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Wednesday, December 10, 2014

इन्द्र दवारा स्वर्ग से उनके गिराए जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिए उद्योग,

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

षष्टितमः सर्गः

 विश्वामित्र का ऋषियों से त्रिशंकु का यज्ञ कराने के लिए अनुरोध, ऋषियों द्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र दवारा स्वर्ग से उनके गिराए जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिए उद्योग, फिर देवताओं के अनुरोध से उनका इस कार्य से विरत होना

नष्ट जान निज तप के बल से, महोदय संग वसिष्ठ पुत्रों को
परिचय दिया त्रिशंकु राजा का, विश्वामित्र ने तब ऋषियों को  

नृप विख्यात बड़े ही दानी, धर्मात्मा, इक्ष्वाकु वंशी
देवलोक सदेह जा सकें, यही कामना इनके मन की

ऐसा यज्ञ करें हम मिलकर, जिससे देवलोक ये जाएँ
मेरी शरण में आये हैं यह, आप भी मेरा हाथ बटाएँ  

विश्वामित्र की बात सुनी जब, किया परामर्श तब ऋषियों ने
कुशिक पुत्र बड़े हैं क्रोधी, संशय नहीं है कोई इसमें

जो भी यह कहते हैं, मानें, अग्नि सम तेजस्वी हैं ये
की अवज्ञा यदि हमने तो, रोषपूर्वक शाप दे देंगे

ऐसे यज्ञ का करें आरम्भ, सदेह त्रिशंकु जाएँ स्वर्ग
निश्चय करके ऐसा सबने, अपना कार्य किया आरम्भ

याजक हुए स्वयं विश्वामित्र, मंत्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज
कल्पशास्त्र अनुसार उन्होंने, यज्ञ किया तब विधि पूर्वक

यत्नपूर्वक मंत्रपाठ कर, किया था देवों का आवाहन
किन्तु नहीं प्रकटे थे देवता, अपना-अपना लेने भाग

क्रोध हुआ अति विश्वामित्र को, स्रुवा उठाकर वे बोले
देखो मेरे तप का बल अब, पहुंचाता तुम्हें स्वर्गलोक में

राजन निज शरीर संग तुम, स्वर्गलोक को इस क्षण जाओ
यदि मेरे तप का कुछ बल है, इसका फल इस रूप में पाओ

इतना कहते ही मुनि के, त्रिशंकु स्वर्गलोक को गये
देवों के संग कहा इंद्र ने, लौट नृप मूर्ख, तुरंत यहाँ से

गुरू शाप से नष्ट हो चुका, पुनः धरा पर जा मुँह उलटे
इंद्र के इतना कहते ही वे, त्राहि-त्राहि कर गिरे स्वर्ग से

सुनी चीख, करुण पुकार जब, कौशिक मुनि हुए क्रोधित
‘वहीं ठहर जा’, ‘वहीं ठहर जा’, राजा को किया बाधित

लटके वहीं रह गये त्रिशंकु, ध्वनि सुनी जब विश्वामित्र की
तत्पश्चात नई सृष्टि की, मुनि ने तारों, सप्तर्षियों की  

प्रजापति हों दूसरे जैसे, दक्षिण दिशा में ऋषियों के संग
नूतन सृष्टि की स्वर्ग की, देवों की रचना की आरम्भ

घबराए तब देव असुर सब, ऋषि समुदाय यही कहते
गुरुशाप से नष्ट पुण्य हैं, यह नृप स्वर्ग न जा सकते

स्वर्ग सदेह त्रिशंकु जाएँ, मैंने की प्रतिज्ञा इसकी
हो कल्याण आपका देवों, यह न अन्यथा हो सकती

सदा मिले स्वर्ग सुख इनको, सदा रहें नूतन नक्षत्र
बनी रहे नवीन सृष्टि भी, जब तक हैं ये सारे लोक

अनुमोदन तब किया बात का, ‘ऐसा ही हो’ कह देवों ने   
बनी रहेंगी सभी वस्तुएं, लोक आपके रचे हुए

वैश्वानर पथ के बाहर से, होंगे नक्षत्र सदा प्रकाशमय
उनके मध्य सर नीचा कर, त्रिशंकु भी हों ज्योतिर्मय

देवों के सम स्थिति होगी, नृप यशस्वी, श्रेष्ठ, कृतार्थ
स्वर्गीय पुरुष की भांति, करें अनुसरण इनका नक्षत्र

देवों ने फिर की स्तुति, मुनि की ऋषियों के मध्य
हो प्रसन्न किया स्वीकार, देवों का यह मन्तव्य


इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ

Saturday, November 17, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्-महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेधयज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्

बालकाण्डम् 


चतुर्दशः सर्गः

महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेधयज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान 


चयन द्वारा सम्पादित अग्नि, स्थापित की कुशल द्विजों ने
पूर्वाभिमुख गरुड़ सी लगती, जो पंख, पुच्छ फैलाकर देखे

सुवर्ण ईंट से पंख बने थे, गरुड़ाकृति अग्नि लगती थी
अठारह प्रस्तारों वाली वह, अश्वमेध के योग्य सजी थी

पूर्वोक्त यूपों में वहाँ पर, शास्त्र विहित पशु बांधे थे
सर्प और पक्षी भी कुछ, देवताओं हित वहाँ बंधे थे

शामित्र कर्म में यज्ञिय अश्व, कूर्म आदि जलचर भी थे
शास्त्रविधि से उन सबको, बांधा था वहाँ ऋषियों ने

 बंधे हुए थे पशु तीन सौ, उन यूपों में उस काल में
राजा का वह अश्वरत्न भी, बंधा हुआ था उसी स्थान में

संस्कार युक्त प्रोक्षण आदि, किया तब कौशल्या रानी ने
तीन बार स्पर्श किया फिर, हो प्रसन्न तीन तलवारों से

धर्मपालन की इच्छा रखकर, रानी कौशल्या थी आयी
सुस्थिर चित्त से निकट अश्व के, एक रात्रि वहीं बितायी

कौशल्या, वावाता, परिवृत्ति, तीन जाति की महिलाओं से
स्पर्श कराया उस अश्व का, होता, अध्वर्यु, उद्गाता ने

तत्पश्चात जितेन्द्रिय ऋत्विक ने, विधिपूर्वक था जिसे निकाला
शास्त्र विधि से उसे पकाया, वह गूदा लेकर अश्वकन्द का

उस गूदे की दी आहुति, फ़ैल गया था उसका धुआं
पाप दूर करने के हित ही, राजा ने था उसको सूंघा

अंगभूत अश्वमेध यज्ञ के, जो-जो भी हवनीय पदार्थ थे
सोलह ऋत्विज ब्राह्मण मिलकर, विधिवत् अग्नि में आहुति दें


Monday, March 12, 2012

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

उपदेश का उपसंहार (शेष भाग)

नट जैसे पुरुष ही रहता, स्वांग करे या रहे अयुक्त
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है, उपाधि युक्त हो या हो मुक्त

जहाँ-तहाँ ज्यों पत्र गिरे हों, सूखे हुए किसी वृक्ष के
उसका तन भी दग्ध हुआ है, चाहे गिरे किसी स्थल पे

वृक्ष का सूखा पत्ता चाहे, कहीं भी गिरे न पड़ता अंतर
नाली, नदी, शिवालय में या, गिरे किसी चबूतरे पर

सत्स्वरूप में हुआ वह स्थित, देह भाव से मुक्त हुआ वह  
कहीं भी त्यागे देह, न अंतर,  देशकाल न देखे वह

हृदय की अविद्या ग्रंथि, जिसकी नष्ट हुई वह मुक्त
देह त्याग नहीं है मोक्ष, रहता वह आनंद से युक्त

वृक्ष के पत्ते, पुष्प, डाल सम, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ मिटते
आनंद रूप आत्मा अमर है, उसे न देखा किसी ने मरते

आत्मा का लक्षण प्रज्ञानघन, उसकी सत्यता को बतलाता
अविनाशी है यह आत्मा, उपाधि का ही नाश है होता

जैसे अन्न अग्नि बन जाता, जब अग्नि में उसे डालते
देह आदि भी ज्ञानाग्नि में, भस्म हुए परम हो जाते

सूर्य उदित होने पर जैसे, अंधकार का नाश हो जाता
ज्ञान हुए से दृश्य प्रपंच, ब्रह्म में ही लीन हो जाता

घट के नाश हुए से जैसे, घटाकाश, महाकाश बनता
लय होता जब उपाधि का, ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हो जाता

एक हुआ दूध मिल दूध, तेल, तेल से मिलकर एक
आत्मा में मिल ज्ञानी आत्मा, जल, जल से मिलकर हो एक

एक अखंड सत्ता शेष हो, वही विदेह-कैवल्य कहलाता
ब्रह्म भाव को प्राप्त हुआ जो, भव बंधन से मुक्त हो जाता

ब्रह्म-आत्मा के ऐक्य से, दग्ध हुए अज्ञान, अविद्या
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हुआ फिर, जन्म न फिर होता है उसका