श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अरण्यकाण्डम्
पंचविंश: सर्ग:
राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचंद्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार
अग्रगामी सैनिकों के साथ, खर ने श्रीराम को देखा
धनुष उठा, चढ़ा कर प्रत्यंचा, सारथी को तब दी आज्ञा
रथ ले चला राम के सम्मुख, जो अकेले ही खड़े हुए थे
शत्रुघाती श्रीरामचंद्र तब, धनुष की टंकार करते थे
खर को देख निकट राम के, श्येनगामी मंत्री भी आये
सिंहनाद कर खर को घेर वे, चारों ओर खड़े हो गये
तारों में मंगल ग्रह जैसा, शोभित होता था खर उनमें
बलशाली राम को देखा, उसी समय गर्जना की उसने
भरे क्रोध में सभी निशाचर, अस्त्र-शस्त्र की वर्षा करते
मुगदर, शूल, प्रास, और खड्ग, फरसों का प्रयोग भी करते
काले, विशालकाय वे निशाचर, चारों ओर से टूट पड़े
मेघ बरसते ज्यों पर्वत पर, बाणों की वे वृष्टि करते
ज्यों प्रदोष की तिथियों में, शिवजी को उनके पार्षद घेरें
उसी प्रकार वे सब राक्षस, राम को घेरे हुए खड़े थे
किंतु राम ने उन अस्त्रों को, निज बाणों से ग्रस्त कर लिया
जैसे नदियों के प्रवाह को, सागर ने है आत्मसात् किया
यद्यपि उनका बदन घायल था, व्यथित या विचलित नहीं हुए
जैसे वज्र का आघात सह, पर्वत अडिग बने हैं रहते
लहुलुहान हो रहे थे राम, अस्त्र-शस्त्रों के आघात से
संध्याकालीन मेघ से घिर, सूर्यदेव सम शोभित होते
श्रीराम को देख अकेले, सहस्र शत्रुओं से घिरे हुए
देव, सिद्ध, गंधर्व, महर्षिगण, सभी विषाद में डूब गये
तत्पश्चात् कुपित हो राम ने, अपने धनुष को इतना खींचा
बलशाली वह धनुष राम का, गोलाकार दिखाई पड़ता
फिर तो वह उस धनुष से अपने, पैने बाण छोड़ते जाते
जिन्हें रोकना अति कठिन था, कालपाश से जो भीषण थे
चील के पंखों वाले बाण, खेल-खेल में उन्होंने छोड़े
लीलापूर्वक छोड़े गये वे, प्राण राक्षसों के लेते थे
राक्षसों के शरीर को बेध, खून में डूबे हुए बाण वे
अग्नि के समान चमकते, जब भी आकाश में जा पहुँचते
मंडलाकार धनुष से उनके, कई बाण छूटते जाते
ढाल, कवच, ध्वजा शत्रु की, खर की सेना को विक्षत करते
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