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Monday, April 9, 2012

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्



श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
नारद जी का वाल्मीकि मुनि को संक्षेप से श्रीरामचरित्र सुनाना 


धर्म बंधन में बंधे थे राजा, सत्य वचन से कैसे डिगते
दिया राम को वास वनों का, कैकेयी को दो वर दे के

राजा के प्रण के अनुसार, कैकेयी का प्रिय करने हित
राम चल पड़े थे वन को, प्रतिज्ञा पूरी करने हित

विनयशील सुमित्रानन्दन, अति प्रिय थे जो राम को
सुबन्धुत्व का परिचय देकर, राम सँग चले थे वन को

जनकनन्दिनी सीता सुन्दरी, शुभलक्षणा, अति उत्तमा
प्राणों से बढ़कर प्रिय पत्नी, पति का हित ही जिसने चाहा

ज्यों रोहिणी चन्द्र के पीछे, सीता चलीं राम के पीछे
पिता ने भेजा सारथि अपना, पुरवासी गए उनके पीछे

श्रंगवेरपुर गंगातट पर, प्रिय निषादराज गुह पाकर
विदा किया सारथि राम ने, चारों गए नदी पार कर 

Wednesday, March 14, 2012

शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

पिछले वर्ष अक्तूबर की २३ तारीख को मैंने यह श्रृखला आरम्भ की थी. आज १४ मार्च २०१२ को इसका अंतिम भाग प्रस्तुत कर रही हूँ. आप सभी का सहयोग मिला और यह कार्य सम्पन्न हुआ. आगे भी इसी तरह का कार्य करने की इच्छा है आपमें से कोई सुझाव दें तो स्वागत है.

 श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि


उपसंहार
शिष्य विदा, अनुबंध चतुष्टय, ग्रंथ प्रशंसा

बंधन, मुक्ति हैं माया में, नहीं आत्मा में हो सकते
सर्प का होना या न होना, भ्रम है क्रिया हीन रज्जु में

बंधन है अज्ञान के कारण, दूर हुआ तो मुक्ति घटती
ब्रह्म को कैसे ढके आवरण, द्वैत नहीं मानती श्रुति

सूर्य को ढका हम कहते, चाहे मेघ ढके आँखों को
ब्रह्म को न ढक सकता कोई, बुद्धि के ही गुण हैं दोनों

ब्रह्म सदा एक अविनाशी, होना, न होना न उसमें
बुद्धि में ही भाव, अभाव, बंध, मोक्ष कल्पित माया में  

निर्मल, शांत, निरंजन, है वह, नभ जैसा विस्तीर्ण विशाल
निरवयव, निष्क्रिय ब्रह्म में, कैसे हो कल्पना जाल

नहीं नाश होता है उसका, ना मृत्यु ही संभव है
न कोई साधक न मुमुक्षु, सदा आत्मा मुक्त ही है

दोष रहित, हे तृष्णा शून्य, तुझे पुत्र समान ही जान
गुह्य ज्ञान कहा है मैंने, सकल शास्त्र का अनुपम सार

शिष्य की विदा

किया शिष्य ने नमन गुरु को, मुक्त हुआ किया प्रस्थान
आनंद मग्न हुए गुरुवर भी, धरती पर फिर करें विहान

आत्मज्ञान का यह निरूपण, कहा गया साधक के हित में
बोध करें सुगमता से वह, पढ़ संवाद गुरु-शिष्य में

शास्त्र श्रवण से हुए शुद्ध जो, शांत चित्त, मुमुक्षु जन
 हितकारी उपदेश को पढ़कर, करें ज्ञान का समुचित आदर

जग के पथ में दाह बहुत है, हैं दुःख रूपी सूर्य की किरणें
जल की इच्छा से भ्रमते हैं, मरुथल में जन थके-थके से

अति निकट ही ब्रह्म सिंधु है, जिसमें भरा है अमृत सा जल
शंकराचार्य की मोक्ष प्रदायिनी, वाणी देती है अद्भुत फल   

इति

Wednesday, January 25, 2012

आत्मानुभव का उपदेश


श्री मद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित
विवेक – चूड़ामणि

आत्मानुभव का उपदेश

बंधन, मोक्ष, तृप्ति और चिंता, स्वयं ही जाने जाते हैं
स्वास्थ्य लाभ या भूख लगी हो, दूजे अनुमान लगाते हैं

श्रुति सम गुरु भी बोध कराते, ब्रह्म का केवल शब्द ज्ञान से
स्वयं को ही अनुभव करना है, प्रभु कृपा से दिव्य भान से

निज अनुभव जब हो जाता है, सिद्ध हुआ साधक हो हर्षित
निर्विकल्प हुआ वह साधक, रहे आत्मा में ही स्थित

जीव और जगत सारा यह, ब्रह्म ही है कुछ और नहीं
अद्वितीय उस ब्रह्म में रहना, मोक्ष यही कुछ और नहीं

बोधोपल्ब्धि  

गुरु के शब्द सुने शिष्य ने, चित्त और इन्द्रियाँ हुईं शांत
आत्मस्वरूप में टिक जाता वह, निश्चल वृत्ति से हो स्थित

परब्रह्म में चित्त समाहित, परमानंद को पाकर हर्षित
बुद्धि खो गयी ज्ञान को पाकर, कहने लगा शिष्य हो चकित

विषयों में न रस कोई है, न यह और न वह मैं मानूँ
कैसा और कहाँ से आया, परम हर्ष यह कैसे जानूँ

जैसे ओला गल जाता है, सागर की जल राशि में
वैसे ही है लीन हुआ, मन आनंद सिंधु अंश में