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Wednesday, June 4, 2014

सगर पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुंचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


चत्वारिंशः सर्गः
 सगर पुत्रों के भावी विनाश की सूचना देकर ब्रह्माजी का देवताओं को शांत करना, सगर पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुंचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना

देवताओं की बात सुनी जब, जो भयभीत और मोहित थे
ब्रह्मा जी ने कहे वचन ये, थे पीड़ित जो सगर पुत्रों से

सारी पृथ्वी है जिनकी वे, वासुदेव श्री हरि वे पावन
कपिल मुनि का रूप धरे, करते हैं वे इसको धारण

उनकी कोपाग्नि से ही, जलकर भस्म सभी होंगे
पृथ्वी का भेदन होना है, निश्चित ही विनष्ट होंगे

हर्षित हुए देव सुनकर यह, लौट गये जैसे आये थे
पृथ्वी जब खोदी जाती थी, शब्द भयंकर तब गूंजे थे

भेदन कर सारी पृथ्वी का, कर परिक्रमा भी उसकी तब
खाली हाथ लौट आये वे, सर्व धरा छान डाली जब

देव, दानव, राक्षस, पिशाच, नाग आदि बलवानों को
मार दिया सबको हमने पर, कहीं न देखा अश्व चोर को

पुत्रों का यह वचन सुना जब, कुपित हुए राजा बोले तब
जाओ, फिर से खोदो धरती, चोर पकड़ लो, आना तब

मान पिता की यह आज्ञा, पुत्र लौटे फिर साठ हजार
रोष में भरकर गये रसातल, देखा दिग्गज पर्वताकार

विरूपाक्ष नाम था उसका, धारण किये था यह भूतल
पर्वत और वनों सहित इस, धरा धरे था वह मस्तक पर

मस्तक को जब जरा हटाता, वह विश्राम के हेतु थककर
भूकम्प होता था उस क्षण, कंप जाती थी धरती हिलकर

विरूपाक्ष विशाल गजराज, रक्षा करता था पूर्व दिशा की
परिक्रमा कर बढ़ गये आगे, तब दक्षिण की ओर वे सभी

दक्षिण में भी एक था दिग्गज, महापद्म नाम था जिसका
 सगर पुत्र लख हुए थे विस्मित, पर्वत के समान ऊंचा था

कर परिक्रमा उस दिग्गज की, पश्चिम दिशा को गये वीर वे
सौमनस का किया था दर्शन, गये उसकी भी परिक्रमा करके

उत्तर दिशा में श्वेत भद्र था, हिम समान विशाल दिग्गज
कुशल पूछ उसकी भी वे सब, भूमि भेदन में गये थे जुट

रोषपूर्वक पूर्वोत्तर में, गये खोदने फिर भूमि को  
इस बार देखा वीरों ने, वासुदेव रूप कपिल मुनि को

राजा सगर के यज्ञ का घोडा, वहीं निकट विचरण करता था
राम ! उसे देख उन सबको, अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ था

यज्ञ में विघ्न इन्होंने डाला, यही समझ क्रोध में भरकर
हाथों में ले हल, पत्थर वे, दौड़े वहाँ रोष में भरकर

अरे ! खड़ा रह, है चोर तू, दुर्बुद्धे ! अब हम आ गये
राजा सगर के पुत्र हैं हम सब, क्रोध में भर ये वचन सुनाये

उनकी जब यह बात सुनी तो, रोष हुआ भगवान कपिल को
मुँह से इक हुंकार निकाला, राख किया तब उन्हें जलाकर


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ.



 



Tuesday, April 29, 2014

उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना

 श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षट्त्रिंशः सर्गः

देवताओं का शिव-पार्वती को सुरतक्रीडा से निवृत करना तथा उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देना 

तब उनके ऐसा कहने पर, बोले थे शिव से यह देव
पृथ्वीदेवी करेंगी धारण, क्षुब्ध हुआ जो गिरेगा तेज

देवों का जब सुना कथन यह, महादेव ने छोड़ा तेज
वन, पर्वत संग सारी धरती, हुई व्याप्त हो गयी सतेज

‘वायु के सहयोग से इसको’, अग्निदेव से बोले देव
धारण कर लो भीतर अपने, शिव का है यह महातेज

अग्नि से जब व्याप्त हुआ, परिणत हुआ श्वेत पर्वत में
सरकंडों का दिव्य वन भी, प्रकट हुआ उस प्रदेश में

सूर्य और अग्नि सम हुआ, तब कार्तिकेय का प्रादुर्भाव
ऋषियों सहित सभी देवों में, बढ़ी प्रसन्नता, भक्तिभाव

पूजन किया उमा-शिव का, पर भरी क्रोध में गिरिजानन्दिनी
रोषपूर्वक शाप दिया तब, देवताओं व पृथ्वी को भी

पुत्र-प्राप्ति की इच्छा थी, रोक दिया देवों तुमने
होंगी पुत्रहीन पत्नियाँ, रहो अयोग्य पुत्र पाने में

पृथ्वी को भी शाप दिया तब, बहुतों की भार्या होगी
नहीं रहेगा एक सा रूप, भूमे ! तेरी खोटी बुद्धि

मेरे क्रोध से कलुषित होकर, तू भी वह सुख न पायेगी
पुत्र जनित जो सुख है सुंदर, अनुभव न उसका जानेगी

देवों को जब देखा पीड़ित, उमादेवी के शाप से शिव ने
पश्चिम दिशा की ओर बढ़ गये, हिमालय के उत्तर भाग में

हुए तपस्या में रत दोनों, उस पर्वत के एक शिखर पर
यह विस्तृत वृतांत कहा, अब सुनो कथा गंगा की रघुवर

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छत्तीसवां सर्ग पूरा हुआ.


Wednesday, July 17, 2013

राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

द्वाविंशः सर्ग

राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना, मार्ग में उन्हें विश्वामित्र की बला-अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति

सुने वचन वशिष्ठ मुनि के, दशरथ अति प्रसन्न हुए
लक्ष्मण सहित राम को बुलाया, मिल सबने स्वस्ति वचन कहे

किया राम को अभिमंत्रित, मंगल सूचक कई मन्त्रों से
मंगल काज किये यात्रा हित, माता-पिता व गुरु वशिष्ठ ने

पुत्र का मस्तक सूँघ प्रेम से, मुनि को सौंप दिया राजा ने
धूल रहित सुख पवन बही तब, पुष्पवृष्टि की देवताओं ने

बज उठीं थीं देव दुन्दुभियाँ, शंख, नगाड़े बजे उसी क्षण
आगे-आगे राम चले थे, पीछे थे सौमित्र लक्ष्मण

तरकस बंधे पीठ पर थे, हाथों में थे धनुष सुशोभित
तीन फनों वाले सर्प दो, ज्यों चले आ रहे हों हर्षित

था स्वभाव उनका, उदार, अनुपम कांति से प्रकाशित
वे अनिन्द्य सुंदर राजपुत्र, कर रहे थे शोभा प्रसारित

ब्रह्मा जी के पीछे-पीछे, ज्यों अश्विनी कुमार चलते हों
पीछे-पीछे थे मुनिवर के, राम-लक्ष्मण वीर वे दोनों

वस्त्र और आभूषण सुंदर, दस्ताने हाथों में पहने
कटि प्रदेश में तलवारें थीं, श्री अंग बड़े मनोहर थे

महातेजस्वी, श्रेष्ठवीर वे, उद्भासित अद्भुत थी कांति
महादेव के पीछे ज्यों, स्कन्द और विशाख की भांति


Tuesday, February 19, 2013

ब्रह्मा जी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानर यूथ पतियों की उत्पत्ति



श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


सप्तदशः सर्गः

ब्रह्मा जी की प्रेरणा से देवता आदि के द्वारा विभिन्न वानर यूथ पतियों की उत्पत्ति 


सुंदर, रूपवान जो दोनों, अश्विनीकुमार नाम है जिनका
दो पुत्रों के पिता बने, मैंद, द्विविद नाम था उनका

वरुण पुत्र कहाया सुषेण, वायु थे हनुमान के पिता
गरुड़ समान वेग पाया, वज्र समान सुदृढ़ शरीर था

बुद्धिमान व बलशाली थे, सभी श्रेष्ठ वानरों में वे
कई हजार वानर उपजे थे, वध करने को रावण के

बल की सीमा नहीं थी उनके, इच्छानुसार रूपधारी थे
गजराजों, पर्वतों समान वे, वीर, पराक्रमी, महाबली थे

वानर, रीछ, लंगूर भी जन्मे, थे पराक्रमी देवावस्था से
जिस देव का रूप था जैसा, उसी समान पुत्र था उससे

कुछ की माता रीछ जाति की, कुछ किन्नरियों से जन्मे थे
देव, महर्षि, गरुड़, गन्धर्व ने, पुत्र अनेकों तब जन्मे थे

सर्प, नाग, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष आदि भी हुए थे हर्षित
देव स्तुति करने वाले जो, वनवासी भी हुए प्रफ्फुलित

कंदमूल फल खाने वाले, सिंह, व्याघ्र सम थे बलशाली
चट्टानों को उठा हाथ में, इच्छा मात्र से विचरण शाली

अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता, लेते, नख, दांतों से काम अस्त्र का  
पर्वत हिला सकें हाथों से, क्षुब्ध कर सकें जल सागर का

लाँघ सकें सागरों को भी, पृथ्वी को विदीर्ण कर डालें
चाहे तो आकाश में जाएँ, गजराजों को बंदी बना लें

घोर शब्द मात्र से उनके, पक्षी गगन से गिर जाते थे
महाकाय वानर बलशाली, कोटि संख्या में यूथपति थे

यूथपति से श्रेष्ठ जो वानर, ऋक्षवान पर्वत पर रहते
दूजे अन्य वनों के वासी, कई पर्वतों पर थे बसते

इंद्रकुमार बाली के भाई, थे सूर्यकुमार सुग्रीव कहाते
वानर यूथपति सब मिलकर, सेवा में उनकी रहते थे

नल-नील, हनुमान व अन्य, वानर अति महाकाय थे
सहायता हेतु श्रीराम की, सारी पृथ्वी पर छा गए थे  

 




Saturday, January 12, 2013

ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ निकलना


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 



पंचदशः सर्गः
ऋष्यश्रंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ निकलना तथा भगवान विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना 


देवों के ऐसा कहने पर, कुछ सोच यह बोले ब्रह्मा
मुझे ज्ञात हो गया उपाय, उस दुरात्मा के वध का

वर माँगा था जब उसने, यही कही थी एक बात तो
यक्ष, देव, राक्षस न मारें, न ही मरूं गन्धर्व के हाथों

“ऐसा ही हो” कहकर मैंने, मानी थी उसकी अभिलाषा
नहीं अवध्य वह मानव से, मानव को तो तुच्छ समझता

मानव के अतिरिक्त न दूजा, कोई उसका वध कर सकता
सुन कर हर्षित हुए ऋषिगण, अब है रावण मर सकता

इसी समय महान तेजस्वी, जगतपति श्री विष्णु भगवान
मेघ के ऊपर सूर्य हो जैसे, आए गरुड़ पर हो विद्यमान

पीताम्बर धारे थे तन पर, शंख, चक्र गदा आदि ले
तपे हुए सोने के केयूर, थे सुशोभित द्वि भुजा में

वन्दित हुए सभी देवों से, ब्रह्मा जी से मिले वहाँ
हुए विराजित उसी सभा में, यज्ञ हुआ था पूर्ण जहां

कहा विनय से भर देवों ने, सर्व व्यापी, हे परमेश्वर !
तीनों लोकों का हित जिसमें, एक महा कार्य आप पर

प्रभो, अयोध्या के राजा, धर्मज्ञ, उदार बहुत हैं
तेजस्वी महर्षियों जैसे, उनकी तीन रानियाँ हैं

ह्री, श्री और कीर्ति जैसी, हैं देवियों के ही समान
चार स्वरूप बना कर अपने, पुत्र रूप में लें अवतार  

 वध कर डालें समर भूमि में, महा पराक्रमी रावण का  
देवों से जो है अवध्य, कंटक रूप है जो जग का

मूर्ख राक्षस रावण जग में, कष्ट दे रहा है सबको
गन्धर्वों, सिद्धों आदि को, साथ मुनि, महर्षियों को

रौद्र निशाचर ने ऋषियों को, नन्दन वन से गन्धर्वों को
गिरा दिया है भूमि पर, स्वर्ग से भी अप्सराओं को


Monday, July 4, 2011

सप्तमोऽध्यायः ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)


  सप्तमोऽध्यायः
ज्ञानविज्ञानयोग (शेषभाग)

त्रिगुणों से मोहित है जग यह, मुझ अविनाशी से अनभिज्ञ
नहीं जानता मुझको कोई, जन समुदाय है अल्पज्ञ

दुस्तर है मेरी यह माया, पार न उसको जग कर पाता
किन्तु जो केवल भजता मुझको, इसके पार उतर जाता

जिनका ज्ञान हरा माया ने, जो मूढ़ हैं ऐसे जन
तुच्छ कर्म करते जो आसुरी, भजते नहीं मुझे वे जन

चार श्रेणियाँ हैं भक्तों की, जो मुझ ईश्वर को भजते हैं
अर्थार्थी, आर्त्त, जिज्ञासु, ज्ञानी चौथे को कहते हैं

एकीभाव से मुझमें स्थित, अनन्य प्रेमी ज्ञानी है उत्तम
मुझे जानता तत्व से ज्ञानी, प्रिय मुझको मैं उसका प्रियतम

यूँ तो भक्त सभी उदार हैं, ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है
मन, बुद्धि मुझमें है उसकी, मुझमें ही सदा स्थित है

आती दुर्लभ है वह महात्मा, जो सब वासुदेव ही माने
जन्मों- जन्मों कर तपस्या, ज्ञानी इस तत्व को जाने

जिनके मन में बसी कामना, ज्ञान हरा गया है जिनका
अन्य देवताओं को भजते, करे स्वभाव प्रेरित उनका

जिस देवता के स्वरूप को, भक्त सकाम पूजना चाहे
मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ करता, पाता है वह फल मन चाहे

उस श्रद्धा से युक्त हुआ वह, पूजन करता है देव की
मैंने ही विधान किया है, प्राप्ति करे इच्छित भोगों की

किन्तु वह फल नाशवान है, अल्पबुद्धि वे नहीं जानते
देवों की पूजा कर साधक, मुझे न पा देवों को पाते  

चाहे जैसे ही भजते हों, मेरे भक्त मुझे भजते हैं
मुझे प्राप्त होते अंत में, ज्ञानीजन उन्हें कहते हैं