Saturday, June 8, 2019

मंगलवाद्य घोष को सुनकर भरत का दुखी होना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


एकाशीतितमः सर्गः


प्रातःकल के मंगलवाद्य घोष को सुनकर भरत का दुखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मंत्री आदि को बुलाने के लिए दूत भेजना

अभ्युदय सूचक उस रात्रि का, अल्प भाग ही रहा शेष जब
करने लगे थे स्तवन भरत का, मंगल स्तुति से सूत-मागध

बजी दुन्दुभि स्वर्ण दंड से, प्रहर समाप्ति को सूचित करने
घोष वाद्यों का गूँजा, बजने लगे शंख, कई बाजे

पूर्ण गगन को करे व्याप्त जो, तुमुल नाद जब सुना भरत ने
नींद खुली उस ध्वनि को सुनकर,  जलने लगे पुनः शोकाग्नि में

'नहीं नरेश मैं' कहकर उनको, बंद कराया तुरंत भरत ने
कैकेयी ने अपकार किया है, वचन कहे ये शत्रुघ्न से

बोझ दुखों का डालके मुझपर, स्वर्गलोक को गये हैं राजा
बिन नाविक की नौका जैसी, राजलक्ष्मी हुई है विधवा

स्वामी व सरक्षक हैं जो, उन राम को मेरी माँ ने
भेज दिया है घोर वनों में, सद्धर्म को तिलांजलि दे  

देख विलाप भरत का दारुण, सभी स्त्रियाँ रनिवास की
दीनभाव से फूट-फूटकर, आतुर हुईं रोने लगीं थीं

राजधर्म के जो ज्ञाता थे, महायशस्वी महर्षि वसिष्ठ ने
 उसी समय प्रवेश किया था, नृप दशरथ के सभा भवन में

बना सुवर्ण का था अधिकांश, लगे हुए थे स्वर्ण स्तम्भ
सभा रमणीय शोभा पाती, देवों की सुधर्मा सभा सम

वेदों के ज्ञाता वशिष्ठ ने, शिष्यों संग प्रवेश किया
सुवर्ण पीठ पर आकर बैठे, दूतों से यह वचन कहा

शांतभाव से तुम सब जाकर, शीघ्र बुलाओ ब्राह्मणों को
क्षत्रियों, व योद्धाओं संग, आओ लेकर अमात्यों को

भरत, शत्रुघ्न, सब राजकुमार, मंत्री युधाजित व सुमंत्र को  
है आवश्यक कार्य हमें उनसे, बुला के लाओ शीघ्र सभी को

कोलाहल आरम्भ हुआ तब, घोड़े, हाथी व रथों का
किया भरत का स्वागत सबने, करें देवता ज्यों इंद्र का

तिमी मछली, जलहस्ती जिसमें, स्थिर जल व मुक्ता से युक्त
शंख, बालुका युक्त सिन्धु सम, भरत से सभा हुई थी शोभित


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ.



Friday, June 7, 2019

अयोध्या से गंगातट तक सुखद राजमार्ग का निर्माण


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

अशीतितमः सर्गः

अयोध्या से गंगातट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण

ऊँची-नीची, निर्जल व सजल,  ध्यान भूमि का जो रखते थे
सूत्र कर्म करने वाले कई, शूर-वीर मार्ग रक्षक थे

दें नदी पार करने के साधन, भू खोद सुरंग बनाते
जल प्रवाह को रोक सकें, वेतनभोगी, रथ, यंत्र बनाते

लकड़हारे, काष्ठकार, रसोइये, चूना पोतने वाले
बांस चटाई, सूप बनाते, चमड़े की वस्तुएं बनाते

थे विशेष ज्ञानी रस्तों के, समर्थ पुरुष गये थे पहले
मार्ग ठीक करने हेतु सभी, वन प्रदेश की ओर वे चले

पूर्णिमा के दिन जो उमड़ा, उस सागर की भांति वेग से
कारीगर निपुण दल लेकर, औजारों के साथ चल दिए

लता, बेल, झाड़ियाँ, ठूँठ, काट अनेक वृक्षों को चलते
पत्थर हटा मार्ग बनाते, जहाँ नहीं थे वृक्ष लगाते

कुल्हाड़ों, टंकों, हंसियों से, वृक्षों व घास को काटते
कुश, कास आदि झुरमुट को, फेंक रहे थे उखाड़ हाथों से

जहाँ-तहाँ, ऊँचे-नीचे भू को, खोद-खोद बराबर करते
अन्य लोग सूखे कुओं व, गड्ढों को पाटते मिट्टी से

जो स्थान नीचे होते थे, शीघ्र ही उन्हें बराबर करते
पुल बाँधने योग्य जल जहाँ, झट जाकर वहाँ पुल भी बाँधे

कंकरीली भूमि थी जहाँ पर, किया मुलायम ठोक-पीटकर
जल बहने हित मार्ग बनाया, जहाँ जरूरी बाँध काटकर

छोटे-छोटे सोतों को तब, जिनका पानी बह जाता था
चहुँ ओर से बाँध उन्हें भी, बना दिया अतीव जलवाला

इस प्रकार अल्प समय में, भिन्न-भिन्न तालाब बनवाये
भरा अगाध जल था उनमें,  सागर समान जान पड़ते थे

निर्जन स्थानों में अनेकों, कुएं, बावड़ी आदि बनवाये
सुंदर लगते थे जो सारे, निकट बनी वेदिकाओं से

देवताओं के मार्ग की भांति, शोभित होने लगा रास्ता
चूना-सुर्खी, बिछाके कंकर, कूटपीट किया था पक्का

मार्ग किनारे वृक्ष लगाये, फूल खिले, पंछी भी चहके
चन्दन मिश्रित जल छिड़का, सजा दिया था पताकाओं से

शिविर-छावनी बनाने हेतु, अधिकार जिन्हें दिया गया था
आज्ञा लेकर उन सभी ने, शिविर बनाकर उन्हें सजाया

जहाँ फलों की थी अधिकता, उन प्रदेशों में शिविर लगे थे
उत्तम मुहूर्त व नक्षत्र में, प्रतिष्ठा की फिर वास्तुविदों ने

बने मार्ग में वे निवेश तब,  इंद्र पुरी सी शोभा पाते
चारों ओर खाइयाँ खोदीं, मिट्टी् के कई ढेर लगवाये

नीलमणि प्रतिमाएं शोभित थीं, उन खेमों के भीतर सुंदर
गलियों, सडकों से शोभा थी, सुंदर प्राकारों से घिरकर

पताकाओं से सजे हुए थे, विश्रामगृह  सड़क किनारे
था स्थान कबूतरों का भी, शोभित होते थे खेमे सारे

वृक्षों और वनों से सशोभित, शीतल-निर्मल जल से पूरित
मत्स्यों से व्याप्त गंगा के,  बना था राजमार्ग वह तट पर

कुशल कारीगरों ने उसका, निपुणता से निर्माण किया था
चाँद-तारों से मंडित नभ सम, रात्रि काल में शोभित होता

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Monday, April 22, 2019

भरत का श्रीराम को ही राज्य का अधिकारी बताना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


एकोनाशीतितमः सर्गः

मंत्री आदि का भरत से राज्य ग्रहण करने के लिए प्रस्ताव तथा भरत का अभिषेक-सामग्री की परिक्रमा करके श्रीराम को ही राज्य का अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लाने के लिए चलने के निमित्त व्यवस्था करने की सबको आज्ञा देना

तत्पश्चात चौदहवें दिन, राजाधिकारी भरत से बोले
महाराज अब स्वर्गलोक गये, जो हमारे श्रेष्ठ गुरु थे

कोई नहीं राज्य का स्वामी, आप हमारे अब राजा हों 
स्वयं आपको राज्य दिया, वनवास दिया बड़े भाई को

अतः आपका राजा होना, पूरी तरह न्याय संगत है
इसे निज अधिकार में लेना, नहीं आपका अपराध है

मंत्री, स्वजन, पुरवासी भी,  सब तैयार हैं सामग्री ले
अभिषेक हेतु तत्पर होकर, राज्य राजा का ग्रहण करें

यह सुनकर उत्तम व्रतधारी, उठे भरत यह सबसे बोले
ऐसी बात नहीं कहनी थी, आप सभी तो बुद्धिमान हैं 

ज्येष्ठ पुत्र ही अधिकारी है, इस कुल की रीति यही कहती 
श्रीराम ही होंगे राजा, हर दृष्टि से ऐसा है सही

चौदह वर्षों तक वन में अब, मैं जाकर निवास करूँगा
सेना सबल तैयार करें, वन से उन्हें लौटा लाऊँँगा

अभिषेक हित इस सामग्री से, राजतिलक राम का होगा
यज्ञ से लायी जाती जो, उस अग्नि सम उन्हें लाऊंगा

मातृभाव अब शेष रहा है, कैकेयी में लेशमात्र ही
राजा होंगे राम, मैं नहीं,  इच्छा उसकी पूर्ण न होगी

कारीगर जाकर मार्ग बनाएं, भूमि को समतल कर दें
दुर्गम स्थानों के ज्ञाता हैं, रक्षकगण भी कुछ साथ चलें

राजकुमार भरत के मुख से, श्रीराम हित सुनी ये बातें
वहाँ उपस्थित लोगों ने तब, सुंदर वचन कहे ये उनसे

रहें आपके निकट लक्ष्मी, ऐसे उत्तम वचन जो कहे
श्रीराम को स्वयं ही राज्य, लौटा देना आप चाहते

आशीर्वचन जब पड़ा कर्ण में, अति प्रसन्न हुए भरत थे
उनकी ओर देख मुखड़े पर, लगे हर्षजनित अश्रु बरसने

राम को लौटा लाने वाली, सुनी बात सभी हुए सुखी
सुख से भर भरत से बोले, सभा सदस्य, मंत्री, कर्मचारी

राज्य प्रति जिनमें भक्ति भाव है, ऐसे कारीगर व रक्षक
आज्ञानुसार आपकी गये हैं, राह ठीक करने वन तक

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनासीवाँ सर्ग 
पूरा हुआ.


Thursday, April 4, 2019

भरतजी के कहने से शत्रुघ्न का मंथरा को मूर्छित अवस्था में छोड़ देना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


अष्ट सप्ततितमः सर्गः


शत्रुघ्न का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी  के कहने से उसे मूर्छित अवस्था में छोड़ देना 


शत्रुओं का दमन जो करते, उस शत्रुघ्न ने भर रोष में
कुब्जा को भूमि पर घसीटा, चिल्लायी वह बड़े जोर से

मंथरा जब घसीटी जाती, सब आभूषण टूट रहे थे
नाना तरह के वे आयोजन, पृथ्वी पर बिखर जाते थे

आभूषण के उन टुकड़ों से, राजमहल शोभित होता था
शरद काल का अम्बर जैसे, हो तारागण से सजा हुआ

तत्क्षण कैकेयी ने आकर, मंथरा को छुड़ाना चाहा
कह कठोर बातें उसको भी, भर क्रोध में उसे धिक्कारा

कैकेयी को हुई अति पीड़ा, सुनकर दुखदायी वचन वे
शत्रुघ्न के भय से थर्रा, गयी तब भरत की वह शरण में

क्षमा करो ! स्त्रियाँ अवध्य हैं, यह कहा भरत ने शत्रुघ्न को
भय अति राम की घृणा का, मातृघाती समझेंगे मुझको

कुब्जा के भी मर जाने का, समाचार मिलेगा यदि उन्हें
त्याग देंगे बोलना निश्चय, हो दुखी वे हम दोनों से

बात सुनी जब भाई भरत की, छोड़ दिया मंथरा को तब
गिर कैकेयी के चरणों में, करने लगी विलाप करुण तब

आर्त और अचेत हुई सी, कुब्जा को देख कर कैकेयी
धीरे-धीरे आश्वासन दे,  होश में उसे लाने लगी

पिजरें में बंधी क्रौंची सी, कातर दृष्टि से देख रही 
कैकेयी की वह अनुचरी, थी शत्रुघ्न से अति डरी हुई

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठहत्तरवाँ सर्ग 
पूरा हुआ.