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Friday, March 15, 2019

भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान देना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्



सप्तसप्ततितमः सर्गः

भरत का पिता के श्राद्ध में ब्राह्मणों को बहुत धन-रत्न आदि का दान देना, तेहरवें दिन अस्थि संचय का शेष कार्य पूर्ण करने के लिए पिता की चिता भूमि पर जाकर भरत और शत्रुघ्न का विलाप करना और वसिष्ठ तथा सुमन्त्र का उन्हें समझाना

दस दिन जब व्यतीत हो गये, किया ग्यारहवें दिन का श्राद्ध
आत्मशुद्धि हित अगले दिन भी, मासिक व सपिण्डीकरण श्राद्ध

धन, रत्न, अन्न, वस्त्रों संग, कई पशुओं का भी दान किया
ब्राह्मणों को विनीत भाव से, स्वर्ण-चाँदी भी प्रदान किया

पारलौकिक हित के हेतु, दास-दासियों संग दी सवारी
बड़े-बड़े घर भी दे डाले, विधिपूर्वक हर रीति पूर्ण की

प्रातःकाल तेहरवें दिन पर, भरत विलाप लगे थे करने
अस्थिसंचय हेतु जब आये, दुःख से भरे गले से कहने

सौंप दिया था पिता आपने, बड़े भाई के हाथ मुझे
कोई नहीं आश्रय अब मेरा, चले गये जब वे वन में 

जो अनाथ हुई हैं देवी, जिनका राम गया उन्हें तज के
उन कौसल्या माँ को दे पीड़ा, आप कहाँ पर चले गये

चितास्थल वह पिता का उनके, भरा हुआ था चिता भस्म से
बिखरी हुई जली हड्डियाँ, देख वहाँ डूबे अति दुःख में

दीनभाव से रोकर उस क्षण, गिरे भूमि पर होकर व्याकुल
इंद्र ध्वज खिसके ज्यों नीचे, ऊपर रखने की जिसे कोशिश 

सभी मंत्री निकट आ गये, पावन व्रत धारी भरत के 
ज्यों ययाति के निकट गये अष्टक, जब स्वर्ग से वे गिरे थे

देख भरत को शोक से व्याकुल, शत्रुघ्न भी हुए अचेत
स्मरण करके पिता स्नेह को, सुध-बुध खोकर हुए निस्तेज

किया मंथरा ने प्राकटय, कैकेयी सम ग्राह है जिसमें
डूब रहे हैं हम बेबस हो, वरदानमय शोक समुद्र में  

Monday, September 19, 2011

अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग) मोक्षसंन्यासयोग


अष्टदशोऽअध्यायः(शेष भाग)
मोक्षसंन्यासयोग

फल की इच्छा रखने वाला, धर्म, अर्थ, काम को धारे
वह धारणा शक्ति राजस, जिससे मोक्ष नहीं विचारे

जो दुर्बुद्धि पूर्ण धृति, स्वप्नों में उलझाये रखती
भय, शोक से परे न जाती, वह तामसिक कहलाती

तीन तरह के सुख भी होते, जिनसे मानव बंधा हुआ है
कभी–कभी अभ्यास से जिनके, दुखों का भी अंत हुआ है

जो सुख मिलता विषयों से, जब इन्द्रियां उनसे जुड़तीं
अमृत तुल्य लगता पहले, अंत में विष सम, सुख रजोगुणी

निद्रा, आलस और प्रमाद से, जो तामस सुख नर को मिलता
अंत हो या आरम्भ सभी दुःख, आत्मा को है मोहित करता

पृथ्वी हो या गगन अनंत, चाहे देवों का लोक हो
कोई कहीं नहीं है ऐसा, तीनों गुणों से जो मुक्त हो

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र के, कर्म स्वभाव से उत्पन्न होते
गुणों के द्वारा भेद है उनमें, भिन्न-भिन्न कर्म वे करते

अंतः करण का निग्रह करना, आत्मसंयम व पवित्रता
सहनशीलता, सत्यनिष्ठा, क्षमाशीलता और सरलता

वेद, शास्त्र, वेदों में श्रद्धा, परमात्मा के तत्व का अनुभव
ज्ञान, विज्ञान और धार्मिकता, ब्राह्मण के गुण स्वभाव गत

खेती, गोपालन, व्यापार, कर्म स्वाभाविक हैं वैश्य के
सबकी सेवा, श्रम शारीरिक, कर्म यही हैं शुद्र जनों के

अपने-अपने कर्म में रत हो, मानव सिद्धि पा सकता है
तुझसे कहता सुन हे अर्जुन, कैसे मानव तर सकता है

जिससे सारे प्राणी उपजे, जिससे यह जगत व्याप्त है
उसकी पूजा निज कर्मों से, जो करे, सहज वह उसे प्राप्त है

निज धर्म ही श्रेष्ठ है अर्जुन, चाहे कितना गुण रहित है
भली प्रकार आचरण किया हो, पर धर्म फिर भी गर्हित है

स्वधर्म निज प्रकृति से उपजा, कभी पाप में नहीं लगाता
अपने-अपने धर्म का पालन, मानव को श्रेष्ठतर बनाता

दोषयुक्त हो चाहे कितना, सहज कर्म कभी न त्यागें  
जैसे अग्नि ढकी धूम से, सभी कर्मों में दोष व्यापते