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Thursday, March 1, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते रहे स्वयं में
आत्मा में ही रमा करे वह, चाहे हो किसी दशा में

जिसने आत्मस्वरूप को जाना, आत्मतत्व की सिद्धि करता
देश काल से परे हुआ वह, नियम, लक्ष्य सब कुछ ही तजता

‘यह घट है’ इसको जो जाने, किस नियम की उसे अपेक्षा
मैं ब्रह्म हूँ, इस ज्ञान को, ज्ञानी जन स्वयं ही कहता

जगत प्रकाशित है सूर्य से, असत् पदार्थ भासते सत् से
उस सत् को कौन प्रकाशे, सत् प्रकाशित होता स्वयं से

वेद, शास्त्र, प्रमाण व प्राणी, अर्थवान हैं जिस परम से
कौन प्रकाशित करेगा उसको, परम प्रकाशित है स्वयं से

स्वयंप्रकाश, अनंत शक्ति, अप्रमेय, अनुभव स्वरूप यह
जान इसे ही मुक्त हुआ, ज्ञानी जन हुआ है धन्य

विषय प्राप्त होते हैं उसको, सुखी-दुखी न होता ज्ञानी
न आसक्त न हुआ विरक्त, स्वयं में ही रस पाता ज्ञानी

आत्मा के आनंद का रस पा, वह स्वयं में ही क्रीड़ा करता
ममता, अहं से मुक्त हुआ वह, निज स्वरूप में ही रमता

जैसे बालक मग्न हुआ सा, खेल में ही लगा रहता
भूख और नींद को भुला के, खिलौने से तृप्त हो रहता

चिंता व दीनता छूटी, मुक्त हुआ सा वह विचरे
अभय हुए वह घूमे वन-वन, सारा जग अपना माने

दिशा वस्त्र है, धरा बिछौना, परब्रह्म में क्रीड़ा करता
सदा सुखी हो तृप्त हुए वह, मुक्त जगत में घूमा करता

बालवत् हुआ वह ज्ञानी, देह का मात्र आश्रय लेता
आसक्ति न रहती उसमें, चिह्न न कोई प्रकट करता 

Tuesday, February 21, 2012

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)

श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

बोधोपल्ब्धि (शेष भाग)

है सबका आधार वही, वही प्रकाशक है सबका
सर्वरूप व सर्व व्याप्त वह, नित्य, शुद्ध, अद्वैत आत्मा

भेद रहित, अंतर आत्मा, अदृश्यमान है अनंत
आनंद स्वरूप निर्विकल्प, वही एक हूँ परम ब्रह्म

क्रिया रहित, विकार रहित हूँ, निराकार, निरालम्ब
हूँ अद्वितीय, आत्मा सबका, ज्ञान स्वरूप, आनंद रूप

हे सदगुरु, मैंने पाया है, कृपा आपकी है मुझपर
बारम्बार नमन है तुमको, ज्ञान की है महिमा अनुपम

माया में मैं भटक रहा था, जन्म-मृत्यु, जरा के भय से
मेरी रक्षा की आपने, जगा दिया है गहन नींद से  

हे सदगुरु, नमन है तुमको, सत स्वरूप तुम तेजवान हो
विश्व रूप हो व्याप रहे हो, परम पूज्य तुम ज्ञानवान हो      


Friday, September 23, 2011

श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित विवेक – चूड़ामणि


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


मंगला चरण

जो अज्ञेय परम पुरुष है, वेद-वाक्यों से जाना जाता
परमानंद स्वरूप सद्गुरु, गोविन्द हित नत मस्तक होता

ब्रह्मनिष्ठा का महत्व

मानव जन्म अति दुर्लभ है, उससे दुर्लभ जिज्ञासु होता
नित्य-अनित्य का भेद मनुज को, शुभ कर्मों के बिना न मिलता

ईश कृपा ही जिसका हेतु, मानव जन्म तभी मिलता है
मोक्ष की इच्छा भी दुर्लभ है, सद्गुरु मुश्किल से मिलता है

जिसको ऐसा मिला है अवसर, ज्ञान का पथ भी जिसे मिला है
आत्म मुक्ति का प्रयत्न न करे, स्वयं को उसने नष्ट किया है

जो न करता खोज स्वयं की, जो प्रमाद में घिरा हुआ है
कौन है उससे बढकर मूर्ख, जो अज्ञान में ही रहता है

शास्त्र सभी जानता कोई, पूजन यजन भी करता है
जब तक आत्मज्ञान न साधा, दूर मुक्ति से रहता है

धन से अमृत तत्व न मिलता, श्रुतियो में यह कहा गया  
कुछ कर के भी पा न सकते, इससे ऐसा स्पष्ट हुआ    


Monday, June 27, 2011

आत्मसंयमयोग षष्ठोऽध्यायः (अंतिम भाग)


आत्मसंयमयोग
षष्ठोऽध्यायः (अंतिम भाग)
परम सत्य को पाने हित जो, कर्म किया करता है जग में
नाश नहीं होता है उसका, इहलोक या परलोक में

योगभ्रष्ट हुआ वह साधक, उत्तम लोकों को ही पाता
पुण्यात्मा के घर जन्मता, पुनः धरा पर जब भी आता

वैरागी भी पुनः जन्म ले, ज्ञानी माता-पिता को पाता
पूर्व जन्म के योग का फल वह, दुर्लभ जन्म को लेकर पाता

अनायास ही योग साधता, संस्कारी बालक वह होता
पुनः परम हित करे साधना, पहले से भी उन्नत होता

प्रयत्नशील साधक वह अर्जुन, दृढ़ होकर साधना करता
जन्मों के संस्कार के द्वारा, परम प्रभु को वह पा जाता

योगी श्रेष्ठ तपस्वी से है, शास्त्री है उससे कमतर
जो सकाम कर्म करते हैं, योगी उनसे भी बढ़कर

जो नर सदा आत्मा में रह, अविरत भजता है मुझको
परम श्रेष्ठ मेरी दृष्टि में, सदा प्रेम करता मैं उसको