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Wednesday, June 10, 2026

श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः


श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अरण्यकाण्डम्

षड् विंश: सर्ग: 



श्रीराम के द्वारा दूषण सहित चौदह सहस्र राक्षसों का वध 


बुरी तरह से मारी जाती, सेना को दूषण ने देखा 

पाँच हज़ार सैनिकों को तब, उसने राम से लड़ने भेजा 


युद्ध में पीछे कभी न हटें, महाभयंकर बलशाली थे 

चारों ओर से श्रीराम पर, लगे अस्त्र की वर्षा करने 


वृक्षों और शिलाओं की उस, बारिश को बाणों से रोका 

आँखें मूँदें सांड की भाँति, श्रीराम ने क्रोध उपजाया 


अति क्रोधित होकर श्रीराम ने, बरसात बाणों की कर दी 

 सभी ओर से हुई पीड़ित, दूषण सहित उसकी सेना भी


दूषण ने भी क्रोधित होकर, वज्र सरिस बाणों से रोका 

क्षुर नामक बाण से राम ने, उसका धनुष भी काट डाला 


चार सायकों से घोड़े व, एक से सिर काटा सारथि का 

तीन बाण छोड़े छाती में, दूषण तब रथहीन हो गया 


सोने के पत्र मढ़े थे जिसपर, ऐसा परिघ लिया हाथ में 

लोहे की कीलें लगी थीं, वज्र समान था वह छूने में 


अति भयंकर सर्प के समान, परिघ से उसने किया आक्रमण 

श्रीराम ने जब यह देखा, कर दीं उसकी भुजाएँ विदीर्ण 


उसके हाथ से खिसक के परिघ, इन्द्रध्वज समान गिर पड़ा 

ज्यों दंतविहीन हाथी गिरता, भुजा विहीन दूषण हो गया 


धराशायी दूषण को देख, साधु-साधु कह हुई प्रशंसा 

सभी प्राणियों को हर्ष था, श्रीरामचन्द्र की देख वीरता 


महाकपाल, स्थूलाक्ष और, प्रमाथी नामके तीन राक्षस 

काल के फंदे में फँस मानो, करने लगे प्रहार राम पर 


महाकपाल ने शूल पकड़ा था, पट्टिश लिया स्थूलाक्ष ने 

किया प्रहार श्रीराम पर, फरसे से प्रमाथी राक्षस ने 


 तीनों को आया देखकर, तीखे सिरे वाले बाणों से 

 अतिथियों सा उन तीनों का, किया था स्वागत श्रीराम ने


महाकपाल का मस्तक काटा, प्रमाथी पर तीर चलाये 

स्थूलाक्ष की आँखें हुईं घायल, तीनों ही मार गिराए 


उसके बाद कुपित राम ने, सेना पर कई बाण चलाये 

पाँच हज़ार की उस सेना को, यमलोक के द्वार दिखाए 


दूषण व उसकी सेना के, ख़त्म होने को खर ने जाना 

शीघ्र करो राम का वध तुम, बची सेना को आदेश दिया 


श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, तृहंगम, दुर्जय, सर्पास्य  

कारविरक्ष, परुष, कालकर्मुक, हेम, महामाली, रुधिराशन 


बारह महापराक्रमियों के  संग, खर ने अब धावा बोला 

अग्नि समान बाणों से राम ने, उन सबका संहार किया 


बड़े-बड़े वृक्षों का जैसे, वज्र विनाश कर देता पल में  

श्रीराम ने उनको मारा, स्वर्णपांख से युक्त बाणों से 


कर्णिनामक सौ बाणों से, सौ राक्षसों का किया विनाश 

सहस्र राक्षसों का संहार, उतने बाणों से कर डाला 


निशाचारों के कवच, आभूषण, धनुष आदि सब टूट गये 

खून से लथपथ होकर वे सब, धरती पर विश्राम पा गये 


ढकी कुशों से ज्यों वेदी हो, खुले केश निशाचर लगते थे 

रक्त, मांस की कीचड़ मच गई, नरक समान वन लगते थे 


मानवरूप धारी श्रीराम, पैदल और अकेले भी थे 

चौदह हज़ार राक्षसों को मारा, जो क्रूर कर्म करते थे 


खर व त्रिशिरा बचे जीवित थे, उस विशाल सेना में उनकी 

एक विशाल रथ ले आया खर, मानो आया हो इंद्र ही 



इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के 

अरण्यकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।


Saturday, January 30, 2021

सेना सहित भरत की चित्रकूट यात्रा का वर्णन

 

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः

श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्

अयोध्याकाण्डम्

त्रिनवतितम: सर्ग: 

सेना सहित भरत की चित्रकूट यात्रा का वर्णन 


हो विशाल सेना से पीड़ित, हाथी यूथ संग भाग चले 

रीछ, रुरु, चितकबरे मृग कई, तट, वन, पर्वत में व्यथित हुए 


कोलाहल करती चलती थी, चतुरंगिणी विशाल वह सेना 

ज्यों आकाश को ढकते बादल, दूर तक भूभाग ढक गया  


दशरथ नंदन भरत जा रहे, हो अति प्रसन्न घिरे सेना से 

अश्व, गजों से भरी महान, आती नहीं थी पूर्ण दृष्टि  में 


दीर्घ मार्ग तय करने पर जब, सवारियाँ हुईं थीं अति क्लांत 

कहा भरत ने मुनि वसिष्ठ से, शायद यही है गन्तव्य स्थान 


जैसा किया था मुनि ने वर्णन, वैसा है स्वरूप यहां का 

मन्दाकिनी नदी बहती है, दर्शन चित्रकूट पर्वत का 


नील मेघ सा शोभित होता, वन पर्वत के आसपास का 

अवमर्दन करते हैं हाथी, ऊँचे पर्वत के शिखरों का 


शत्रुघ्न से कहा भरत ने, देखो पर्वत की घाटियों में  

मगरों से ज्यों भरा हो सागर, भरी हुई अब हैं सेना से  


किन्नर जहाँ विचरण करते हैं, भाग रहे झुंड मृगों के 

जैसे शरतकाल में बादल, हों शोभित जब उड़ें पवन से 


ये सैनिक या वृक्ष मस्तक पर, पुष्पों को धारण करते हैं 

 मेघ समान ढाल धारे ज्यों, दक्षिण भारतीय रहते हैं 


जनशून्य यह जंगल पहले, अति भीषण प्रतीत होता था 

वही भरा है अब लेगों से,  जान पड़े अयोध्या पुरी सा 


घोड़ों की टापों से उड़ी जो, धूल गगन को ढक लेती है 

हवा उसे मेरा प्रिय करती, शीघ्र दूर उड़ा देती है 


श्रेष्ठ सारथियों से संचालित, जुटे अश्व से रथ चलते हैं 

अति सुंदर  जो लगें दृष्टि को, मोर सैनिकों से डरते हैं 


ऐसे ही तुम जरा निहारो, निज आवास को उड़ते पक्षी

देश अति मनोहर है यह, सत्य ही स्वर्गीय पथ यह स्थली  


मृगियों संग विचरण करते, चितकबरे मृग मनोहर लगते 

मानो इन्हेँ किया हो चित्रित, सुसज्जित सुंदर फूलों से 


आगे बढ़ें हमारे सैनिक, जाकर और वनों में खोजें 

पुरुषसिंह राम, लक्ष्मण को हम, अति शीघ्र जिससे हम पा लें 


भरत का यह वचन सुना तो, शूरवीर हथियार लिए कई 

उस वन में प्रवेश कर गए, जहाँ धुआँ उठता दिया दिखाई 


देख धूमशिखा को लौटे, कहा भरत से, वहाँ कोई है 

मानव बिना अग्नि नहीं सम्भव, राम, लक्ष्मण वहीं बसे हैं 


यदि वे दोनों न भी हुए, कोई तपस्वी जन तो होंगे 

आगे अब मैं ही जाऊंगा, सुन यह  बात कहा भरत ने


सावधान हो तुम ठहरो, मेरे साथ सुमन्त्र, धृति होंगे 

भरत ने धूएँ को तब देखा, सैनिक सभी वहीं ठहर गए


हर्षपूर्वक वहीं खड़ी थी, सेना भू का निरीक्षण करती 

सबको यह ज्ञात हुआ था, शीघ्र आएगी घड़ी मिलन की  


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Tuesday, September 16, 2014

अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना

श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 

पंचपञ्चाशः सर्गः

अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके महादेवजी से दिव्यास्त्र पाना तथा उनका वसिष्ठ के आश्रम पर प्रयोग करना एवं वसिष्ठ जी का ब्रह्म दंड लेकर उनके सामने खड़ा होना

विश्वामित्र के अस्त्रों से जब, घायल होकर हुए वे व्याकुल
और सैनिकों की सृष्टि कर, कहा धेनु को लगा योगबल

फिर हुंकार किया गाय ने, जिससे उपजे थे कम्बोज
सूर्य समान तेजस्वी थे वे, बर्बर हुए थनों से उत्पन्न

योनि देश से यवन हुए थे, शकृदेश से शक आये
रोमकूप से उपजे म्लेच्छ, हारीत और किराट हुए

रघुनन्दन उन सब वीरों ने, तब भारी प्रहार किया
पैदल, हाथी, घोड़े, रथ संग, सेना का संहार किया
  
अति कुपित हो सौ पुत्र तब, टूट पड़े वसिष्ठ मुनि पर
हुंकार मात्र से ही मुनि ने, भस्म किया उन्हें जलाकर

दो ही पल में भस्म हुए वे, नष्ट हुए सेना के संग
लज्जित हुए विश्वामित्र तब, शांत हुआ तब उनका वेग

दंत विहीन सर्प समान, राहु ग्रस्त सूर्य की भांति
हुए तत्काल निस्तेज वे, पंख कटे पक्षी की भांति

नष्ट हुआ था बल सारा, उत्साह भी नष्ट हुआ
खिन्न हुए थे मन ही मन वे, एक पुत्र ही शेष रहा

राजा के पद पर बैठा कर, आज्ञा दी उसको शासन की
गये हिमालय तप करने वे, पूजा करते महादेव की

प्रकट हुए भगवान वृषभ ध्वज, जब बीता था कुछ काल
पूछ तप करने का कारण, थे उत्सुक वर देने तत्काल

कर प्रणाम कहा मुनि ने, यदि आप संतुष्ट हैं मुझसे
अंग, उपांग, व सहित उपनिषद, धनुर्वेद मुझे प्रदान करें  


Friday, April 26, 2013

राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इंकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना


श्री सीतारामाचन्द्राभ्या नमः
श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्
बालकाण्डम् 


विंश सर्गः

राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इंकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना
विश्वामित्र की बात सुनी जब, दो घड़ी तक रहे अचेत
दारुण दुःख झेला राजा ने, बोले होकर पुनः सचेत

सोलह वर्ष का नहीं हुआ है, कमलनयन राम है छोटा
राक्षस से युद्ध वह करे, नहीं है उसमें यह योग्यता

मेरे पास अक्षौहिणी सेना, जिसका पालक व स्वामी मैं
इस सेना को लिए साथ, युद्द करूँगा उनसे स्वयं मैं

शूरवीर सैनिक मेरे ये, अति कुशल, पराक्रमी भी
राक्षसों से युद्ध करेंगे, इनका जाना ही उचित भी

लिए हाथ में धनुष स्वयं मैं, युद्ध करूँगा निशाचरों से
जब तक देह में प्राण रहेंगे, यज्ञ की रक्षा होगी मुझसे

नियम आपका पूरा होगा, बिना किसी भी भय, बाधा के
राम को न ले जाएँ आप, मैं चलूँगा संग आपके

राम अभी बालक है छोटा, विद्या युद्ध की नहीं जानता
न ही अस्त्र चलाना, न ही, बलाबल शत्रु का जानता

नहीं योग्य है युद्ध कला के, राक्षस माया बड़ी जानते
राम वियोग मुझे है भारी, जीवित रहूँ न बिन इसके

बहुत हुई है आयु मेरी, कठिनाई से पायी सन्तान
यदि इसे ले जाना चाहें, सेना संग, मैं करूं प्रयाण

चारों पुत्रों में ज्येष्ठ राम, है उस पर प्रेम सर्वाधिक
हैं कौन वे निशाचर ?, किसके पुत्र व किससे रक्षित ?  

संग लिए अपनी सेना को, मायायोधी उन राक्षसों से
हे ब्रह्मन ! कहें आप ये, कैसे उनसे युद्ध करूं मैं