसको जग कर पाता
किन्तु जो केवल भजता मुझको, इसके पार उतर जाता

जिनका ज्ञान हरा माया ने, जो मूढ़ हैं ऐसे जन
तुच्छ कर्म करते जो आसुरी, भजते नहीं मुझे वे जन

चार श्रेणियाँ हैं भक्तों की, जो मुझ ईश्वर को भजते हैं
अर्थार्थी, आर्त्त, जिज्ञासु, ज्ञानी चौथे को कहते हैं

एकीभाव से मुझमें स्थित, अनन्य प्रेमी ज्ञानी है उत्तम
मुझे जानता तत्व से ज्ञानी, प्रिय मुझको मैं उसका प्रियतम

यूँ तो भक्त सभी उदार हैं, ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है
मन, बुद्धि मुझमें है उसकी, मुझमें ही सदा स्थित है

आती दुर्लभ है वह महात्मा, जो सब वासुदेव ही माने
जन्मों- जन्मों कर तपस्या, ज्ञानी इस तत्व को जाने

जिनके मन में बसी कामना, ज्ञान हरा गया है जिनका
अन्य देवताओं को भजते, करे स्वभाव प्रेरित उनका

जिस देवता के स्वरूप को, भक्त सकाम पूजना चाहे
मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ करता, पाता है वह फल मन चाहे

उस श्रद्धा से युक्त हुआ वह, पूजन करता है देव की
मैंने ही विधान किया है, प्राप्ति करे इच्छित भोगों की

किन्तु वह फल नाशवान है, अल्पबुद्धि वे नहीं जानते
देवों की पूजा कर साधक, मुझे न पा देवों को पाते  

चाहे जैसे ही भजते हों, मेरे भक्त मुझे भजते हैं
मुझे प्राप्त होते अंत में, ज्ञानीजन उन्हें कहते हैं 

Wednesday, June 29, 2011

सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग


  सप्तमोऽध्यायः
ज्ञानविज्ञानयोग

योग साधना कर हे अर्जुन, अनन्य प्रेम तू कर मुझसे
नहीं परायण हो किसी के, अपना चित्त लगा मुझमें

मैं विभूति सम्पन्न बली, ऐश्वर्यशाली परमात्मा  
संशय रहित पार्थ हे सुन, निस्संदेह मैं सबका आत्मा

जिसे जानकर जग में तुझको, कुछ जानना न शेष रहेगा
तत्व ज्ञान, विज्ञान सहित, तेरे हित यह कृष्ण कहेगा

कोई एक हजारों में से, मुझको सचमुच पाना चाहे
उनमें से भी कोई बिरला, यथार्थ रूप से मुझको जाने

पंच भूत पृथ्वी, जल आदि, मन, बुद्धि व अहंकार
अपरा प्रकृति जड़ है मेरी, ये हैं उसके आठ प्रकार

एक और परा प्रकृति है, यह जग किया है जिसने धारण
जीवरूपा परा प्रकृति वह, वही जगत का चेतन कारण

इन दोनों से ही जन्मे हैं, प्राण किये हैं सबने धारण
मैं ही प्रभव, प्रलय भी हूँ, मैं ही हूँ इस जग का कारण

मुझसे भिन्न न दूजा कारण, यह जग मुझसे ही उपजा है
जैसे धागे का इक माल, धागे के मोती से गुंथा है

सूत के मनके सूत की माला, सूत बिना कुछ और नहीं है
मुझसे उपजा, टिका है मुझमें, दूजा कोई ठौर नहीं है

हे अर्जुन, मैं जल में रस हूँ, हूँ प्रकाश चन्द्र, सूर्य में
ओंकार वेदों में पावन, शब्द गगन में पुरुषत्व, पुरुष में

पावन गंध धरा की मैं हूँ, तेज अग्नि का मुझे ही जान
सब भूतों का जीवन भी मैं, तापस का तप मुझको मान

बीज सनातन भूतों का मैं, मेधा बुद्धिमानों की हूँ
तेजस्वी का तेज भी मैं ही, ज्योति मैं प्राणों की हूँ

आसक्ति, इच्छा रहित बल, मैं ही धर्मयुक्त हूँ काम
तीनों गुणों से उत्पन्न होते, भाव भी उपजे मुझसे जान

किन्तु साथ ही स्मरण रख तू, मैं न उनमें होता लिप्त
ज्यों आकाश सभी में रहता, फिर भी रहता सदा अलिप्त 

Monday, June 27, 2011

आत्मसंयमयोग षष्ठोऽध्यायः (अंतिम भाग)


आत्मसंयमयोग
षष्ठोऽध्यायः (अंतिम भाग)
परम सत्य को पाने हित जो, कर्म किया करता है जग में
नाश नहीं होता है उसका, इहलोक या परलोक में

योगभ्रष्ट हुआ वह साधक, उत्तम लोकों को ही पाता
पुण्यात्मा के घर जन्मता, पुनः धरा पर जब भी आता

वैरागी भी पुनः जन्म ले, ज्ञानी माता-पिता को पाता
पूर्व जन्म के योग का फल वह, दुर्लभ जन्म को लेकर पाता

अनायास ही योग साधता, संस्कारी बालक वह होता
पुनः परम हित करे साधना, पहले से भी उन्नत होता

प्रयत्नशील साधक वह अर्जुन, दृढ़ होकर साधना करता
जन्मों के संस्कार के द्वारा, परम प्रभु को वह पा जाता

योगी श्रेष्ठ तपस्वी से है, शास्त्री है उससे कमतर
जो सकाम कर्म करते हैं, योगी उनसे भी बढ़कर

जो नर सदा आत्मा में रह, अविरत भजता है मुझको
परम श्रेष्ठ मेरी दृष्टि में, सदा प्रेम करता मैं उसको