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Monday, July 4, 2011

सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)


  सप्तमोऽध्यायः
ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)

त्रिगुणों से मोहित है जग यह, मुझ अविनाशी से अनभिज्ञ
नहीं जानता मुझको कोई, जन समुदाय है अल्पज्ञ

दुस्तर है मेरी यह माया, पार न उसको जग कर पाता
किन्तु जो केवल भजता मुझको, इसके पार उतर जाता

जिनका ज्ञान हरा माया ने, जो मूढ़ हैं ऐसे जन
तुच्छ कर्म करते जो आसुरी, भजते नहीं मुझे वे जन

चार श्रेणियाँ हैं भक्तों की, जो मुझ ईश्वर को भजते हैं
अर्थार्थी, आर्त्त, जिज्ञासु, ज्ञानी चौथे को कहते हैं

एकीभाव से मुझमें स्थित, अनन्य प्रेमी ज्ञानी है उत्तम
मुझे जानता तत्व से ज्ञानी, प्रिय मुझको मैं उसका प्रियतम

यूँ तो भक्त सभी उदार हैं, ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है
मन, बुद्धि मुझमें है उसकी, मुझमें ही सदा स्थित है

आती दुर्लभ है वह महात्मा, जो सब वासुदेव ही माने
जन्मों- जन्मों कर तपस्या, ज्ञानी इस तत्व को जाने

जिनके मन में बसी कामना, ज्ञान हरा गया है जिनका
अन्य देवताओं को भजते, करे स्वभाव प्रेरित उनका

जिस देवता के स्वरूप को, भक्त सकाम पूजना चाहे
मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ करता, पाता है वह फल मन चाहे

उस श्रद्धा से युक्त हुआ वह, पूजन करता है देव की
मैंने ही विधान किया है, प्राप्ति करे इच्छित भोगों की

किन्तु वह फल नाशवान है, अल्पबुद्धि वे नहीं जानते
देवों की पूजा कर साधक, मुझे न पा देवों को पाते  

चाहे जैसे ही भजते हों, मेरे भक्त मुझे भजते हैं
मुझे प्राप्त होते अंत में, ज्ञानीजन उन्हें कहते हैं